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Sunday, October 18, 2015

अब गाय गाँव आएगा क्या ?

     बहुत साल हुए हम लोग पटियाला जा रहे थे कि छोटे बेटे प्रद्युम्न जो कि चार साल का था, ने रोना शुरू कर दिया। उसकी मांग और जिद थी कि वह कार  की सीट के नीचे घुसेगा और वहीँ सोयेगा भी। मनाने पर भी मान नहीं रहा था। तभी मेरी नज़र माइल -स्टोन पर पड़ी। जिस पर लिखा था, 'गिदड़बाहा 'पांच किलोमीटर !
      मुझे अचानक एक युक्ति सूझी और बोल पड़ी, " देखो मानू अब गीदड़ गाँव ( गिदड़बाहा निवासियों से क्षमा सहित ) आएगा ! यहाँ हर जगह गीदड़ ही गीदड़ होते हैं। ट्रक में, ट्राली में, सब जगह गीदड़ ही दिखाई देंगे। "
  वह मान भी गया। कार से बाहर झांकते -झांकते कब उसको नींद आ गई और हमने चैन की साँस ली।
  संयोगवश उस दिन धनौला में पशु मेला था। वापस आते हुए हमें ट्रक ,ट्रालियों आदि में गायें जाती हुई दिखी।  हम भूलचुके थे कि हमने क्या कहा था। मानू बहुत ध्यान से देखते हुए, मेरे मुहं को अपनी तरफ करते हुए बोला, " मम्मा अब गाय गाँव आएगा क्या ?"


Saturday, October 17, 2015

माँ का वो छोटा सा बक्सा (लघु कथा )


     आज माँ की तेरहवीं थी। हम सभी भाई बहन माँ के सामान को देख रहे थे। उनकी अलमारी खोल रखी थी। मेरे लिए यह बहुत दुःखद पल थे। मन था कि मानने को तैयार ही नहीं कि अब माँ नहीं रही। सामान देखते -देखते एक लकड़ी का छोटा सा, पुराने ज़माने का नक्काशी दार डिब्बा बक्से नुमा डिब्बा दिखा ।  हम सबको कौतूहल जगाता था अलमारी में रखा  माँ का वो छोटा सा बक्सा ! माँ का उसे किसी का भी हाथ लगाना तो दूर देखना तक भी गवारा न था माँ को।
         माँ का अस्थियों के साथ उस बक्से का विसर्जन भी माँ की अंतिम इच्छा थी।
    एक बार बाबूजी ने बताया था कि  छोटी उम्र में माँ ने, अपनी माँ को खो दिया था।  उनको बताया गया कि वह कहीं दूसरे शहर गई है। उसने माँ को बुलाने के लिए ख़त लिखने शुरू किये।  कुछ समझ आने पर  एक दिन उन्होंने अपने बाबूजी की अलमारी में वे ख़त पड़े देखे तो बिन कहे ही  वह समझ गई कि माँ भगवान के घर चली गई। डिब्बे में सहेज कर रख लिया माँ ने उन खतों को।  उस दिन से वे ख़त, ख़त ना होकर उसकी माँ का प्यार और स्नेह हो गया। उसे लगता कि कोई उन ख़तों को देखेगा या छुएगा तो माँ चली जाएगी।
  " ओह यह बक्सा ! चलो इसे भी माँ की अस्थियों के साथ विसर्जित कर देंगे।" बड़े भैया बोले।
" लेकिन भैया ! इसे तो  मैं रखना चाहती हूँ ! इसमें माँ के प्राण बसे थे और मैं माँ के प्राणों में ! अलग हुई  तो क्या मैं जी पाऊँगी ! "
" पर माँ की इच्छा !"
" वह मेरे मरने पर पूरी  हो जाएगी !"
" अरे बिटिया ! ऐसे नहीं कहते ! तेरी माँ तुझ से दूर कैसे रहेगी, रख ले तू ही इसे !" बाबूजी मेरे सर पर हाथ रख बोले। बाबूजी के साथ -साथ मैं भी सुबक पड़ी। मैंने डिब्बे को अपने सीने से लगा लिया जैसे माँ ने गले लगा लिया हो।

     उपासना सियाग

Wednesday, September 30, 2015

घूंघट के पट् खोल रे....



    गली के चौकीदार की  रात के सन्नाटे को चीरती हुई  तेज सीटी की आवाज़ ने  माधव जी को जैसे खीज़ा दिया हो । चादर हटा कर बिस्तर से उठ गए।
" अरे भई, जाग ही तो रहा  हूँ ! आधी रात को भी चैन नहीं इन लोगों को !" आदतन बड़बड़ा दिये।
"चौकीदार का काम भी तो यही है माधव जी ! कोई जागे ना जागे ! " राधिका जी की आवाज़ गूंजी।
पत्नी की आवाज़ सुन कर चौंक कर उन्होंने लाईट जलाई। हैरान हो देखने लगे। लेकिन पत्नी कहाँ थी वहां !उसे तो दो साल हुए गुज़रे हुए। हाँ, जब वह थी, तब यही तो कहा करती थी।
      याद कर के उनका मन भर आया। सामने उसकी तस्वीर थी , चंदन की माला चढ़ी।
" देख लेना जब मैं ना रहूंगी, तुम मेरी तस्वीर को देख कर रोया करोगे ! "
"क्यों रोऊंगा ! मैं पहले जाऊंगा तुमसे !"
" अजी रहने दीजिये ! भगवान भी डरता है आप जैसे खतरनाक पुलिस वाले से ! "
तब तारीफ सुन कर माधव जी मूंछो ही मूंछो में मुस्कुरा दिया करते थे ।
" लेकिन राधिका मैं तुम्हारे साथ तो हमेशा अच्छे से ही रहा था, फिर तुम क्यों मुझे छोड़ कर चली गई ?" गला भर्रा गया।
  "आपके साथ मैं ही तो रह सकती हूँ, और कोई नहीं ! बच्चों पर रोब जमाना छोड़ कर दोस्ताना व्यवहार करना सीखिये। घर को तो पुलिस विभाग मत समझिए। बच्चे तो घोंसले की चिड़ियाँ है आज पास हैं, कल अपने दाने -पानी की तलाश में उड़ जाएंगे । आपका प्यार ही याद रहेगा इनको। "
   राधिका जी अक्सर समझाती थी। लेकिन माधव जी में तो एक अहम् ने सा घर किया हुआ था जो उन्हें किसी के भी आगे झुकने को रोकता था। यह तो राधिका जी थी जो ढाल बनी रहती।बच्चों और रिश्तेदारों के आगे।
      राधिका को भी एक दिन भगवान के घर से बुलावा आ गया। उनको जाना ही पड़ा। ना साथ कोई आया है ना ही साथ कोई जायेगा। चली गई वह भी।  कहाँ तो वह माधव जी की आज्ञा बिना कही भी नहीं जाती थी और अब बिन कहे ही राम जी के घर चल दी।
       बच्चे अपने ठौर -ठिकानो पर व्यस्त थे। माँ के मरने पर सभी आये। माधव जी को भी साथ चलने को कहा। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
  "नहीं जाऊंगा मैं ! रह सकता हूँ अकेला, यहाँ मैं सदा से रहता आया हूँ ,मेरे दोस्त हैं, परिचित हैं ! "
"लेकिन बाबूजी आखिर में तो हम ही काम आएंगे ना ! आप साथ रहोगे तो बच्चों को भी अच्छा लगेगा। आप जिस के साथ रहना चाहे बता दीजिये, लेकिन आप हमारे साथ चलिए  ! हम यह घर नहीं बेचेंगे, जब आपका मन हो दो-चार दिन के लिए रहने आ जाया करेंगे। "
   "बाबूजी आप भाई लोगों के साथ नहीं जाना चाहते तो आप मेरे साथ चलिए। आप बेटी के यहाँ भी रह सकते हैं। "
 " मुझे अपने  बेटों से कोई  शिकायत नहीं है लेकिन मैं किसी के भी साथ जाना  नहीं चाहता !"
बेटी - बेटे सभी ने बहुत अनुरोध किया लेकिन माधव जी ने तो मानना ही नहीं था। वह किसी का सहारा लेना अच्छा नहीं समझते थे।
       बच्चों के जाने बाद वह सच में ही अकेले हो गए। पहले पत्नी थी तो अहसास नहीं हुआ कि वह अकेले हैं।
       एक बहादुर था उनके काम करने को। सुबह-शाम तो बाहर घूम कर समय  निकल जाता लेकिन लम्बी दोपहरी और रातें कैसे निकालते। टीवी पर समाचार देखने के अलावा कुछ भी पसंद नहीं था। धारावाहिक और मूवी देखना वह वाहियात समझते थे। एक-आध बार कोशिश  भी की थी। लेकिन रंगबिरंगे पुते हुए चेहरे और उनकी साजिशे देख मन उकता  गया।
        किसी मित्र ने सलाह दी कि कुत्ता ही पाल लो। वह भी उनको पसंद नहीं था।
"आप भी ना कैसे इंसान है ! ना जाने किस घडी और किस मिटटी से आपको परमात्मा ने बनाया है, कोई चीज़ पसंद ही नहीं है, हर बात -चीज़ हम अपनी शर्तों के अनुसार तो नहीं कर सकते। कभी वक्त के साथ बह भी तो देखो कितना अच्छा लगेगा।" राधिका जी कई बार नाराज़ हो उठती थी। उनको सुनाते हुए गुनगुना उठती थी कि 'घूंघट के पट् खोल रे तुझे पिया मिलेंगे !"
      राधिका जी की तस्वीर देखना और बातें करना ही उनका पसंद का काम बन गया था। आज भी खड़े थे कि टेलीफोन की घंटी ने तन्द्रा भंग कर दी।
  "आधी रात को किसका फ़ोन आया है।" फोन की तरफ बढ़े।
समय ज्यादा नहीं था, रात के ग्यारह ही बजे थे.शहर में रात को नौ बजे तो शाम शुरू होती है। यह तो माधव जी के लिए कुछ करने को नहीं था और वह शहर के जिस हिस्से में रहते हैं वहां ज्यादा आबादी भी नहीं है।
   " हेलो !" रौबीली आवाज़ गूंजी माधव जी की।
"आप कौन ?"
"  फोन तो आपने किया है,  मैं क्यों बताऊँ कि मैं कौन हूँ  ? "
" मैं अनमोल बोल रहा हूँ !"
" हाँ तो बोलो, लेकिन मैं तो किसी अनमोल को नहीं जानता ! काम क्या है ? मुझे जानते हो क्या तुम ?"
" नहीं जानता !"
" फिर आधी रात को किसी को  परेशान करने का क्या मतलब है ?"
" परेशान तो मैं हूँ !"
उधर से बहुत प्यारी और मासूम आवाज़ थी। शायद कोई बच्चा बोल रहा था। माधव जी को वह आवाज़ बहुत प्यारी और आत्मीय सी लगी, पूछ बैठे ,"क्या परेशानी है ?"
"आपकी उम्र क्या है अंकल ?"
"मेरी उम्र से तुम्हारी परेशानी से क्या लेना है ?"
" इसलिए कि मैं जिन  से बात कर रहा हूँ वह अंकल है या दादा जी की उम्र के हैं, यह मालूम होना चाहिए !"
"हा हा ! बहुत बढ़िया !फिर तो मैं तेरे दादा की उम्र का हूँ । "
माधव जी को हंसी आई तो कुछ हल्का पन सा महसूस हुआ। कभी किसी से आत्मीयता से बात की होती तो मालूम होता न !
" तो मैं आपको दादा जी बोलूं ?"
"हाँ बोलो !"
"तो दादा जी ! मेरे मम्मा और पापा तो पार्टी में गए हैं। भैया सो गया है। और मेरा कल गणित का  टेस्ट है , तो मुझे कोई पढ़ाने वाला ही नहीं हैं। हमेशा तो मम्मा तैयारी करवा देती है पर आज तो वह देर से आएगी। "
" ओह गणित !" गणित तो उनका पसंद का विषय था।
" अच्छा मुझे बताओ कि कौनसा सवाल नहीं आता, जरा रुको ! मैं कागज़ -पैन लाता हूँ, फिर मुझे लिखवाना। "
कागज़ पर लिख कर अनमोल से कहा कि  वह  थोड़ी देर में फोन कर के समझाते हैं।
   चौथी कक्षा के सवाल उनके लिए मुश्किल नहीं थे। झट से हल कर दिए। लेकिन उनको हैरानी के साथ ही गर्व भी हुआ कि अब तक वे गणित के सवाल हल कर सकते थे। मूंछों में से होठ कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा पड़े, गर्वीले अंदाज़ से राधिका जी की तस्वीर की और देखा।
तभी फोन बज उठा। अनमोल को अच्छी तरह से समझा दिया और यह भी कि बाकी विषय भी वह समझा सकते हैं। वह जब चाहे फोन कर के पूछ सकता है।
" थैंक यू  दादा जी ! "
"अरे थैंक यू मत बोल, दादा को भी कोई थैंक यू बोलता है ! जीता रह ! जब मर्ज़ी फोन कर लेना !" दिल से ख़ुशी महसूस हो रही थी लेकिन गला भर आया था। हैरान थे कि वह इतना कुछ एक अनजान बच्चे से बोल कैसे गए।
दिल को सहलाते हुए कुर्सी पर बैठे रहे। आँखों के कोने नम हो गए थे।
        भूख सी लग आई उनको। उन्होंने शाम को खाना भी नहीं खाया था। सारा दिन अकेले चुप रहते उनकी भूख जैसे मर  सी गई थी। फ्रिज  खोला तो बहुत सा सामान था जो खाया जा सकता था। समय देखा तो साढ़े -बारह बज चुके थे इसलिए सिर्फ दूध ही पिया।
   बहुत अच्छी नींद आई। सुबह सैर से लौट कर आते ही बहादुर से पूछा कि कोई फोन तो नहीं आया। यह उनकी दिनचर्या में शामिल था, हालाँकि बच्चों से बात कम ही करते थे तो उनका  फोन भी रविवार को ही आता था।     आज तो उनको अनमोल के फोन का इंतज़ार था।
  "दादा जी ! आपको बाबूजी ने मोबाईल फोन ला कर दिया हुआ तो है, वह साथ क्यों नहीं ले जाते ! रोज़ आते ही पूछते हो मुझसे। कोई फोन आया क्या ?"
" क्यों !तुझे कोई परेशानी है क्या ?"
"मुझे क्यों परेशानी होगी दादा जी ! लो चाय पियो। आज खाने में क्या बनाऊँ ? रात को भी आपने नहीं खाया !"
 "आज तू अपनी पसंद का बना कर खिला !"
     "मेरी पसंद का ?"
      " हाँ !!"
    बहादुर ने देखा दादा जी खुश है तो रेडियो की आवाज़ बढ़ा दी ,रोज़ उसे इस बात पर डाँट पड़ती है। यह मानव का स्वभाव है कि  वह अकेले रह नहीं सकता है। घर में और कोई तो था नहीं दादा जी के अलावा तो रेडियो ही उसका साथी था ।
       माधव जी आज ख़ुशी-ख़ुशी सारा काम कर रहे थे। जैसे जोश आ गया हो। बार -बार फोन की तरफ ध्यान था।  उनके पास मोबाईल फोन भी था और बेटे ने खास हिदायत दी थी कि चाहे फोन ना करे लेकिन बिस्तर के पास ही रखे ,कभी कोई जरूरत हो, तबियत खराब हो तो बता तो सकते ही हैं। और नहीं तो बहादुर को ही जगा दे। लेकिन नहीं ! उनको तो अपने मन की ही करनी थी। दरअसल उनको नयापन जल्दी से स्वीकार ही नहीं होता है। समय के साथ नहीं चलना आता, समय को हाथ में पकड़ना चाहते हैं। समय रुका भी है कभी !
     आज उनको अनमोल के फोन का इंतज़ार क्यों था ? सोचने वाली बात यह भी थी कि रात को यूँ ही किसी बच्चे ने ऐसे ही रोंग नम्बर मिला कर बात कर लेने से  माधव जी को यूँ उत्साहित तो नहीं होना चाहिए था। लेकिन मन का क्या कीजिये। सब कुछ होते हुए भी अकेला पन  महसूस करता है। अकेला हो कर भी मन भरा-भरा महसूस कर सकता है। ऐसा ही आज वे महसूस कर रहे थे।
       दो-तीन बार बहादुर से भी कहा कि अगर वो सोये हों और कोई फोन आ जाये तो उनको जगा  देना। इंतज़ार की घड़ियाँ कितनी तकलीफ देह होती है यह वह आज जान रहे थे। उनको याद आया कि कैसे वह ड्यूटी से देर से आते  थे  और कितनी बैचेनी से राधिका जी को  इंतज़ार करते हुए  पाते थे।
"इतनी देर तक जागने की क्या जरूरत है राधिका ! मेरी तो ड्यूटी है, देर तो होना ही है, तुम सो जाया करो।"
"मुझे भी चैन कहाँ पड़ता है तुम बिन ! कह कर हंस पड़ती थी राधिका जी !"
" राधिका ! तुम क्यों चली गई अब इस उम्र में मुझे अकेला छोड़ कर ?" आँसू ढलक गए आँखों के किनारों से।
आँखे पोंछते हुए आँख खोली, धीरे से करवट ली।
      बच्चों से ज्यादा लगाव ही नहीं था। बच्चे कम ही याद आते थे। कुछ गलती राधिका जी की भी थी। उनको पिता और बच्चों में ढाल नहीं बनना  चाहिए था और ना ही संदेशवाहक ही। कोई भी काम या जरूरत होती तो बच्चों को ही प्रेरित करना चाहिए था। इस से उनमें  आपस में खाई तो नहीं बनती।
      माधव जी शाम की चाय पी कर पास ही के पार्क में चले जाते हैं। आज जाऊँ या ना जाऊँ वाली मनस्थिति में थे कि कहीं फोन आ गया तो !
"दादा जी आप जाओ और घूम कर आओ नहीं तो रात को नींद नहीं आएगी, ऐसे ही उदास बैठे रहोगे !"
बहादुर की बात में भी दम था। फिर अनमोल के फोन का क्या, आये ना आये।
         पार्क में आज मौसम सुहाना लग रहा था। सच भी है जब मन में ख़ुशी हो तो बाहर भी अच्छा ही लगता है। वैसे यह बात हैरान नहीं करती कि थोड़ी सी देर बात करने पर माधव जी इतना बदलाव महसूस कर रहे थे ! क्योंकि वह उकता गए थे अपने नीरस जीवन से। ना अकेले रहना बन रहा था और ना ही बच्चों के पास जा कर बंदिश भरा जीवन जीने को तैयार थे।
         रात होने को थी, थोड़ा सा अँधेरा मन में भी छाने लगा था। थोड़ी देर  टीवी देखा, खाना खाया और अपने बिस्तर पर लेट गए। घड़ी की ओर देखा साढ़े-नौ बजे थे। तभी फोन की घंटी घनघना उठी। घंटी की आवाज़ कितनी मधुर लग रही थी माधव जी को, यह तो माधव जी  ही बता सकते थे  या जो अकेलेपन के भुक्तभोगी हैं वही  बता सकते हैं। यह भी कोई जरुरी नहीं था कि यह अनमोल का ही फोन होगा। लेकिन यहाँ तो सच में अनमोल ही बोल रहा था।
    "हैलो दादा जी ! मैं अनमोल बोल रहा हूँ !" यह दुनिया की सबसे प्यारी और कीमती आवाज़ थी उनके लिए।
"ओह्हो अनमोल ! कैसे हो मेरे बच्चे ? कहते हुए गला भर आया। एक रात की बात में ही इतना प्यार -दुलार एक अनजान बच्चे के लिए ! यह थोड़ी ना मानने वाली बात तो लगती है लेकिन असम्भव भी नहीं था। बियाबान जंगल से  मन में  ऐसा होना अचरज भी नहीं है।
    " मेरा टेस्ट अच्छा ही हुआ आज !पर पूरे नम्बर नहीं मिले। सिर्फ 12 नम्बर ही आये 25  में से। "
"कोई बात नहीं, अगली बार अच्छे से पढ़ना !"
"अच्छा अनमोल तुम इतनी रात को फोन कर लेते हो, तुम्हारे मम्मी -पापा डांटते नहीं क्या ?"
"नहीं डांटते !"
    वे हैरान हुए कि मात्र दस साल का चौथी कक्षा का बच्चा, और इस तरह फोन इस्तेमाल करता है। यह तो बहुत गलत है ! जैसे इसने मुझसे एक अनजान आदमी से फोन मिला कर बात कर ली। ऐसे ही अगर वह किसी और से बात करता और अगर वह कोई असामाजिक तत्व होता तो ! बहुत नुकसान भी तो हो सकता है, कितने लापरवाह माँ-बाप है इसके !
"यह तो गलत बात है बेटा, तुम्हें यूँ किसी अनजान आदमी से बात नहीं करनी चाहिए। "
"अनजान कहाँ, आप तो मेरे दादा जी  हैं ! "उधर से बहुत प्यारी सी हंसी उभरी।
" मैं तुम्हारा दादा !" एक बारगी तो चौंक पड़े वे।
"आपने ही तो कहा था कि आप मेरे दादा की उम्र के हो !"
"ओह, हा हा !!"
"अच्छा हां ! अब तुम बताओ कि तुमने आज क्या-क्या किया। तुम पढाई के अलावा खेलते भी हो क्या ?"
बहुत सारी बातें हुई दोनों में। माधव जी फोन हाथ में लिए थकने लगे थे , पर उत्साह बरक़रार था।
"अच्छा अनमोल बेटा अब मैं थक गया हूँ, सोना चाहता हूँ, कल बात करेंगे। "
    उस रात बहुत हल्का -हल्का सा महसूस हुआ जैसे मन का बोझ हट सा गया हो। नींद भी सुकून की आई।
"जिस रात आप टेंशन फ्री हो कर सोते हो उस रात आपके चेहरे पर एक मुस्कान होती है। " सुबह उठते ही राधिका जी की बात याद हो आई। उदास होना चाहते तो थे पर सामने तस्वीर की ओर देख कर मुस्कुरा दिए।
     सैर से आते ही बहादुर से मोबाईल वाला डब्बा मंगवाया और फ़ोन चलाना सीखा। कई महीनों से उपेक्षित मोबाईल अब उनके दिल के करीब था मतलब  कि जेब में रख लिया गया था। अनमोल को मोबाईल नंबर भी दे दिया गया।
         अब तो अनमोल दिन में एक बार तो फोन करता ही था, रविवार को दो बार कर ही लेता था।
एक दिन उन्होंने पूछ  लिया कि उसके दादा-दादी कहाँ है। अनमोल ने बताया कि वे लोग उनके साथ नहीं रहते हैं।
  " तुमको उनकी याद नहीं आती क्या ?"
" नहीं आती !"
" मैंने उनको कम ही देखा है !"
"कमाल है ! दादा-दादी को कम देखा है ? कहाँ  चले गए वो लोग ?"
"पता नहीं !"
"ओह कैसे दादा-दादी हैं बच्चों को उनकी जरूरत है और वो उनके साथ ही नहीं !क्या जमाना है !"
" अच्छा तो फिर आप कैसे दादा  हैं माधव जी ?" राधिका जी की आवाज़ गूंज उठी। चौंक कर तस्वीर की तरफ देखा। थोड़ा सा व्यंग्य सा था नज़रों में। गर्दन झुका कर अपने दिल या गिरबान में झाँकने लगे, क्यूंकि आवाज़ तो असल में आई ही वहां से थी। मन जाने कैसा हो आया। बिन कहे फोन रख दिया।
      मन में उथल -पुथल सी मच गई। उसके पोते-पोती भी तो ऐसे अकेले रहते होंगे। बेटे-बहुएं तो नौकरी करते हैं। तो क्या वो भी ऐसे हर किसी को फोन कर लेते होंगे। कोई गलत इंसान उनको बरगला ले तो। यह तो कभी सोचा ही नहीं उन्होंने। इस बार रविवार को जब फोन आएगा बच्चों का तो बात करूँगा यह सोच कर आँखे मूँद ली सोने की कोशिश करने लगे । "क्यों ? रविवार से पहले अगर आप बात कर लेंगे तो क्या हो जायेगा ! " राधिका जी बोल पड़ी।
" हाँ -हाँ कर लूंगा बात, सुबह तो होने दो !" थोड़ा सा नाराज़ होकर घुटने सिकोड़ कर करवट ले कर लेट गए, मानो राधिका जी को जता रहे हों कि वे भी तो अकेले हैं।
   अगले दिन सुबह होते ही बेटे को फोन मिलाया । दूसरी ओर आवाज़ से आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी झलक रही थी। बेटे की आवाज़ पहली बार दिल को छू गई। बच्चों ने तो हमेशा मान ही दिया था उनको। यह तो वे ही 'मान ' किये रहते थे मन में, कभी मन के दरवाज़े कभी खोले ही नहीं। यहाँ वहां की बात कर के बात बंद कर दी। बाद में दूसरे बेटे और बेटी से भी बात की। मन में था कि उनके पास चले जाएँ। फोन पर बात तो सभी ने बहुत प्यार से की लेकिन किसी भी ने एक बार भी आने को नहीं कहा। थोड़े मायूस हो गए वे।
    " देखो राधिका, मैंने सभी से बात कर ली फिर भी किसी के यहाँ मेरे लिए जगह ही नहीं है ! किसी ने भी अपने यहाँ नहीं बुलाया !"
"बुलाने पर आप गए भी थे क्या ? बच्चों ने कितनी मिन्नतें की थी।" तस्वीर में राधिका जी जैसे बोल पड़ी हो।
"यह भी सही है !" चुप से कुर्सी पर बैठ गए। तभी अनमोल का फ़ोन आ गया। उनको थोड़ी सी राहत महसूस हुई।
"दादा जी आपका जन्म दिन कब आता है !" अनमोल उनसे पूछ रहा था।
" पता नहीं बेटा ! उस ज़माने में कोई जन्म दिन तो मनाता नहीं था।" थोड़े  थके हुए से बोल रहे थे वे।
  राधिका जी उनका जन्म राम नवमी को मनाया करती थी कि जब जन्म दिन पता ना हो तो खुद ही अच्छा सा दिन जान कर जन्म दिन मना लेना चाहिए। बात तो आखिर ख़ुशी की ही है कभी मना लो। राधिका के जाने के बाद बच्चे रामनवमी को आ जाते थे। छुट्टी भी तो होती थी उनकी ! सोचते हुए मन जाने कैसे हो गया। कान तो अनमोल की तरफ ही थे। बात करते करते कई बार मन कहाँ का कहाँ पहुँच जाता है फिर उनकी  तो उम्र का तकाज़ा भी तो था।
" तुम्हारा जन्म दिन कब आता है !"
" चार दिन बाद है ! मैं आपको लेने आऊं ?"
"नहीं ! मैं क्या करूँगा बच्चों में !"
"प्लीज़ दादा जी, मना मत कीजिये ! थोड़ी सी देर की तो बात है, मैं आपको लेने आजाऊंगा और छोड़ भी जाऊंगा !"
" ठीक है बेटा। " इतनी प्यारी आवाज़ वाले बच्चे से वह मिलना चाहते थे। प्यारी आवाज़ ही नहीं थी बल्कि उनमें  नव जीवन का संचार भी तो उसने किया था। फोन बंद कर कई देर तक फोन को ताकते रहे।
"अपने बच्चों से तो पराये ही अच्छे हैं !" तल्खी से राधिका जी को देखा। राधिका जी भी थोड़ी उदास लग रही थी। अनमोल ने तो चार दिन बाद आना था। इस बीच दोनों में बातचीत भी होती रही थी।
    अनमोल के जन्म दिन पर उन्होंने उसे सुबह ही आशीर्वाद  दे दिया। दोपहर में दो बजे आने को कह अनमोल ने फोन बंद कर दिया। अब छह घंटे इंतज़ार के थे। उसकी प्यारी बातें याद कर के ही मुस्कुराते रहे वह। इस बीच उसके लिए पास के बाजार से एक सुन्दर सा तोहफा भी ले आये।
         दो बजे के करीब मुख्य दरवाज़े के पास कुछ आवाज़ें सी सुनाई दी तो वे समझ गए कि अनमोल आ गया है। वह उठ कर कमरे के दरवाज़े तक आये ही थे कि अनमोल उनके सामने था। दादा जी कह कर लिपट गया।
माधव जी तो जैसे रो ही पड़े। झुक कर गले से लगा लिया। प्यार से सर पर हाथ फिराते  रहे। कलेजे में जैसे ठंडक सी पड़ रही थी। आंसुओं को बह जाने दिया, मानो दिल पर पड़ी बरसों से जमी  बर्फ पिघल रही हो।
   " बाबूजी !"
  जानी  पहचानी आवाज़ सुन कर आँसू पोंछते हुए सर उठाया था तो देखा उनका बड़ा बेटा था। आँखों में पानी भरे मुस्कुरा रहा था। आगे बढ़ कर गले लग कर रो पड़ा। सारा दुःख, सारी शिकायतें आंसू में बह गए। बेटे ने बताया कि यह सब उसके कहने पर ही हुआ था। अनमोल को फोन पर बात करने को उसने ही कहा था।
" बाबूजी मुझे यह नहीं मालूम था कि यह इतना बड़ा कलाकार भी निकलेगा और इतनी सारी बातें आपसे करेगा।"
" इसकी बातों ने ही तो मुझे मोह लिया था। लेकिन इसका नाम अनमोल है, यह मुझे क्यों नहीं मालूम ? "
"क्यूंकि इसका निक नेम तो गुड्डू है और आप इसको इस नाम से ही तो जानते हैं !"
"ओह, हा हा ! तभी मुझे बुद्धू बना दिया गया !" माधव जी के दिल से हंसी निकल रही थी आज। कितना खुश थे।
"दादा जी, अब आप मेरे साथ ही रहेंगे ! "
"हाँ बाबूजी आप अब हमारे साथ नहीं बल्कि हम आप के साथ रहेंगे।"
माधव जी ने भी हाँ भर दी। घर से चलने लगे तो बोले कि रुको तुम्हारी माँ को भी साथ ले चलो नहीं तो वह भी अकेली हो जाएगी। अंदर से तस्वीर ले आये। उनको लगा की राधिका जी गा  रही है कि  घूंघट के पट् खोल रे तुझे पिया मिलेंगे।

उपासना सियाग

    

Thursday, September 24, 2015

जिन्दगी --- एक दिन

            रात के दस बजे हैं सब अपने -अपने कमरों में जा चुके हैं। आरुषि ही है जो अपने काम को फिनिशिंग टच दे रही है कि कल सुबह कोई कमी ना रह जाये और फिर स्कूल को देर हो जाये। अपने स्कूल की वही प्रिंसिपल है और टीचर भी, हां चपड़ासी भी तो वही है ! सोच कर मुस्कुरा दी। मुस्कान  और ठंडी हवा पसीने से भरे बदन को सुकून सा दे गई। सोचा थोड़ा पसीना सुखा लूँ तो कमरे में जाऊँ नहीं तो ऐ सी की हवा कहीं  बीमार ना कर दे।
     ठण्डी हवा के झोंके ने आरुषि को सुकून सा दिया।  कितनी उमस थी शाम को। रविवार का दिन सबके लिए आराम का होता होगा, उसके लिए तो दोहरी ड्यूटी का दिन। रविवार को ही तो छुट्टी मिलती है। उस दिन
सारे सप्ताह के पेंडिग वर्क का दिन ! अगले दिन से फिर वही स्कूल और घर के बीच चक्कर घिन्नी सी घूमना है।
   अलार्म बजते ही बिस्तर छोड़ दिया और अपने सधे  हाथों से काम निपटा लिए। कोई परेशानी नहीं हुई। उसने
अपनी माँ का कहावत रूपी मन्त्र, " रात का कमाया हुआ और पीहर से आया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता "
 को गाँठ की तरह बांध रखा है।  बच्चों को स्कूल भेज दिया। सास का बहुत सहारा है सुबह की रसोई का काम
वह देख लेती है तो काम आसान हो जाता है। पति भी दूसरे शहर में टीचर है। दोनों साथ ही निकलते हैं, उसे स्कूल छोड़ते हुए वह अपने स्कूल चले जाते हैं।
      आरुषि कस्बे नुमा शहर में प्राइमरी स्कूल की टीचर है। बहुत ईमानदार, अपने काम के प्रति समर्पित एक आदर्श शिक्षिका है। स्कूल में लगभग तीन सौ बच्चे हैं। और सिर्फ दो टीचर !
        स्कूल में बच्चे आने लगे हैं। कितने प्यारे और शरारती बच्चे हैं। और चिंता रहित भी।  सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ  याद करती वह ऑफिस के पास जा पहुंची।
     आरुषि को खुद ही ऑफिस खोलना पड़ता है।
    " मैडम जी ! ऑफिस में सफाई कर दूँ  ! " सफाई कर्मचारी जो कि स्कूल की सफाई कर चुका था। उसके इंतज़ार में ही था।
" हाँ कर  दो ! " कह कर वह स्कूल के शौचलयों की तरफ गई।
  "ओह ! आज फिर ताले टूटे हैं ! ना जाने क्या मिलता है लोगों को, स्कूल बंद हो जाने के बाद यहाँ के शौचालय इस्तेमाल किस लिए करते हैं ! " वह खुद से सवाल से कर रही थी। तेज़ गंध /बदबू से मितली सी हो आई उसे।
   "उफ्फ़ ! अरे भई , शौचलय इस्तेमाल तो किया तो किया, फ्लश भी तो चलाया जा सकता है ! सफाई कर्मचारी को आवाज़ देते हुए उसे साफ करने को कहा। परेशान हो गई थी वह। कभी गंदगी मिलती तो कभी शौचालय की दीवारों पर अश्लील नाम और चित्रकारी मिलती। वह कभी -कभी अपनी सहयोगी सुहासी से चुहल भी कर उठती कि अगर किसी को काम शास्त्र का ज्ञान नहीं है तो वह यहाँ से ले सकता है। लेकिन जो भी था वह गलत ही  तो था। बच्चों पर क्या असर पड़ता। कितनी ही बार वह दीवारों को पुतवा चुकी थी और साफ तो रोज़ ही करवाना पड़ता।
       पाँचवी कक्षा तक स्कूल है और दो टीचर हैं तो दोनों को आपस में कार्य विभाजन करना पड़ता था। एक कक्षा को पढ़ाती  तो दूसरी वाली कक्षा में मॉनिटर की ड्यूटी लगाती कि कोई शोर ना करे। लेकिन ! बच्चे तो बच्चे ही तो हैं, शोर तो करेंगे ही। पढ़ने का शौक तो बहुत कम बच्चों को होता है। कई बच्चे सोचते हैं कि पढ़ना तो पड़ेगा और ऊधम मचाने वाले ज्यादा होते हैं। ऐसे बच्चे कक्षा का माहोल खराब किये रहते। आरुषि के मन में तो आता कि एक दो डंडे धर दे। यह भी सम्भव नहीं था उसके लिए। एक तो सरकारी आदेश कि मारना नहीं है और दूसरे वह खुद बहुत कोमल स्वभाव की है तो हाथ उठाना सम्भव नहीं था उसके लिए।
     बच्चों को सजा ना  देने के पक्ष में भी नहीं है, क्यूंकि थोड़ा तो डर  होना ही चाहिए बच्चे को। प्रार्थना के बाद सभी बच्चों को शांति पूर्वक कक्षा में जाने का आदेश देते हुए ऑफिस की तरफ चली।
    " मैडम जी ! आज सुहासी नहीं आएगी, मेरी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है ! "
आरुषि ने मुड़ का देखा तो सुहासी के पति हाथ में प्रार्थना -पत्र लिए खड़े थे।
    "ओह ! कोई बात नहीं ! " कहने को तो कहना पड़ा उसे पर अब सारी  जिम्मेदारी उस पर आन पड़ी। ऑफिस में बैठी ही थी कि सामने एक व्यक्ति खड़ा था।
   " नमस्ते बहनजी ! मेरा नाम दयानंद है। मेरा बेटा कहता है कि  उसका नाम हाजरी में नहीं बोला जाता  जबकि वह रोज़ स्कूल आता है। "
   " ऐसा कैसे हो सकता है ? जब बच्चा स्कूल आता है तो हाज़री में नाम तो आएगा ही !"
" वह तो ऐसा ही बोल रहा है।"
" अच्छा दाखिला कब लिया था ?"
" ज्यादा दिन नहीं हुए, कोई बीस -पच्चीस दिन ही हुए हैं। "
" आप साथ आये थे क्या ?"
" नहीं जी, मेरी माँ आई थी। मैं और मेरी घरवाली तो खेत जाते हैं। "
 " बहुत अच्छी बात है दयानंद जी ! बच्चों से ज्यादा तो खेत हैं ! हैं ! क्यूँ ? थोड़ा गुस्सा और खीझ थी आरुषि के स्वर में।
  " अजी बहनजी दो-चार अक्षर सीख जायेगा तो हिसाब सीख लेगा, फिर तो खेती ही करनी है। "
" बहुत हैरानी होती है आज के ज़माने में भी ऐसी सोच पड़ी है, तभी तो देश आगे नहीं बढ़ता, किसान ही अनपढ़ रहेगा तभी तो पिछड़ रहा है। अरे भाई ! खेती से जरुरी पढाई है ! बच्चों के लिए भी आपका कोई फ़र्ज़ है के नहीं ?"
   दयानंद को समझ ही नहीं आया शायद।
" अच्छा बताओ क्या नाम है बच्चे का ! "
" जी राम कुमार है। "
आरुषि ने नए दाखिल हुए बच्चों वाला रजिस्टर निकल कर देखा।कोई भी राम कुमार के नाम से दाखिला नहीं था। सहसा एक नाम दिखा जिस पर दयानंद लिखा हुआ था। पिता का नाम भैरू राम था।
  "आपके पिता जी का क्या नाम है ?"
   " जी भैरू राम। "
" ओह्ह ! अब याद आया ! " हंसी आते -आते रह गई आरुषि को।
" मैडम जी ! सामान  दे दो तो हम काम शुरू करें ! "दरवाज़े पर विमला खड़ी थी। दोपहर का  भोजन बनाने वाली बाई थी वह।
 " हां अभी आती हूँ ! जरा रुको। " कह कर दयानंद की तरफ मुखातिब हुई।
" देखो दयानंद जी यह होता है अनपढ़ होने का परिणाम, आपकी माँ से मैंने पूछा था, बेटे का नाम , मतलब कि जिस बेटे का दाखिला करवाना है उसका नाम और उसके पिता का नाम, उन्होंने खुद के बेटे यानि आपका नाम लिखा दिया और आपके पिता का भी !"
    " हो हो हो बहनजी ! माँ तो निरी अनपढ़ है, कुछ नहीं पता उसे । " वह हंसने लगा।
" अच्छा आप पढ़े -लिखे हैं ! "
" हाँ जी, पांच पढ़ा हूँ। "
आरुषि को ऐसे लोगों से दो-चार होना ही पड़ता था। घर आकर सोचती तो हंसी आती। अभी तो रसोई की तरफ ध्यान था। दयानंद को नाम बदलने को कह ऑफिस से बाहर आ गई।
    पहले तो कक्षाओं की तरफ गई। वहां उसमे मॉनिटर की ड्यूटी लगाई हुई  है कि एक कागज़ पर सारे बच्चों की हाज़री लगाये और गिन  कर रखे कि कितने बच्चे आये हैं। गिनती के हिसाब से ही तो आटा -दाल दिया जायेगा। कभी सब्जी भी बनाते हैं। खीर-हलवा भी तो बनाया जाता है। खाना बनाने वालियों को बिना हिसाब रसद दे दी जाये तो महीने का राशन बीस दिन में ही ख़त्म हो जायेगा। ऐसे शुरू -शुरू में हो भी चुका है।
       तो, पढाई से ज्यादा तो भोजन जरुरी था !मलाल होता था अपनी पढाई पर, ली हुई डिग्रियों पर कि जब एक
दिन खानसामा पना ही करना था तो घर वालों को ही गर्म खाना खिलाती। " चल पड़ी मेम साहब पर्स उठा कर,
यह तो सुनना नहीं पड़ता।"

   खाने का निर्देश दे कर, साफ-सफाई का ध्यान  रखने को कह  वह कक्षा की तरफ मुड़ी। घड़ी की तरफ देखा दो पीरियड निकल गए थे, अभी तीन बाकी थे आधी -छुट्टी । कक्षा पांच थी। शुरुआत पांचवीं से की। उसके जाते ही बच्चे शांत हो गए।
     सोचा कि आज बच्चों को सामान्य ज्ञान ही पूछा जाय। जिस प्रकार सवालों के जवाब मिल रहे थे उस से उसे लगा कि बच्चों में जान ने की जिज्ञासा तो बहुत है। हालाँकि साधन सीमित हैं। उसने सोचा कि बच्चों को किस चीज़ में रूचि है यह जानने के लिए लेख लिखने को कहती हूँ और इस प्रकार उसका भी काम हो जायेगा। वह अगली कक्षा भी देख सकेगी।
       चौथी कक्षा ! बच्चे शांत कैसे रह सकते हैं। यह तो मानव प्रवृत्ति है। बोलने का अधिकार भी तो मिला है !यहाँ भी एक बार तो शांति छा गई। गणित के सवाल कुछ ब्लेक बोर्ड पर लिखे और बच्चों से हल करने को कह कुर्सी पर बैठना चाहा कि डाकिया डाक लिए खड़ा था। डाक ऑफिस में रखी और तीसरी कक्षा की तरफ चली। यहाँ बच्चों के पास करने को कुछ नहीं था। क्यूंकि आधे से ज्यादा बच्चे कुछ नहीं जानते थे सिर्फ मार -पीट करने के अलावा ! इन बच्चों को पूरी तवज्जो की जरूरत थी। जो कि सिर्फ एक शिक्षिका के लिए संभव नहीं था।
      तभी अगला घंटा बजा। यह भी किसी बच्चे को ही बोला हुआ था कि वह नियत समय पर बजा दे।
वह कक्षा से बाहर आई ही थी कि स्कूल प्रांगण में जीप रूकती हुई  दिखी। शिक्षा -अधिकारी महोदय थे।

 " ओह, यह कैसे आ गए ! बिना किसी पूर्व सूचना के। " आरुषि हैरान सी हो गई।

आगे बढ़ कर स्वागत किया। " सर आप बिना कोई पूर्व सूचना के... ?"
 " कभी -कभी ऐसा ही सही रहता है मैडम ! "
ऑफिस में सारे रजिस्टर, फाइलें जाँचे गए अधिकारी महोदय द्वारा जो कि सही थे।
 " बहुत बढ़िया मैडम, रजिस्टर में एंट्री तो सही है। आप पढ़ाते  भी हो या यही पन्ने भरते हो। "
चिढ़ सी गई वह। एक तो इतना काम, उपर से यह महोदय भी आ गए बिन बताये। आखिर वह चिढ़ती भी क्यों नहीं ? अपना हर काम समय पर पूरा रखती है। घर बाहर सब जगह संतुलन बना कर रखती है। फिर कोई तन्ज़ करे तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है।
     मन की चिढ़ मन में रख कर संयत दिखते हुए खामोश ही रही। तभी आधी -छुट्टी की घंटी बजी। बच्चे लाइन बना कर बाहर आने लगे और बरामदे में बैठने लगे।
"अच्छा तो भोजन तैयार है !"
" हाँ जी सर। "
" तो आरुषि जी, आप भी यह भोजन खा सकते हैं क्या ? या नहीं ! "
" हाँ जी , क्यों नहीं ! मेरी देख रेख में बना है। अभी तक कभी कोई शिकायत नहीं आई।"
" सर आपके लिए भी मंगवाऊँ क्या ?"
" चलिए मंगवा दीजिये ! "
विमला बाई दो प्लेटों में दाल -फुल्के रख गई।
" खाना तो बढ़िया है मैडम ! लेकिन एक बात बताइये जरा, खाना भी बढ़िया ! कागज़/पत्र भी सही ! सारा ध्यान तो आपका यहीं रहता है तो फिर आप बच्चों को पढ़ाते भी हो क्या ? "
  फिर चिढ़ हो आई आरुषि को।
मन में तो बहुत कुछ आया कि वह सारी भड़ास निकाल दे चिल्ला कर। लेकिन नहीं ! वह खुद को शांत ही किये रखा।
     " जितना समय बचता है उतना तो बच्चों पर देते ही हैं सर। "
" आपका काम पढ़ाना है, खाना बनाने को, परोसने को तो बाई रखी है, फिर क्या दिक्कत है ? "
" दिक्कत तो है ही सर, ठीक है खाना बनाने वाली रखी है,लेकिन उसे बताना पड़ता है, नाप-तोल कर देना पड़ता है। और जिस  प्रकार का गेहूं सप्लाई होता है वह साफ  ना करवाया जाये या धूप ना दिखाई जाये तो बहुत जल्द खराब होने का डर भी तो होता है। सड़े हुए अनाज़ से बच्चे बीमार होंगे तो जिम्मेवार कौन ? हम लोग ही ना ! भण्डार घर की साफ सफाई भी देखनी पड़ती है। "
    "इस स्कूल में हम दो ही शिक्षिका हैं जो कि बहुत मुश्किल से संभाले हुए हैं। आज सुहासी नहीं आई तो मुझे ही सारा देखना पड़ रहा है। हम भी सामाजिक प्राणी है अगर आज मेरे घर में भी जरुरी काम होता तो स्कूल का क्या होता। मुझे मेरी पॉवर के अनुसार छुट्टी घोषित करनी पड़ती, और आप के आगमन पर यहाँ  ताला लगा होता !"
       सरकारी आदेश है कि पढाई से अधिक भोजन सही तरीके से परोसा जाय।और सर, टीचर्स को हर जगह जैसे जनसंख्या गणना करना हो ,साक्षरता अभियान हो,चुनाव में ड्यूटी लगनी हो, हर जगह हमें ही भेजा जाता है तब भी तो पढाई प्रभावित करती है। विद्यार्थियों को हम एक -एक पल सदुपयोग करने की हिदायत  और हम ही उन्हें पूरा समय नहीं दे पाते हैं।  इतना होने के बाद भी हमारे स्कूल का परीक्षा परिणाम बहुत अच्छा नहीं तो संतुष्टि दायक तो  होता ही है ! "
    " शिक्षकों के साथ -साथ एक चपरासी और एक भंडार-घर के लिए एक सहायक की नियुक्ति होनी चाहिए। "
आरुषि ने आज कह ही दिया जो कई दिन से था।
 " आपकी बात में दम है मैडम ! मैं सहमत भी हूँ और कोशिश करता हूँ बात आगे पहुँचाने में। वैसे सभी शिक्षक आप जैसे ही सोचने-करने  लग जाये तो देख का भविष्य बहुत सुधर सकता है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। " अधिकारी महोदय  चल दिए।
   अब स्कूल का समय भी ख़त्म होने को था। ऑफिस को ताला लगा कर बाहर  आ गयी। विमला बाई को सामान भंडार घर में रखवा कर ताला लगाया। छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे उछलते -खिलखिलाते दौड़ लगाते हुए कुछ धकियाते हुए बाहर जाने लगे।
     आरुषि को ये बच्चे चिंता रहित  खिलते हुए, महकते हुए फूलों की तरह लगे। सोच रही थी इन बच्चों को सही दिशा मिलेगी तभी तो देश की दशा सुधरेगी। वह भी ताला लगा कर घर की ओर चल पड़ी।(2,337)
   


     

Tuesday, September 15, 2015

ख़तों में सिमटी यादें

 

   पुराने बक्से में झाँका तो बहुत कुछ पुराना सामान था।  ये सामान पुराना तो था लेकिन कनिका की  यादें नई कर गया। एक डिबिया में एक अंगूठी थी। जिस पर यीशु और मरियम की तस्वीर थी। आयरिश ने बहुत प्यार से दी थी उसे। विवाह के बाद जब एक बार ऊँगली में पहनी तो पति देव ने कहा सोने कि है क्या ये ! वह हंस कर बोल पड़ी थी कि नहीं ये तो प्लेटिनम से भी महंगी है।
    यादें कभी पुरानी  कब हुई है भला !नए युग में भी ख़त की महत्ता कैसे भूली जा सकती है। सोचती हुई कनिका ने बक्से में पड़े पुराने खतों का  बंडल उठा लिया। मेज़ पर रख कर देखने लगी तो हल्की सी खांसी आ गई। उसे डस्ट -माइट्स से एलर्जी जो है। पर बेपरवाह हो खतों को सामने बिखेर लिया। नज़र का चश्मा लगा कर पढ़ने लगी। और पहुँच गई अपने होस्टल के दिनों में।भूल गई  सब कुछ  याद रहा तो अपना गुज़रा ज़माना जो एक -एक कर के खतों से बाहर निकल कर उसके आस-पास बह रहा था। कनिका भाव-विभोर हो रही थी कि ये ख़त ही हैं जिन्होंने उसे अतीत कि खूबसूरत वादियों में पहुंचा दिया। " टन -टन " की  आवाज़ पास के मंदिर से आई तो कनिका की तन्द्रा भंग हुई। ख़तों में सिमटी  यादों को सहेज़ कर फिर से रख दिया। 

~ उपासना सियाग ~ 

Thursday, July 2, 2015

बंद दरवाज़ा...

बंद  दरवाज़े के आगे ठिठक गयी रूमा।
" अरे  ! यह तो वही दरवाज़ा , जगह है , जो मैं रोज़ सपने में देखती हूँ। अहा ! वही महल !! " 
तभी दरवाज़ा खुला।  एक दरबान अंदर से बाहर आया और अदब से झुक कर रूमा से बोला , " आइये राजकुमारी जी आपका स्वागत है। "
वह रोमंचित सी अंदर चली। बहुत शानदार  महल दूर से ही नज़र आ रहा था। सुन्दर सा बगीचा था। एक तरफ मंदिर था। वह मंदिर की तरफ बढ़ी। अपने आराध्य को सामने पा कर हाथ जुड़ गए और आँखे मुंद गई।   बहुत सारी घंटियां बज़ रही थी वहां। इतनी तेज़ कि जैसे कान के पास बज़ रही हो। उसने घबराकर आँख खोली तो सड़क पर रिक्शेवाला घंटी बजा रहा था।  चिल्ला कर  बोला  , " ओ मेडम , घर वालों को अलविदा बोल कर आयी हो क्या ?" 
अचकचा गई रूमा और जोर से हँस पड़ी कि यह सपना था या। ....?

Saturday, June 27, 2015

क्यूंकि वह आतंकी की माँ थी !

     अँधेरा गहरा होता जा रहा था। वह अब भी डरती -कांपती सी झाड़ियों के पीछे छुपी बैठी थी। तूफान तो आना ही था। चला गया आकर ! वह अभी भी छुपी थी। गर्दन घुटनों में दबा रखी थी । कानों में जीप की घरघराहट और पुलिस के खटखटाते बूंटों की आवाज़ें अब भी गूंज रही थी। हिम्मत नहीं थी कि उठ कर अपने घर जाये और देखे।
    " रेशम !! ओ रेशम !! "
अपने नाम की पुकार सुनी तो कुछ हौसला सा हुआ। नीलम चाची उसे ही पुकार रही थी।
  " रेशम ! तू कहाँ है ? कितनी देर से तलाश रही हूँ ! " चाची का गला भर्रा रहा था।
" चाची, मैं यहाँ हूँ ! " लड़खड़ाते हुए रेशम चाची की तरफ बढ़ रही थी।
दोनों  एक दूसरे के गले लग गई। दोनों ही जोर से रो पड़ी। करुण रुदन  सारे माहौल को कारुणिक बना रहा था। एक मज़मा सा लग गया पास -पड़ोस के लोगों का।  चाची रेशम को घर तक लाई। दरवाज़े पर पहुँच कर रेशम ने चाची से कहा , " चाची तुम घर जाओ। मैं चली जाउंगी।
 " अरे ना बिटिया ! अकेली कैसे छोड़ूँ तुम्हें ?"
" जब ऊपर वाले को दया नहीं आई मुझे अकेला छोड़ते हुए तो फिर किसी सहारे की क्या जरूरत है ! "
" ना - ना , ऐसा नहीं कहते ! ऊपर वाले की मर्जी को हम नहीं जानते ! "
" लेकिन फिर भी चाची तुम जाओ , जरूरत होगी तो मैं बुला लूंगी।  "
" ठीक है बिटिया , तुम जैसा कहती हो ! "
       रेशम अपने घर के खुले दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दहलीज़ पर ठिठक गई। सारा सामान बिखरा था। पुलिस ने हर कमरे की तलाश ली थी।
     उसे जब ले ही गए तो अब क्या सबूत ढूंढ रहे हैं ?
     रो पड़ी रेशम !
आज सुबह ही चाची ने कहा कि टीवी में बताया कि उसे आतंकी संघठन का सदस्य मानते हुए गिरफ्तार कर लिया गया है ।
     ना जाने कितनी बार गिरफ्तार हुआ और छूटा है वह। उदास , खामोश सी साँस ली उसने।
  " आतंकी !! नहीं मेरा लाल आतंकी कैसे हो सकता है ! वह तो बहुत मासूम ,शर्मीला ,ख़ामोश तबियत का बच्चा था। बातें भी सिर्फ मुझसे ही करता था। मन की भी  कहाँ करता था, जितना पूछा जाता, उतना ही जवाब देता था। इतना शांत बच्चा और ऐसे आरोप !! " रेशम जोर से रो पड़ी। कोई सुनने वाला, चुप करवाने वाला भी नहीं था।
           जब वह पहली बार  गिरफ्तार हुआ था तो पिता दिल थाम के जो बैठे फिर उठ  ही ना सके। चले गए ऊपर वाले के पास।
        और रेशम… ! वह गम दिल में दबा कर जीती रही क्यूंकि वह माँ थी ! धरती की तरह सब कुछ झेलने को तैयार !
            बार -बार की पुलिस की पूछ -ताछ और खोजबीन से परेशान छोटे भाई और बहन को मामा के पास भेज दिया।
      वह उस के कमरे के बेड पर औंधी पड़ी देर तक रोती रही। बेटा पुलिस हिरासत में था। माँ भी तो बंधन में जकड़ी थी। ना मरती, ना जीती।  सामने की दीवार पर  उसके लाल की हँसते हुए तस्वीर थी। उसे याद ही नहीं वह आखिरी बार कब हंसा था शायद इसी तस्वीर में ही हंसा था।
    कमरे का सामान बिखरा पड़ा था। अलमारी में सामान रखने के लिए उठी तो पैर की ठोकर में कुछ लगा। देखा तो पुराना एल्बम था। जन्म से लेकर कॉलेज जाने तक की तस्वीरें सहेजी थी उसमे। पलटती रही एक -एक तस्वीर, छूती रही जैसे अपने लाल को दुलार रही हो। सीने में भींच कर एल्बम लेट गई , जाने जब आँख लग लग गई।
     सुबह  चिड़िया की चहचहाअट से आँख खुली। खिड़की पर बैठी थी चिड़िया, जैसे वह भी उसे ढूंढ रही हो। क्यों ना ढूंढती !बचपन की दोस्त जो थी। सामने एल्बम में खिड़की में झूलता वह और खिड़की पर बैठी चिड़िया की तस्वीर थी। मुस्कुरा पड़ी रेशम।
      उसे याद आ गई एक सुबह जब " ची -ची "की आवाज़ से घर चहक रहा था, रेशम सुनते हुए ठिठक गई थी क्यूंकि चिड़िया के साथ -साथ एक मासूम आवाज़ भी चहक रही थी। कमरे में पहुँच कर देखा तो वह चिड़िया के सुर में सुर मिला रहा था। रेशम ने हंसी रोकते हुए धीरे से तस्वीर ले ली और खिलखिला कर हँसते हुए बहुत सारा लाड उंडेल दिया बेटे पर।
      मायूस सी कुछ देर तस्वीर ताकती रही। हलके से सहला कर जैसे अपने बच्चे के सर को सहलाया हो, तस्वीर पलट दी। अगली तस्वीर में उसने लकड़ी के टुकड़े को बन्दूक की भांति पकड़ रखा था। तब कितना गर्व हुआ था यह तस्वीर लेते हुए और सबको दिखाते हुए कि एक दिन उसका लाल सेना में भर्ती होगा,  देश की रक्षा करेगा।
     लेकिन वह तो देश के दुश्मनों के साथ मिला हुआ है ! और  यह सच भी था !
  कलेजे में हूक सी उठी ! खिड़की में आ खड़ी हुई। दिन होले -होले चढ़ रहा था। समय था ! निकलना ही था। रेशम को कोई उत्साह नहीं था। बिखरे घर को समेटने का भी नहीं। यह तो सामान था जो उठा कर रख देती, उसका तो परिवार ही बिखर गया था।
         फोन की घंटी से उसकी तन्द्रा भंग हुई  । दिल घबराया कि किसका फोन होगा ? आशंकित सी फोन पर धीरे से बोली। दूसरी तरफ कोई बोल रहा था लेकिन वह पहचान नहीं पा रही थी। शायद कोई परिचित या पड़ोसी होगा ! लेकिन आवाज़ में प्यार और संकोच सा था।
 " रेशम बिटिया ! टीवी चला कर देख ! उसकी खबर आ रही है ! सजा पर विचार होगा !"
" सजा !! " वह आगे सुन नहीं पाई।
   वह कैसे यह खबर देख-सुन सकती थी।
        बहुत सारे अवगुण थे उसमें, अपराधी था ! हाँ , वह सजा का अधिकारी भी था, कितने ही मासूमों का हत्यारा था। लेकिन माँ तो थी वह, उसे यकीन नहीं होता था कि वह एक आतंकी की माँ है। लेकिन सच तो था यह !
    बैठ गई वहीँ सुन्न सी। सजा तो वह भी भुगत रही है , उसकी माँ होने की। घर से बाहर जाती है तो कितनी घूरती,नफरत भरी आँखे उस पर तीर बरसाती है। कितने नफरत से भरे शब्द बाण छोड़े जाते हैं उस पर।
    मन होता है कि वह चीख कर बोले , " हाँ ! मैं हूँ एक आतंकी की माँ ! दोष है मेरा जो मैंने उसे जन्म दिया ! मैं , उसकी अच्छी परवरिश ना कर सकी ! " लेकिन खुद को समेटती हुए घर आकर घंटो रोती रहती।
  जबकि सच तो यह भी था कि उसका होनहार बेटा ही कमज़ोर मनोवृत्ति का था। नहीं तो वह ऐसे किसी के बहकावे में आता ही क्यों। फिर भी दोष तो हमेशा जन्म और परवरिश को ही जाता है।
    कंधे पर हल्का सा स्पर्श पा कर देखा तो चाची थी।
 " चल उठ बिटिया , मुहँ धो।  मैं चाय लाई हूँ, साथ में कुछ खा भी ले। तुझे अभी जिन्दा रहना है। दो बच्चे और भी हैं तेरे !"
" जिन्दा रहना है !! हैं चाची !! क्या हुआ ? क्या ? "सहम गई रेशम। कुछ समझी और कुछ समझना नहीं चाहती थी। चाची के चेहरे पर मौत का साया था। आगे बढ़ कर रेशम को गले लगा लिया। रेशम जोर से रोना चाहती थी पर रो ना पाई। गले में कुछ घुटा सा रह गया। जमीन पर बैठी उँगलियों से कुछ उकेरती सोच रही थी कि अच्छा है वह मुक्त हो जायेगा।  लेकिन वह तो मुक्त नहीं हो सकती थी। उसे तो सहन करना था जिन्दा रहते हुए क्यूंकि वह उसकी माँ थी !

उपासना सियाग


Monday, April 13, 2015

ईश्वर की इच्छा...

         नन्ही  चीनू ने खिड़की से बाहर उड़ती -फुदकती चिड़िया को देखा तो मचल पड़ी।
 " माँ , मुझे भी चिड़िया होना है ! "
" क्यों चिड़िया होना है ? "
" चिड़िया कितनी आज़ादी से घूमती है , अपनी मर्जी से कहीं भी उड़ जाती है ! मैं कहाँ घूम पाती  हूँ ! हर समय तुम मेरे इर्द गिर्द ही रहती हो ! "
  " मैं नहीं चाहती कि तुम चिड़िया बनो और एक दिन बहेलिये के पिंजरे में जा फंसो। ईश्वर ने तुम्हें नारी रूप दे कर भेजा है तो कुछ सोच कर ही भेजा होगा। उसकी इच्छा का सम्मान करो !इतनी मज़बूत बनो कि कोई नारी चिड़िया होने की ना सोचे ! "
       नन्ही चीनू माँ के गले लगी कुछ समझी ,कुछ नहीं समझी। लेकिन माँ की आँखों में एक दृढ निश्चय था। 

Tuesday, March 24, 2015

वह छिपकली की पूंछ थी....!

 

     घंटी की आवाज़ सुन कर  शिखा गैस बंद कर के दरवाज़े की ओर लपकी। कोरियर वाला था। अंदर पहुंचे , उससे पहले ही माँ की तकलीफ भरी आवाज़ सुन कर चौंक पड़ी। माँ की आवाज़ ऐसी थी जैसे उनके साथ बहुत छल किया जा रहा हो। बेचारगी वाले भाव , भरी आँखे जरा सी सिकोड़ कर कुछ गला भी भर्रा गया जैसे !
   " शिखा , मैंने कहा था बेटा कि मेरी सब्जी में प्याज़ मत डाल  देना , मेरा नवरात्री का व्रत है , फिर भी तूने एक टुकड़ा डाल ही दिया !! "
     " क्या कह रहे हो माँ जी ?  मैं ऐसा क्यों करुँगी ! आपका व्रत है तो प्याज़ डाल कर मैं पाप की भागीदार क्यों बनूँगी ?"
 " लेकिन मैंने देखा है !  आओ दिखाती हूँ !! "
  " चलिए दिखाइए , हो ही नहीं सकता ? "
शिखा ने देखा तो सच में एक गुलाबी रंग का टुकड़ा घी में तैर रहा था। वह हैरान थी कि उसने प्याज़ काटा  ही नहीं तो यह कहाँ से आया। यहाँ -वहां नज़र दौड़ाई तो कलेजा मुहं को आ गया। चिल्ला कर पीछे खड़ी सास के कस कर गले लग गई। काँप रही थी डर से।
     " अरी , क्या हुआ ? " माँ भी घबरा गई।
" माँ जी वह छिपकली की पूंछ है , प्याज़ नहीं ! जरा देखो तो स्टोव के उस तरफ छिपकली तड़फ रही है। मसालेदानी में भी देखो एक टुकड़ा पड़ा है। " वह अब भी काँप रही थी।
     शायद एक्जास्ट फैन से छिपकली कट कर गिर पड़ी थी। शिखा कई दिन तक सकते में रही कि अगर बेध्यानी में वह माँ को ऐसी सब्जी खिला देती तो !!

Wednesday, March 18, 2015

दरवाज़ा खोलो .....!

   

   " दरवाज़ा खोलो !!"
" ठक ! ठक !! दरवाज़ा खोलो !!!
    रात के तीन बजे थे। सुजाता ठक -ठक की आवाज़ की और बढ़ी चली जा रही थी। बहुत बड़ी लेकिन सुनसान हवेली थी। चलते -चलते तहखाने के पास जा कर सुजाता के कदम रुक गए। कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। नीम रोशनी में देखा दुल्हन का सा लिबास पहने  फूल कँवर खड़ी थी।
      " यह यहाँ कैसे ! यह तो मर गई थी ! फिर क्या करने आयी है ? "सुजाता का कलेजा जैसे मुहँ की ओर आ गया ।फूल कंवर  उसकी और  देखती हुई मुस्कुराये जा रही थी।
           बहुत बरस हुए फूल कंवर को अपने देवर की दुल्हन बना कर लाई थी। तब भी  मुख पर ऐसी ही प्यारी सी मुस्कान थी। देवर वीरेश को पुत्र की तरह पाला था। वीरेश की माँ, सुजाता के पति राज सिंह की सौतेली माँ थी। वीरेश छोटा ही था तब उसकी माँ भी चल बसी। ठाकुर साहब ने बड़े बेटे राज सिहं की शादी कर दी। सुजाता ने वीरेश को मातृवत्त स्नेह दिया। यह स्नेह और भी गहरा हो गया, जब उसका पति और ससुर दोनों पारिवारिक रंजिश में मार दिए गए।
      अब दोनों देवर भाभी रह गए  इतनी बड़ी हवेली और जायदाद के साथ। उसने बहुत मुश्किल से वीरेश की परवरिश की। युवा होने पर सुजाता को राय दी गई की अब उसे वीरेश का ब्याह कर लेना चाहिए। परिवार बढ़ेगा। रौनक लगेगी। वंश भी तो आगे बढ़ेगा ! वह चाहती तो नहीं थी कि वीरेश का विवाह हो , लेकिन चाहने से क्या होता है।विवाह तो करना ही था। ना करने का कारण भी तो कोई नहीं था।
      सुकुमार  वीरेश और फूलों सी नाजुक फूल कंवर।
बरसों बाद हवेली में रौनक लगी थी। सब खुश  थे कि अब हवेली में छाई उदासी हट जाएगी और खुशियां ही खुशियां होगी। आज दुल्हन के शुभ कदम पड़े हैं। कल को खानदान  के वारिस की किलकारियां भी गूंजेगी।
        लेकिन  सुजाता खुश क्यों नहीं थी ! उसे वीरेश छिनता हुआ क्यों नज़र आ रहा था। उसने , उसे पाल  पोस कर बड़ा किया था। बैरियों से बचा कर रखा। क्या हुआ जो वीरेश को जन्म नहीं दिया था ! पाला  तो एक माँ ही की तरह था ! तो फिर उलझन क्या थी ?  क्यों सुजाता वीरेश को फूल कंवर के वजूद को सहन नहीं कर पा रही
थी ? माँ थी तो माँ की तरह ही व्यवहार करती ना ! यह सौतिया डाह उसे क्यों डस रहा था ? सीने पर सांप लौट रहे थे। वह चहलकदमी कर रही थी तेज़ी से। सांस तेज़ चल रहा था जैसे कि रुक ना जाये कहीं।
        सहनशक्ति जब असहनीय हो गई तो वह दौड़ पड़ी वीरेश के कमरे की तरफ। दरवाज़े पर आ कर रुकी। ह्रदय से एक पुकार भी उठी कि वह यह क्या करने जा रही है। लेकिन स्त्री के एकाधिकार की प्रवृत्ति कई बार सोचने समझने की शक्ति खत्म भी कर देती है। वह बुदबुदा उठी ," नहीं , वीरेश मेरा है ! मेरा बच्चा है ! इसे कोई दूर नहीं कर सकता मुझसे ! " दरवाज़ा पीटने लगी।
     " दरवाज़ा खोलो !! दरवाज़ा खोलो !! "
        वीरेश ने घबरा कर दरवाज़ा खोला। सुजाता उसे धकेल कर अंदर चली गई। कमरे में इधर -उधर नज़र दौड़ाई और आश्वस्त सी हो गई। कहीं कोई हलचल नहीं दिखी। कमरे में सजाये फूल अभी अनछुए से ही थे। गहरी साँस भर कर वीरेश के पास जा कर अपने आँचल से उसका माथा पोंछने का उपक्रम करने लगी।
   " अरे मेरे बच्चे !! कितनी गर्मी है यहाँ ! चल मेरे साथ ! मैं हवा में सुलाती हूँ !! " नव वधु को आग्नेय दृष्टि से देखती वीरेश को खींचती ले गई।
    और फूल कंवर ! वह एक दम से घटित हुई घटना से सकते में आ गई थी । उन दोनों के पीछे बढ़ी तो थी। लेकिन लाज ने कदम रोक दिए। जिन आँखों में नव जीवन के सपने भरे थे , उनमें आंसू भर गए। वहीँ जमीन पर बैठ गई। रोती  रही ...., फिर ना जाने कब आँख लग गई।
        उधर वीरेश ने कमज़ोर आवाज़ में प्रतिरोध भी किया कि गर्मी नहीं है, अगर  होगी भी  तो पंखा चलाया जा सकता है। वह सुजाता का अधिक विरोध नहीं कर पाया। मन की भावनाओं पर संकोच हावी हो गया। वह भी वहीँ सो गया।
          तीन महीने बीत गए।  सुजाता ने कोई न कोई बहाना बना कर वीरेश और फूल कंवर को एक छत के नीचे एक होने ही नहीं दिया। फूल कंवर सहमी सी रहती और वीरेश संकोच में रहता।  अपने मन की बात कभी कह ही नहीं पाया। फूल कंवर मायके भी जाती तो वीरेश को बहाने से घर पर ही रोक लिया जाता। शायद सुजाता ने जैसे प्रण  ही कर लिया था कि अगर उसे सुख नहीं मिला तो वह दुनिया की किसी भी औरत को सुखी नहीं रहने देगी।
        दिन -रात  समान हुए हैं कभी ! मौसम भी भी तो बदलते हैं। फिर फूल कंवर के जीवन में ईश्वर ने पतझड़ और गर्म लू तो नहीं लिखी थी ! संयोग से सुजाता को मायके से बुलावा आ गया और उसे जाना पड़ा। आशंकित तो थी वह लेकिन कोई बस नहीं था हालात पर।
        अब वीरेश और फूल कंवर अकेले ही थे।
         उस रात बहुत बारिश हुई। छाई उमस खत्म हो गई।  हवा का ठंडा झोंका दोनों के हृदय को सुकून दे रहा था। ह्रदय का सुकून चेहरे पर गुलाब खिला रहे थे। तीन -चार दिन बाद सुजाता लौट आई। दोनों के चेहरों पर खिले गुलाब उसके हृदय में काँटों की तरह चुभ रहे थे।
          सुजाता ने अब भी अपना नाटक जारी रखा। रात होते ही पीड़ा का नाटक शुरू होता जो भोर होने तक थमता। तो क्या फूल कंवर के जीवन में क्या चार दिन की चांदनी ही थी ?
      " नहीं शायद ! "
      उसे कुछ दिनों से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था। तबियत भी गिरी-गिरी  सी थी शायद ये किसी नन्ही जान के आने की आहट थी और उसे ही पता नहीं था।  लेकिन सुजाता को भान हो गया था। वह तड़प उठी। सर को, हाथों को दीवार पर मारा। खुद को लहूलुहान कर लेना चाहती थी। लेकिन तभी कुछ सोच कर फूल कंवर के कक्ष की तरफ भागी। उसे बालों से पकड़ कर बाहर ले आयी।
         मासूम फूल कंवर घबरा गई। रोते हुए कारण पूछने लगी कि उसका क्या कसूर है ?
" कसूर पूछ रही हो ? बताओ कहाँ जाती हो  ? किस से मिलती हो ? किसका पाप है ?  "
" पाप ! मैंने कोई पाप नहीं किया ! आप क्या कह रही हो ? "
"अरी ये जो पेट में पल रहा है तेरे ! "
चौंक गई फूल कंवर। एक साथ कई विचार मन में आये। खुश तो होना चाहती थी पर वह समझ नहीं पा रही थी कि  क्या कहे क्या ना कहे !
" मैंने कोई गलत काम नहीं किया ! यह तो आपके देवर का ही जिज्जी .....! "
 " झूठ मत बोलो ! अभी वीरेश को बुलाती हूँ ! "
वीरेश खुद ही वहां पहुँच गया था शोर की आवाज़ सुन कर।
 " बोलो वीरेश ! ये क्या कह रही है ? पाप किसी और का लिए घूम रही है और नाम तुम्हारा ले रही है !! "
" हाँ बोलो , तुम बोलते क्यों नहीं कि यह बच्चा तुम्हारा ही है !! " फूल कंवर हाथ जोड़े गिड़ गिड़ा  रही थी।
        कायर निकला वीरेश ! गर्दन झुका दी। ख़ामोशी दो तरफा होती है। हां भी और ना भी। सुजाता ने इसे ना समझा। जबकि वह यह जानती थी कि फूल कंवर सच बोल रही थी।
        कैसी विडंबना थी ! वीरेश को मालूम था कि फूल कंवर सच बोल रही थी फिर भी चुप रहा।  ऐसा भी क्या भय था उसे जो सच का साथ ना दे सका। सुजाता को वीरेश की ख़ामोशी का बल मिला। वह  फूल कंवर को घसीटती हुई तहखाने में ले गई और बंद कर दिया। फूल कंवर की आर्त पुकार कोई नहीं सुन रहा था। नौकर भी थे लेकिन वे सब हुकुम के गुलाम और बेजुबान थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि  मालकिन का विरोध कर सकें।
       सुजाता ने वीरेश को मज़बूर कर दिया कि वह उसकी बात माने और रात को तहखाने में ले कर गई। सुजाता में बेसुध फूल कंवर के प्रति नफरत ना केवल शब्दों और आँखों से बल्कि रोम -रोम से फूट रही थी।
   " वीरेश , मार डाल इस कुलक्षिणी को ! यह जीने के लायक नहीं है !! "
फूल कंवर  तीन दिन से भूखी थी। बोलने की भी क्षमता नहीं थी उठती  तो क्या ! पड़ी रही। मौत की बात सुन कर कांप उठी। जमीन पर घिसट कर दीवार की तरफ सरकने की कोशिश की। लेकिन जो सात जन्म का वादा कर के हाथ पकड़ कर लाया था वही साथ नहीं निभा पाया तो शिकायत किस से !
       सुजाता ने फूल कंवर को घसीट कर चारपाई के पास पटक दिया। चारपाई का पाया उसके कलेजे पर रख दिया। वीरेश को कहा कि वह पाये पर जोर दे कर फूल कंवर को मार डाले। वीरेश के एक बार तो हाथ कांपे लेकिन ना जाने क्या डर था उसे भाभी का।  आदेश का पालन हुआ।
          मर गई फूल कंवर ! मर गई या जी गई यह तो कौन बताता।
  परन्तु ईश्वर जो दुनिया बनाता है , सबका रक्षक होता है ! वह क्यों नहीं आया !
        जब कोई पुरुष स्त्री पर अत्याचार करता है तो इंसानो की ना सही लेकिन ईश्वर की अदालत में इंसाफ की उम्मीद जरूर की जाती है। लेकिन यहाँ एक स्त्री थी दूसरी स्त्री पर अत्याचार करने वाली ! ईश्वर स्तब्ध हो जाता है ऐसे दृश्य देख कर। वह हैरान हो जाता है कि स्त्री को बनाते हुए वह पांच तत्वों को गूंधते हुए कुछ ईश्वरीय अर्क भी समाहित करता है। यही ईश्वरीय अर्क स्त्री के दया और ममता भर देता है। फिर कोई स्त्री इतनी क्रूर कैसे हो सकती है ?
           भोर होने पर खबर फैला दी गई कि फूल कंवर  करंट लगने से मर गई। उसके शव के पास सुजाता का विलाप दिलों को जैसे चीर रहा था। माहौल बेहद ग़मगीन था। परन्तु यह विलाप कैसा था ? इसमें तो जैसे आल्हाद छुपा था। वीरेश खामोश था। मन में कुछ नहीं था। ख़ुशी नहीं थी तो गम भी नहीं था।
            फूल कंवर चली गई तो क्या हुआ। देवर को  फिर से ब्याह लिया। रागिनी आ गई। उसे तो आना ही था। घर सूना कैसे रहता। वंश भी तो बढ़ाना था !
         सुजाता ने रागिनी के साथ भी वही खेल शुरू कर दिया जो फूल कंवर के साथ करती थी। नव -वधु ने कुछ दिन तो देखा। फिर सोच -विचार कर कुछ निर्णय किया। वह सुजाता के कक्ष में गई।  लाज संकोच छोड़ कर वीरेश से बोली , " आप हमारे कक्ष में चलें। जिज्जी की सेवा करने को मैं हूँ ! वह जब तक नहीं सो जाती मैं उनके पैर दबाती रहूंगी ! "
         वीरेश भी शायद यही चाहता था। बस हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था। पिंजरे से आज़ाद हुए पंछी की तरह जल्दी से बाहर निकल गया। रागिनी धीरे से सुजाता के पैरों की तरफ झुकी। सुजाता ने झट से पैर खींच लिए। खड़ी हो कर रागिनी पर तमाचा मारने को हाथ उठाया। रागिनी ने हाथ पकड़ लिया ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न !
      " देखो जिज्जी ! माँ हो तो माँ ही बनी रहो ! सौतन बनने की कोशिश ना करो !! " हाथ झटक कर कक्ष से बाहर आ गई।
           यह तो होना ही था एक दिन ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न ! अब सुजाता की बारी थी सकते में आने की !
             जीवन की गाड़ी चल पड़ी वीरेश की। वह खुद को अपराधी तो मानता था फूल कंवर का लेकिन कर भी क्या सकता था ? हालाँकि रात के सूनेपन में एक चीख उसे जगा जाती थी। उसके बाद वह सो नहीं पाता था। अपने गुनाह के बारे में रागिनी को भी क्या बताता।
          रागिनी ! उसे जीवन के सभी रागों को सुर में ढाल कर गाना आता था। अब उसे मातृत्व का सुर ढाल कर ममता का गीत गाना  था। वीरेश बहुत प्रसन्न था लेकिन सुजाता ! वह तो खुश होने का दिखावा भी नहीं कर पा रही थी। अलबत्ता कोई न कोई कोशिश होती कि रागिनी का गर्भ समाप्त हो जाये। यह राज़ एक दिन वीरेश पर भी खुल गया। वह रागिनी को लेकर अलग घर में चला गया।
         सुजाता  क्या करती ? उसने तो वीरेश को माँ बन कर पाला था।
   निःस्वार्थ ! बेशक निःस्वार्थ !
       उसके अवचेतन मन में यही था कि जो भी उसे मिलता है छिन जाता है। इसलिए वह वीरेश के प्रति असुरक्षित थी। पारिवारिक रंजिश की वजह से और परदे की वजह से भी वह बाहर की दुनिया से अधिक सम्पर्क नहीं बना पाई। अपने ही खोल में सिमटी रही। काश,  कि कोई सुजाता को समझने वाला होता तो वह ऐसी नहीं होती। खुले दिल से वीरेश की दुनिया बसते देखती।
            उसका अकेलापन और बढ़ गया। सूनी हवेली में वह अकेली थी। पागलों की तरह यहाँ वहां हर कमरे में भागती। उसकी चीखों से सारी  हवेली तड़प उठती। रागिनी, जो कि समझदार औरत थी उसने वीरेश को सुजाता के ईलाज करवाने को कहा। कहा कि वह सुजाता के प्रति जिम्मेदारी से मुहं नहीं मोड़ सकता। आखिर उसी ने तो उसकी परवरिश की थी।
       ईलाज से तन ठीक होते हैं मन नहीं। हालात से समझोता करने के अलावा सुजाता के पास कोई चारा भी नहीं था।
              कलेजे में हूक सी उठती थी सुजाता के और वीरेश के भी। दोनों को ही उनका पाप जीने नहीं दे रहा था। वीरेश के घर में खुशियां तो आई थी लेकिन कभी हृदय से महसूस नहीं कर पाया। कभी हँसता भी तो फूल कंवर का मरता , दर्द भरा चेहरा सामने खड़ा हो जाता। उसे याद था कि कैसे फूल कंवर के चेहरे पर दर्द था। वह चली गई चिता की अग्नि में भस्म हो गई। दर्द  छोड़ गई , सुजाता और वीरेश के हिस्से में।
                सुजाता को लगता कि फूल कंवर उसके आस -पास ही मंडराती है। वह भयभीत रहती थी। किसी नौकर या नौकरानी को हवेली में रहने ही नहीं देती थी। रात को बार -बार दरवाज़े पर अंदर लगी कुण्डियां जांचती। चलती तो ऐसे लगता कि कोई साया उसके साथ -साथ चल रहा है।
        " आओ जिज्जी ! मेरे साथ चलो !" फूल कंवर बोली तो सुजाता बुरी तरह से चौंक उठी। अतीत की तन्द्रा से जाग गई हो जैसे।
       " नहीं !! मैं तुम्हारे साथ क्यों जाऊँ ? तुम हट जाओ मेरे सामने से ! चली जाओ !! "
पता नहीं यह फूल कंवर का भूत था या मन का वहम। भूत या वहम नहीं था तो यह सुजाता का पाप तो जरूर था जो आज उसके सामने खड़ा था। वह दौड़ पड़ी मुख्य दरवाज़े के पास।
     चीख रही थी ,   " दरवाज़ा खोलो !!"
दरवाज़ा पीट रही थी !   " दरवाज़ा खोलो !!"
           अंदर से बंद दरवाज़े खुलें है भला कभी !!
  दरवाज़ा खोलने के लिए कुण्डी उसके सामने थी लेकिन वह बाहर से दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार करती रही। काश कि वह अपने मन का दरवाज़ा बंद ना करती।
     सुबह दरवाज़ा तोडा गया तो सामने सुजाता मरी पड़ी थी। लहू लुहान , रक्त रंजित कलेजा फटा पड़ा था। सुना था की उसे पेट में कैंसर हो गया था , शायद वही फूट गया हो। या क्या मालूम फूल कंवर ने ही ?


( चित्र का कहानी से कोई संबंध नहीं है। यह मेरी मित्र अंजना बिजारणिया का है उनकी इज़ाज़त से ही यहाँ लगाया गया है )

Friday, March 6, 2015

शिकायत ....


        किशोर बहुत परेशान है श्यामा की नाराज़गी से। होली के दिन मायके से ले आया इसलिए वह मुहँ फुलाये घूम रही है। बात ही नहीं सुन रही है। वह भी क्या करता दादी ने एक दम से फरमान जारी कर दिया कि  होली पूजन में बहू  भी होनी चाहिए। उसका ससुराल ज्यादा दूर नहीं है। बस से जाओ तो दो घंटे ही लगते हैं।
       श्यामा ने तो उसे देखते ही मुहं फुला लिया था। सारे राह बोली ही नहीं बल्कि चुप -चुप आंसू बहा रही थी। पूजा में भी चुप से लग रही थी। उदास सी घूंघट में होली को परिक्रमा देती हुई को काकी सास और जेठानी की आवाज़ सुन रही थी कि  बेचारी  को बेकार ही में त्यौहार पर बुलवा लिया। वह जल्दी से आँगन की तरफ चली। वहां परेशान सा किशोर अकेला ही खड़ा था।
   
  " श्यामा , मुझे माफ़ कर दो ! मुझे तुम्हें आज के दिन नहीं लाना चाहिए था मगर मैं मज़.....! "
" पंद्रह दिन का बोल कर  तू महीने  बाद क्यूँ आया रे !! " श्यामा ने घूंघट पलट कर तैश में जवाब दिया।
   

Wednesday, February 11, 2015

" ओह ! ये बच्चे भी ना !

 " ओह , ये बच्चे भी ना !
                 
 घर में सभी सो गए हैं । जाग रही है एक माँ ! क्यूंकि उसका जवान होता बेटा अभी घर नहीं लौटा है। किसी दोस्त के जन्म दिन की पार्टी है। जब भेज ही दिया तो चिंता क्यों कर रही है ?
    क्यों ? चिंता क्यूँ ना करे !
    अरे भई माँ है वो ! जमाना खराब है। कोई गलत राह पर डाल दे तो !  उलटे -सीधे काम सीख गया तो !
             " हैं !! उलटे -सीधे काम ? "
             " हाँ ,यही कि कोई नशा ! "
                " नशा !! "
                जैसे सिगरेट , शराब या  और कोई बुरी लत।
             "ओह्ह नहीं !! " उठ बैठी वह। मन आशंका  घबराने लगा।
          तभी दरवाज़ा  खुलने और चिटकनी लगने की आवाज़ से आश्वस्त हो गई। लेट गई। फिर सोचा कि अभी डांट लगाती हूँ। कुछ सोच कर रुक गई। उचित समय का इंतज़ार करने लगी।  लगभग आधे-पौने  घंटे से तो ऊपर समय हो ही गया होगा।
          वह  धीरे से उठी और बेटे के कमरे की तरफ चली। धीरे से दरवाज़ा खोला। झांक कर देखा तो बेटा  गहरी नींद में सो गया था।
        " सोते हुए कितना प्यारा लग रहा है मेरा लाल !  थक जाता होगा। कितनी मेहनत करता है। सुबह स्कूल , फिर दोस्तों के साथ घूमना, ट्यूशन जाना ,पढाई करना।
      हां ! मोबाईल भी तो है। इस पर भी तो कितनी दिमाग खपाई होती है। बहुत सारा प्यार आया कि सर सहला कर माथे पर ढेर सारा प्यार उंडेल दे।
           लेकिन वह तो किसी और काम आयी थी। ऐसे तो वह जाग जायेगा। वह झुकी और सूंघने की कोशिश करने लगी कि कोई बू तो नहीं आ रही।
               कोई बू नहीं आई।
             "  बू कैसे नहीं आई भला ! "
              " माँ को जुखाम लगा है शायद !! "
        फिर कोशिश की।  इस बार भी नहीं आई बू ! ऐसा कैसे हो सकता है , इतनी देर रात तक बाहर रहा और कोई बू नहीं ! जरूर माँ को नज़ला हो गया है !
       अब अगली कोशिश मोबाईल ढूंढने की। सरहाने के नीचे दबा कर रखा होगा। धीरे से सरहाने के नीचे हाथ सरकाने की कोशिश की।
         " अरे वाह, मिल गया ! " जीत जाने की ख़ुशी का सा भाव। मोबाईल में देखना था कि वह किस से बातें करता है। कोई लड़की तो नहीं !
       वैसे फोन टटोलने की यही मुख्य वजह थी। फोन तो मिल गया ! पासवर्ड नहीं मालूम !
      कई देर कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं। फिर देखा कि फोन की बैटरी लो हो रखी है। बच्चे को सुबह मुश्किल होगी। फोन चार्ज पर लगा कर बेटे का सर सहला कर मन ही मन बुदबुदाती हुई कमरे से बाहर आ गई आ गई।
        " ओह ,  ये बच्चे भी ना ! जरा सा विश्वास नहीं बड़ों पर ! अब हमें इनके फोन से क्या ? "

Monday, February 9, 2015

पेके हुंदे माँवा नाल.......


कब्रें विच्चों बोल नी माए 
दुःख सुःख धी नाल फोल  नी माए 
आंवा तां मैं आमा  माए 
आमा केहरे चावा नाल 
माँ मैं मुड़ नहीं पैके औणा 
पेके हुंदे माँवा नाल। 
      सुरजीत बिंदरखिया का यह गीत हस्पताल के  जनरल वार्ड से  स्पेशल रूम की खिड़की से होता हुआ सुखवंत के कानो में भी पड़ रहा था। शायद किसी की मोबाईल फोन की रिंग टोन थी। दवाइयों के नशे से ज्यादा हिल तो नहीं पा रही थी लेकिन चेतना तो पूर्ण रूप से थी। 
" माँ !! " 
 " पैके हुंदे माँ वा नाल। "
हृदय से हूक उठी जो जबान पर आह बन कर निकली। माँ -बापू तो साल पहले ही दुनिया छोड़ चले हैं। एक बस दुर्घटना में उन चारों भाई बहनो  बिलखता छोड़ गए। बेशक  सभी अपने घरों  सुखी  थे। लेकिन बेटियों को  माँ -बाप हर उम्र में चाहिए। वो किसे अपने मन की कहे। कौन प्यार से सर पर हाथ रखे। 
        भाई अपनी दुनियाँ में मगन हो जाते हैं। और हो भी क्यों ना हो उनका अपना परिवार ,जिम्मेदारी भी तो होती है। दोनों बहने जब भी मायके आती , माँ-बापू कितना चाव करते थे। छोटे भाई के साथ रहते थे। बड़े का घर सामने था। छोटे की शादी होते ही कुछ दिनों बाद बड़ा भाई अलग हो गया। अलग क्या हुआ , जैसे वैर ही बांध लिया छोटे से। छोटा भी कम नहीं था वह भी अड़ जाता। खेतों में पानी की बारी हो या बाड़ लगाना हो। हर जगह बड़ा भाई चौधरी बन कर खड़ा हो जाता। खुद के करोड़ पति होने का दम्भ भरता। 
             छोटे भाई का रोना शुरू हो जाता कि उसको क्या मिला सारा धन तो बड़ा हड़प गया। उसके सर पर माँ-बापू का बोझ भी तो है। रोज़ बीमारी पर खर्चा होता है। बहने भी साल में कई चक्कर लगा जाती है , उनको भी कोई खाली थोड़ी भेजा जाता है। ऊपर से दो बेटियां भी तो हैं। बड़े भाई के तो ऐश है। कोई जिम्मेदारी नहीं , ऊपर  से रौब भी सहन करो उनका। किस्मत तो मेरी फूटी है जो मरा हुआ सांप गले पड़ गया। 
         " ओये कुलजीते !! ये मेरे बेटे नहीं है ! राहु -केतु हैं ! उनकी तरह ही कभी एक साथ नहीं रहते। आमने सामने अड़े रहते हैं और चलते भी वक्री गति से हैं। कोई बदला है पिछले जन्म का , या मेरी परवरिश ही ऐसी है !"
      माँ क्या कहती बापू को। वे सही तो बोलते थे।  
    " परवरिश तो बुरी नहीं की जी हमने !! "
बेटियां मायके आती  तो भाभी बाजार से कपड़े कहाँ लाने  देती थी। पहले ही शोर मचा कर अपनी कमियों का रोना शुरू कर देती।  माँ अपने पास जो रूपये रखे होती थी उन्ही में से कुछ दे देती। 
       हालाँकि बापू के हिस्से की जमीन छोटा ही देखता था।पर फसल का तीसरा हिस्सा भी रो -रो कर देता। छोटी भाभी जितनी रूपवती थी उतनी ही कर्कशा। माँ -बापू को जब तक दिन में एक बार रुला ना दे , चैन नहीं मिलता। इसी स्वभाव के कारण बच्चों में ननिहाल आना ही छोड़ दिया था। बेटियां ही आती कुछ दिन रह कर अपने घर वापस आ जाती। 
       बड़ी भाभी मीठी छुरी जैसी , भाई के खेतों की तरफ या शहर चले जाने के बाद माँ के पास आकर मीठी बातों से टोह लेती कि कितनी फसल हुई। माँ के पास कितना माल है। कई बार तो दोनों बहुओं में तकरार भी हो जाती। छोटी को ऐतराज़ था कि बड़ी को अगर इतना ही मोह प्यार है तो इनको साथ क्यों नहीं रखती। इस तकरार को देखते हुए बेटियों ने अपने साथ ले जाने की भी सोची। 
       सुखवंत ने , उसकी छोटी बहन ने भी कई बार कहा भी कि वे उसके साथ चलें। कम से कम चैन की साँस तो मिलेगी। 
    " ना पुत्त ना !! बेटी के घर जायेंगे तो लोग क्या कहेंगे। अब यही रहेंगे हम। तू तेरे घर सुख से रह। " 
   " सुख !! "
  फिर आह निकल गई सुखवंत के मुहं से।   क्या सुख था उनको बेटों का। कितनी मन्नते मांगने पर बेटे मिलते हैं और अगर बेटे ऐसे निकल जाये तो !
  " सरदार जी ! जब तक हम हैं  ,  बेटियों को कुछ न कुछ देते रहते  हैं। जब ना रहेंगे तो ये बेटे -बहू तो उनको घर में भी क्या मालूम आने दे या ना आने दे। मेरी इच्छा है कि थोड़ी जमीन या शहर की कुछ जायदाद बेटियों के नाम लगा दें। ये भी तो इसी घर का हिस्सा हैं , इन्होने भी तो यहाँ जन्म लिया है। मेरे लिए तो सभी एक जैसे हैं। "
   " हाँ कुलजीते ! तेरी बात सही है। मैं भी यही विचार कर रहा हूँ। "
     संयोग से यह बातचीत छोटी बहू के कानो में पड़ गई । फिर तो उस रात ना वह सोई ना ही घर में किसी को सोने दिया। वह  हंगामा खड़ा किया कि पड़ोसी भी जाग गए। बात मरने -मारने तक पहुँच गई। अगले दिन बेटियों को भी बुलवा लिया।
          " बेटियों को मायके की सुख शांति के अलावा कुछ नहीं चाहिए। हम दोनों बहनों को  जायदाद का थोड़ा सा भी हिस्सा नहीं चाहिए। रब जी के वास्ते तुम  माँ -बापू पर जुल्म करना  छोड़ दो। पता नहीं कितने साल और जीयेंगे। चैन से मर सकें इतना तो जी लेने दो इनको !! " सुखवंत को बहुत गुस्सा आया। दोनों बहने बिना खाए पिए ही घर से जाना चाह  रही थी। माँ के बारे में सोच कर कुछ निवाले गले में सरका लिये।
          बड़े भाई को पता चला। वह भी जायदाद पर दावा करने पहुँच गया। उसे लगा , बापू खुद के हिस्से की जमीन भी कहीं  छोटे के नाम ना कर दे। उसने कहा कि  जमीन चाहे बापू के मरने के बाद मिले , नाम अभी लगा दे। क्या मालूम छोटा कब्ज़ा कर ले दे ही ना। छोटा कहाँ चुप रहने वाला था। वह भी बोला कि सेवा तो वह करता है।  इनके मरने के बाद खर्चा भी  उसे ही उठाना है।  जमीन भी वही रखेगा।
             सुन कर दिल कट कर रह गया। लालच और स्वार्थ कितना गिरा देता है इंसान को।
       माँ मुहं ढांप के रो पड़ी। " अरे कसाइयों ! क्या तुमको इस दिन के लिए जन्मा था। कुछ तो शर्म करो , लिहाज करो हमारी उम्र का। इस  उम्र में हमें प्यार के दो बोल चाहिए। इज़्ज़त -मान चाहिए। दौलत -जायदाद यहीं धरी  जाएगी। साथ नहीं जाएगी। मुहं से बद्दुआ नहीं दे सकती ! माँ हूँ ! लेकिन तड़पता दिल दुआ तो नहीं दे सकता ! "
        सुखवंत और जसवंत दोनों बहने अपने घर चली गई। भारी मन से। मायके  का दुःख ससुराल में कैसे कहती। मायके की इज़्ज़त का सवाल भी तो था। अंदर ही अंदर रो लेती बाहर मुस्कुरा लेती। बस वही आखिरी मुलाकात थी , माँ -बापू से से।  रिश्तेदारी में जा रहे थे। बस दुर्घटना ने दोनों को छीन लिया। कहर टूट पड़ा जैसे।
          कुछ दिन मायके रह वापस आ गई। भाभियाँ मन ही नहीं जोड़  थी ननदों से। असल में मायका तो भाई -भतीजों से ही तो होता है। माँ -बाप हमेशा तो नहीं रहते !भाई -भाभियों  बेरुखी से बहनो ने समझ लिया था कि  उनका मायका , मायका नहीं रहा।  एक कसक भरी  याद बन गया है। अपने -अपने घरों खुश थी।
       जीवन तो चलता ही है। चल पड़ा। सुखवंत के बेटे  की शादी की तारीख नज़दीक आ रही थी। शादी की तैयारी में व्यस्त सुखवंत अपना दुःख कुछ भूलने  थी। बीच -बीच में यह भी बात  उठती कि ननिहाल से भी तो कुछ आएगा ही। दो मामा है। अपना फ़र्ज़ अच्छा ही निभाएंगे। सुखवंत के पति को  सब पता था। वह कह देता कि क्यों मेरे पास क्या कमी है जो ससुराल से आस रखूं। सुखवंत क्या बोलती।
       शादी का निमंत्रण देने बेटे  साथ मायके गई। कुछ नहीं बदला था। वही आँगन , दीवारें ! भाई -भाभियों की बेरुखी भी वही। आँगन में बैठी माँ -बापू  खोज रही थी। कि इधर से माँ भागी आती आती थी उसे गले लगाने। बापू भी तो सुन कर दौड़े आते थे। कितना प्यार -दुलार कि वह खुद को बच्ची ही समझ बैठती। हृदय में हूक उठी। काश आज माँ सामने होती , एक बार गले लग कर रो लेती।लेकिन माँ नहीं थी।
            और अब ! दोनों भाभियाँ !! हां , हैरानी तो उसे भी थी। पहले तो इतनी एकता नहीं थी उनमें। माँ -बापू  के मरते ही  भाई एक  हो गए। जायदाद बाँट ली। यानी कि माँ-बापू का खून ही मीठा था जो ये जोंक की तरह पीते रहे। मन वितृष्णा से भर गया उसका । भाभियों ने मन तो न मिलाया।  पकवान बहुत बनाये। जब मन ही मर गया हो तो मन मार के ही खाना गले से उतरा।निमंत्रण दे कर भरे मन से लौट आई सुखवंत।
             शादी की धूमधाम थी घर में। मेहमानों से घर भर गया। भाइयों की उडीक ( इंतज़ार ) थी।  भाई सपरिवार तो आये पर पर  महज औपचारिकता सी निभाने। सास भड़क गई।
      " ऐ की  सुखवंत !! तेरे भाई यूँ ही आ गए हाथ हिलाते। तेरे बापू के  बाद यही तो पहला काम था। शर्म तो नहीं आयी। खुद के साथ हमारी भी नाक कटवा दी। "
          करतार सिंह ने बात संभाली , " जान दे बेबे ! क्या कमी है मेरे पास। "
        सास का मुहं फूला ही रहा। सुखवंत के पास कहने को कुछ नहीं था। दिल रो रहा था। मुस्करा कर रस्में निभाए जा रही थी। बेटा दूल्हा बना बहुत प्यारा लग रहा था। हर माँ का अरमान बेटे को दूल्हा बने देखने का , उसके संसार को बसते देखने का होता है। ढेर सारी दुआएं दे डाली। सहसा माँ याद आ गई। अगर माँ होती तो कितना खुश होती।
           शाम को दुल्हन आ गयी की गूंज से घर गुंजायमान हो गया। द्वार पर मंगलाचार करते  हुए सुखवंत की आँखों के आगे जैसे अँधेरा छा गया और बेहोश गई। दिल ही तो था। इतना सारा गम भरा था , ख़ुशी झेल नहीं पाया। हृदय घात  बताया डॉक्टर ने। होश आया तो अस्पताल में थी। कुछ दिन आई सी यू में रखने के बाद पिछली रात ही कमरे में शिफ्ट किया गया था।  छत को निर्विकार देखती सुखवंत माँ को याद किये जा रही थी। उसे लगा जैसे माँ सर सहला रही है। आँखे मुंद गई।
              " सुखवंते ! सो रही है ? " करतार सिंह की आवाज़ सुन कर सुखवंत ने आँख खोली। करतार का हाथ ही उसके सर पर था। सर घुमाया तो बेटा - बहू और परिवार के सभी सदस्य थे चिंता और ख़ुशी के भाव लिए। सहसा उसकी नज़र कमरे के दरवाज़े पर जा कर रुक गई।
          " सुखवंते , तैन्नू हुण वी किस्से दी उडीक है ? " करतार ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए पूछा।
 " नहीं सरदार जी , हुण मैन्नू किस्स्से दी वी उडीक नहीं है। पैके हुंदे माँवा नाल ! " कह कर आँखे मूंद ली सुखवंत ने , दो बून्द आँसू ढलक पड़े आँखों के किनारों से।(1832)
             
             
   

     
                
           

Saturday, February 7, 2015

ख़ुशी की ओर पहला कदम ...

 "दर्द ! कैसा दर्द !! "
   " अब दर्द कहाँ होता है डॉक्टर  ?   कहीं भी हाथ रखो , दर्द नहीं होता मुझे !  यह तो मेरे बदन में लहू बन कर दौड़ रहा है ! मैंने सुना है कि प्रसव पीड़ा भी बहुत दर्द दायक होती है। अब मैं वही दर्द महसूस करना चाहती हूँ।  मेरा इलाज़ करो। अगर इस दौरान मैं मर भी जाती हूँ तो आपको कोई दोष नहीं लगाएगा। यह भी मैं लिखने को तैयार हूँ। "
       ख़ुशी मेरे सामने गिड़गिड़ा सी रही थी।
" लेकिन यह मैं अपनी जिम्मेदारी पर नहीं कर सकती  ख़ुशी , तुम साथ में अपने पति को लाओ या सास को ही ले आओ। "
       " ठीक है डॉक्टर , आज मेरा दिन है मेरे पति के साथ ! बात करती हूँ ! "
  ' ख़ुशी ', नाम ना जाने क्या सोच कर रखा था माता -पिता ने ,जबकि ख़ुशी का कोई स्थान ही नहीं इसके जीवन में। कुछ महीनों से यह मेरे पास इलाज़ के लिए आ रही है। पहले मुझसे जूनियर डॉक्टर के पास इसका केस था।
    शादी के बाद माँ नहीं बनी। घर में किसी को इसके माँ बनने की कोई चिंता नहीं थी शायद इसलिए अकेली ही आती थी। मैंने कहा भी था कि उसका पति साथ क्यों नहीं आता। क्या उसे बच्चे की चाहत नहीं है ? वह बस काम का बहाना कर देती कि उसके पति को काम है। लेकिन अब , जब उसके सभी परीक्षण किये जा सकते थे कर लिए थे मैंने। यह आखिरी परीक्षण था जिसमें मैंने उसे पति  को साथ लाने  को कहा। एक तो उस प्रक्रिया में दर्द बहुत था और दूसरे कि अगर मुझे कुछ दोष नज़र आये तो मैं उसके पति को समझा सकूँ।
      वह बोल कर चली गई कि आज उसका ' दिन ' है पति के साथ। जब उसने पहली बार यह कहा तो मैं बहुत चौंकी थी कि वह ऐसा क्यों बोली। पूछा भी था। वह चुप सी चली गई।
     अगले दिन मेरे आग्रह से पूछने  पर बताया कि वह उसके पति की दूसरी पत्नी है।
" तो क्या पहली पत्नी जिन्दा नहीं है ? "
" ज़िंदा है !"
संक्षिप्त सा उत्तर दे कर चली गई।
      मुझे हैरानी और खीझ हो आई। कैसे पहेलियाँ सी बुझा कर चली जाती है यह औरत। फिर ख्याल भी आया कि मुझे क्या पड़ी है ? मैं क्यों इसकी निज़ी जिंदगी में झाँकने की कोशिश कर रही हूँ। कोई उसके साथ आये या ना आये मुझे इससे क्या ?
        अगले दिन वह अकेली ही आई। मेरे पूछने पर वह रोने लगी कि उसके साथ कोई नहीं है। घर में सबके होते हुए भी वह अकेली है। वह चाहती है कि  उसके एक बच्चा हो जाये। कोई तो हो जो उसे अपना कहे। जो उसने अपने बारे में बताया , उसे  सुन कर मुझे बहुत दुःख हुआ।
         ख़ुशी के पिता की  मौत उसके बचपन में ही हो गई थी। माँ ने पिता की जगह नौकरी करते हुए जैसे -तैसे  उसे और बड़े भाई को पाला। अभी दसवीं में ही थी कि माँ भी चल बसी। तब तक भाई की नौकरी लग गयी थी। बचपन की चंचलता तो माँ को हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए देख कर  ही खत्म हो गई थी और किशोरावस्था के सुहाने सपने माँ के चले जाने से टूट गए। बस  ख़ुशी थी वह , दिल से खुश कब हुई थी , नहीं याद उसको।
        रिश्तेदारों ने भाई की शादी करवा दी। घर भी सँभालने वाला चाहिए। भाभी को वह  मुफ्त की नौकरानी से कम नहीं लगी। स्कूल और घर का काम दोनों करती ख़ुशी का जीवन मशीन की तरह बन गया था। मन में कोई चाह नहीं थी। जैसे -तैसे बारहवीं पास की। दूर के रिश्ते की मामी ने रिश्ता करवा दिया। ख़ुशी ने विरोध भी किया लेकिन पढ़ कर कौनसा कलक्टर बनना है उसे , कह कर चुप करवा दिया।
           कपिल से विवाह हो गया। दुल्हन बन ससुराल आ गई। सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार था। ससुराल में इतना प्यार मिला कि वह मायके के सारे दुःख भूलने लगी।  सास-ससुर बहुत प्यार करने वाले। जेठ पिता समान तो जेठानी माता समान थी , उनके दो बच्चे भी बहुत प्यारे थे। कपिल भी बहुत प्यार और ख्याल करने वाला पति था। कभी -कभी उसे सपने जैसा लगता और सोचने लगती कि क्या जीवन में इतनी खुशियाँ भी हो सकती है।
      मगर नाम से ख़ुशी होने से क्या होता है। वह तो किस्मत में भी तो होनी चाहिए ! नहीं थी उसकी किस्मत में कोई भी ख़ुशी।
         ईश्वर क्या सच में इतना बेरहम हो सकता है !
          शायद हाँ !
             पता नहीं !! तभी तो शादी के छह महीने बाद ही उसका सपना टूट गया। बिखर गई खुशियाँ एक बार फिर। कपिल का शव जब घर पहुंचा तो जैसे भूचाल सा आ गया हो। घर की दीवारें जैसे भरभरा कर टूट गई हो। बताया गया कि फैक्टरी में  मशीन से करन्ट आ गया था।
              छोटी सी उमर में ही कितने हादसे झेल  चुकी ख़ुशी अब टूट गयी थी। सदमा सा दिल में बैठ गया था। जीवन एक बार फिर यंत्रवत्त  गया।
                           बेरंग सा !!
           बेचारा सा महसूस करवाने वाला।
  सास का रवैया बदलने लगा था। ससुर गुमसुम से हो गए थे। जेठ से पहले भी कोई सरोकार नहीं था अब भी  नहीं , पर्दा करती थी। जेठानी का बर्ताव जरूर हमदर्दी वाला था। बच्चों से बातें  कर कुछ दुःख भुला देती थी।
      एक दिन फैक्टरी से एक आदमी आया और कागज़ों पर दस्तखत करवा कर गया।  उसे समझ नहीं आया कि यह कैसे कागज़ थे और सास इतनी मीठी क्यों बनी हुई थी। उस रात देर तक सास -ससुर के कमरे में आवाज़ें आती रही थी। जेठ जी भी बोल रहे थे। क्या बात हो रही थी उसे समझ नहीं आ रही थी।
     सुबह का आलम कुछ अजीब सा लगा उसे। अजीब सा सन्नाटा था घर में। रसोई में गई। जेठानी चाय बना रही थी। पैर छूने को हुई तो पीछे सरक गई। ख़ुशी अचरज से उसे ताकने लगी तो मुहं फेर लिया जेठानी ने। शायद आँखे भरी थी लेकिन चेहरे पर घृणा जैसे भाव थे।
      सारा दिन उस के साथ कोई नहीं बोला। ना ही बच्चों को पास आने दिया गया। वह हैरान थी। हिम्मत करके जेठानी से पूछा भी। " चल यहाँ से !दूर होजा मेरी नज़रों से मनहूस  !! " कह कर वह फूट -फूट कर रोने लगी।
ख़ुशी हैरान परेशान सी थी। कोई बोलता नहीं।  कोई बताता भी नहीं। घर में फोन भी नहीं था कि मायके ही बात कर ले।ससुर और जेठ के पास अपने-अपने मोबाईल फोन थे। उसे कौन बात करवाता।
         मायका ! आह निकली उसके दिल से ! कौन था उसका अब वहां ? फिर भी एक आस रहती है कि कोई तो ठंडी हवा का झोंका आएगा जो उसके मन को शीतल कर जायेगा। भाई की बहुत याद आ रही थी उसे।
      दो दिन बाद वह आश्चर्य चकित रह गई जब सच में उसका भाई उसके सामने खड़ा था। वह दौड़ कर भाई के गले लग गई और बिलख पड़ी। भाई भी अपने आप पर काबू ना रख सका। वह भी रो पड़ा। क्यों कि  कहीं न कहीं एक अपराध बोध भाई के मन में भी था।कुछ देर बहन -भाई ने सुख दुःख किया। ख़ुशी को पता चला कि भाई को बुलवाया गया था। किस वजह से बुलाया , यह नहीं पता था।
          वजह पता चली तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई जैसे। फिर जो हुआ वह सिर्फ गुनाह ही था। ख़ुशी को भाई की रजामंदी से जेठ की चादर ओढ़ा दी गई।
          पिता समान जेठ अब पति था और माता समान जेठानी अब उसकी सौत थी। ख़ुशी को अब समझ आ गई थी  बेरुखी।  स्वाभाविक भी था , कोई भी औरत अपने पति को बाँट नहीं सकती। ख़ुशी की हालत तो और भी बदतर थी कि जिस इंसान से पर्दा करती थी , जो पिता तुल्य था , उसे पति रूप में कैसे स्वीकार करे। यह अनैतिक तो था ही  गैरकानूनी भी तो था। काश कि वह और उसकी  जेठानी पढ़ी लिखी होती , विरोध करती तो दोनों की ही जिंदगी इतनी बदतर नहीं होती। ऐसा हुआ नहीं और दोनों स्त्रियों ने ही गलत परम्परा के आगे घुटने टेक दिए। तय किया गया कि पति एक दिन बड़ी बहू के साथ तो दूसरे दिन छोटी बहू के साथ रात बिताएगा । बहुत अच्छा न्याय था दोनों पत्नियों के साथ !
               जिस रात पति ख़ुशी के साथ होता वह रात दोनों के लिए जैसे मौत की रात होती , बड़ी को यह सहन ही नहीं हो रहा होता  पति अब बँट गया है। और ख़ुशी ! वह यह स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी कि पिता समान जेठ  अब पति है। चाहने से क्या होता है। हालात थे  ! दोनों स्त्रियां झुकती ही चली गई। बच्चे भी बेरुख  गए थे। उसे  लगा कि  कोई बच्चा आ जाये तो  कुछ सुकून  मिले।  दो साल तक माँ नहीं बनी तो  चिंता होने लगी। सास को कहा तो बोली वह क्या करेगी बच्चों का , दो बच्चे तो हैं। यही जवाब पति की और  से भी मिला। वह रोई ,कुछ दिन मिन्नत भी की। तरस आ गया पति को , अस्पताल जाने की इज़ाज़त  दे दी। लेकिन वह साथ नहीं जायेगा , शर्त पर !
        अब वह मेरे सामने बैठी थी। अपनी कहानी सुनाती हुयी। आँसू पौंछती हुई। मैंने पानी  का गिलास थमाते हुए पूछा , " ख़ुशी ! मुझे एक बात नहीं समझ आई कि तुम्हारी शादी तुम्हारे जेठ से ही क्यों करवाई गई ? जबकि तुम्हारा किसी और  भी तो विवाह किया जा सकता था ! "
        " लालच था ! "
" पति की मृत्यु के बाद कम्पनी ने  बीमे और मुआवजे का रुपया मुझे ही देना था। घर का पैसा घर में ही रहे इसलिए मुझे जेठानी की सौत बना दिया गया। "
     ओह ! लालच की कैसी पराकाष्ठा थी !!
" तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ है ख़ुशी। " मैंने बुरा शब्द पर जोर देते हुए कहा।
     " अब तुम क्या चाहती हो ? तुम्हारा पति तुम्हारे साथ नहीं है। बल्कि वह तो खुश ही हो रहा होगा कि बच्चे का झंझट भी नहीं है और बिस्तर गर्म करने का साधन भी सहज उपलब्ध है। तुम्हें पता भी है क्या , कि तुम्हारी शादी गैरकानूनी है। अगर तुम शिकायत करती तो तुम्हारे पति पर दबाब पड़ता कि ऐसे  में उसकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है तो वह तुमसे यह शादी नहीं करता।  "
    " जी डॉक्टर ! मुझे मालूम है कि गैर क़ानूनी है। लेकिन मेरे साथ  नहीं था।  मैं क्या करती ?"
     " अगर मैं कहूँ तो हर इंसान अपनी हालत का खुद जिम्मेदार होता है। तुमने विरोध की  एक आवाज़ तो उठानी  थी। फिर देखती कितने हाथ आ  जाते तुम्हारे सहारे  के लिए। घर में कोई नहीं था तो बाहर किसी  राज़दार बनाती। अब तो कितनी ही सरकारी -गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो बे -सहारा औरतों को स्वाबलंबी बनने  सहायता करती है। "
      " आपने सही कहा डॉक्टर। मैं कमजोर पड़ गई क्यूंकि जीवन ने मुझे दुःख और हादसों के सिवा कुछ नहीं मिला है। कोई सहारा -सांत्वना देने वाला भी नहीं। यहाँ तक कि मेरा माँ जाया भाई भी राखी की लाज निभा नहीं सका। अपना बोझ ही समझा मुझे। "
      " खैर ,अब तुम अपने घर से किसी को तो साथ लाओ। वैसे मैं तुम्हारे भाई और तुम्हारे पति की पहली पत्नी से मिलना चाहती हूँ। तुम किसी तरह मना कर ले आओ उनको। "
       ख़ुशी ने कहा कि वह कोशिश करेगी। चली गई।
मुझे मालूम है कि मुझे किसी की जिंदगी में दखल देने का अधिकार नहीं है। मगर मैं एक डॉक्टर होने के साथ -साथ एक स्त्री भी हूँ जो दूसरी स्त्री का दर्द समझ सकती हूँ। मेरे मन में उस बिन माँ की बच्ची के लिए ममता उमड़ पड़ी। ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि ईश्वर उसकी  गोद जरूर हरी करे।
        लगभग एक सप्ताह बाद ख़ुशी अपने भाई -भाभी और जेठानी के साथ आई। परीक्षण के  बाद  सभी को  अपने पास बुलाया  कहा कि ख़ुशी माँ नहीं बन सकती।  उसकी जेठानी और भाभी तो बिना प्रतिक्रिया बैठी रही। भाई  दुखी था। ख़ुशी को जरूर एक आस थी कि शायद ! क्या मालूम !!लेकिन अब वह मायूस हो कर फूट -फूट कर रो पड़ी।
    " मुझे बहुत दुःख हो रहा है कि तुम दोनों ख़ुशी को रोते हुए देख कर भी नहीं पसीजी। क्यूंकि एक की वह सौतन है और दूसरी इस डर  से कि प्रेम से पेश आएगी तो कहीं यह तुम्हारे गले ना पड़ जाए। जरा इंसान बन कर भी तो सोचो। " मैं उन दोनों महिलाओं से कहा।
      ख़ुशी को चुप करवाते हुए उसके भाई से कहा , " क्या तुम्हें अपनी बहन पर जरा भी तरस नहीं आया ! एक विवाहित को ब्याह दिया अपनी बहन को। क्या तुम्हारा फ़र्ज़ नहीं था कि  तुम उसका उत्तरदायित्व निभाओ। "
    भाई बगलें झाँकने के अलावा कुछ नहीं कर सका।
 " और तुमने अपने पति की दूसरी शादी के लिए हाँ कर दी और ख़ुशी को ख़ुशी-ख़ुशी सौत स्वीकार कर लिया। "
 " मैं क्या करती ! मेरी कौन सुन रहा था ? "
   " क्यों , तुम  बे -जुबान थी ? या समझ नहीं थी ! अरे ! तुम दो बच्चों की माँ थी। तुम्हारे कदम जम चुके थे घर में ! तुम जरा सी हिम्मत करती। अपने बच्चों सहित घर छोड़ देने की धमकी देती। और नहीं तो आगे बढ़ कर ख़ुशी को ही बेटी के रूप में स्वीकार कर उसके सर पर हाथ रख देती। तुम्हारे पति का क्या ? वह पुरुष है। भोगने को सहज सुलभ स्त्री मिल रही थी। लोभ रोक नहीं पाया होगा। तुम्हारा फ़र्ज़ था कि तुम पति को समझाती। अपनी गृहस्थी को उजड़ने दिया स्वयं  तुमने और दोष ख़ुशी को देती रही !" मैं जरा आवेश में आ गई।
     मधु ( ख़ुशी की जेठानी ) को अब समझ आया कि उसने क्या गलती की। " मुझमें इतनी हिम्मत आई ही नहीं थी डॉक्टर जी ! "  पछतावा मिश्रित दुःख था चेहरे पर।
    " रोशनी ( ख़ुशी की भाभी ) तुमने क्या किया !! एक बिन माँ की बच्ची को बोझ समझ कर घर से बाहर धकेल दिया ! सोचो अगर तुम्हारी बेटी ऐसे हालात से गुज़रती तो तुम क्या करती ? "
    रोशनी निरूत्तर थी। जवाब देती भी क्या ?
" तुम रोशनी के भाई हो , तुम अब भी इसके लिए कुछ कर सकते हो। तुम इसे ससुराल से ले आओ। वैसे भी वह शादी गैर क़ानूनी है। तुम पुलिस की धमकी का इस्तेमाल कर सकते हो। यह बाहरवीं तक पढ़ी है। कई संस्थाए हैं जो लड़कियों -महिलाओं की मदद करती है। वहां इसे प्रशिक्षण दिलवाओ और अपने पैरों पर खड़ी होने में मदद करो। "
    " लेकिन , लोग क्या कहेंगे ! "
" लोग तो अब भी कहते ही होंगे कि यह कैसी ना इंसाफी है ! कुछ लोग तो तुम्हे भी बुरा कहते होंगे कि कैसे भाई -भाभी हैं। अब जो तुम करोगे उस से ना केवल ख़ुशी का जीवन संवरेगा बल्कि तुम्हारे दिवगंत माता-पिता की आत्मा भी शांत होगी। यह बहन है तुम्हारी , तुम्हारा फ़र्ज़ है ! तुम ऐसे मुहं नहीं फेर सकते ! और मधु , तुम भी भाई की सहायता करोगी तो तुम्हारी गृहस्थी एक बार फिर खुशहाल हो जाएगी और ख़ुशी के जीवन में खुशियाँ आ जाएगी। "
          वे सभी चले गए। ख़ुशी के जीवन में क्या होता है और कितनी ख़ुशी आती है , यह उसकी किस्मत पर निर्भर करता है ? नहीं !  उसकी खुद की हिम्मत पर है ! आखिर में पहला कदम तो ख़ुशी को ही उठाना होगा अपने जीवन को खुशहाल करने के लिए। मैं तो सिर्फ दुआ और शुभकामना  के साथ उसकी  हर सम्भव सहायता कर  सकती हूँ।



       


Thursday, February 5, 2015

बदलता रंग

    लेखिका जी के चेहरे पर एक रंग आ रहा था , एक रंग जा रहा था। बहुत आवेश में थी और कुछ कहते नहीं बन रहा था।
कारण !
   अभी -अभी उनकी ननद का फोन आया था कि उसे भी पिता की  जायदाद से हिस्सा चाहिए। ननद की इतनी हिम्मत कैसे हुई यह सब कहने को ! सोच कर ही गुस्सा आ रहा था।
      पानी पीने उठी तो सामने के मेज  पर रखे अखबार में उनका ताज़ा तरीन लेख ," बेटियां भी पिता की जायदाद में बराबर की हिस्सेदार होती है " जैसे उनको  मुहँ चिढ़ा रहा हो। जल्दी से अख़बार को पलट के रख दिया गया। 

Friday, January 16, 2015

आईना ...

(आईना ...)
" अरे बेटा ! तू झाड़ू हाथ में मत ले , झाड़ू लगाना कोई लड़कों का काम है ? "
 " लेकिन माँ ! ये छोटू भी तो लड़का ही है ना ! तो यह झाड़ू क्यों लगा रहा है ? "
   " ओह ,चलो भी यहाँ से !!"
" और छोटू !! तुझे हंसी क्यों आ रही है ? चल काम कर अपना !! "

उपासना सियाग

Friday, January 9, 2015

बहार की उम्मीद....



"ओह्ह !! आज फिर ये फूल पड़े है !! "
"कौन रखता है इनको ?"
 " पतझड़ के मौसम में बहार की किसको उम्मीद है !!"
 " इन पत्तों के साथ इन महकते फूलों को फेंकते मुझे बहुत दुःख सा होता है !!"बलबीर खुद से ही जैसे बात कर रहा हो।
 " बलबीर बेटे !! तुम दुखी ना हुआ करो , मेरी आशा को मैं रोज़ ताज़ा फूल ला देता हूँ। मेरी जीवन साथी आशा जो न हो कर भी यहाँ इन फूलों की महक लेने आ ही जाती है। "प्रकाश जी भावुक हुए जा रहे थे।