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Friday, January 16, 2015

आईना ...

(आईना ...)
" अरे बेटा ! तू झाड़ू हाथ में मत ले , झाड़ू लगाना कोई लड़कों का काम है ? "
 " लेकिन माँ ! ये छोटू भी तो लड़का ही है ना ! तो यह झाड़ू क्यों लगा रहा है ? "
   " ओह ,चलो भी यहाँ से !!"
" और छोटू !! तुझे हंसी क्यों आ रही है ? चल काम कर अपना !! "

उपासना सियाग

7 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 17 जनवरी 2015 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (17-01-2015) को "सत्तर साला राजनीति के दंश" (चर्चा - 1861)7 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सटीक व सार्थक प्रस्तुति

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  4. सटीक चिंतन
    यही है अपने और पराये में फर्क और खाई बन जाती है धीरे धीरे ..

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  5. यही तो अंतर है - मन में जानते हैं सब !

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