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Monday, October 29, 2012

एक दिन रेल के सफर में ....



       मैं एक व्यवसायी या कहिये एक सफल व्यवसायी रहा हूँ। अपने जीवन में बहुत रुपया ,नाम ,इज्ज़त कमाई है। लेकिन  कभी बाहर  की दुनिया का भ्रमण ही नहीं कर पाया। अब बेटों ने व्यवसाय बहुत अच्छी  तरह संभाल लिया है तो दुनिया देखने निकला हूँ या मन की शांति खोजने।
      हिंदुस्तान के कई शहरों में घूम चूका हूँ। अब हरिद्वार की तरफ जा रहा हूँ। रेल का सफ़र मुझे हमेशा से पसंद है। हालांकि बड़े बेटे ने गाडी और ड्राइवर साथ ले जाने को कहा था। सारी  उम्र  गाड़ी और ड्राइवर के साथ ही तो घूमा हूँ मैं। मेरे विचार से जब तक आप दूसरे लोगों के साथ सफ़र ना करो दुनिया का असली रूप नज़र नहीं आता।
      सारी उम्र काम में ही उलझा रहा। छोटी उम्र से ही काम का जूनून था। एक दिन सबसे ऊँचा पहुँच जाऊं यह एक जूनून था मेरे अन्दर।मैंने पाया भी बहुत लेकिन बहुत अधिक खोने के बाद।
    अपनी सीट पर बैठा हूँ और आने -जाने वालों को ताक रहा हूँ। मेरे साथ यहाँ दो तीन पुरुष ही सहयात्री है । सामने से भी तीन जन चले आ रहे हैं । उनमे पीछे जो आ रहा था , वह  कुछ परेशान नज़र आ रहा है ।तभी उसके मोबाइल की घंटी बज गयी।
     वह तनिक धीरे पर थोडा सा रोष भरी आवाज़ में बोला , " हाँ बोलो ...! अब ट्रेन पकडूँ  या तुम्हारा फोन सुनुं  ?ओह ...! अब रोने वाली क्या बात है ? हैं ..! मैं आ तो रहा ही हूँ ...सुबह तक पहुँच जाऊंगा ...अरे भई ...चुप हो जाओ , मैं जोर से नहीं बोल रहा था ..यहाँ तक आने में देर हो गई और ट्रेन छूटने का डर  था और ऊपर से तुम फोन पर फोन किये जा रही थी ,तुम भी तो कुछ समझा करो। चलो अब मैं बंद करता हूँ , घर आकर सारी शिकायते कर लेना ....."
     किसका फोन  था राकेश। फोन करने वाले का नाम राकेश है ।

   "अरे पत्नी जी का है , एक सांस में लग जाएगी फोन करने ,अब अगले की भी मजबूरी हो सकती है।कुछ बोलो तो आंसू ढलकने लग जायेंगे।" राकेश ने बात खत्म कर के दोनों हाथों को अंगडाई लेने की तरह फैलाया।
  " उनकी भी तो मजबूरी हो सकती है आखिर दस दिन हो गए इंतजार करते हुए !  जरा उनकी  जगह खुद  रखो " विमल बोला।
   उनकी बातों से पता लगा राकेश , विमल और श्री कान्त अपने ऑफिस के किसी काम से दस दिनों के टूर पर आये हुए थे।
    श्री कान्त भी  खीझा हुआ था बोला , "कोई भी मजबूरी नहीं उनकी , उनको तो इंतजार हैअपने सामान की जो उन्होंने  फरमाइश की लिस्ट  बना कर दी थी , अब एक भी कम रह जाएगी तो मुहं ही फूल जायेगा।घर में घुसते ही हमारी और ध्यान कम होगा और सामान के बैग पर ज्यादा होगा।"
    विमल जोर से हंस पड़ा और उनकी बातों से वह भी सहमत लगा।
      अब मेरे सहयात्री जो मेरे साथ पहले ही बैठे थे। वे भी उनकी बातों में शामिल होने को उत्सुक लगे।क्यूंकि उनकी भी हंसी सम्मिलित थी। और संयोग भी है कि  हमारे साथ कोई महिला  नहीं थी तो आज उनके पास महिलाओं के प्रति भड़ास निकलने का पूरा मौका था।
   " महिलाओं को समझना बहुत मुश्किल है , कब क्या फरमाइश कर बैठे, कब किस बात पर खफा हो जाये, और आंसू तो कब ढलक जाये। नहीं कहा जा सकता ..." , मेरे पास बैठे व्यक्ति , जिसका नाम नवीन था , बोला।
    " मैं तो भैया इन महिलाओं ना  आज समझ पाया ना ही तब , जब मास्टर जी ने संस्कृत के एक श्लोक की एक लाइन का  मतलब  पूछा था।
   श्लोक इस प्रकार था , " त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम "
   मैंने जवाब दिया , " सर इसका मतलब है , त्रिया का चरित्र देख कर पुरुष भाग गया ...!"और बस फिर क्या बताऊँ भाई साहब ...! क्लास में क्या ठहाके लगे , मेरे सहपाठी तो टेबल पीट -पीट कर हंसने लगे। सर के चेहरे पर भी हंसी तो आयी पर वो आखिर सर थे।पहले तो सबको चुप रहने को कहा फिर मुझे बस एक थप्पड़ ही नहीं मारा पर सुनाने में कोई कसर भी ना छोड़ी।
     और अब मेरी पत्नी ...! उसे शक के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। इतनी देर क्यूँ हो गयी , कहा थे अब तक ....और यह भी , जब कहीं रास्ते में जा रहे हो और सामने से कोई औरत आती दिख जाये तो ...! क्या देख रहे ? एक दिन मैंने भी हार कर ,बड़े ही प्यार से कहा , ' प्रिये तुम ऐसा करो , जैसे ताँगे वाले घोड़े  की आँखों पर जो बंधा होता है वैसा ही  कुछ मेरी ही आँखों के बाँध दो , फिर मैं सीधा -सीधा ही चलूँगा। इस बात पर तो गंगा -यमुना ही बह चली श्रीमती जी की आँखों से।
   यारो , मुझे एक बात तो तय लगती है , हमारी धरती पर जो तीन तरफ पानी है वो हमारी पत्नियों के आंसुओ से ही बना है और जो दिनों -दिन जल स्तर बढ़ता जा रहा है वो कारण भी ये आंसू ही है ....!" मेरे  बिलकुल साथ बैठा विवेक बहुत उत्तेजित हो कर बोला तो हम सब एक बार जोर से हंस पड़े। ऐसा लगा ऐसे मुक्त हो कर हम  बेचारे पुरुष बहुत दिनों बाद हँसे हो।
     मुकेश चुप हो कर सभी की सुन रहा था। विवेक बोला , "क्यूँ भाई , आप को कोई शिकायत नहीं है क्या ...! सब ठीक -ठाक है।
  " अब क्या ठीक है और क्या ठाक है ...! पर एक बात जरुर है इन औरतों के आगे सच की कोई कीमत नहीं है।मैंने अपने पहले प्यार के बार में पत्नी को बता दिया। अपनी तरफ से इमानदारी ही की थी।पर अब जब भी कभी चुप हो जाऊं या कोई गीत गुनगुनाऊ तो सुनना पड़ता है ' क्यूँ किसी की याद आ रही है क्या?' अब जब पत्नी के साथ सब आराम से निभा रहा हूँ तो  उसे ऐतराज़ किस बात है।"मुकेश कुछ चिढ कर बोला।
    " सुबह से शाम बस कोल्हू के बैल की तरह लगे रहो।शाम को घर पहुँचो तो कई बार  मेम साहिबा सो  रही होती है ..जगाओ तो ऐसे देखेगी जैसे किसी अजनबी को देख रही है और फिर से पसर जाएगी ..' अरे अभी तो कमर सीधी की है ....', लो कर लो बात,  अब इन्होने सारा दिन क्या किया ...! जो अब आराम फरमा  रही है। मैं भी सारा दिन का मारा -मारा भटक कर आया हूँ।" राकेश थोडा जोश में आ गया था।
     विवेक बोला, " कभी टीवी चला कर बैठ जाओ और कोई सुन्दर सी हिरोइन पर फिल्माया हुआ गीत आ रहा हो तो , फिर तो भी श्रीमती जी की आँखे मुझे पर ही होगी। मन करता है कई बार बोल दूँ ...भई  थोडा टीवी की तरफ ही देखो ना, मुझे क्या घूरे जा रही हो !   अरे ...यह शादी तो करनी ही नहीं चाहिए।शिकायत और बस शिकायत ही है इसमें।"
    " और नहीं तो क्या ...! उनकी यह शिकायत की हम उनको प्यार ही नहीं करते ...! तो सोचने वाली बात है, फिर किससे प्यार करते हैं ...! सारा दिन उनके लिए ही भागते हैं।नहीं तो हमें क्या चाहिए था। कभी पास बैठती है ,थोडा रोमांस करने का मन भी होता है तो इनकी शिकायतें सुन कर ही मन मर जाता है,तो कभी फरमाइशें सुन कर भी।" विमल भी थोडा सा तल्ख़ हो चुका था।
    मैं सब की बातें सुन कर सोच रहा हूँ । अपनी जिन्दगी से तुलना कर रहा हूँ । समय कितना बदल गया।मैंने तो कभी शिकायत नहीं की अपनी पत्नी की और ना ही मेरी पत्नी ने ही कभी मुझसे की।लेकिन  मैंने तो ....
   मेरी सोच पर विराम लग गयी। जब श्रीकांत ने मुझसे पूछा ,  " आपका क्या विचार है हमारे वार्तालाप पर ...? आपके और हमारे समय में आपको अंतर लगा क्या ...! या हम सब गलत हैं।
   " मुझे नहीं लगता हम सब गलत हैं , दोनों ही अपनी जगह सही है।बात तो एक दूसरे  का मूल्य समझने का और भावनाए समझने का है।" मुकेश ने मुझसे पहले ही कहा।
   मैंने कहा , " अगर देखा जाये तो आप लोग यानी पुरुष वर्ग गलत नहीं है ...ना ही महिलाएं ।यह तो हर एक की अपनी जिन्दगी है कोई कैसे जीता है। मैं क्या कहूँगा आप लोगों को ,जब मुझे  ही समझ बहुत देर बाद आयी।
      बचपन अभावों में बीता। सोचा एक दिन इतना रुपया कमाऊंगा कि मेरे बच्चों को मेरी तरह मन ना मारना पड़े।और सच में मैंने वही मकाम पाया , जो चाहा  था। लेकिन जिन्दगी तो कही छूट गयी। जीना क्या होता है ,घर का सुख क्या होता है वह मैंने खो दिया।
      पत्नी ने कभी शिकायत ही नहीं की।बस चेहरे पर मुस्कान ही बिखेरे रहती।
   आज जब आपकी बातें सुन रहा हूँ तो मुझे यह अहसास हो रहा है काश वो भी ऐसे शिकायत करती या मेरे देर से आने पर झगड़ा करती। पर वह तो बस त्याग की मूर्ति बनी सब सहन करती रही। वह बेहद खूबसूरत थी  ,कमर से भी नीचे लहराते बाल थे उसके। कभी देर से घर पहुँचता तो वह मेरा इंतजार करते-करते सो जाती .घने बालों में उसका चाँद सा पर कुछ मायूस सा चेहरा नज़र आता पर ...... पर मैंने कभी देखा ही नहीं उसकी तरफ और जिस दिन मुझे अहसास हुआ वो दुनिया से जा चुकी थी।
   सुबह अपने बिखरे बालों के साथ -साथ अपने आप को भी समेटती हुई फिर से लग जाती घर बच्चे सँभालने में।  विवाह की पच्चीसवी  साल गिरह पर  एक समारोह किया मैंने। वहां पर किसी ने पूछा सुनीता से ( मेरी पत्नी ) कि उनके इतने सालों के विवाहित जीवन का सबसे यादगार लम्हा क्या था। वह क्या बताती कभी मेरे साथ कोई ख़ुशी का पल बिताया होता तो बताती। लेकिन उसने यहाँ भी ख़ूबसूरती  से जवाब दे कर बात को संभाल लिया  और मेरे मर्द होने का दर्प बना रहने दिया।
     धीरे - धीरे मुझे अहसास होने लगा के मैं गलत हूँ और बहुत कुछ खोया है मैंने। बेटों को कारोबार सँभालने को दे कर मैंने सोचा कि  अब सुनीता को सारी  खुशियाँ दूंगा। उसके साथ ही रहूँगा ,सारा हिंदुस्तान घुमाऊंगा। नई - नई शादी हुई थी तब एक बार उसने जिक्र भी किया था।उसे घूमने  का बहुत शौक है।
    अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो पास के टेबल पर हमेशा की तरह चाय नहीं थी ना ही उस दिन का अखबार था। मैंने गर्दन घुमाई तो देखा सुनीता अभी तक सो रही थी। बहुत चिंतित हुआ और उसे छुआ तो उसका बदन ठंडा सा लगा मुझे।
   वह जा चुकी थी और मैं रोक भी नहीं पाया। अंतिम संस्कार के समय , मेरा मन हो रहा था उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर उसे पुकारूँ कि बस एक बार मेरे लिए वापिस आ जाओ। अब कोई शिकायत नहीं होने दूंगा उसे। लेकिन मैं ऐसा क्यूँ करता भला मर्द था आखिर। उसको जाते देखता रहा अपने चेहरे पर गंभीरता लिए।
   अब मैं हर रोज़ पश्चताप में जलता हूँ ............
   मैं तो यहीं कहूँगा के जिन्दगी को भरपूर जियो। जो शिकवा -शिकायत है उसे खुल कर कहो मन में ना रखो ....!" कहते -कहते मैंने अपने दोनों हाथ से अपना चेहरा ढक लिया।
    मेरी बात सुन कर सभी चुप रहे।
   पर विवेक चुप ना रह सका बोला, " देखिये मोहन लाल जी , आपकी बात सही है  पर सभी औरतें सुनीता जी की तरह सहन शील भी नहीं होती। मेरी पत्नी को हर बात पर शक होता है घर में घुसते ही ख़ुफ़िया जासूस की तरह सूंघने लगती है कहीं मुझमे कोई किसी और औरत की खुशबू तो नहीं आ रही ...! अब इसका क्या इलाज किया जाये।"
" बीमारी हो या समस्या हर चीज़ का इलाज है , वह भी सिर्फ आपके पास ही।यह आपने सोचना-समझना है और अपने साथी को समझाना है।
अब मुझे इजाजत दीजिये ,मेरा गन्तव्य आ गया।" मैंने अपना बैग उठाते हुए अपने सहयात्रियों से विदा ली।

( कहानी )

Monday, October 8, 2012

साथी

  " रामली , तू मेरे से ब्याह कर ले ...!" राम दीन ने अपने हाथ में पकड़ी एक छोटी से टहनी को दूसरे हाथ पर थपथपाते हुए , रामली यानि रामेश्वरी की और देखते हुए कहा। 
" रे तेरा दिमाग तो ना खराब  हो गया  राम दीन ...! ठीक है तेरे से बात भी करूँ , मिलने को भी आऊं हूँ और मुझे,  मेरी माँ के बाद तेरे मुहं से ही रामली सुनना अच्छा भी लागे, पर ब्याह  ...! ये तूने कैसे  सोच लिया  ...! " रामली उर्फ़ रामेश्वरी ने बात तो बहुत हैरानी से शुरू की पर खत्म करते -करते उसका चेहरा लाल और दिल जोर से धडकने भी लग गया था। 
  लो जी,  अब दिल है तो धड़केगा ही।  अब रामली की उम्र चाहे पैसठ से सत्तर बरस के बीच थी तो क्या हुआ ! राम  दीन भी तो बहत्तर का ही था ! चाहे ज्यादा उम्र थी उसकी पर सारी उम्र मेहनत की थी उसने, तो अपनी उम्र से पांच -सात साल छोटा ही लगता था।
दिल ने तो धडकना ही था. यहाँ भला उम्र का क्या काम ...! 
 राम दीन का भरा पूरा परिवार था लेकिन पत्नी को  गुजरे हुए पन्द्रह बरस हो गए थे। मध्यम वर्गीय किसान था वह।  चार बेटों , दो बेटियों का पिता और पोते - पोतियों से भी घर भरा हुआ था।  बेटों को उनकी जमीन का बंटवारा कर दिया और अपना हिस्सा भी अलग रखा। इसके, उसके पास तर्क भी थे। उसके दो बेटियां है आखिर वो उसकी ही जिम्मेदारी है। बेटों को कोई ऐतराज़ ना था सभी खुश थे।  सभी जिम्मेदारियों से मुक्त राम दीन को जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने जीवन साथी की कमी बहुत खलती थी।  उम्र के इस पड़ाव में एक साथी की ज्यादा जरूरत होती है। 
  बेटे -बहुए बहुत आज्ञाकारी  थे।  पोते - पोतियाँ भी घेरे हए रहते थे उसे। लेकिन  कब तक !सभी के अपने अपने काम -धंधे थे। क्या हुआ थोड़ी देर सुबह शाम बैठ लिए बतला लिया !  हर एक बात तो वह बच्चों से भी नहीं कर सकता था। रात को अक्सर पत्नी को याद करते - करते कब आँखों से आंसू बह निकलते और ना जाने कब आँख लग जाती।  सुबह भीगा तकिया इसकी गवाही देता की रात कैसी गुजरी है राम दीन की।  
    रामेश्वरी भी उम्र को झुठलाती एक साधारण रंग -रूप वाली एक किसान पत्नी ही थी। उसके पति को गुजरे हुए दस बरस हो चुके थे। दो बेटे, दो बेटियों, नाती -पोतों से घर भरा पूरा था।  जमीन का बँटवारा पति उनके जीते हुए ही कर गए थे।  कुछ हिस्सा रामेश्वरी के नाम भी था।  अपना समय पूजा- पाठ में बिताती वह किसी तरह अपना जीवन बिता रही थी। 
    राम  दीन और रामेश्वरी की मुलाकात भी कम दिलचस्प तरीके से नहीं हुई थी। 
    हुआ यूँ के एक दिन राम दीन की बड़ी बहू  की नज़र में उसका आंसुओं से भीगा  तकिया नज़र में आ गया।  उसे बहुत दुःख हुआ कि  उनके बापू जी कितने दुखी है और वह कुछ नहीं कर सकती।  उसने झट से सभी घर की बाकी महिलाओं को एकत्रित किया और बताया -पूछा कि उनको बापू जी के  लिए क्या करना चाहिए। छोटी बहू  बोली, " दीदी अब हम बापू जी के लिए क्या कर सकते हैं , बुढ़ापा है तो झेलना ही पड़ेगा...!" बाकी ने समर्थन तो किया पर कोई हल निकालने की  भी बात सोचने लगी।  तभी बड़ी को ध्यान  आया और बोली , " मैंने दो दिन पहले अपने गाँव के मंदिर में पुजारी को लाउड-स्पीकर  पर बोलते सुना था कि कोई बस जा रही है तीर्थ -यात्रा के लिए  तो बापू जी का भी नाम लिखा  देते हैं उनका मन भी बहल जायेगा .." सभी की सहमती हो गयी।  रात को बेटे जब घर आये तो उन्होंने भी इसे सही बताया।
अब  राम दीन भी खुश था।  और वह दिन भी आ गया जिस दिन राम दीन ने तीर्थ पर जाना था। 
उसी बस में और लोगो के साथ -साथ  रामेश्वरी भी थी।  एक जगह बस रुकी तो यात्रियों से कहा गया कि वे सब नीचे उतर कर चाय -नाश्ता कर सकते हैं।  
लेकिन यह क्या हुआ ...! नीचे उतरते हुए बस के पायदान से रामेश्वरी का पाँव ही फिसल गया।   पास ही खड़े  राम दीन  ने लपक कर रामेश्वरी की बांह थाम ली। रामेश्वरी को जैसे सहारा मिला। सभी लोग इकट्ठे हो गए।  रामेश्वरी का हाल पूछने लगे।  राम दीन के मन में हल चल शुरू हो गयी और वह समझ नहीं पा रहा था ये सब क्या है. रामेश्वरी भी थोड़े सकते में तो थी पर संयत भी थी। 
   बस चल पड़ी सभी अपनी बातों में मगन थे।  कोई भजन भी गा रहे थे।  पर राम दीन का मन तो उड़ा -उड़ा था।  लगता था उसे अब इस उम्र में पहली नज़र में प्यार हुआ था।  सारी उम्र यूँ ही निकाल दी उसने। 
     सबसे पहले बस जिस तीर्थ स्थल पर रुकी वहां धर्म शाला में पहले से ही कमरे बुक थे।  सभी महिलायें - पुरुष अपने - अपने कमरों  आराम करने लगे। थोड़ी देर में सभी शाम की आरती देखने निकल पड़े।  राम दीन को लगा के उसे रामेश्वरी से बात करनी चाहिए।  वह आरती के समय उसके पास ही खड़ा हो गया।  आरती के बाद उसके साथ -साथ ही चलने लगा।  फिर हिम्मत करके बोला , " तू हमारे गाँव में ही रहती है  और कभी देखा ही नहीं ...!" ,तेरा नाम क्या है ...?"
" रामेश्वरी " उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और आगे चली गयी। पर ये क्या दिल तो रामेश्वरी का भी धड़का , शायद पहली बार ही। 
अब राम दीन का मन करता था कि रामेश्वरी के इर्द-गिर्द ही रहे।  पर समाज -उम्र की  मर्यादा भी थी, तो मन को थाम लेता था। 
   एक दिन मौसम थोडा सा भीगा था। कहीं- कहीं गीली मिटटी या  मिटटी चिकनी भी थी। औरतों  -पुरुषों का ग्रुप अलग अलग चल रहा था।  अचानक राम दीन, जिसका ध्यान रामेश्वरी की ओर ही था, चिल्लाया , " अरे रामली , गिर मत जाना आगे कीचड़ है ! "
" हे राम ...! रामली ...! , मेरी माँ के अलावा किसी की भी हिम्मत ना हुई मुझे ऐसा कहने को।  पति ने भी कहा तो उसे भी मना  कर दिया के उसे छोटे नाम से ना पुकारें  और यह रामूड़ा मुझे ऐसे कह रहा है ...!" वह मन ही मन सोच कर रह गयी। इतने लोगों के सामने कुछ कह ना पायी। पलट कर देखा तो था। उसे राम दीन का ' रामली ' कहना बहुत भला सा, अपना सा भी लगा ,ना जाने क्यूँ ...!
    कुछ दिन घूम -घाम कर सभी लोग अपने -अपने घर लौट आये। राम दीन को रामेश्वरी बहुत भा गयी।  वह कर भी क्या सकता था।  समाज के नियमो से अलग तो वह कुछ  नहीं कर सकता था।  वहीं  रामेश्वरी को अपनी सीमा , मर्यादा मालूम थी तो ज्यादा तूल नहीं दिया और भूलने की कोशिश करने लगी।  हाँ कोशिश ही कर रही थी नहीं तो दिन में कई बार उसके भी कानो में 'रामली ' शब्द गूंज उठता था और वह झट से पलट कर भी देखती। 
     ईश्वर ने तो और ही सोचा था उनके लिए।  सो  एक दिन रामेश्वरी अपने खेत गयी हुई थी।  कपास की चुगाई का समय था तो वह निगरानी के लिए चली गयी। राम दीन भी संयोग से उधर ही जा रहा था।  थोड़ी देर उससे बात करने के लिए रोक लिया।  फिर कई दिन तक ऐसे ही मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा। यहाँ एक बात सपष्ट कर देती हूँ .उनके प्यार में एक -दूसरे का खाली पन भरने की ही कवायद थी और कहीं कोई  अपवित्रता  नहीं थी।  एक स्त्री का पुरुष और एक पुरुष का स्त्री, ही संबल बन सकती है। यह वही बता सकते है या जानते है जिन्होंने अपने साथी को ढलती उम्र में खो दिया हो। 
  ऐसे ही  दिन था जब राम दीन ने विवाह का प्रस्ताव भी रख दिया और रामेश्वरी चुप चाप चल पड़ी।  उसमे इतनी हिम्मत कहाँ थी कि  अपने बच्चों और समाज से लड़ने की समाज को मुहं दिखाने की ...! 
   मगर राम दीन ने तो अपने बेटों को बुला कर घोषणा  कर दी के वह रामेश्वरी से विवाह करना चाहता है।  बेटे सन्न रह गए। कुछ बोल ही नहीं सूझ रहे थे. बड़ा बेटा बोला , " लेकिन बापू , लोग क्या कहेंगे , ये मुहं काला करने वाली बात कहने - करने की क्यूँ सोच रहे हो ...!" बाकी बेटों ने भी अपनी सहमती जताई।  
अब बात बहुओं तक भी पहुंची तो सभी की प्रतिक्रिया भी वही थी जो उनके पतियों की थी। सभी सोच में पड़ गयी।  बड़ी बहू थोड़ी दयावान थी और उम्र में परिपक्व भी। बोली , " इसमें कोई बुराई भी तो नहीं आखिर हम सब अपने -अपने बच्चों , गृहस्थी में मग्न है तो उनको भी साथी की जरुरत है , मुझसे उनका अकेला पन नहीं देखा जाता। " छोटी बहू बोल पड़ी , "अरे जाने दो ना , यूँ ही सास का स्यापा हो जायेगा, जान खाएगी सारा दिन।" पर कई देर तक बात -चीत या बहस बाजी हुई तो जीत बड़ी बहू  के तर्क की ही हुई। 
  उसने सभी को बुला कर कह दिया कल हम उनके घर  जायेंगे रिश्ते की बात करने।  
अब कहने को कह तो दिया  पर जा कर क्या कहेंगे  और बात रिश्तेदारों में जाएगी तो क्या इज्ज़त रह जाएगी हम सब की।  हमारा तो मजाक ही बन कर रह जायेगा।  राम दीन की बेटियां पतियों समेत पहुँच गयी।  विरोध के स्वर गूंजने लगे।  सभी विपक्ष में ही बोल रहे थे।  एक बड़ी बहू ही थी तो राम दीन की पक्ष ले रही थी।  उसके पास अकाट्य तर्क थे एक दम " वीटो -पावर " की तरह।  उसका मानना था इंसान को मरने से पहले अच्छी तरह जी लेना चाहिए।  आखिर बापू जी और रामेश्वरी दोनों को अपने जीवन में खुशिया लाने का पूरा हक़ है. इसमें कोई भी अनैतिकता नहीं है। वे दोनों विवाह  ही तो कर रहे हैं। कुछ विरोध के बाद सब रज़ा मंद हो गए। 
   अब बारी थी रामेश्वरी के परिवार को मनाने की तो तय हुआ के बड़ा बेटे -बहू जा कर बात करके आयें। दोनों सुबह रामेश्वरी के घर जाकर उसके बड़े बेटे बहू से बात की।  एक बार जो उनकी प्रतिक्रिया थी उसके लिए रामदीन के बेटा बहू मानसिक रूप से तैयार थे।  कई देर की बहस के बात रामेश्वरी के बेटे से कहा गया के वह घर के बाकी सदस्यों से बात कर ले . फिर दोनों के परिवार वाले एक जगह इक्कठा हो कर बात कर लेते हैं।  
   ऐसी बातों में औरत को अधिक सहन करना पड़ता है . रामेश्वरी का तो बुरा हाल था। उसे लग रहा था वो मुहं ढक कर ही बैठ जाये, उसकी तो सारे जीवन की कमाई ही व्यर्थ गयी। 
 उसकी  बेटियों को बुलाया गया। यहाँ भी सभी विरोध के स्वर ही गूंजे  पर छोटी बेटी का पति जो  एक अध्यापक भी था उसने सभी को अपने अकाट्य तर्क से सबको सहमत कर लिया और बोला ," आखिर  ये समाज है क्या ...! हम लोगों से ही तो बना है न ,  हर इन्सान को खुश रहने का अधिकार है , इस समाज को हम ही तो बदलेंगे...!"
   अगले दिन तय हो गया दोनों परिवार एक जगह एकत्रित हो जायेंगे और आगे की कार्यवाही तय करेंगे। सभी लोग इक्कठा हुए और विवाह की सहमती भी जता दी पर अब बात जमीन की हो रही थी कि  जो जमीन रामेश्वरी के नाम थी और राम दीन के नाम की भी।  इस पर विवाद होता इससे पहले राम दीन बोला , " हमारी जमीने हमारे नाम ही रहेगी आगे भी हम हमारी बेटियों की जिम्मेदारी उठाते रहेंगे। हमारे ना रहने पर मेरी जमीन मेरे बच्चे और रामेश्वरी की जमीन उसके बच्चे उसकी जमीन पर अपना हक़ ले लेंगे। अब सब खुश थे। 
एक अच्छा मुहूर्त देख कर उनकी मंदिर में शादी कर दी।  गाँव में बहुत चर्चा हुई पर जब उनके परिवार वाले साथ थे तो उनको कोई चिंता नहीं थी।  विवाह कार्य संपन्न होते - होते रात ढलने लगी थी। सभी सोने चले गए।  जाग रहे तो बस वे दोनों ...कोई बात ही नहीं सूझ रही थी की क्या बात करें। 
  तभी दोनों चौंक पड़े मंदिर के पुजारी उस दिन का पचांग बता रहे थे , वार -तिथि सब कुछ बता कर आरती शुरू कर दी। उन दोनों के मन को आरती  बहुत भली लग रही थी।  सुहा रही थी दोनों हाथ जोड़ कर बैठ गए और अपने  सुखद भविष्य की कामना करने लगे।  तभी पुजारी का स्वर गूंजा। वह बता रहे थे  कुछ दिन बाद उनके गाँव से एक बस तीर्थ यात्रा को जा रही है। जिसने भी जाना हो अपना नाम लिखवा दे।  राम दीन ने रामेश्वरी की और देखते हुए बोला , " चले क्या रामली ....!" और रामली ने भी हँसेते  हुए सहमती जता दी। 

उपासना सियाग