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Sunday, March 24, 2013

अन्तर्द्वन्द ...



        कहानियाँ तो बहुत पढ़ी है और सुनी भी बहुत है। कुछ सच्ची होती है तो कुछ काल्पनिक होती है। कुछ बन जाती है तो कुछ बुनी हुयी होती है। कहानियां राजा और रानी की हो तो बहुत पसंद की जाती है। बचपन में सुना करते  थे  कि एक राजा  था एक रानी थी दोनों मिले और ख़त्म कहानी।
एक कहानी जो बनी नहीं बल्कि शब्दों के ताने बाने से बुनी हुयी है।   इस कहानी में राजा भी है और रानी भी। लेकिन यहाँ  हमारा जो राजा है वो किसी और रानी का है तो हमारी रानी भी किसी और राजा की ही रानी है ...!
          तो फिर क्या हुआ ख़त्म कहानी ...!
नहीं ऐसा तो नहीं लगता कि कहानी खत्म हो गयी ...जब शुरू की है तो खत्म कैसे की जाये ...मगर कहानी बुनी है तो कुछ तो बुनना ही पड़ेगा ......
   तो शुरुआत रात के समय से होती है। कहानी की नायिका  यानी हमारी रानी यानी वेदिका, की आज चूड़ियाँ और पायल  कुछ ज्यादा ही खनक -छमक  रहे है। 'कलाई भर चूड़ियाँ और बजती पायल'  परिवार की रीत है और फिर उसके पिया जी को भी खनकती चूड़ियाँ और पायल ही पसंद है।
   मगर आज ये पायल - चूड़ियाँ  पिया के लिए तो नहीं खनक रही , बस आज बहुत खुश है वेदिका ...! दौड़ कर सीढियाँ चढ़ रही है। छत पर पूनम का चाँद खिल रहा है।उसे छत पर से चाँद देखना नहीं पसंद।उसे तो अपनी खिड़की से ही चाँद देखना पसंद है , उसे लगता है कि खिड़की वाला चाँद ही उसका है , छत वाला चाँद तो सारी  दुनिया का है।
कमरे में जाते ही देखा राघव तो सो गए हैं। थोडा मायूस हुई वेदिका , उसे इस बात से सख्त चिढ थी के जब वह कमरे में आये और राघव सोया हुआ मिले। उसे रात का ही तो समय मिलता था राघव से बतियाने का , दिन भर तो दोनों ही अपने-अपने काम  , जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन वह तो सो गया था।अक्सर ही ऐसा होता है।
  थोड़ी दूर रखी कुर्सी पर वह बैठ खिड़की में से झांकता चाँद निहारती रही।  सोये राघव को निहारती सोच रही थी कि कितना भोला सा मासूम सा लग रहा है ,एकदम प्यारे से बच्चे जैसा निश्छल सा , और है भी वैसा ही निश्छल ...वेदिका का मन किया झुक कर राघव का माथा चूम ले , हाथ भी बढाया लेकिन रुक गयी।
          संयुक्त परिवार में वेदिका सबसे बड़ी बहू है।राघव के दो छोटे भाई और भी है। सभी अपने परिवारों सहित साथ ही रहते है। राघव के माँ-बाबा भी अभी ज्यादा बुजुर्ग नहीं है।
बहुत बड़ा घर है ,जिसमे से तीसरी मंजिल पर  कमरा वेदिका का है। साथ ही में एक छोटी सी रसोई है। रात को या सुबह जल्दी चाय-कॉफ़ी बनानी हो तो नीचे नहीं जाना पड़ता। बड़ी बहू  है तो काम तो नहीं है पर जिम्मेदारी तो है ही। पिछले बाईस बरसों से उसकी आदत है कि सभी बच्चों को एक नज़र देख कर संभाल कर , हर एक के कमरे में झांकती किसी को बतियाती तो किसी बच्चे की कोई समस्या हल करती हुई  ही अपने कमरे में जाती है। वह केवल अपने बच्चों का ही ख्याल नहीं रखती बल्कि सभी बच्चों का ख्याल रखती है। ऐसा आज भी हुआ  और आदत के मुताबिक राघव सोया हुआ मिला।
       राघव की आदत है बहुत जल्द नीद के आगोश में गुम  हो जाना।वेदिका ऐसा नहीं कर पाती वह रात को बिस्तर पर लेट कर सारे  दिन का लेखा  -जोखा करके ही सो  पाती है।
लेकिन आज वेदिका का मन कही और ही उड़ान  भर रहा था।वह धीरे से उठकर खिड़की के पास आ गयी। बाहर अभी शहर भी नहीं सोया था। लाइटें कुछ ज्यादा ही चमक रही थी। कुछ तो शादियाँ ही बहुत थी इन दिनों , थोडा कोलाहल भी था तेज़ संगीत का , शायद नाच-गाना चल रहा है ।
उसकी नज़र चाँद पर टिक गयी और ख़ुशी थोड़ी और बढ़ गयी जो कि राघव को सोये हुए देख कर कम हो गयी थी।उसे चाँद में प्रभाकर का चेहरा नज़र आने लगा था सहसा। खिड़की वाला चाँद तो उसे सदा ही अपना लगा था लेकिन इतना अपनापन भी देगा उसने सोचा ना था।
 तभी अचानक एक तेज़ संगीत की लहरी कानो में टकराई। एक बार वह खिड़की बंद करने को हुई मगर गीत की पंक्तियाँ सुन कर मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी। आज-कल उसे ऐसा क्यूँ लगने लगा है कि हर गीत ,हर बात  बस उसी पर लागू हो रही है। वह गीत सुन रही थी और उसका भी गाने को मन हो गया ...," जमाना कहे लत ये गलत लग गयी , मुझे तो तेरी लत लग गयी ...!"
    अब वेदिका को ग्लानि  तो होनी चाहिए , कहाँ भजन सुनने वाली उम्र में ये भोंडे गीत सुन कर मुस्कुरा रही है।लेकिन उसका मन तो आज-कल एक ही नाम गुनगुनाता है , ' प्रभाकर '
"यही प्रभाकर हमारी कहानी का राजा है ...!"
     वेदिका इतनी व्यस्त रहती है और घर से कम ही निकलती है , कहीं जाना हो तो पूरा परिवार साथ ही होता है लगभग  तो प्रभाकर से कैसे मिली...!अब यह प्रभाकर कौन है ...?
तो क्या वह उसका कोई पुराना ...?
     अजी नहीं ...! आज कल एक चोर दरवाज़ा घर में ही घुस आया है। कम्प्यूटर  -इंटरनेट के माध्यम से ...!
नयी -नयी टेक्नोलोजी सीखने का बहुत शौक है वेदिका को इंटरनेट पर बहुत कुछ जानकारी लेती रहती है। बच्चों के पास बैठना बहुत भाता है उसे तो  उनसे ही कम्प्यूटर चलाना सीख लिया । ऐसे ही एक दिन फेसबुक पर भी आ गयी।
  फेसबुक की दुनिया भी क्या दुनिया है ...अलग ही रंग -रूप ......एक बार घुस जाओ तो बस परीलोक का ही आभास देता है। ऐसा ही कुछ वेदिका को भी महसूस हुआ।
   ना जाने कब वह प्रभाकर को मित्र से मीत समझने लगी। और आज खुश भी इसीलिए है कि ...,
" खट -खट " आईने के आगे रखा मोबाईल खटखटा उठा था। वेदिका ने उठाया तो प्रभाकर का सन्देश था। शुभरात्रि कहने के साथ ही बहुत सुंदर मनभाता कोई शेर लिखा था। देख कर उसकी आखों की चमक बढ़ गयी। तो यही था आज वेदिका की ख़ुशी का राज़ ...पिछले एक साल से प्रभाकर से चेटिंग से बात हो रही थी आज उसने फोन पर भी बात कर ली। और अब यह सन्देश भी आ गया।
    नाईट -सूट पहन अपने बिस्तर पर आ बैठी वेदिका , राघव को निहारने लगी और सोचने लगी कि  यह जो कुछ भी उसके अंतर्मन में चल रहा है क्या वह ठीक है। यह प्रेम-प्यार का चक्कर ...! क्या है यह सब ...? वह भी इस उम्र में जब बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने की उम्र है। तो क्या यह सब गलत  नहीं है ? और राघव से क्या गलती हुई  ...! वह तो हर बात का ख्याल रखता है उसका। कभी कोई चीज़ की कमी नहीं होने दी। अब उसे काम ही इतना है की वह घर और उसकी तरफ ध्यान कम दे पाता है तो इसका मतलब यह थोड़ी है की वेदिका कहीं और मन लगा ले। अब वेदिका का मन थोडा बैचैन होने लगा था।
  वेदिका थोड़ी बैचेन  और हैरान हो कर सोच रही थी। इतने उसूलों वाले विचार उसके ,इतनी व्यस्त जिन्दगी में जहाँ हवा भी सोच -समझ कर प्रवेश करती है वहां  प्रभाकर को आने की इजाजत कहाँ से मिल गयी। यह दिल में सेंधमारी कैसे हो गयी उसकी।
  सहसा एक बिजली की तरह एक ख्याल दौड़ पड़ा , " अरे हाँ , दिल में सेंध मारी तो हो सकती है क्यूँ की विवाह  के बाद , जब पहली बार राघव के साथ बाईक पर बाज़ार गयी थी और सुनसान रास्ते में उसने जरा रोमांटिक जोते हुए राघव की कमर में हाथ डाला  था और कैसे वह बीचराह में उखड़ कर बोल पड़ा था कि यह कोई सभ्य घरों की बहुओं के लक्षण नहीं है , हाथ पीछे की ओर झटक दिया था। बस उसे वक्त उसके दिल का जो तिकोने वाला हिस्सा होता है , तिड़क गया ...और वेदिका उसी रस्ते से रिसने लगी थोड़ा - थोड़ा , हर  रोज़ ...., "
हालाँकि बाद में राघव ने मनाया भी उसे लेकिन दिल जो तिड़का उसे फिर कोई भी जोड़ने वाला सोल्युशन बना ही नहीं। वह  बेड -रूम के प्यार को प्यार नहीं मानती जो बाते सिर्फ शरीर को छुए लेकिन मन को नहीं वह प्यार नहीं है।
  सोचते-सोचते मन भर आया वेदिका का और सिरहाने पर सर रख सीधी लेट गयी और  दोनों हाथ गर्दन के नीचे रख कर सोचने लगी।
" पर वेदिका तू बहुत भावुक है और यह जीवन भावुकता से नहीं चलता ...! यह प्रेम-प्यार सिर्फ किताबों में ही अच्छा लगता है, हकीकत की पथरीली जमीन पर आकर यह टूट जाता है ...और फिर राघव बदल तो गया है न ,जैसे तुम चाहती हो वैसा  बनता तो जा ही रहा है ...!" वेदिका के भीतर से एक वेदिका चमक सी पड़ी।
 " हाँ तो क्या हुआ ...!' का वर्षा जब कृषि सुखाने ' .....मरे , रिसते  मन पर कितनी भी फ़ुआर डालो जीवित कहाँ हो पायेगा ...!" वेदिका भी तमक गयी।
   करवट के बल लेट कर कोहनी पर चेहरा टिका कर राघव को निहारने लगी और धीरे से उसके हाथ को छूना चाहा लेकिन ऐसा कर नहीं पायी और धीर से सरका कर उसके हाथ के पास ही हाथ रख दिया। हाथ सरकने -रखने के सिलसिले में राघव के हाथ को धीरे से छू गया वेदिका का हाथ। राघव ने झट से उसका हाथ पकड लिया। लेकिन वेदिका ने खींच लिया अपना हाथ , राघव चौंक कर बोल पड़ा ,"क्या हुआ ...!"
" कुछ नहीं आप सो जाइये ..." वेदिका ने धीरे से कहा और करवट बदल ली।
सोचने लगी , कितना बदल गया राघव ...! याद  करते हुए उसकी आँखे भर आयी उस रात की जब उसने पास लेट कर सोये हुए राघव के गले में बाहें डाल दी थी और कैसे वह वेदिका पर भड़क उठा था , हडबडा कर उठा बैठा था ...! अब वेदिका को कहाँ मालूम था कि राघव को नींद में डिस्टर्ब करना पसंद नहीं ...! उस रात उसके 'तिड़के हुए दिल' का कोना थोडा और तिड़क गया , वह भी टेढ़ा हो कर  ...सारी रात दिल के रास्ते से वेदिका रिसती रही।
     " तो क्या हुआ वेदिका ...! हर इन्सान का अपना व्यक्तित्व होता है , सोच होती है। अब तुम्हारा पति है तो क्या हुआ , वह अपनी अलग शख्शियत तो रख सकता है। तुम्हारा कितना ख्याल भी तो  रखता है। हो सकता है उसे भी तुमसे कुछ शिकायतें हो और तुम्हें कह नहीं पाता  हो और फिर अरेंज मेरेज में ऐसा ही होता है पहले तन और फिर एक दिन मन  मिल ही जाते है।थोडा व्यवहारिक बनो , भावुक मत बनो ...!" अंदर वाली वेदिका फिर से चमक पड़ी।
" हाँ भई , रखता है ख्याल ...लेकिन कैसे ...! मैंने ही तो बार-बार हथोड़ा मार -मार के यह मूर्त गढ़ी है लेकिन ये मूर्त ही है इसमें प्राण कहाँ डले  है अभी ...! " मुस्कुराना चाहा वेदिका ने।
वेदिका को बहुत हैरानी होती जो इन्सान दिन के उजाले में इतना गंभीर रहता हो ,ना जाने किस बात पर नाराज़ हो जायेगा या मुहं बना देगा ,वही रात को बंद कमरे में इतना प्यार करने वाला उसका ख्याल रखने वाला कैसे हो सकता है।
  अंदर वाली वेदिका आज वेदिका को सोने नहीं दे रही थी फिर से चमक उठी , " चाहे जो हो वेदिका , अब तुम उम्र के उस पड़ाव पर हो जहाँ तुम यह रिस्क नहीं ले सकती कि  जो होगा देखा जायेगा और ना ही सामाजिक परिस्थितियां ही तुम्हारे साथ है , इसलिए यह पर-पुरुष का चक्कर ठीक नहीं है। "
  " पर -पुरुष ...! कौन ' पर-पुरुष ' क्या प्रभाकर के लिए  कह रही हो यह ...लेकिन मैंने तो सिर्फ प्रेम ही किया है और जब स्त्री किसी को प्रेम करती है तो बस प्रेम ही करती है कोई वजह नहीं होती। उम्र में कितना बड़ा है ,कैसा दिखता है , बस एक अहसास की तरह है उसने मेरे मन को छुआ है ...!" वेदिका जैसे कहीं गुम  सी हुई  जा रही थी। प्रभाकर का ख्याल आते ही दिल में जैसे प्रेम संचारित हो गया हो और होठों पर मुस्कान आ गयी।
" हाँ ...! मुझे प्यार है प्रभाकर से , बस है और मैं कुछ नहीं जानना चाहती ,समझना चाहती ..., तुम चुप हो जाओ ...," वेदिका थोडा हठी होती जा रही थी।
" बेवकूफ मत बनो वेदिका ...!जो व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं है वो तुम्हारे प्रति कैसे वफादार हो सकता है , जो इन्सान अपने जीवन साथी के साथ इतने बरस साथ रह कर उसके प्रेम -समर्पण को झुठला सकता है और कहता है की उसे अपने साथी से प्रेम नहीं है वो तुम्हें क्या प्रेम करेगा। कभी उसका प्रेम आज़मा कर तो देखना ,कैसे अजनबी बन जायेगा , कैसे उसे अपने परिवार की याद आ जाएगी ...!" वेदिका के भीतर जैसे जोर से बिजली चमक पड़ी। और वह एक झटके से उठ कर बैठ गयी।
" हाँ यह भी सच है ...! लेकिन ...! मैं भी तो कहाँ वफादार हूँ राघव के प्रति ...! फिर मुझे यह सोचना कहा शोभा देता है कि प्रभाकर ...! " वेदिका फिर से बैचेन हो उठी।
बिस्तर से खड़ी हो गयी और खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर कोलाहल कम हो गया लेकिन अंदर का अभी जाग रहा है। आज नींद जाने कैसे कहाँ गुम हो गई ...क्या पहली बार प्रभाकर से बात करने की ख़ुशी है या एक अपराध बोध जो उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था।
   सोच रही थी क्या अब प्रभाकर का मिलना सही है या किस्मत का खेल कि यह तो होना ही था। अगर होना था तो पहले क्यूँ ना मिले वे दोनों।
राघव के साथ रहते -रहते उसे उससे एक दिन प्रेम हो ही गया या समझोता है ये या जगह से लगाव या नियति कि  अब इस खूंटे से बन्ध  गए हैं तो बन्ध ही गए बस।
 नींद नहीं आ रही थी तो रसोई की तरफ बढ़ गई। अनजाने में चाय की जगह कॉफ़ी बना ली। बाहर छत पर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर जब एक सिप लिया तो चौंक पड़ी यह क्या ...! उसे  तो कॉफ़ी की महक से भी परहेज़ था और आज कॉफ़ी पी रही है ...? तो क्या वेदिका बदल गयी ...! अपने उसूलों  से डिग गयी ?जो कभी नहीं किया वह आज कैसे हो हो रहा है ...!


राघव की निश्छलता वेदिका को अंदर ही अंदर कचोट रही थी कि  वह गलत जा रही है ,जब उसे वेदिका की इस हरकत का पता चलेगा क्या वह सहन कर पायेगा या बाकी सब लोग उसे माफ़ करेंगे उसे ?
अचानक उसे लगने लगा कि वह कटघरे में खड़ी है और सभी घर के लोग उसे घूरे  जा रहे हैं नफरत-घृणा और सवालिया नज़रों से ..., घबरा कर खड़ी हो गई वेदिका ...
वेदिका जितना सोचती उतना ही घिरती  जा रही है ...रात तो बीत जाएगी लेकिन वेदिका की उलझन खत्म नहीं होगी। क्यूंकि यह उसकी खुद की पाली हुई उलझन है ...
तो फिर क्या करे वेदिका ...? यह हम क्या कहें ...! उसकी अपनी जिन्दगी है चाहे बर्बाद करे या ....
रात के तीन बजने को आ रहे थे। वेदिका घडी की और देख सोने का प्रयास करने लगी। नींद तो उसके आस - ही नहीं थी।
     यह जो मन है बहुत बड़ा छलिया है। एक बार फिर से उसका मन डोल गया और प्रभाकर का ख्याल आ गया। सोचने लगी क्या वह भी सो गया होगा क्या ...? वह जो उसके ख्यालों में गुम हुयी जाग रही तो क्या वह भी ...!
" खट -खट " फोन  खटखटा उठा , देखा तो प्रभाकर का ही सन्देश था। फिर क्या वह बात सही है कि मन से मन को राह होती है। हाँ ...! शायद , जब रानी जाग रही हो तो राजा भी जागेगा ही ...
अब इस कहानी का क्या किया जाए क्यूंकि वेदिका का अन्तर्द्वन्द खत्म तो हुआ नहीं।
  उसका प्रभाकर के प्रति कोई  शारीरिक आकर्षण वाला प्रेम  नहीं है बल्कि प्रभाकर से बात करके  उसको एक सुरक्षा का अहसाह सा देता है। वह उसकी सारी  बात ध्यान से सुनता है और सलाह भी देता है, उसकी बातों में भी कोई लाग -लपेट नहीं दिखती उसे ,फिर क्या करे वेदिका ? यह तो एक सच्चा मित्र ही हुआ और एक सच्चे मित्र  से प्रेम भी तो हो सकता है।
लेकिन ऐसे फोन करना या मेसेज का आदान -प्रदान भी तो ठीक नहीं ...! सोचते -सोचते वेदिका मुस्कुरा पड़ी शायद उसे कोई हल मिल गया हो।
  वह सोच रही है कि फेसबुक के रिश्ते फेसबुक तक ही सिमित रहे तो बेहतर है। अब वह प्रभाकर से सिर्फ फेसबुक पर ही बात करेगी वह भी सिमित मात्रा में ही।नया जमाना है पुरुष मित्र बनाना कोई बुराई  नहीं है लेकिन यह मीत बनाने का चक्कर भी उसे ठीक नहीं लग रहा था। वह प्रभाकर को खोना नहीं चाहती थी।उसने तय कर लिया कि अब वह फोन पर बात या मेसेज नहीं करेगी और सोने की कोशिश करने लगी।
अब रानी समझ गयी है तो राजा को समझना ही पड़ेगा कि असल दुनिया और आभासी दुनिया में फर्क तो होता ही है।




एक कली मुस्काई ...

        सोनाली हर बार यानि पिछले आठ वर्षों से अपना जन्म -दिन  घर के पास के पार्क में खेलने वालों बच्चों के साथ ही मनाती है। उनके लिए बहुत सारी चोकलेट खरीद कर उनमे बाँट देती है। आज भी वह पार्क की और ही जा रही है। उसे देखते ही बच्चे दौड़ कर  पास आ गए।और वह ...! जितने बच्चे उसकी बाँहों में आ सकते थे , भर लिए । फिर खड़ी हो कर  चोकलेट का डिब्बा खोला और सब के आगे कर दिया।बच्चे जन्म-दिन की बधाई देते हुए चोकलेट लेकर खाने लगे।
 " एक बच्चा इधर भी है , उसे भी चोकलेट मिलेगी क्या ...?" सोनाली के पीछे से एक आवाज़ आई।
सोनाली ने अचकचा कर मुड़ कर देखा।उसे तो वहां कोई बच्चा नज़र नहीं आया। उसके सामने तो एक सुंदर कद -काठी का एक व्यक्ति खड़ा था। हाँ , उसके चेहरे पर एक बच्चे जैसी शरारती मुस्कान जरुर थी।
" कहाँ है बच्चा ...? मुझे तो नज़र नहीं आ रहा।" सोनाली थोड़ी सी चकित हुयी सी बोली।
" वह बच्चा मैं ही हूँ , मैं अपनी माँ का सबसे छोटा बेटा हूँ और अभी मेरे कोई बच्चा  नहीं है तो मैं खुद को बच्चा ही मानता हूँ ...!"उस अजनबी ने हँसते हुए कहा।
" लेकिन मैं दो चोकलेट लूँगा ...!" उसने बच्चों की तरह की कहा।
" लेकिन क्यूँ ...! दो किसलिए ? सभी बच्चों ने एक -एक ही तो ली है ...!" सोनाली ने भी उसके सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को समझते हुए ,थोडा सा डांटते हुए कहा।
" लो कर लो बात , मैं बड़ा भी तो हूँ एक चोकलेट से कैसे काम चलेगा मेरा ...!" वह फिर बच्चों की तरह ही मुस्कुरा कर बोला।
" लीजिये आप जितनी  मर्ज़ी हो उतनी ही चोकलेट लीजिये ..." हंस पड़ी सोनाली। उसके आगे डिब्बा ही कर दिया।
" शुक्रिया ...! मैं दो ही लेता हूँ। मेरा नाम आलोक है। मैं यहाँ आगरा में एक सेमिनार में आया हूँ। मैं लखनऊ से हूँ और बोटनी का लेक्चरर हूँ। शाम को घूमने  निकला तो यह पार्क दिख गया और यहाँ आ गया।यहाँ आपको चोकलेट लिए देखा तो मुझसे रहा नहीं गया।
 "आप यहीं की रहने वाली है क्या ? " आलोक ने पूछा।
" जी हाँ ...मैं यहाँ सरकारी स्कूल में हिंदी पढाती हूँ। " कह कर सलोनी चल दी।
सलोनी घर आ कर चुप चाप कुछ देर कुर्सी पर बैठी रही। फिर उसकी माँ का कानपुर  से फोन आ गया।
थोड़ी ही देर में बाहर  का अँधेरा गहराने लगा था।सोनाली को अब उठाना ही पड़ा। लाइट्स जलाते हुए सोच रही थी , घर में तो रौशनी हो गयी पर मन के अन्दर जो अँधेरा है वह कैसे दूर होगा।
 कहने को जन्म-दिन था पर ऐसा भी कभी मनाना होगा कब सोचा था।ऐसे तो लगभग दस सालों से होता आ रहा है।जब से वह आगरा आयी है।
रसोई में गयी कुछ बनाया कुछ फ्रिज से निकाला, गर्म किया और खा लिया।खाते हुए सोच रही थी कि इस बार छुट्टियों में घर जा कर आएगी।फिर अपना लेपटोप लेकर बैठ गयी।
आज कल लोगों में सोशल साइट्स भी काफी लोकप्रिय हो चुका है। उसका भी एक एकाउंट था। उसी में थोड़ी बिजी हो गयी। तभी उसकी नज़र एक  दिलचस्प वक्तव्य पर पड़ी। साथ ही में उस पर की गयी रोचक टिप्पणी पर भी। पढ़ कर उसे हंसी आ गयी। गौर से देखा के वह कौन है। उसे याद आया शायद ये वही है जो उसे आज शाम को पार्क में मिला था।
"अरे हां ...!लगता तो वही है नाम भी वही है आलोक , आलोक मेहरा ...!" उसने उस को मित्रता का निवेदन भेज दिया।

    सुबह फिर से वही दिनचर्या ....जल्दी उठो , नाश्ता बनाओ , स्कूल जाओ फिर घर। उसे इंतजार होता था शाम का , जब वह पार्क में जा कर कुछ देर बच्चों के साथ बतिया लेती और मन में ख़ुशी सी महसूस करती थी।
और फिर रात का काला अँधियारा शरू होता तो उसे लगता शायद रात उसके मन के अंधियारे से अँधेरा  और ले लेती है।
   रात के खाने से निबट कर वह अपना लेपटोप लेकर बैठी और अपना सोशल नेटवर्क पर अपना अकाउंट खोल कर देखा तो आलोक का मेसेज आया हुआ था।
" अच्छा जी आप सोनाली है ...,आपने नाम तो बताया ही नहीं था उस दिन , ये तो आपकी सूरत  कुछ याद रह गयी थी तो  आप पहचान में आ गयी।"
सोनाली ने बताया , वह कानपुर की रहने वाली है और यहाँ आगरा में पिछले दस सालों से हिंदी की टीचर है। परिवार के बारे में पूछा तो वह बात टाल  गयी।
आलोक ने बताया वह चार भाई -बहन है और  वह सबसे छोटा है। सभी लोग साथ ही रहते हैं और ' वेल सेटल्ड ' है। उसने अभी शादी नहीं की हालाँकि वह 45 साल का है।क्यूँ नहीं की , क्यूँ कि  उसे कोई मिली ही नहीं उसके मन के मुताबिक।जब मिलेगी वह शादी जरुर करेगा।
थोड़ी देर  इधर -उधर की बात कर वह  रात हो गयी कह कर बंद कर के सोने चली गयी।
सोनाली सोच रही थी के वह आलोक को उसके बारे में क्या बताती ...?
क्या यह बताती वह कि उसके 25 वर्ष की एक बेटी और 20 वर्ष का बेटा है। वह तलाक शुदा है।आलोक ही क्यूँ वह किसी भी को क्यूँ बताये अपनी कहानी के बारे में।
         सोनाली बचपन से ही बहुत शान -शौकत से पली थी।पिता जिला स्तरीय एक उच्चाधिकारी थे।बहुत रौबिला व्यक्तित्व था उनका। मजाल कि  कोई उनके आगे कोई आवाज़ भी ऊँची  कर सके। अपने पिता की बेहद लाडली सोनाली पढाई में  भी बहुत अच्छी  थी। माँ की आँखों का तारा और भाई की बहुत अच्छी और ज्ञानवान दीदी थी वह।
         वह रविवार ही था जिस दिन उसके पिता भानु प्रताप किसी से फोन पर बात कर रहे थे। बात बंद कर के उसकी माँ नीलिमा को आवाज़ दी। वह बता रहे थे के उनके और उनकी बिटिया के तो भाग्य ही खुल गए। एक बहुत बड़े और प्रतिष्ठित व्यवसायी के यहाँ से सोनाली के लिए रिश्ता आया है।माँ ने बात का विरोध करते हुए कहा के अभी तो सोनाली सिर्फ दसवी कक्षा में ही है मात्र अठारह वर्ष की ही तो है। पर पिता को उसकी पढाई से मतलब नहीं एक अच्छा रिश्ता हाथ  से ना चला जाये , यह ज्यादा चिंता थी। उनके विचार से वह पढाई तो शादी के बाद भी कर सकती है लेकिन ऐसा अच्छा रिश्ता निकल जायेगा तो फिर क्या मालूम मिले या नहीं।सोनाली की मनस्थिति कुछ अजीब सी थी।ना तो उसने सहमती जताई और ना ही विरोध।वैसे भी उससे पूछा भी किसने था।जन्म कुंडली भी मिल गयी।
        आनन - फानन रिश्ता तय हो गया। उनके दूसरे रिश्ते दारों के लिए यह बहुत इर्ष्या का विषय बन गया और तब तो और भी जब उसकी सगाई में हीरे की अंगूठी और बहुत कीमती जेवर और कपडे आये।यह एक किवदंती की तरह कई दिन तक चर्चा का विषय बना रहा। दोनों की जोड़ी कोई खास जच  भी नहीं रही थी।यह जलने वालों को कुछ सुकून भी दे रही थी। सोनाली बहुत सुंदर , सुन्दर कद , जो भी देखता एक बार बस देखता ही रह जाता। सुमित साधारण रंग रूप ,कद में ज्यादा लम्बा नहीं था।तिस पर थोडा मोटा भी था। लड़के का रूप कौन देखता है बस उसमे गुण ही होने चाहिए ....रूप का क्या ! वह एक बार ही दिखता है गुण तो सारी  उम्र काम आते है। लेकिन कुछ तो बराबरी का होना चाहिए था। लेकिन यह सभी  सारे सवाल  हीरे की अंगूठी की चमक में दब कर रह गए।
       सोनाली की सास तो उस पर बलिहारी जा रही थी उसके सर पर बार-बार ममता से हाथ फिराए जा रही थी।आखिर क्यूँ नहीं ममता लुटाती। उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी।बहू लाने  की ...हर माँ की इच्छा होती है एक चाँद सी बहू लाने की।
           दसवीं का रिजल्ट आने के बाद सोनाली की शादी कर दी गयी। ससुराल में  बहुत स्वागत हुआ उसका। सास सच में ही बहुत ममतामयी माँ ही साबित हुयी।आखिर वह उनके एकलौते बेटे की बहू जो थी।ससुर भी बहुत अच्छे थे।और पति सुमित का व्यवहार ठीक -ठाक ही था।सुबह घर से निकलता शाम को ही घर आता ...पिता के साथ काम तो संभालता था पर ..
            सोनाली को धीरे-धीरे समझ आ गया था कि उन्होंने अपने बिगडेल बेटे के पैरों में लगाम डालने के लिए इतनी जल्दी शादी की है।सुमित को उसके साथ कोई दुर्व्यवहार भी नहीं था तो कोई लगाव भी नहीं था । इसी दौरान उसकी सास ने उसको बाहरवीं की परीक्षा देने के लिए फार्म भरवा दिया। बीच में पढाई और साथ ही पति के साथ हनीमून भी दोनों चल रहा था।  हनीमून भी क्या था , बस घर वालों को भुलावा ही देना था।वहां भी काम के बहाने से सुमित दिन भर गायब ही रहता। कई-कई दिन बाहर रहने के बाद घर  वे दोनों लौट आते। इतना पैसा -रुतबा हौने के बाद भी सोनाली का मन एक बियाबान सा ही था।कोई फूल खिलने की उम्मीद नहीं थी वहां पर।
     लेकिन एक दिन उसकी गोद में फूल खिलने की खबर से बहुत वह खुश थी  और सारा परिवार भी। यहाँ तो सुमित भी खुश था। बेटी हुई थी उसके ....सभी बहुत खुश थे। रूबल नाम रखा गया उसका।
सोनाली की पढाई भी साथ ही में चल रही थी।इस दौरान उसने  बी .ए . भी कर लिया था। सास ने सुमित और उसको कुछ दिनों के लिए गोवा भेज दिया, बेटी को अपने पास रख लिया। दो महीने का प्रोग्राम बना कर गए थे लेकिन बीच में ही लौटना पड़ा दोनों को ...कारण था सोनाली के गर्भवती होना।
अब वह बेटे की माँ बनी।नामकरण  , रोहन किया गया।
सब ठीक -ठाक ही चल रहा था।एक दिन सुबह -सुबह एक फोन आया और समय एक बारगी ठहरा हुआ लगा सभी को। समाचार था सुमित के चाचा -चाची का एक एक्सीडेंट में निधन हो गया। उनकी बेटी करुणा ही बची थी।
       करुणा अब उनके साथ ही रहने लगी।देखने में सुंदर और तेज़ - तर्र्रार करुणा ने सबके मनो को जीत लिया और बेटी के से अधिकार जताने लगी। सुमित के तो अधिक ही नज़दीक रहती थी। वो भी उससे बात कर के खुश होता था। जबकि कई बार सोनाली को ही करुणा के सामने झिडक भी दिया करता था।
           लगभग एक साल बाद उसके ससुर का ह्रदयघात से निधन हो गया।अब तो सुमित के हाथों में सारा कारोबार आ गया था।वह भी एक कुशल व्यवसायी था। लेकिन एक अव्वल दर्जे का अय्याश  भी था।माँ की कोई परवाह नहीं थी। धीरे -धीरे वह निरंकुश होता जा रहा था। वह किसी की नहीं सुनता पर करुणा की लच्छेदार बातों  का बहुत आज्ञाकारी था। उसका कहा कभी नहीं टालता था। सोनाली की सास भी मानसिक रोगी जैसे होती जा रही थी।दिन में कई-कई बार कह उठती ये मौत उसे क्यूँ नहीं आती, क्यूँ नहीं कोई बस - ट्रेन ही उसके उपर से गुजर जाती।सोनाली को बात  बहुत हैरान करती और माँ के पास बैठ उनको समझाने की कोशिश करती। लेकिन माँ के आंसू थमते ही नहीं थे। दोनों को एक दूसरे  ही का सहारा था।
          एक रात को जब वह माँ के पास बैठी थी तो उन्होंने उसका हाथ पकड लिया , रोने लगी और बोली, " बेटी मैने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया , मैं बहुत बड़ी अपराधी हूँ तुम्हारी ,मैंने सोचा था , सुन्दर बहू लाऊंगी  तो इसके बहकते कदम थम जायेंगे। अब तो मुझे मर के भी चैन नहीं आएगा !"
ना जाने कितनी देर रोती  रही दोनों। सोनाली ने माँ को अपने बाँहों के घेरे में ले कर  खड़ा किया और बिस्तर पर सुला दिया। माँ ने हाथ नहीं छोड़ा जब तक वह सो ना गयी।
      अगले दिन माँ उठी ही नहीं ,वह तो सो चुकी थी हमेशा के लिए।सोनाली को लगा जैसे उसकी अपनी ही माँ चली गयी। अब कौन सहारा था उसका।
          अब शुरू हुआ सोनाली का मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का दौर। बहन करुणा दोगली राजनीती खेल रही थी। उसके सामने कुछ और सुमित के सामने कुछ और।और तो और बच्चों को भी भुआ जी का साथ भाने  लगा। ना जाने करुणा की मीठी  जुबान में क्या जादू था की हर कोई उसके वश में हुआ जाता था।
उन्ही दिनों सोनाली ने बी . एड . करने के लिए फार्म भी भर दिया। इतने तनावपूर्ण माहौल के बावजूद वह अपना मानसिक संतुलन बनाये हुए थी। वह सोच रही थी अपने पैरों पर खड़ा हो कर अपने बच्चों  को लेकर यहाँ से दूर चली जाएगी।
         उसके माता -पिता को भी अपनी गलती महसूस हो रही थी। लेकिन  उसे ही संयम बरतने को कह रहे थे।
एक दिन बच्चों के स्कूल जाने के बाद उसे बाज़ार जाना था,उसने सुमित से कहा कि  वह भी उसके साथ चले ,उस दिन वह घर ही था। पीठ में दर्द का कह इनकार कर दिया।वह अकेली ही चल दी।कुछ दूर जाने पर उसको याद आया के उसका कैमरा भी थोडा ठीक करवाने देना था। अपनी गाडी को घर की ओर मोड़ ली। अपना कमरा खोलना चाहा तो अन्दर से बंद था। खटखटाया तो सामने करुणा थी,  सोनाली की हैरानी की कोई सीमा नहीं थी।मुहं से कुछ बोला नहीं गया। करुणा का चेहरा भी सफ़ेद पड़  गया, वह जल्दी से बाहर  की और भागी।सोनाली ने
सवालिया नज़र से सुमित की और देखा तो वह बेशर्मी से बोला , "मेरी पीठ पर बाम मल रही थी।"
  उसे तो वहां कोई बाम तो क्या उसकी महक भी नहीं मिली , हाँ उसके नाक और मन तो कुछ और ही सूंघ रहे थे।वह जल्दी से बाहर आ गयी और सीधे लान की तरफ चली। घर में तो उसका दम घुट रहा था। अपनी साँसों को संयत कर रही थी। अपनी ही बात पर विश्वास नहीं कर रही थी।
  " ठीक है सुमित एक अय्याश इन्सान है ,पर अपने ही घर में  ऐसा व्यभिचार तो नहीं करेगा ,लेकिन कमरा बंद करके बाम लगाने का क्या मतलब ...! "
    अब उसे याद आ रहा था के क्यूँ उसकी सास रो-रो कर मौत माँगा करती थी।शायद उनको पता चल ही गया होगा।
      कब तक बाहर बैठी रहती , आखिर में उसे घर में तो आना ही था।लेकिन उस दिन के बाद से सुमित की प्रताड़ना और भी बढ़ गयी।उसे खर्च देना भी बंद कर दिया। कभी मांगती तो हाथ भी उठा दिया करता। एक दिन तो बहस इतनी बढ़ गयी के सुमित ने सोनाली की कनपटी  पर पिस्तौल ही रख दी और जान से मारने की धमकी देने लगा। करुणा ने कैसे बीच बचाव किया और उसे उसके कमरे में छोड़ आयी। वह सोनाली को बहुत हिकारत भरी नज़रों से देख रही थी।
      हार मानने वालों में से नहीं थी सोनाली !उसने पुलिस -स्टेशन जा कर अपनी शिकायत दर्ज करवा दी।पुलिस ने कार्यवाही तो की लेकिन वह शाम को जमानत पर वापस आ गया।यह सब उसके बच्चों के सामने ही हुआ था।और बाकी की कसर  करुणा ने पूरी कर दी।इस लिए वह भी सोनाली को ही दोषी मान रहे थे।वह दिन प्रति दिन बच्चों को उससे दूर तो किये ही जा रही थी और उस दिन पुलिस वाली घटना ने आग में घी का काम किया।उसने उस दिन सोचा काश वह अपने बच्चों को पहले से ही सही वस्तुस्थिति बताती तो आज उसे बच्चों की भी बेरुखी ना देखनी पड़ती। लेकिन बताती भी क्या ?
         उस दिन के बाद से सुमित ने घर में कदम रखना बंद कर दिया।घर में एक बने  तरफ गेस्ट हाउस में ही रहने लगा। कभी रात गहराती और उसके मन में घुटन सी होती तो वह खिड़की के पास खड़ी  हो बाहर की और देखती तो उसे अक्सर एक साया सा गेस्ट हाउस के पास लहराता हुआ सा नज़र आता। वह करुणा ही होती थी। सोनाली को सोच कर ही मतली सी आ जाती और होठ घृणा से सिकुड़ जाते।
       जब उसके माता पिता को यह सब मालूम हुआ  तो फौरन चले आये।साथ चलने को कहा , सोनाली ने मना कर दिया के वह ऐसे नहीं जाएगी अपना हक़ ले कर जाएगी। उसके पिता अपनी बेटी की हालत देख कर टूट चुके थे।वह सहन नहीं कर पाए और सोनाली का हाथ पकड कर रो पड़े ...एक ऐसा इन्सान जिसके एक इशारे पर दुनिया चला करती थी वह आज इतना मजबूर था। पछता रहा था अपने गलत फैसले  पर ....संभाले भी नहीं संभल रहे थे वे ...
    बेटी का पिता होना भी क्या मजबूरी है ,एक अपराधी जैसा हो जाता है एक इन्सान ।
           सोनाली ने कैसे  ही कर के पिता को संभाला  और कहा कि उनकी बेटी कमजोर नहीं है ,बहुत हिम्मत है उसमे।माँ ने  सोनाली से कहा वह  पिता , दोनों उसके फैसले में उसके साथ है।वह चाहे तो उनके साथ चल सकती है।बच्चों को यहीं उनके पिता के पास ही छोड़  दे। अब बेटी पन्द्रह साल की हो चुकी है उसे जब  पिता के व्यभिचार का पता चलेगा तो क्या सुमित को शर्मिंदगी नहीं होगी।
लेकिन सोनाली ने कुछ समय माँगा। उसे अपने बच्चों की और से कुछ उम्मीदें अभी बाकी थी।
      बच्चों पर तो करुणा ने जैसे काला जादू ही कर दिया था।वह उसकी और देखना भी पसंद नहीं  करते थे।आखिरकार उसने वह घर छोड़ ही दिया। मायके आ गयी।
उसको संभलने में बहुत दिन लगे। तलाक की कार्यवाही में ज्यादा समय नहीं लगा।  इस दौरान उसने कई बार बच्चों से सम्पर्क करने की भी कोशिश की पर वे उससे बात ही नहीं करना चाहते थे।आखिर वह हार गई बच्चों के आगे। उनको भूलना भी कहा आसन था।
        उन दो सालों  में उसने बी . एड . कर ली थी।अब आगरा में सर्विस कर रही थी। दस साल के लगभग होगया उसे आगरा में।पहले -पहल तो माँ कुछ दिन आ कर रही थी।पिता की बिगडती सेहत  देख सोनाली ने माँ को वापस कानपुर भेज दिया।धीरे-धीरे यहाँ भी रम गयी वह।पर मन का अँधियारा इतना था के उसे कुछ भी अच्छा ना लगता था .............

     अगली सुबह जब वह सो कर उठी तो सर भारी हो रखा था।फोन करके अपनी सहेली को छुट्टी की अर्जी दे देने  को कह दिया।और फिर से लेट गयी।
  जब काम वाली आयी तो खड़ी हो कर घर का जायजा लिया तो लगा की घर थोडा  बिखरा हुआ है तो आज क्यूँ न इसे ही समेटा जाये।सारा दिन घर को संवारने में ही लग गया।कामवाली खाना बना गयी थी।खाना खाने को मन नहीं हुआ तो सोचा के कुछ अच्छा बना कर खाया जाये।
   शाम  को चल पड़ी पार्क की और। बच्चों  से बातें कर  मन कुछ हल्का सा हुआ सोनाली का।
रात को जब लेपटोप लेकर बैठी तो अलोक भी ऑन  लाइन था। दोनों के कुछ देर बात की ...,
     फिर रोज़ ही बात होने लगी !
   आलोक का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर गजब का था ,बात कुछ ऐसी करता के वह हंस पड़ती।ऐसे ही एक दिन उसने सोनाली का फोन नंबर मांग लिया। एक बार तो वह झिझकी पर फिर उसे  बुरा नहीं  लगा नंबर देना।
एक दिन सोनाली ने अपनी सारी आपबीती भी उसे बता दी। सुमित ने बहुत अफ़सोस जताते हुए उससे सहानुभूति जताई और कहा के उसे यह सब एक बुरा सपना समझ कर भूल जाना चाहिए। एक नयी शुरुआत करनी चाहिए। आलोक की बातें सोनाली को बहुत सुकून देती थी।
     अब सोनाली भी मुस्कुराने लगी थी। अब उसे रात का अँधियारा ही नज़र नहीं आता था उसमे जड़े टिमटिमाते सितारे भी नजर आते, खिला चाँद भी नज़र आता। सच भी है हर इन्सान को साथी की जरूरत होती है। उसकी प्रकृति ही ऐसी है ,वह अकेला रह ही नहीं सकता।अकेलापन उसे मुरझा देता है।
             उसे फूलो से बहुत प्यार था। अपने दो कमरे के मकान  में भी उसने बहुत सारे गमलों में  फूल खिला रखे थे।लेकिन जब मन ही मुरझाया हो तो कोई भी फूल मन को नहीं सुहाता।हां , वह सुबह उठते ही उनको संभालने जरुर जाती।रविवार को तो उनको पूरा समय देती थी।
      उस दिन भी रविवार था।
           सुबह जब वह बालकनी खोल अपने गमलों में लगे फूलो को देखने गयी तो देख कर खिल पड़ी। सामने के गमले में लाल गुलाब के पौधे में एक कली  निकल आयी थी।सामने उगते सूरज की किरन और मुस्काती कलि को देख वह भी मुस्कुरा पड़ी।यह मुस्कान उसके दिल से निकली थी।शायद ये आलोक की संगत का असर था जो कि सोनाली की पीली रंगत को भी गुलाबी बनाता  जा रहा था।अब उसे सब कुछ अच्छा लगने लगा था।उदासी कही दूर चली गयी हो जैसे।
थोड़ी देर में आलोक का फोन भी आ गया। वह अक्सर रविवार को ही फोन किया करता था।
    वह किसी बात पर उसे हंसा रहा था। अचानक वह बोल पड़ा ," सोनाली , आई लव यू ......, मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ ...!"
अचानक कही गयी बात पर वह जैसे चौंक पड़ी। पहले तो उसे कुछ नहीं सुझा और बोली , " तुम जानते हो मैं 45 साल की हूँ ,यह मेरी शादी की उम्र नहीं है ...!"
" कमाल है मैं भी 45 साल का हूँ ...और मेरी तो शादी की उम्र अभी आयी भी नहीं और तुम्हारी चली भी गयी ...?आलोक हंस  के बोला।
 " लेकिन आलोक , तुमसे मित्रता तक तो ठीक है लेकिन शादी की बात मत करो ..मेरे दो बच्चे भी है ...लोग क्या कहेंगे ? और तुम्हारे घर वाले , तुम्हारी माँ ने जो सपने सजाये हैं अपनी बहू के लिए ,वह एक तलाकशुदा - दो बच्चों की माँ के तो नहीं सजाये होंगे।इसलिए समझदारी की बात करो ऐसा बचपना शोभा नहीं देता तुम्हे और मुझे भी।" सोनाली कुछ परेशान  सी हो गयी थी।
   " मैंने माँ के आगे शर्त रखी थी जो मेरे मन में बस जाएगी उसी से शादी करूँगा और तुमने मेरे मन में घर कर लिया है ... तुम बताओ क्या तुम मुझसे शादी करोगी ...!", आलोक ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।
      कुछ देर सोचने के बाद सोनाली ने हां कह दिया।
आलोक ने कहा वह और उसके माता पिता आगरा आना चाहते है।सोनाली से भी कहा के वह भी अपने परिवार वालों को वही बुला ले।
थोड़ी देर में उसने अपनी माँ से बात की तो माँ को क्या ऐतराज़ हो सकता था भला। उन्होंने भी आगरा आने की हामी भर दी। फोन बंद करते हुए सोनाली  की आँखे  भर आयी ...
आंसुओ को पोंछते हुए जब सामने देखा तो बालकनी में गमले में वह छोटी सी लाल गुलाब की कली  मुस्कुरा रही थी और एक कली  सोनाली के मन में भी मुस्कुरा रही जो उसके होठों पर खिल रही थी ....

उपासना सियाग


Monday, March 11, 2013

मीठी गुड्डी ....



         राजस्थान और गुजरात की सीमा से लगे धर्म पुर गाँव में एक दिन सुबह - सुबह ही एक सनसनी खेज खबर से हडकम्प सा मच गया।मचे भी क्यूँ नहीं ...! आखिर गाँव के बड़े चौधरी दमन जीत सिंह का कत्ल जो हो गया। इलज़ाम गाँव के ही रामसुख की बेटी कमली पर लगा। यह तो और भी हैरान कर देने वाली बात थी कि  "एक दुबली पतली, एक मुट्ठी हड्डियाँ है जिसमें  और जिसे कभी बोलते ही ना सुना था, उसने कत्ल कर दिया ...!" यह दूसरी चोंकाने वाली खबर थी।
       कहते हैं कि बड़े आदमी का जन्म भी महान होता तो मरण भी महान ही होता है।पुलिस ने सारा अमला झोंक दिया कमली की तलाश में।आखिर तीन दिन की मशक्कत के बाद कमली परिवार सहित पकड़ी गयी।
      कमली अब कटघरे में खड़ी थी। बेहद सुन्दर रूप पर थोडा कुम्हलाया हुआ बड़ी-बड़ी आँखों में एक सूनापन था।जिन होठों पर सदैव मुस्कान खिला  करती थी वे अब भींचे हुए थे।
      पूछने पर उसके भींचे हुए होठ खुले और बोली , " जज साहब मैंने ही  जमींदार का कत्ल किया है। उसने ना जाने कितनी लडकियों -औरतों को बे -आबरू किया। उसने मेरे साथ भी यही करना चाहा तो मैंने अपनी  ओढनी से गला दबा कर उसे मार डाला। "
  आवाज़ में आक्रोश भर कर बोली , " जज साहब ...! मैं कोई  मीठी गुड्डी ना हूँ , जो जमींदार मुझे जायका  बदलने ले लिए खा जाता ...! मैं इन्सान हूँ एक जीती -जागती, हाड़ - मांस की बनी हुई। अपनी इज्ज़त की रक्षा  खुद कर सकती हूँ।" कहते-कहते गर्दन घुमाई तो सामने काशी खड़ा था। काशी पर नजर पड़ने के बाद वह अपनी रुलाई रोक ना पाई और जोर से रो पड़ी।
        काशी जिसे प्यार से कमली ' कासीड़ा ' पुकारती थी। दोनों बचपन के साथी , साथ -साथ खेलते, रेगिस्तानी मिटटी के ऊँचे नीचे धोरों पर भागते, कभी रुठते तो कभी मनाते , इसी में कब बचपन बीता और कब अल्हड कैशोर्य  में प्रवेश कर गए। आपस का स्नेह कब प्रीत में बदला यह वे दोनों ही नहीं जान पाए।हाँ बदला नहीं था तो कमली का काशी को मनाने का तरीका।
      एक दिन जब कमली ने किसी बात का मजाक बनाया तो काशी रूठ गया। अगले दिन भी नहीं बोला तो कमली अपनी ओढ़नी में कुछ मीठी गुड्डियों वाले खिलोने भर लाई। अपनी ओढ़नी में से एक आगे करती हुयी बोली, " ले मुहं मीठा करले ..कड़वा गुस्सा थूक दे ..!कासीड़ा ...!"
  काशी, कमली से नाराज़ थोड़ी हो सकता था।एक महल को हाथ में लेता हुआ उसकी उँगलियों को जैसे पियानो बजा रहा हो, बजाते हुए बोल पड़ा , " कमली तू भी तो एक मीठी गुड्डी जैसी तो है मीठी -मीठी , बाते भी तेरी मीठी ...!"
      काशी ने पियानो बजाया  तो कमली के मन  में भी जलतरंग सा बज उठा।
" ना रे कासीड़ा ...! मैं मीठी गुड्डी ना हूँ , मैं तो खारी मिर्च और तेज़ धार वाली तलवार सी हूँ ..."जलतरंग सी हंसी हँसते हुए तलवार की तरह टेढ़ी तन कर खड़ी हो गयी।
         उन दोनों की हंसी देर तक सफ़ेद धोरों पर हलके - हलके बहती रेत पर कई देर गूंजती रही। गाँव में किसी को कोई भी ऐतराज़ नहीं था उनके प्यार से। कोई-कोई तो उनको ' ढोला - मारू ' की जोड़ी भी कहा करते थे।
ऐसे ही एक दिन दोनों हँसते हुए जा रहे थे कि सामने से जमींदार की जीप आ रही थी। जमींदार ने कमली की सुन्दरता देख जीप रोक ली और आवाज़ दी , " ए  छोरी ....कौन है तूँ ...!"
" मेरा नाम कमली है।" कमली ने बहुत सयंत स्वर में जवाब दिया।
" अच्छा -अच्छा तो  ढोला - मारू की जोड़ी वाली कमली ...! और तू  काशी है फिर  ...हैं ...! " काशी की और मुखातिब हो कर जमींदार बोला। लेकिन उसकी वहशी नज़र कमली को ऊपर से नीचे ताक रही थी।कमली सहम कर आगे की और बढ़ गयी तो जमींदार ने भी कुत्सित मुस्कान से अपनी जीप आगे बढ़ा ली।
  घर आ कर जब कमली ने जमींदार से मुलाकात की बात अपनी माँ को बताया तो वह सिहर उठी और जल्दी से उसे धकेलती सी हुई  कोठडी में ले जा खड़ा कर दिया।
      बोली , " खबरदार जो यहाँ से बाहर  निकली तो जब तक आक्खा तीज ना आवे और तेरा ब्याह ना कर दूँ , तूँ  इसी कोठड़ी के भीतर रहेगी।एक बार जमींदार की नज़र पड़ गयी मतलब नज़र ही लग गयी ...!"
     लेकिन होनी तो कुछ और ही थी। कुछ तो ठण्ड का मौसम और कुछ भीतर का डर , कमली की माँ को तेज़ बुखार हो आया।वह जमींदार के घर पानी भरने का काम करती थी। दो दिन वह जा ना पाई तो तीसरे दिन चौधराइन का बुलावा आ गया कि  वह ना आ सके तो कमली को ही भेज  दे। अब वह भी क्या करती बहुत समझा बुझा कर बेटी को भेज दिया। कमली को पानी भी कहाँ लाना आता था।कुछ पानी ढ़ोया तो कुछ अपने ऊपर भी गिरा  लिया। भीगे वस्त्रों को समेटती कमली चली तो सामने जमींदार खड़ा था उसे घूरता हुआ। उसके तो जैसे प्राण ही सूख गए।जमींदार की वहशी नज़रों से डरती , गिरती -पड़ती अपने घर की तरफ भागी वह। माँ को कुछ भी ना बता सकी।
       अगले दिन वह नहीं गयी तो फिर से बुलावा आ गया। फिर भी वह ना गयी और ना ही माँ को बताया। दिन ढले फिर बुलावा आ गया। अब तो मरती क्या न करती उसको जाना ही पड़ा।


    जाते ही चौधराइन भड़क गयी। ना जाने क्या - क्या सुनाया और कमली चुपचाप सुनती रही।अपना काम निपटाते-निपटाते शाम हो आई। उसे अपनी माँ की फ़िक्र हो रही थी साथ में सोच रही थी कि  काशी से भी मुलाकात ना हो पाई। सर्दियों को वैसे भी शाम और फिर रात जल्दी ही गहरा जाती है। वह शाल लपेट कर घर की और चल पड़ी। जमींदार के घर के दरवाज़े तक पहुँच भी ना पाई थी कि  एक बलिष्ठ हाथ ने उसके मुहं पर हाथ रख उसे कंधे पर डाल लिया। कमली कुछ सोचती समझती, जमींदार के मेहमान खाने में जमींदार  सामने खड़ी कर दी गयी। दरवाज़ा बाहर से बंद भी कर दिया। कमली भयभीत, सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी। डर के मारे कुछ बोला  नहीं जा रहा था उससे, बस हाथ जोड़ कर बेबसी से जमींदार की और देख रही थी।
      छीना -झपटी, जोर - जबरदस्ती से कमली की ओढ़नी जमींदार के हाथ आ गई । यह देख अचानक कमली में न जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी। उसने जोर से अपना घुटना जमींदार मर्मस्थल पर मारा। जमींदार बिलबिला कर पीछे हटा तो उसने फिर से उसे जोर धक्का देकर अपनी ओढ़नी छीन ली। चिल्ला पड़ी , " रे जमींदार ...! तूने मेरी लाज पर हाथ डाला .... अब तुझे ना छोडूंगी , मार डालूंगी तुझे तो मैं ...!"
     बूढ़ा ,कामान्ध और नशे में धुत जमींदार  धक्का झेल नहीं पाया और गिर पड़ा । कमली पर तो जैसे चंडिका देवी ही सवार हो गयी थी। उसने अपनी ओढ़नी को जमींदार के गले में लपेट कर उसके गले पर कसने लगी। साथ ही में वह गुर्राए जा रही थी, " तुमने मुझे क्या समझा ....मीठी गुड्डी ...! ना रे  ! मैं ना हूँ मीठी गुड्डी ... तेरा जायका बदलने  का सामान नहीं हूँ ..." कमली के हाथ कसे ही जा रहे थे जमींदार की गर्दन पर।
थोड़ी ही देर में जमींदार की आँखे और जीभ बाहर आ गई।
     मर गया ....! अंत हो गया एक वहशी जानवर का।
    ऐसे को तो यमदूत भी ना लेने आया होगा। भगवान  भी ऐसे इन्सान  को बना कर शरमाया तो होगा।धिक्कार है ऐसे माणस  जन्म पर।
       अब कमली के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। दरवाज़ा भी बाहर से बंद था। वह भाग कर खिड़की के पास गयी तो राहत की साँस ली। वहां पर कोई अवरोध नहीं था और गली की तरफ  खुलने वाली खिड़की ज्यादा ऊँची भी नहीं थी। भाग ली कमली जितना जोर से भाग सकती थी।
      कमली की माँ आशंकित सी बाहर ही खड़ी थी। बेटी को यूँ भागते देख वह समझ गयी और जैसे उसके घुटनों से प्राण ही निकल गए हो, वहीँ बैठ गयी। कमली ने सारी बात बताई तो उसके पिता सुखराम ने बहुत गर्व से बेटी के सर पर हाथ रखा और बोला, " मुझे गर्व है तुझ पर मेरी बेटी ....! एक वहशी जानवर का नाश हो गया।"
कुछ देर में वह परिवार सहित गाँव छोड़ कर चले गए।
       अब वह कटघरे में खड़ी थी। लेकिन अपने किये पर शर्मिंदा नहीं थी। जो लोग जमींदार के सताए हुए थे वे सभी राहत की सांस ले रहे थे। कुछ दिन मुकदमा चला. सुनवाई हुई और अंत में जज-साहब ने यही निष्कर्ष निकाला के कमली को एक इन्सान को मारने का कोई अधिकार नहीं था लेकिन जमींदार को एक इन्सान नहीं कहा जा सकता था उसने की लड़कियों और औरतों की आबरू से खेला था। अगर कमली ने अपनी इज्ज़त बचाते  हुए अपनी आत्मरक्षा में जमींदार का क़त्ल भी कर दिया है तो  भी उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।
कमली बा-इज्ज़त बरी कर दी गयी।
      कमली को मिलने काशी उसके घर पहुँचा।  कमली ने मिलने से ही इनकार कर दिया। उसने अपनी माँ से ही कह दिया की वह काशी से नहीं मिलेगी।  वह अब पहले वाली कमली ना रही।  एक कातिल भी है।  उसके हाथों पर खून लग गया है अब मेहँदी ना सज सकेगी।
     काशी ने चाहा कि एक बार बात करले उससे। लेकिन कमली ना मानी।उसकी जिन्दगी में तो जैसे पतझड़ ही आ गया हो। लेकिन सच्चा प्रेम तो पतझड़ में भी फूल खिला देता है। वह रोज़ कमली के घर आता और बात करने की कोशिश करता पर कमली कोठड़ी से बाहर ही नहीं आती।
        मौसम बदल रहा था।सर्दी काम होने लगी थी। बहार का मौसम आने को था।  काशी का प्यार वही रहा। कमली का मन बदल रहा था अब। उसके मन के थार  में अब प्यार का सोता फिर से फूट पड़ा था।लेकिन अब भी काशी से मिलना नहीं चाह रही थी।
      " कमली एक बार तो आकर मिल ले बात कर ले मुझसे, देख ले एक दिन वह भी आएगा मैं ना रहूँगा और तूँ मुझे खोजेगी !" बेबस पुकार कर रह गया काशी।
       एक दिन काशी उसके सच में घर नहीं आया तो कमली बैचैन हो उठी।सारा दिन परेशान रही। रात हुई तो अचानक लगा उसे काशी पुकार रहा हो। वह उठी और अपनी ओढ़नी के पल्लू में कुछ मीठी गुड्डियों वाले खिलोने बांधे और मन्त्र-मुग्ध सी चल पड़ी। उसे केवल काशी की पुकार ही सुनायी दे रही थी। वहीँ जा कर रुकी जहाँ वे दोनों मिला करते थे। सामने देखा तो काशी खड़ा था।
  रो पड़ी कमली, " कासीड़ा ...! तूने मेरी जान लेने की ठान रखी है क्या ? तूँ आया क्यूँ नहीं आज ...!"
" मैंने सोचा , मेरे प्रेम  में शक्ति है या  नहीं, आज यह देख ही लूँ। देख ले ...! मेरे प्रेम की शक्ति, तुझे आना ही पड़ा ...!"  काशी ने कमली का हाथ थामते हुए कहा।
" अच्छा ले अब सब भूल जा ...! ले आज तू मेरे हाथ से मीठा मुहं कर। मैं ले कर आया हूँ  तेरे लिए मीठे -मीठे खिलोने ...." और उसकी उँगलियों से पियनो जैसा बजा दिया। एक जलतरंग कमली के मन में भी बज उठा।और दोनों की हंसी कई देर तक रेगिस्तान के धोरों पर जलतरंग सी तैरती रही।

( चित्र गूगल से साभार )






Thursday, March 7, 2013

औरत होना ही अपने आप में एक ताकत है

 रश्मि प्रभा जी की पुस्तक " नारी विमर्श का अर्थ " में छपा मेरा यह लेख 

          नारी विमर्श , नारी -चिंतन या नारी की चिंता करते हुए लेखन , हमेशा से ही  होड़   का विषय रहा है। हर किसी को चिंता रहती है नारी के उत्थान की ,उसकी प्रगति की .पर कोई पुरुष या मैं कहूँगी कोई नारी भी , अपने दिल पर हाथ रख कर बताये और सच ही बताये कि  क्या कोई भी किसी को अपने से आगे  बढ़ते देख सकता है। यहाँ हर कोई प्रतियोगी है. फिर सिर्फ नारी की बात क्यूँ की जाये !
          एक औरत अपने जीवन में कितने रूप धारण करती है, बेटी से ले कर दादी तक। उसका हर रूप शक्ति स्वरूप ही है। बस कमी है तो अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की। ना जाने क्यूँ वह कस्तूरी मृग की तरह इधर -उधर भागती -भटकती रहती है। जबकि  खुशबु रूपी ताकत तो स्वयम उसमे ही समाहित है। सदियाँ गवाह है जब भी नारी ने प्रतिरोध किया है तो उसे न्याय अवश्य ही मिला है। 
      सबसे पहले तो मुझे " महिला-दिवस " मनाने  पर ही आपत्ति है. क्यूँ बताया जाये के नारी कमजोर है  और उसके लिए कुछ किया जाये। कुछ विद्वान जन का मत होता है  , एक महिला जो विभिन्न रूप में होती है उसका आभार प्रकट करने के लिए ही यह दिन मनाया जाता है।  ऐसी मानसिकता पर मुझे हंसी आती है . एक दिन आभार और बाकी साल क्या ....? फिर तो यह शहरी   क्षेत्रों तक ही सीमित हो कर ही रहता है।  मैं स्वयं ग्रामीण क्षेत्र से हूँ। एक अपने परिवेश की महिला से कह बैठी , " आज तो महिला दिवस है ...!" वो हंस पड़ी और बोली , " अच्छा बाकी दिन हमारे नहीं होते क्या...? " यह भी सोचने वाली बात है के बाकी दिन नारी, नारी ही तो है ...!
         हमारे आस -पास नज़र दौडाएं तो बहुत सारी महिलाये दिख जाएगी ,मैं यहाँ आधुनिकाओं की बात नहीं कर रही हूँ . मैं बात कर रही हूँ ग्रामीण क्षेत्रीय या मजदूर -वर्ग की महिलाओं की , जो रोज़ ना जाने कितनी चिंताए ले कर सोती है और सुबह उठते ही कल की चिंता भूल कर आने वाले कल की चिंता में जुट जाती है। वह  आज में तो जीती ही नहीं। जिस दिन वह अपने , आज की चिंता करेगी वही दिन उसके लिए होगा।  उसके लिए उसका देश , उसका घर और उसके देश का प्रधानमंत्री उसका पति ही होता है।  और विपक्ष उसके ससुराल वाले ही बस ! अब ऐसे महिला के लिए क्या चिंता की जाये जब उसे ही पता नहीं उसके लिए क्या सही है या गलत।  उसे अपने बुनियादी हकों के बारे में भी पता नहीं है बस फ़र्ज़ के नाम पर घिसी -पिटी   मान्यताएं ही निभाए जा रही है। यहाँ  तो हम बात कर सकते हैं कि ये  महिलाएं अशिक्षित है और उन्हें अपने बुनियादी हको के बारे में कोई भी जानकारी ही नहीं है।  बस जानवरों की तरह हांकी ही जा रही है। 
   लेकिन शहर की आधुनिक और उच्च -शिक्षित महिलाओं की बात की जाये तो उनको अपने हक़ के बार में तो पता चल गया है लेकिन अपने फ़र्ज़ ही भूले जा रही है।  वे  विदेशी संस्कृति की ओर  बढती जा रही है।  बढती महत्वकांक्षाएँ और आगे बढ़ने की होड़ में ये अपना स्त्रीत्व और कभी जान तक गवां बैठती है ऐसे बहुत सारे उदहारण है हमारे सामने।  
     मुझे दोनों ही क्षेत्रो की नारियों से शिकायत है।  दोनों को ही  पुरुष रूपी मसीहा का  इंतजार रहता है कि कोई आएगा और उसका उद्धार करेगा।  पंजाबी में एक कहावत का भावार्थ है " जिसने राजा महाराजाओं को और महान संतो को जन्म दिया है उसे बुरा किस लिए कहें !" और यह सच भी है। 
     कहा जाता है नारी जैसा कठोर नहीं और नारी जैसा कोई नरम नहीं है. तो वह किसलिए अपनी शक्ति भूल गई ! पुरुष को वह जन्म देती है तो क्यूँ  नहीं अपने अनुरूप  उसे ढाल देती. किसलिए वह पुरुष कि सत्ता के आगे झुक जाती है। 
         जब तक एक नारी अपनी स्वभावगत ईर्ष्या से मुक्त नहीं होगी . तब तक वह आगे बढ़ ही नहीं सकती . चाहे परिवार हो या कोई कार्य क्षेत्र महिलाये आगे बढती महिलाओं को रोकने में एक महिला ही बाधा डालती है . पुरुष तो सिर्फ मौके का फायदा ही उठाता है। 
औरतें, औरतों की दुश्मन
होती है .
ये शब्द तो पुरुषों के ही है ,बस
कहलवाया गया है औरतों के
मुहं से .......
...
 और कहला कर उनके दिमाग मे
बैठा दिया गया है ....

लेकिन औरतें ,औरतों की दुश्मन

कब हुई है भला ......

जितना वो एक दूसरी को समझ सकती 

है ,उतना और कौन समझता है .......

उसकी उदासी में ,तकलीफ में ,

उसके दुःख में कौन मरहम लगाती है ....



  मैं यहाँ पुरुषों की बात नहीं करुगी कि उन्होंने औरतों पर कितने जुल्म किये और क्यूँ और कैसे. 

बल्कि मैं तो कहूँगी , औरतों  ने सहन ही क्यूँ किये. यह ठीक है , पुरुष और स्त्री कि शारीरिक क्षमता अलग -

अलग है. आत्म बल और बुद्धि बल में किसी भी पुरुष सेए स्त्री कहीं भी कमतर नहीं  फिर उसने क्यूँ एक 

पुरुष को केन्द्रित कर आपस में अपने स्वरूप को मिटाने  को तुली है। 

     मुझे विद्वान  जनों के एक कथन  पर हंसी आती है और हैरानी भी होती है , जब वे कहते है ," समाज में 

ऐसी व्यवस्था हो जिससे स्त्रियों का स्तर सुधरे." समाज सिर्फ पुरुषों से ही तो नहीं बनता .यहाँ भी तो औरतों 

की  भागीदारी होती है।  फिर  वे क्यूँ पुरुषों पर ही छोड़ देती है कि  उनके बारे में फैसला ले। 

      मेरे विचार से शुरुआत हर नारी को अपने ही घर से करनी होगी।  उसे ही अपने घर बेटी को , उसका 

हक़ और फ़र्ज़ दोनों याद दिलाने के साथ -साथ उसे अपने मान -सम्मान कि रक्षा करना भी सिखाये। 

अपने बेटों को नारी जाति का सम्मान करना सिखाये। 

बात जरा सी है और
 समझ नहीं आती ...
जब एक माँ अपनी 
बेटी को दुपट्टा में इज्ज़त 
 सँभालने का तरीका
 समझाती है ,
तो वह अपने बेटे को
राह चलती किसी की
बेटी की इज्ज़त करना
क्यूँ नहीं सिखलाती ....
       कई बार हम देखते ( टीवी में ) और सुनते है ,रात को कोई लड़की  या महिला   पर  जुल्म होने की  बात को।  तो सबसे पहले यही ख्याल आता है और कह भी बैठते हैं कि वह  इतनी देर रात गए वहां क्या लेने गयी थी।  तब मेरे जहन में यही सवाल उठता है , अगर किसी अत्याचारी पुरुष के परिवार की कोई  सदस्य या कोई उनके जानकारी की महिला या लड़की होती  तो क्या वह उसके साथ भी ऐसा ही दुराचार करता ?क्यूँ कि कहीं ना कही पुरुष में एक पाशविक प्रवृत्ति भी होती है जो उसे एक नारी को दमन करने पर उकसाती है। उसे , एक स्त्री जो कि माँ होती है अपने संस्कारों से दमित कर सकती है।  अब ये भी कहा जा सकता है के कोई भी स्त्री क्या अपने बेटे को दुराचारी बनाती है ...!  कोई भी माँ अपने बेटे को गलत शिक्षा तो नहीं देती। फिर यह सब नारी के प्रति बढ़ता अत्याचार क्यूँ हो रहा है. ! क्यूँ कि वह ना अपना सम्मान करती है ना ही और ना ही किसी अन्य स्त्री का मान करना सिखाती है !
      बात वहीँ घूम फिर कर आ जाती है कि जो कस्तूरी रूपी अपनी शक्ति  वह अपने में छुपा कर  एक  तृषित मृग की  भाँती फिरती है, वह और कहीं नहीं है, उसी के अन्दर ही है।  उसे सिर्फ वह ही ढूंढ़ सकती है।  सरकार हो या कोई संस्थाए कोई भी क्या करेगी जब नारी स्वयं ही जागरूक नहीं होगी। उसे आत्म -केन्द्रित होने से बचना चाहिए। अस आवाज़ उठा कर देखना चाहिए। जरूरत है बस एक जज्बे की !
नारी शायद तुम हारने लगी हो
क्या सच में अपने को अबला
ही समझने लगी हो ........
ईश्वर ने तुम्हें  अबला नहीं
सृजना ही बनाया था ,
तुम यह कैसी कुसंस्कारी ,
खरपतवार
का सृजन करने लगी हो ,
जो तुम्हारी ही लगाई ,
फूलों कि क्यारी का
विनाश कर रही है....
तुम क्यूँ अपना ही
स्वरूप अपने ही हाथों से
मिटाने लगी हो ....
नारी जो कभी ना हारी थी , अब  हारने लगी हो , शायद ...!


( चित्र गूगल से साभार )