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Tuesday, May 21, 2013

छोटा राजकुमार और रहस्यमयी तोता ( बाल कहानी )

वीरपुर एक बहुत बड़ा राज्य था। वहां के राजा सुमेर सिंह एक कुशल प्रशाशक थे। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की देखभाल के लिए मंत्रियों की व्यवस्था कर रखी थी। विशाल सेना थी। जिससे उनकी प्रजा को कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े।
जगह -जगह सरायों का निर्माण करवाया हुआ था। जिससे किसी बाहर  से आने वाले यात्री को परेशानी  का सामना न करना पड़े।
उनके राज्य में अपराधों की संख्या ना के बराबर थी , इसका मुख्य कारण था वहां पर कोई बेरोजगार नहीं था।और दूसरा  कारण था वहां की सशक्त न्याय व्यवस्था जिसके चलते अपराधियों को कड़ा  दंड मिलना।
लेकिन कुछ दिनों से राजा और उनके मंत्री बहुत परेशान  थे।
कारण...?
कारण था , राजा के आम बाग़ से , कई दिनों से आम चोरी हो रहे थे।और कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था।राजा ने सभा बुलाई कि  क्या किया जाये...! उसके राज्य में ऐसी किसकी हिम्मत हो गयी जिसको अपनी जान की परवाह ना हो ...
राजा के चार बेटे थे ...
बड़े बेटे वीर सिंह ने कहा , " पिता जी आप चिंता ना करें , आज रात मैं निगरानी रखूँगा बाग़ की , चोर मेरी नज़रों से बच  कर नहीं जायेगा। "
राजा ने अनुमति दे दी।
राज कुमार वीर सिंह ने बाग़ में ऐसी  जगह पर अपनी बैठने की व्यवस्था कर ली जहाँ से उसे हर कोई आने-जाने वाला नज़र आता रहे।
आधी रात हो गयी।
पर ये क्या हुआ ...! अचानक यह कैसी महकी सी हवा चली। और वीर सिंह एक मदहोशी में डूब गया और पता ही नहीं चला उसे कब नींद आ गयी।  सुबह किसी ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे तो आँखे खुली। देखा सामने सभी लोग चिंता के मारे उसे घेरे खड़े है। रानी माँ की आँखों से तो आंसूं थम ही नहीं रहे थे।
और वीर सिंह ...?
वो तो बेहद शर्मिंदा था ,एक राज कुंवर हो कर भी एक चोर का पता नहीं लगा पाया। पर उसका कोई कुसूर भी तो ना था।
पर राजा की परेशानी तो वैसे की वैसी ही रही। इस बार मंझले राजकुमार समीर सिंह ने अपने पिता से वादा किया  के वो चोर को पकड़ेगा ...
पर उसके साथ भी वीर सिंह वाला किस्सा हुआ। इसके बाद तीसरे राजकुमार सुवीर सिंह के साथ भी यही किस्सा हुआ।
अब तो राजा बहुत फिक्रमंद हुआ कि  एक चोर को कोई भी नहीं पकड तो क्या कोई सुराग भी नहीं पा सका है।तभी सबसे छोटा राजकुमार जोरावर सिंह कहता है, " महाराज ,आज की रात मुझे  कोशिश करने दी जाये।" राजा ने समझाया भी कि  वह छोटा है। पर उसने जिद की तो राजा को मानना ही पड़ा।
आखिर राजकुमार छोटा था तो क्या हुआ ...! था तो राजसी खून ही , तो हिम्मत भी बहुत थी और समझ भी...
वह भी वही बैठ गया जहा उसके दूसरे  भाई बैठे थे।
जैसे -जैसे मध्यरात्री का समय आ रहा था , राजकुमार और  भी चौकन्ना  हो गया था कि उसे सोना नहीं है। यह बात भी सही है अगर इन्सान दृढ निश्चय कर ले तो बहुत कुछ संभव है उसके लिए।
तो उसने क्या किया ...? जिससे उसे नींद ना आये ...!
उसने अपनी एक ऊँगली को तलवार की धार पर रगड़ कर जख्मी कर लिया। जिससे पीड़ा के कारण उसे नींद ना आये।
अब समय हो आया मध्य रात्री का ...! एक महकी हुई सी हवा चलने लगी पर छोटे  राजकुमार ने तो हवा के विरुद्द रुख कर रखा था। उसने देखा बहुत सारे तोते उड़ते हुए चले आ रहे है।और सभी आम के पेड़ों पर से एक -एक आम चुरा कर भाग रहे हैं। राज कुमार ने भाग कर बड़ी मुश्किल से एक तोते को पकड लिया।
तोते को एक पिंजरे में बंद करके रख लिया गया। अगली सुबह उसे लेकर राजकुमार , राजदरबार में उपस्थित हुआ। वहां पर एक जमघट सा लगा था के एक तोता चोर कैसे हो सकता है।
अब समस्या थी कि  तोते से क्या और कैसे पूछा जाये ...!
तभी तोता मानवीय आवाज़ में बोल पड़ा , " महराज , मुझे मुक्त कर दिया जाय , मैं बेकुसूर हूँ , दूर काली पहाड़ियों पर एक महा राक्षस है हम उसी के गुलाम है। उसी ने हमें अपने माया जाल में बाँध कर यहाँ भेजा था और हमने चोरी की।"
राजा सुमेर सिंह एक दयालु व्यक्ति था। उसने तोते को मुक्त कर दिया।
लेकिन समस्या तो वहीँ की वहीँ ही रही। अब काली पहाड़ियाँ कहाँ थी , किसे मालूम , खोज के लिए किसे भेजा जाए ...! तभी बड़ा राज़  कुमार आगे हो कर अपने जाने की आज्ञा मांगने लगा। और राजा ने अनुमति भी दे डाली।क्यूँ कि वह राजा था और उसकी प्रजा उसकी संतान थी। इसलिए उसने प्रजा या अपनी सेना में से किसी को भेजने के बजाय अपने पुत्र को ही भेजना उचित समझा।
अगले दिन राजकुमार वीर सिंह घोड़े पर सवार हो कर चल दिया। कई दिन तक चलता रहा, पूछता रहा काली पहाड़ियों का पता । एक दिन उसने पाया कि सडक का रास्ता तो ख़त्म हो गया है और आगे घना  जंगल था। उसमे राह ढूंढता हुआ चल ही रहा था। उसे दूर एक बूढी औरत, जिसने  सर पर बड़ा सा लकड़ियों का गट्ठर लिया हुआ था, नज़र आई।
उसने बेरुखी से उसे पुकारा , "ए बुढ़िया ...! जंगल के पार जाने का रास्ता कौनसा है और तूने किन्ही काली पहाड़ियों के बारे सुना है क्या ...?"
पर यह भी क्या बात हुई ...!अब राजकुमार को क्या ऐसे बोलना चाहिए था ...? एक बाहुबली को एक मजबूर और लाचार  के साथ ऐसी वाणी और भाषा में तो नहीं बोलना चाहिए था।
तभी वह बूढी औरत बोल पड़ी , " पहले बेटा  मेरा ये गट्ठर तो उठा कर मेरी झोंपड़ी तक ले चलो ..."
" मुझे इतना समय नहीं है जो मैं फ़ालतू के काम करूँ ...!", राज़ कुमार उपेक्षा से कहता हुआ घोड़े को आगे की तरफ ले चल पड़ा।
बहुत मुश्किल से जंगली जानवरों से बचता कभी लड़ता आखिरकार वह जंगल से पार पहुँच ही गया। आगे विशाल नदी दिखाई पड़  रही थी। अब एक बार फिर से परेशानी में पड़  गया राज़ कुमार। अब क्या किया जाये , सोच में पड़ गया वह। फिर हिम्मत करके आस -पास नज़र दौड़ाई तो वहां एक लकड़ी का  बड़ा सा  चौकोर पटरा सा था। अपने घोड़े को वही छोड़ कर उस पर सवार हो कर नदी भी पार कर ली। आगे एक खुला मैदान आया। वहां पर उसने क्या देखा ...!
उसने देखा के वहां पर असंख्य पत्थर की मूर्तियाँ थी और वो भी इंसानों जैसी। उसे बहुत हैरानी हो रही थी कि  यहाँ वीराने में ये मूर्तियाँ कौन बनता होगा भला ...!
वह चलता रहा लेकिन तभी ....
"ओ राज़ कुमार ...!  कहाँ जा रहे हो , एक बार मुड़  कर तो देखो ...!" कोई पीछे से पुकार रहा था।
राज़ कुमार ने जैसे ही मुड़ कर देखा और वह पत्थर का बन गया।
उधर वीर पुर में सभी चिंता में डूबे  हुए थे। राजकुमार तो बहुत दिन हो गये ना खबर थी और ना ही वापस आया।इस पर राजकुमार समीर सिंह ने जाने की आज्ञा मांगी , उसका कहना था के वह चोर और अपने बड़े भाई दोनों का पता ले कर आएगा।
वह भी चल पड़ा उसने भी उस बूढी औरत की अवहेलना की और आखिरकार वह भी  पत्थर की मूर्ति में बदल गया। ऐसा ही हाल तीसरे राजकुमार का हुआ।
और अब बारी थी छोटे राजकुमार जोरावर सिंह की। पर इस बार राजा भी सहमत नहीं था और ना ही राजा के सलाहकार ... और रानी माँ का भी बुरा हाल था। वह अपने पुत्रों के वियोग में बार-बार गश खा कर गिरती रहती थी। लेकिन जोरावर सिंह अपनी बात पर अटल रहा और आखिर में उसे अनुमति मिल ही गयी।
जोरावर सिंह भी चल पड़ा। उसको भी  वही घना जंगल दिखा और वही सामने आती हुई  बूढी औरत ...!
लेकिन राजकुमार बहुत विनम्र और दयालु था। वह घोड़े से उतरा और बूढी औरत के पास जाकर बोला," माँ , लाओ ये मुझे दो , कितना बोझ है इसमें आपके कैसे उठेगा यह , मुझे बताओ , लाओ मैं इसे रख आता हूँ।"
बूढी औरत ने उसे  गट्ठर थमा  कर अपनी झोपडी की तरफ ले गई।
वहां उसने राजकुमार को पानी और थोडा गुड खाने को दिया जिससे उसके अन्दर एक शक्ति का सा संचार हुआ लगा। जब राजकुमार ने बूढी औरत से अपने भाइयों और काली पहाड़ी के बारे में पूछा तो ...
अचानक उसने क्या देखा ...!
वो बूढी औरत तो एक सुंदर से देवी में बदल गयी। उसने बताया कि  वह " वन-देवी " है। वह ऐसे ही वेश बदल कर लोगों की परीक्षा लेती  और रक्षा भी करती है। क्यूंकि जोरावर बहुत ही नेक इन्सान था इसलिए देवी ने उसकी सहायता करने का निश्चय किया।
देवी ने उसे उसे एक पतली रस्सी का बड़ा सा गोला दिया और कुछ अनाज के दानो की पोटली दी।
और  कहा, " इस गोले का एक सिरा पकड कर इसे जमीन पर छोड़ देना , यह लुढकता हुआ तुमको जंगल पार ले जायेगा। आगे एक नदी आएगी , उसमे तुम यह पोटली के दाने डालते रहना , जिससे नदी में तुम्हारे लिए राह खुद - ब - खुद ही बनता जायेगा। नदी पार कर लोगे तो तुम्हें आगे एक विशाल मैदान नज़र आएगा। उस मैदान में तुम्हें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ नज़र आएगी ,वे पत्थर की मूर्तियाँ असल में इंसान ही है। काली  पहाड़ी के राक्षस   ने उसके आसपास एक माया जाल फैला रखा है। जो भी उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उसको पीछे से कई सारी आवाजें पुकारने लग जाती है।जो भी मुड़  कर देखता है वही पत्थर हो जाता है। अब तुम यह ख्याल रखना के पीछे मुड़  कर नहीं देखना है। उसके बाद तुम अपने विवेक से काम लेते हुए आगे बढ़ना ..."
राजकुमार को आशीर्वाद दे देवी अंतर्ध्यान  हो गयी।
राजकुमार भी चल पड़ा रस्सी वाले गोले के पीछे-पीछे ...बड़ी सुगमता से जंगल पार कर लिया। अब सामने नदी थी। अपने घोड़े को वहीँ छोड़ कर दानो वाली पोटली से दाने नदी में डालता रहा और नदी भी रास्ता बनाती रही। सामने मैदान और उसमे खड़ी मूर्तियाँ देख वह समझ गया कि अब राक्षस का मायावी क्षेत्र आ गया है।
सामने ही काली पहाड़ी थी।
 राजकुमार आगे बढ़ चला।  उसको भी पुकारा जाने लगा पीछे से । एक बार तो वह ठिठक ही गया जब उसे लगा उसे उसके तीनो भाई पुकार रहें है। पर वह सावधान था ... मन तो भर आया था अपने भाइयों की पुकार पर लेकिन उसने खुद  को दृढ कर लिया था  , उसे मुड़  कर तो देखना ही नहीं है।
अब वह पहाड़ के सामने था। उस पर जाने का रास्ता तो सामने ही था। सोच ही रहा था के ...अचानक धरती में कुछ कंम्पन सा महसूस हुआ और आसमान में गर्जना सी सुनायी दी। सामने से राक्षस चला आ रहा था। राजकुमार को कुछ नहीं सुझा तो वह भाग कर एक पेड़ के पीछे की झाड़ियों में छुप  कर देखने लगा।
राक्षस बहुत विशालकाय था। बड़े- बड़े दांत , नाख़ून  और सर पर सींग और सारे शरीर पर बाल थे। पास से गुज़रा तो भयंकर बदबू  आ रही थी।
उसके जाने के बाद राजकुमार जल्दी से पहाड़ी पर चढने लगा। थोड़ी देर में की एक महल के सामने था। बाहर का दरवाज़ा खुला था। वहां  दरवाज़े पर कोई भी नहीं था और राक्षस को जरूरत भी क्या थी।उसने  अपनी माया ही ऐसी फैला रखी थी कोई उसके महल तक जा ही नहीं सकता था।
अंदर जा कर उसने देखा , बहुत सुन्दर दृश्य था वहां पर बहुत सारे  कक्ष थे हर कक्ष  की सज्जा दर्शनीय थी।लेकिन एक कक्ष के पास से गुज़रा तो उसे धीरे - धीरे रोने की आवाज़ सुनाई दी तो वह रुक गया और जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी उस कक्ष की तरफ बढ़ चला। एक बार तो उसने सोचा कहीं ये भी कोई राक्षस की माया ना हो।फिर भी वह हिम्मत करके भीतर की ओर बढ़ा।
देखा एक सुंदर सी लड़की रोये जा रही थी।उसे देख कर घबरा कर खड़ी हो गयी। राजकुमार ने उसे डरने को मन करते हुए अपनी सारी कहानी  बताई।
लड़की ने बताया ,वह सुंदर नगर की राजकुमारी फूलमती  है। राक्षस ने उसके पिता से कोई शर्त लगाई थी और राजा शर्त हार गए तो उसके बदले राक्षस उसे उठा लाया। राजकुमार से हैरान हो कर वह बोली ," तुम यहाँ क्या करने आये हो राक्षस आते ही तुमको खा जायेगा।"
पर राजकुमार तो राक्षस को मार कर उसका आतंक खत्म करने आया था। वह फूलमती से महल और राक्षस का राज़  पूछने लगा।
राजकुमारी भी क्या बताती। वह तो जब आयी थी सिवाय रोने के अलावा कुछ भी नहीं किया था।उसने राजकुमारी के साथ महल में घूमना शुरू कर दिया।उन्होंने देखा सभी कक्ष खुले हैं। एक कक्ष पर छोटे -छोटे सात ताले एक क़तर में क्रमवार लगे थे, देख कर दोनों हैरान से हुए। फिर दोनों ने एक योजना बनाई।
कुछ देर बाद जब राक्षस आया तो चकित रह गया ...! राजकुमारी रो नहीं रही थी बल्कि बाहर खड़ी थी।राक्षस के पूछने पर उसने बताया कि  जब उसे वहीँ रहना है तो वह मन लगाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद वह धीरे - धीरे राक्षस से   घुलने मिलने भी लगी। एक दिन बातों ही बातों  में वह पूछ बैठी राक्षस से , " तुम कितने वीर हो और बहुत मायावी भी तो तुम्हें तो कोई मार ही नहीं सकता।"
राक्षस शरीर से बलशाली पर बुद्धि से जड़ ...!बोल पड़ा , " हाँ मुझे कोई मार नहीं सकता क्यूंकि मेरी जान तो एक तोते में बसी है ,उस तोते को मैंने मेरे बाग़ में छुपा कर रखा है। इस महल में एक कक्ष है उस  पर मैंने सात ताले लगा रखे हैं। उसमे भी सात कमरे है उसके बाद एक बाग़ है उसमे एक आम के पेड़ पर एक पिंजरे में तोता है अगर उसे कोई मार दे तो ही मैं मर सकता हूँ ...! लेकिन चाबी सदैव मेरे पास ही रहती है।"
राजकुमार छुप कर सारी  बात सुन रहा था।
अब सिर्फ चाभी ही हासिल करनी थी राजकुमार ने , मंजिल तो उसके सामने ही थी। और यह भी संयोग ही था के महीनो ना नहाने वाला राक्षस उस दिन नहाने चला गया। उसके जाते ही फूलमती ने चाबी उठा कर राजकुमार को दे दी। राक्षस को  राजकुमारी  ने बातों में उलझा लिया। और बातों ही बातों में राक्षस चाबी को भूल ही गया। महल से बाहर  भी  चला गया।
उसके जाते ही बिना मौका गवांये वे दोनों बंद कक्ष के सामने थे। एक -एक कर के ताले खोलने लगे। सातवे ताले को खोल ही रहे थे के राक्षस महल में आ पहुंचा। राक्षस को थोड़ी दूर जाते ही चाबी की याद आ गयी थी।अब एक तरफ तो राक्षस आगे की और बढ़ रहा था।दूसरी तरफ वे दोनों ताला खोल चुके थे। और भागते हुए आगे जो क्रमवार कमरे बने थे उनके दरवाज़े धकेल कर खोलते हुए आगे भागते हुए जा रहे थे।
राक्षस के क्रोध की पारावार ही नहीं थी। उसके क़दमों से धरती और हुंकार से आकाश भी काँप  रहा था।वो बढ़ा चला जा रहा था।
तब तक वे दोनों बाग़ में पहुँच चुके थे। अब तलाश थी उनको तोते की ...! उस आम के पेड़ की जिस पर तोता था ...!
तभी सामने उनको पिंजरे में तोता दिख गया।
" नहीं ...!" राक्षस जोर से दहाडा।
" उसे हाथ मत लगाना ...!"राक्षस फिर दहाडा ...
लेकिन राजकुमार ने तोते को हाथ में ले लिया था और उसने तोते की एक टांग मरोड़ दी।
राक्षस एक टांग से लंगड़ा हो गया। फिर तोते की दूसरी टांग मरोड़ी और राक्षस नीचे गिर पड़ा लेकिन हाथों के सहारे रेंगता आगे बढ़ गया।
राजकुमार ने तोते का एक पंख मरोड़ दिया तो राक्षस का एक हाथ टूट गया। दूसरा पंख मरोड़ा तो दूसरा हाथ टूट गया।
और आखिर में तोते की गर्दन मरोड़ी तो राक्षस निढाल हो कर गिरा और मर गया।
उसके मरते ही उसका माया जाल भी खत्म हो गया। बाग़ के पेड़ों पर बैठे  सभी तोते उड़ गए उन्मुक्त हो कर आसमान में।
काली पहाड़ी भी अपने असली स्वरूप में आ कर  अपनी सुनहरी आभा से चमक रही थी।
जितने भी लोग मूर्तियों में बदले हुए थे वे सभी  फिर से इन्सान बन गए थे। राजकुमार अपने भाइयों से मिल कर बहुत ही खुश हुआ। जोरावर सिंह ने अपने भाइयों को  राजकुमारी का परिचय दिया और बताया अगर फूलमती  का सहयोग नहीं मिलता तो  राक्षस का मारा जाना संभव नहीं था।
फिर सभी वीर पुर की ओर चल पड़े। वहां पर सभी का बहुत भव्य स्वागत हुआ। राजकुमारी फूलमती के पिता राजा सुंदर सेन को भी बुलाया गया और राज़ कुमारी को उनके साथ विदा कर दिया।
इसके बाद वहां पर कोई भी अपराध नहीं हुआ सभी  सुख -चैन के साथ रहे।

उपासना सियाग







Saturday, May 11, 2013

मेरी माँ , प्यारी माँ , मम्मा ..


माँ की ममता को कौन नहीं जानता और कोई परिभाषित भी नहीं कर पाया है। सभी को माँ प्यारी लगती है और हर माँ को अपना बच्चा प्रिय होता है। मेरी माँ भी हम चारों बहनों को एक सामान प्यार करती है। कोई भी यह नहीं कहती कि माँ को कौनसी बहन ज्यादा प्यारी लगती है, ऐसा लगता है जैसे उसे ही ज्यादा प्यार करती है। लेकिन मुझे लगता है मैंने मेरी माँ को बहुत सताया है क्यूंकि मैं बचपन में बहुत अधिक शरारती थी।
     मेरा जन्म हुआ तो मैं सामान्य बच्चों की तरह नहीं थी। मेरा एक पैर घुटने से भीतर की और मुड़ा  हुआ था।नानी परेशान थी पर माँ ...! वह तो गोद में लिए बस भाव विभोर थी।
नानी रो ही पड़ी थी , " एक तो दूसरी बार लड़की का जन्म ,उस पर पैर भी मुड़ा  हुआ कौन  इससे शादी करेगा कैसे जिन्दगी कटेगी इसकी ...! "
   माँ बोली , " माँ तुम एक बार इसकी आँखे तो देखो कितनी प्यारी है ..., तुम चिंता मत करो ईश्वर सब अच्छा करेगा। "
  मेरी माँ में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी है , तभी तो हम चारों बहनों में भी यही गुण है। किसी भी परिस्थिति में डगमगाते नहीं है हम।
  खैर , मुड़ा हुआ पैर तो ठीक करवाना ही था। पहले सीधा कर के ऐसे ही कपडे से बाँध कर रखा गया। बाद में पैर को सीधा करने के लिए प्लास्टर किया गया जो की तीन महीने रखा गया।( अब तो माँ को भी याद नहीं है कि कौनसा पैर मुड़ा हुआ था।) तब तक मैं सरक कर चलने की कोशिश करने लगी थी।माँ बताया करती है कि मुझे पानी में भीगने का बहुत शौक था। माँ के इधर -उधर होते ही सीधे पानी के पास जा कर बैठ जाती , जिसके फलस्वरूप पानी पलास्टर के अंदर  चला जाता। अब उसके अंदर से तो पोंछा नहीं जा  सकता था। पानी की अंदर ही अन्दर बदबू होने लगी। रात की माँ के साथ ही सोती थी और सर्दियों में , रजाई में भयंकर बदबू असहनीय थी। लेकिन माँ ने वह भी ख़ुशी -ख़ुशी झेल लिया। माँ की ममता का कोई मोल नहीं चुका सकता है लेकिन मेरी माँ ने तो जो बदबू सहन की उसका मोल मैं कैसे उतारूँ , मेरे पास कोई जवाब नहीं है। मैंने अनजाने में ही बहुत तकलीफ दी है माँ को ...!
    जब बहुत छोटी थी तभी से मुझे भीड़ से बहुत डर  लगता था। माँ जब भी बस से सफर करती तो मैं भीड़ से डर  के माँ के  बाल अपनी दोनों मुट्ठियों में जकड़ लेती थी और घर आने तक नहीं छोडती थी। अब सोचती हूँ माँ को कितनी पीड़ा होती होगी। इस दर्द का कोई मोल है क्या ...?
  मेरी सारी शरारतें - बदमाशियां माँ हंस कर माफ़ कर देती। जबकि मैं अपनी छोटी बहन पूजा को बहुत सताया करती थी। खास तोर से चौपड़ के खेल मे तो जरुर ही पूजा रो कर -हार ही खड़ी होती थी।
  पढाई में हमेशा से अच्छी रहीं है हम चारों बहने , मुझे याद है जब मैं आठवी कक्षा में प्रथम आयी थी तो माँ ने गले लगा कर कितना प्यार किया था। और नवीं कक्षा में विज्ञानं मेले के दौरान मेरा माडल जिला स्तर पर प्रथम आया था और पापा ने जाने नहीं दिया था आगे की प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए  ,तो माँ ने समझाया था कि  मैं ना सही मेरा मोडल तो वहां गया ही है ना , नाम तो तुम्हारा ही होगा। माँ कभी उदास या रोने तो कभी देती ही नहीं है ।
जब हॉस्टल गयी तो माँ रो पड़ी थी कि अब घर ही सुना हो जायेगा क्यूंकि मैं ही थी जो कि घर में बहुत बोलती थी या सारा दिन रेडिओ सुना करती थी।  और नहीं तो बहनों से शरारतें ही करती रहती थी। जब घर आती तो छोटी बहन शिकायत करती थी कि जब से मैं हॉस्टल गयी हूँ तब से माँ कोई भी खाने की वह चीज़ ही नहीं बनाती थी जो मुझे पसंद थीऔर बनती भी तो वह खाती नहीं थी । माँ झट से कह देती कि यह तो मुझे बहुत पसंद है , माँ के तो गले से ही नहीं उतरेगी बल्कि बनाते हुए भी जी दुखेगा। अब मुझे खाने का भी बहुत शौक था तो अधिकतर चीज़ें मुझे पसंद ही होती थी। मुझे कोई ज्यादा महसूस नहीं होता था सिवाय इसके की यह माँ का प्यार है।
 जब बच्चे का भविष्य बनाना हो तो माँ थोड़ी सी सख्त भी हो जाती है। मेरा मन भी हॉस्टल में नहीं लगा , एक महीने तक रोती  ही रही कि मुझे घर ही जाना है यहाँ नहीं रहना। पापा को भी कई बार बुलवा लिया कि मुझे वहां से ले जाओ लेकिन माँ ने सख्त ताकीद की कि यदि वह घर आने की जिद करे तो बाप-बेटी को घर में आने की इजाज़त नहीं है। पापा ने भी मज़ाक किया कि मैं तो हॉस्टल में रह लूंगी लेकिन वे कहाँ जायेंगे इसलिए वो मुझे घर नहीं ले जा सकते।
   लेकिन अब जब मैं खुद माँ हूँ और मेरे दोनों बेटे हॉस्टल में हैं तो मैं माँ होने का दर्द समझ सकती हूँ। माँ का दर्द माँ बनने के बाद ही जाना जा सकता है। लेकिन फिर भी माँ क़र्ज़ तो कोई भी नहीं उतार पाया है। माँ बन जाने के बाद भी।
मैं चाहती हूँ कि माँ हमेशा स्वस्थ रहे और उनका आशीर्वाद और साया हमेशा हमारे साथ रहे।



Thursday, May 2, 2013

नसीब ..

   कॉलेज में छुट्टी की घंटी बजते ही अलका की नज़र घड़ी पर पड़ी। उसने भी अपने कागज़ फ़ाइल में समेट , अपना मेज़ व्यवस्थित कर कुर्सी से उठने को ही थी कि जानकी बाई अंदर आ कर बोली , " प्रिंसिपल मेडम जी , कोई महिला आपसे मिलने आयी है।"
" नहीं जानकी बाई , अब मैं किसी से नहीं मिलूंगी , बहुत थक गयी हूँ ...उनसे बोलो कल आकर मिल लेगी।"
" मैंने कहा था कि अब मेडम जी की छुट्टी का समय हो गया है , लेकिन वो मानी नहीं कहा रही है के जरुरी काम है।" जानकी बाई ने कहा।
" अच्छा ठीक है , भेज दो उसको और तुम जरा यहीं ठहरना ....," अलका ने कहा।
    अलका  भोपाल के गर्ल्स कॉलेज में बहुत सालों से प्रिंसिपल है। व्यवसायी पति का राजनेताओं में अच्छा रसूख है। जब भी उसका  तबादला  हुआ तो रद्द करवा दिया गया। ऐसे में वह घर और नौकरी दोनों में अच्छा तालमेल बैठा पायी।नौकरी की जरूरत तो नहीं थी उसे लेकिन यह उनकी सास की आखिरी इच्छा थी कि  वह शिक्षिका बने और मजबूर और जरूरत मंद  महिलाओं की मदद कर सके।
       उसकी सास का मानना था कि अगर महिलाये अपनी आपसी इर्ष्या भूल कर किसी मजबूर महिला की मदद करे तो महिलाओं पर जुल्म जरुर खत्म हो जायेगा। वे कहती थी अगर कोई महिला सक्षम है तो उसे कमजोर महिला के उत्थान के लिए जरुर कुछ करना चाहिए।
      जब वे बोलती थी तो अलका उनका मुख मंडल पर तेज़ देख दंग  रह जाती थी। एक महिला जिसे मात्र  अक्षर ज्ञान ही था और इतना ज्ञान !
       पढाई पूरी  हुए बिन ही अलका की शादी कर दी गयी तो उसकी सास ने आगे की पढाई करवाई। दमे की समस्या से ग्रसित उसकी सास ज्यादा दिन जी नहीं पाई।  मरने से पहले अलका से वचन जरुर लिया कि वह शिक्षिका बन कर मजबूर औरतों का सहारा जरुर बनेगी। अलका ने अपना वादा निभाया भी।अपने कार्यकाल में बहुत सी लड़कियों और औरतों का सहारा भी बनी।अब रिटायर होने में एक साल के करीब रह गया है।कभी सोचती है रिटायर होने के बाद वह क्या करेगी ....!
" राम -राम मेडम जी ...!" आवाज़ से अलका की तन्द्रा  भंग हुई।
सामने उसकी ही हम उम्र लेकिन बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थी। बदन पर साधारण - सूती सी साड़ी थी। चेहरे पर मुस्कान और भी सुन्दर बना रही थी उसे।
" राम -राम मेडम जी , मैं रामबती हूँ। मैं यहाँ भोपाल में ही रहती हूँ। आपसे कुछ बात करनी थी इसलिए चली आयी।  मुझे पता है यह छुट्टी का समय है पर मैं क्या करती मुझे अभी ही समय मिल पाया।" रामबती की आवाज़ में थोडा संकोच तो था पर चेहरे पर आत्मविश्वास भी था।
" कोई बात नहीं रामबती , तुम सामने बैठो ...!" कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए अलका ने उसे बैठने का इशारा किया।
" अच्छा बताओ क्या काम है और तुम क्या करती हो ...?" अलका ने उसकी और देखते हुए कहा।
रामबती ने अलका की और गहरी नज़र से देखते हुए कहा , " मेडम जी  , मैं वैश्या हूँ ...! आप मेरे बारे में जो चाहे सोच सकते हो और यह भी  के मैं एक गिरी हुयी औरत हूँ।"
" हां गिरी हुई  तो हो तुम ...!" अलका ने होठ भींच कर कुछ आहत स्वर में रामबती को देखते हुए कहा।
" लेकिन तुम खुद  गिरी हो या गिराया गया है यह तो तुम बताओ। तुमने यही घिनोना पेशा  क्यूँ अपनाया।काम तो बहुत सारे है जहान में।अब मुझसे क्या काम आ पड़ा तुम्हें। " थोडा सा खीझ गयी अलका।
एक तो थकान  और  दूसरे भूख भी लग आयी थी उसे। उसने जानकी बाई को दो कप चाय और बिस्किट लाने को कहा।
" पहले मेडम जी मेरे बारे में सुन तो लो ...! साधारण परिवार में मेरा जन्म हुआ।पिता चपरासी थे।माँ-बाबा की लाडली थी। मेरी माँ तो रामी ही कहा करती थी मुझे। हम तीन बहने दो भाई ,परिवार भी बड़ा था।फिर भी पिता जी ने हमको स्कूल भेजा।"
       "मेरी ख़ूबसूरती ही मेरे जीवन का बहुत बड़ा अभिशाप बन गयी। आठवीं कक्षा तक तो ठीक रहा लेकिन उसके बाद ,मेडम जी.… !  गरीब की बेटी जवान भी जल्दी हो जाती है और उस पर सुन्दरता तो ' कोढ़ में खाज ' का काम करती है।  मेरे साथ भी यही हुआ।" थोडा सांस लेते हुए बोली रामबती।
  इतने में चाय भी आ गयी।  अलका ने कप और बिस्किट उसकी और बढ़ाते हुए कहा , " अच्छा फिर ...!"
    " अब सुन्दर थी और गरीब की बेटी भी जो भी नज़र डालता गन्दी ही डालता।स्कूल जाती तो चार लड़के साथ चलते , आती तो चार साथ होते। कोई सीटी मारता कोई पास से गन्दी बात करता या कोई अश्लील गीत सुनाता निकल जाता। मैं भी क्या करती। घर में शिकायत की तो बाबा ने स्कूल छुडवा दिया।"
    " कोई साल - छह महीने बाद शादी भी कर दी। अब चपरासी पिता अपना दामाद चपरासी के कम क्या ढूंढता सो मेरा पति भी एक बहुत बड़े ऑफिस में चपरासी था। मेरे माँ-बाबा तो मेरे बोझ से मुक्त हो गए कि  उन्होंने लड़की को ससुराल भेज दिया अब चाहे कैसे भी रखे अगले ,ये बेटी की किस्मत ...! मैं तो हर बात से नासमझ थी। पति का प्यार -सुख क्या होता है नहीं जानती थी।बस इतना जानती थी कि पति अपनी पत्नी का बहुत ख्याल रखता है जैसे मेरे बाबा मेरी माँ का रखते थे।कभी जोर से बोले हुए तो सुना ही नहीं। पर यहाँ तो मेरा पति जो मुझसे 10 साल तो बड़ा होगा ही , पहली रात को ही मेरे चेहरे को दोनों हाथों में भर कर बोला ...!" बोलते -बोलते रामबती थोडा रुक गयी। चेहरे से लग रहा था जैसे कई कडवे घूंट पी रही हो।
   चेहरे के भाव सयंत कर बोली , " मेडम जी , कितने साल हो गए शादी को मेरी उम्र क्या है मुझे नहीं याद !लेकिन मेरे पति ने जो शब्द मुझे कहे वह मेरे सीने में वे आज भी ताज़ा घाव की तरह टीस मारते हैं।वो बोला ,' तू तो बहुत सुन्दर है री ...! बता तेरे कितने लोगों से सम्बन्ध रहे हैं। ' मुझे क्या मालूम ये सम्बन्ध क्या चीज़ होती है भला ...! मैं बोली नहीं चुप रही।"  
    " सुन्दर पति का दिल इतना घिनोना भी होगा मुझे बाद में मालूम हुआ। पति ने नहीं कद्र की  तो बाकी घर वालों नज़र में भी मेरी  कोई इज्ज़त नहीं थी। कभी रो ली। कभी पिट ली। यही जिन्दगी थी मेरी। माँ को कहा तो मेरा नसीब बता कर चुप करवा दिया। शादी के बाद जब पहला करवा चौथ आया तो सब तैयारी कर रहे थे। मैंने साफ़ मनाही कर दी के मुझे यह व्रत नहीं करना।  मुझे अपने आप और उपर वाले से झूठ बोलना पसंद नहीं आया। "
  " सास ने बहुत भला - बुरा कहा , गालियां भी दी मेरे खानदान को भी कोसा। लेकिन मैंने भी अम्मा को साफ़ कह दिया के मैं उसके बेटे जैसा पति अगले जन्म तो क्या इस जन्म में भी नहीं चाहूंगी। मेरी मजबूरी है जो  मैं यहाँ रह रही हूँ।यह मेरी पहली बगावत थी। "
   " शक्की , शराबी और भी बहुत सारे अवगुणों की खान मेरा पति राम किशन और मैं रामबती ....!ज़िन्दगी यूँ ही कट रही थी। "
   " मेडम जी ...! मुझे तो सोच कर ही  हंसी आती कि उसके नाम में भगवान राम और किशन दोनों और दोनों ही उसके मन में नहीं ...! लेकिन नाम से क्या भगवान् बन जाता है क्या ...?"
    ऐसे में सलीम मेरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका बन कर आया। सलीम मेरे पडोसी का लड़का था और मेरा हम उम्र था। सुना था आवारा था पर मुझे उसकी बातें बहुत सुकून पहुंचाती थी। पहले सहानुभूति फिर प्यार दोनों से मैं बहक गयी और क्यूँ न बहकती आखिर मैं भी इन्सान थी।
    उसके इश्क में एक दिन घर छोड़ दिया मैंने और कोठे पर बेच दी गयी। एक नरक से निकली दूसरे नरक में पहुँच गयी। यहाँ तो वही बात हुई  न मेडम जी , आसमान से गिरे और खजूर में अटके। मैंने  कोशिश भी बहुत की वहां से निकलने की लेकिन नहीं जा पाई और फिर मेरा जीवन रेल की पटरियों जैसे हो गया कितने रेलगाड़ियाँ गुजरी यह पटरियों को कहाँ मालूम होता है और कौन उनका दर्द समझता है ...!" शायद यही मेरा नसीब था। " कहते - कहते रामबती की आँखे भर आयी।
    अलका जैसे उसका दर्द समझते -महसूस करते कहीं खो गयी और जब उसने नसीब वाली बात कही तो उसे अपने विचार पर थोडा विरोधाभास सा हुआ। हमेशा कर्म को प्रधानता देने वाली अलका आज विचार में पड़ गयी कि  नसीब भी कोई चीज़ होती है शायद ...! क्यूँ की उसे तो हमेशा जिन्दगी ने दिया ही दिया है। जन्म से लेकर अब तक जहाँ पैर रखती गयी जैसे ' रेड- कार्पेट ' खुद ही बिछ गए हों।तो क्या ये अलका का नसीब था तो फिर का कर्म क्या हुआ ...! सोच में उलझने लगी थी वह।
  तभी फॊन टुनटुना उठा।  अलका ने देखा उसकी बहू  थी फोन पर ,कह रही थी  खाने पर इंतजार हो रहा है उसका ।अलका ने देर से आने को कह मना कर दिया कि वह खाना नहीं खाएगी। फिर रामबती से कहने लगी कि वह अब उसके लिए क्या कर सकती है।
"वही तो बता रही हूँ  मेडम जी , आप के सामने मन हल्का करने को जी चाहा तो अपनी कहानी सुनाने बैठ गयी। " रामबती ने बात को आगे बढ़ते हुए कहा।
" मैंने उस नर्क को ही अपना नसीब ही समझ लिया और अपना दीन -ईमान सब भूल बैठी। दुनिया और उपर वाले से जैसे एक बदला लेना हो मुझे , मैंने किसी पर दया रहम नहीं की ,जब तक मेरा रूप-सौन्दर्य था तब तक मैंने और बाद में मैंने और भी लड़कियों को इस काम में घसीटा।
    लेकिन मेडम जी , मुझे मर्द -जात की यह बात कभी भी समझ नहीं आयी , खुद की पत्नियों को तो छुपा -लुका  कर रखते है। किसी की नज़र भी ना पड़े।  शादी के पहले भी पाक -साफ बीबी की चाह  होती है और बाद में भी कोई हाथ लगा ले तो जूठी हो जाती है ...! तो फिर वह हमारे कोठे या और कहीं क्यूँ 'जूठे भांडो' में मुहं मारता  है .... कुत्तों की तरह ...!हुहँ ..छि ...!! " मुहं से गाली निकलते -निकलते रह गयी रामबती के मुहं से।
   " पिछले एक सप्ताह से मैं सो नहीं पायी हूँ।  मुझे लगा एक बार रामबती खुद रामबती के सामने ला कर खड़ी कर दी गयी हो। एक लड़की जिसे दलाल मेरे सामने लाया। शायद वह भी किसी के प्यार के बहकावे में फांस  कर मेरे पास लाई गयी हो।  डर के मारे काँप रही थी। मुझे पहली बार दया आयी उस पर और उससे पूछा तो उसने बताया कि  वह अनाथ है।  कोई भी नहीं है उसका।  अनाथालय से ही वह बाहरवीं कक्षा में पढाई कर रही थी। सलोनी नाम है उसका।"
   " मैं चाहती हूँ के आप उसके लिए कुछ कीजिये। यही मेरे पाप का प्रायश्चित होगा।" रामबती ने अपनी बात खत्म की।
" रामबती तुम्हारा ख्याल बहुत अच्छा है। मैं सोच कर बताती हूँ कि  मैं उसके लिए क्या कर सकती हूँ। अब तुम जाओ और कल शाम को उसे मेरे यहाँ ले आओ फिर उससे बात करके तय करेंगे कि  वह क्या चाहती है। "      अलका ने भी बात खत्म करते हुए खड़े होने का उपक्रम किया।
रामबती भी चली गयी। अलका कॉलेज से घर  पहुँचने तक विचार मग्न ही रही। मन में कई विचार आ-जा रहे थे।घर पहुँचते ही दोनों बच्चे यानि उसके पोते-पोती उसी का इंतजार कर रहे थे। दोनों को गले लगा कर जैसे उसकी थकन ही मिट गयी हो।
    रात को खाने के मेज़ पर उसने सबके सामने रामबती और सलोनी की बात रखी। अलका के पति निखिल ने कहा कि अगर वह लड़की आगे पढना चाहे तो उसे आगे पढाया जाये। वह  उसका खर्चा उठाने को तैयार है। ऐसा ही कुछ विचार अलका के मन में भी था। बेटे-बहू  की राय थी कि  पहले सलोनी की राय ली जाये। हो सकता वह कोई काम सीखना चाहे।
    अगली सुबह रविवार की थी। सारे सप्ताह की भाग दौड़ से निजात का दिन है रविवार अलका के लिए।हल्की गुलाबी धूप में बैठी अलका कल वाली बात सोच रही थी। उसे रामबती की बातों ने प्रभावित किया था खास तौर पर पुरुषों की जात पर जो सवाल किया।  वह तो उसने भी कई बार अपने आप से किया था और जवाब नहीं मिला कभी।
     हाथ में चश्मा पकडे हलके-हलके हाथ पर थपथपा रही थी। उसे पता ही नहीं चला निखिल कब सामने आ कर बैठ गए । कुर्सी के थपथपाने पर उसकी तन्द्रा  भंग हुई। उसने निखिल से भी यही सवाल दाग दिया ।
    निखिल ने कहा , " पुराने समय से ही औरत को सिर्फ देह ही समझा गया है और पुरुष की निजी सम्पति भी ...! जो सिर्फ भोग के लिए ही थी। तभी तो हम देख सकते है कि राजाओं की कई-कई रानियाँ हुआ करती थी।वे जब युद्ध जीता करते थे तो उनकी रानियों से भी दुष्कर्म करना अपनी जीत की निशानी माना  करते थे।अब भी  पुरुष की यही प्रवृत्ति है।  वह अब भी उसे अपनी संपत्ति मानता है। और दूसरी स्त्रियों को भोग का साधन ...! इसिलिए वह अपने घर की औरतों को दबा -ढक कर रखना चाहता है। लेकिन औरतों की इस स्थिति का जिम्मेवार मैं खुद औरतों को  मानता हूँ ...! क्यूँ वह पुरुष को धुरी मानती है ? क्यूँ नहीं वह अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रचती ? क्यूँ वह खुद को पुरुष की नज़रों में ऊँचा उठाने की हौड़  में अपने ही स्वरूप को नीचा दिखाती है ...! मेरा पति , मेरा बेटा  या कोई भी और रिश्ता क्यूँ ना हो ,  झुकती चली जाती है। फिर पुरुष क्यूँ ना फायदा उठाये , यह तो उसकी प्रवृत्ति है ...!"
   अलका को काफी हद तक उसके बातों में सच्चाई नज़र आ रही थी।कुछ कहती तभी सामने से सलोनी और रामबती आती दिखी।
    सलोनी का सुन्दर मुख कुम्हलाया हुआ और भयभीत था।अलका ने प्यार से सर पर हाथ फिर कर गले से लगा लिया उसे। जैसे कोई सहमी हिरनी जंगल से निकल कर भेड़ियों  रूपी इंसानों में आ गयी हो। सलोनी  आशंकित नज़रों से अलका की तरफ ताक रही थी। अलका ने उसे आश्वस्त किया कि वह अब सुरक्षित है।उससे उसकी पिछली जिन्दगी का पूछा और आगे क्या करना चाहती है। सलोनी की पढने की इच्छा बताने पर निखिल ने अपना खर्च वहन करने का प्रस्ताव रखा।
 इसके लिए रामबती ने मना  कर दिया और कहा , " मैंने पाप -कर्म से बहुत पैसा कमाया है। अब इसे अगर सही दिशा में लगाउंगी तो शायद मेरा यह जीवन सुधर जाये।  अगले जन्म में अच्छा नसीब ले कर पैदा हो जाऊं।सलोनी का नसीब अच्छा है तभी तो आपका साथ मिल गया , यह बहुत बड़ा अहसान है हम पर आपका मेडम जी -साहब जी ...!"
    एक बार अलका फिर से उलझ गयी कर्म और नसीब में।
 उसने रामबती से कहा , " माना कि नसीब में क्या है और क्या नहीं , कोई नहीं जानता है। लेकिन जो मिला है
उसे ही नसीब मान लेना कहाँ की समझदारी है। कठिन पुरुषार्थ से नसीब भी बदले जा सकते है।
'हाथ लगते ही मिट्टी  सोना बन जाये यह नसीब की बात हो सकती है लेकिन जो मिट्टी को अपने पुरुषार्थ से सोने  में बदल दे और अपना खुद ही नसीब बना  ले ' ऐसा भी तो हो सकता है। तुम ऐसा क्यूँ सोचती हो ये नारकीय जीवन ही तुम्हारा नसीब बन कर रह गया है। तुम अब भी यह जीवन छोड़ कर अच्छा और सम्मानीय जीवन बिता सकती हो। तुम अगर चाहो तो मैं बहुत सारी  ऐसी संस्थाओं को जानती हूँ जो तुम्हारे बेहतर जीवन के लिए कुछ कर सकती है। तुम्हारे साथ और कितनी महिलाये है ? "
" मेडम जी , क्या सच में ऐसा हो सकता है ? मेरे साथ मुझे मिला कर छह औरतें है। सच कहूँ तो बहुत तंग आ चुके है ऐसे जीवन से ...! क्या हमारा भी नसीब बदलेगा ...!" आँखे और गला दोनों भर आये रामबती के।
" यह इंसान पर निर्भर करता है कि  वह अपने लिए कैसी जिन्दगी चुनता है। ईश्वर अगर नसीब देता है तो विवेक भी देता है। इसलिए हर बात नसीब पर टाल  कर उस उपर बैठे ईश्वर को बात -बात पर अपराध बोध में मत डालो। " अलका ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।
रामबती ने भी अपना नसीब बदलने की ठान ली और अलका का शुक्रिया कहते हुए सामजिक संस्थाओ में बात  करने को कह सलोनी को लेकर चल पड़ी।

उपासना सियाग
अबोहर ( पंजाब )