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Wednesday, May 21, 2014

समझोते

  " माँ ! आज आप सुरभि आंटी के पास जरूर जा कर आना !" मानसी ने मुझसे  कहा।
"अब सुरभि क्या करेगी ? पढाई तुमने करनी है। जिसमें रूचि हो वह विषय लो ! " मैं कुछ कहती इससे पहले मानसी  के पापा बोल उठे।
" लेकिन पापा !! मैं थोड़ी कन्फ्यूज़ हूँ। लॉ करुं या प्रशासकीय परीक्षा की तैयारी करूँ ! अगर सुरभि आंटी मेरी सहायता कर देगी तो क्या हर्ज़ है। "
  मानसी सोच रही थी कि बी ए के बाद क्या करे। हम सोच रहे थे कि शादी कर दें। मानसी का और उसके पापा का विचार था कि उसे अपने पैरों पर खड़ा तो होना ही चाहिए। अगर कभी कोई मुसीबत हो तो उसके पास अपनी डिग्री तो होगी किसी की मुहताज तो नहीं होगी।
  मेरी सोच उन दोनों से भिन्न ही है।  मुझे लगता है कि लड़की जितना पढ़ेगी उतनी ही वह आत्म निर्भर तो होगी ही लेकिन स्वाभिमानी भी हो जाएगी। कभी -कभी यह स्वाभिमान , अभिमान भी बन जाता है जो गृहस्थी के लिए हानिकारक है। क्यूंकि आज भी समाज की सोच नहीं बदली है। यहाँ आज भी औरत से ही समझोते की आशा रखी जाती है।
 जैसे की आज की शिक्षा है और परवरिश है लड़कियां बंधन में नहीं रह पाती। हम लड़कियों को खुला आसमान तो देते है लेकिन बहुओं के पर काट देते हैं। इसलिए जो समझौते कर लेती है वह तो गृहस्थी निभा लेती है। जो अपनी शर्तों पर जीती है वे अकेली रह जाती है।
  मानसी को भी हमने बहुत लाड़ -प्यार से पाला है। हर संभव ज़िद पूरी की है। कभी सोचती हूँ कि अगर यह शादी के बाद एडजस्ट नहीं कर पाई तो .... !
  यह ' तो ' ही मुझे सोच में डाल  देता है। सोचती हूँ कि जल्दी शादी होगी तो जल्दी घुल मिल जाएगी। इसलिए मैं आज सुरभि के पास जाने को तैयार हुई। सोचा कि इस बहाने से  इसकी शादी का भी पूछ लूंगी।
  सुरभि से बात हुई तो उसने कहा की मैं दो बजे उसके पास आऊं , क्यूंकि तब वह लंच के लिए फ्री भी हो जाएगी। लंच के साथ ही बात भी हो जाएगी।
   सुरभि मेरी सहेली है जो कि ज्योतिषी भी है। मैं अक्सर उससे राय लेती रहती हूँ। वह अक्सर कहती है कि इंसान जब तक खुद मुख्तयार होता है तब तक वह किसी भगवान या ज्योतिष को नहीं मानता ,कोई धर्म-स्थल पर नहीं जाता। उसके  विचार से हर जगह भगवान है। फिर किसी भी खास जगह क्यों जाया जाये। उसके विचार से एक हारा हुआ इंसान ही ज्योतिष के पास जाता है।
       अब मुझे किसी से क्या लेना  !  मैं तो सभी सलाह उससे ही लिया करती हूँ।
    लगभग दो बजे के आस-पास मैं उसके ऑफिस पहुँच गई। एक महिला ही बैठी थी। मेरे जाने के कुछ देर बाद वह अंदर चली गई। मुझे अभी कुछ देर और इंतज़ार करना था।
   अंदर की बात-चीत मुझे सुनाई दे रही थी।
    वह महिला रुंधे गले से बोल रही थी ," सुरभि जी !! मुझे सिर्फ इतना बता दीजिये कि इसकी उम्र कितनी है  ताकि मैं अपनी बेटी के नाम जमीन-जायदाद लगा सकूँ। मेरे कोई बेटा  तो है नहीं यही बिटिया ही है। कल को इसे कुछ हो जायेगा तो हम,माँ -बेटी को तो शरीक़ घर से भी बाहर निकाल  देंगे ! मुझे यह घर खर्च के लिए भी रूपये नहीं देता है।"
    " यह दूसरी औरत के पास जाता है। मैंने यह सोच कर मन को समझा लिया  कि अगर इतनी बड़ी बीमारी से यह मर जाता तो मैं सब्र करती ही ना ! अब यह मेरी  नज़रों  के सामने तो है। मैं भी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूँ , नहीं तो अपने पैरों पर खड़ी हो कर बेटी की जिम्मेदारी उठा लेती। "
   " देखिये सुनीता जी !! ज्योतिष में यह कभी भी बताने की इज़ाज़त नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति की मृत्यु की भविष्यवाणी करे। हाँ ! आपके पति के स्वास्थ्य में उतार -चढ़ाव बना रहेगा। कैंसर से ठीक हुए हैं। कीमो-थेरेपी, दवाओं के कुछ तो साइड -इफेक्ट तो होंगे ही। उनके स्वास्थ्य में सुधार  के लिए कुछ उपाय बताये  देती हूँ।"
   "आपकी बेटी का भविष्य उज्जवल है। उसे पढ़ाइए और अपने पैरों पर खड़ा कीजिये ताकि जीवन की उलझनों का  सामना आसानी से कर सके।  " सुरभि की आवाज़ पहले तो तेज़ थी पर बात ख़त्म करते-करते समझाने  के अंदाज़ में खत्म हुई।
 " और हाँ !! ये जो दूसरी औरत का चक्कर है ! इसके बारे में मैं जरूर बता देती हूँ कि यह सिलसिला अधिक देर तक नहीं चलेगा। क्यूंकि इन रिश्तों की कोई बुनियाद नहीं होती है। " सुरभि ने उसे जैसे ढाढ़स बंधाया हो।
   मैं सोच में पड़ गई कि कोई भी स्त्री और वह भी एक भारतीय स्त्री अपने पति के लिए ऐसे कैसे सोच सकती है। उसके लम्बे जीवन की कामना करने के लिए कितने व्रत , पूजा-पाठ करती है। मृत्यु के बारे में  बात तो क्या सोच भी नहीं सकती।
    उस महिला के जाने के बाद सुरभि के साथ मैं उसके घर की तरफ चल दी जो कि उसके ऑफिस के ऊपर ही बना है।खाना खाते हुए मैंने सुरभि से उस महिला के बारे में पूछा।
    उसने जो बताया वह सुन कर मेरा मन करुणा से भर आया।
    सुरभि ने बताया कि वह सुनीता को पिछले चार सालों  से जानती है।  जब सुनीता के पति मंजीत को कैंसर हुआ तो वह दवा के साथ -साथ मेरे पास दुआ का भी इंतज़ाम करने आई थी। बीमारी पहली स्टेज पर थी तो इलाज़ सम्भव था। साथ ही उसके ग्रह  भी मज़बूत थे जो की बीमारी से लड़ने में सक्षम थे।
    सुनीता ने पति की बहुत सेवा की। दिन-रात ,जाग -जाग कर। दो साल तक ना नींद ले कर देखी ना खाने -पीने की ही सुध रही। पति तो ठीक हो गया लेकिन सुनीता बीमार हो गई। शरीर के जोड़ों में जकड़न हो गई। अपने पैरों पर चलना भी दूभर हो गया।
    मंजीत की सरकारी नौकरी थी। ठीक हो कर ऑफिस जाने लगा। सुनीता का भी इलाज़ करवाया लेकिन उसका अपनी  सहकर्मी की ओर झुकाव हो गया। अब वह घर में भी देर से आने लगा। घर में होता भी तो बात कम ही करता।  जिसके लिए अपनी परवाह नहीं की वही बेवफाई करेगा, यह सुनीता ने नहीं सोचा था।
    वह एक दिन झगड़ा करते हुए सवाल कर बैठी की अगर वह उसकी इतनी परवाह -सेवा ना करती तो क्या वह ठीक हो पाता ! मंजीत के जवाब को सुन कर सुनीता का रहा सहा हौसला भी जाता रहा। उसने कहा था कि उसने सिर्फ इसलिए सेवा की है कि कहीं वह विधवा ना हो जाये। ये शिंगार , गहने और अच्छे कपड़े ना छीन जाये। सुनीता रो पड़ी थी कि अगर उसको इतना ही सुहागन रहने का मोह था ,वह तो उसके मरने के बाद दूसरा विवाह भी तो कर सकती थी।
   पति-पत्नी का प्रेम कोई मायने नहीं था मंजीत के आगे।
  अब अगर सुनीता अपने और बेटी के भविष्य की चिंता क्यों न करे। भावनाओं के सहारे जीवन तो नहीं कटता।
अगर वह शिक्षित होती तो किसी के आगे झुकने को मज़बूर नहीं होती।
      सुनीता की कहानी जान कर ही मुझे समझ आया कि महिलाएं समझोते सिर्फ इसलिए करती है की वह पूर्ण रूप से शिक्षित नहीं होती है। उनके पास कोई मार्ग ही नहीं होता कि वह कहाँ जाए। घुट-घुट कर दम  तोड़ती रहती है।
   सुरभि ने मेरी बेटी मानसी के लिए कहा कि वह होनहार है और खुद तय करे कि कौनसा क्षेत्र उसके लिए उचित है। वैसे भी जो ग्रह योग होते है इंसान का रुझान उस तरफ खुद-ब -खुद हो जाता है।
    अब मैंने भी सोच लिया कि जब तक बेटी पैरों पर खड़ी हो कर अपनी राह ना चुने। विवाह की बात नहीं करुँगी। सुरभि से विदा लिया और घर चल पड़ी।