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Monday, April 13, 2015

ईश्वर की इच्छा...

         नन्ही  चीनू ने खिड़की से बाहर उड़ती -फुदकती चिड़िया को देखा तो मचल पड़ी।
 " माँ , मुझे भी चिड़िया होना है ! "
" क्यों चिड़िया होना है ? "
" चिड़िया कितनी आज़ादी से घूमती है , अपनी मर्जी से कहीं भी उड़ जाती है ! मैं कहाँ घूम पाती  हूँ ! हर समय तुम मेरे इर्द गिर्द ही रहती हो ! "
  " मैं नहीं चाहती कि तुम चिड़िया बनो और एक दिन बहेलिये के पिंजरे में जा फंसो। ईश्वर ने तुम्हें नारी रूप दे कर भेजा है तो कुछ सोच कर ही भेजा होगा। उसकी इच्छा का सम्मान करो !इतनी मज़बूत बनो कि कोई नारी चिड़िया होने की ना सोचे ! "
       नन्ही चीनू माँ के गले लगी कुछ समझी ,कुछ नहीं समझी। लेकिन माँ की आँखों में एक दृढ निश्चय था। 

Saturday, April 11, 2015

नयी ऊर्जा

         बूढ़ा माली परेशान था। उसने छोटा सा घर बनाया था । घर में एक पेड़ भी लगाया था । उसके जाने बाद पेड़ की कौन देखभाल करेगा। कौन सींचेगा उसकी जड़ें। दिन -रात यही परेशानी थी कि इस पर बसेरा करने वाली चिड़ियाँ कहाँ जाएँगी। आज वह है तो सब है। ना रहेगा तो क्या होगा ?
     चिंता करते - करते सो गया एक दिन उसकी छाँव में।  उसने एक स्वप्न देखा। देखा ,पेड़ की चिड़ियाँ अपनी चोंच में पानी भर -भर के जड़ें सींच रही है। पेड़ हरा भरा है। एक अलौकिक चमक है , एक महक है चहुँ और ! बूढ़ा निश्चिन्त हो मुस्कुरा उठा। आँख खुली तो संध्या का धुंधलका छा रहा था। चिड़ियाँ चहक रही थी। घर लौट आने की ख़ुशी में। बूढ़ा देख कर  खुश हो रहा था एक नयी ऊर्जा महसूस कर रहा था।