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Saturday, December 19, 2020

छोटी लकीर-बड़ी लकीर



  छोटी लकीर-बड़ी लकीर

  दिसम्बर  के छोटे-छोटे दिन। भागते-दौड़ते भी दिन पकड़ से जैसे छूटा जाता है। सुबह पांच बजे से लेकर दोपहर ढ़ाई बजे तक एक टांग पर दौड़ते रहना वेदिका की आदत में शामिल है। अब कुछ समय मिला है तो छत की तरफ चल दी। धूप भी हल्की हो चली है, मगर यही थी , उसके हिस्से की धूप...
            एक कोने में चटाई बिछा कर पैर सीधे कर के बैठ गई। बाल कन्धों पर फैला दिए। सुबह के धोए हुए बाल अब भी गीले ही थे। फिर हाथ बढ़ा कर साथ लाया डिब्बा खोल लिया। उसमें वैसलीन , लोशन और कंघा था , कुछ  मेकअप का सामान और एक छोटा सा आईना भी । यहीं वह कुछ देर सुस्ता कर अपना चेहरा-मोहरा ठीक कर लिया करती है। हाथ पर लोशन लिया ही था कि वह भी आ गई।
           " अच्छा तो मिल गई फुरसत !" वह मुस्कुराते हुए फर्श पर बैठते हुए बोली।
       " हाँ ....,मगर तुम वहां क्यों बैठ गई , यहाँ बैठो ना चटाई पर !
 सच में फुरसत तो बहुत दिन बाद मिली है। घर की रंगाई-पुताई सम्पूर्ण हो गई है। अभी  शादी की तैयारियां भी बहुत पड़ी है।  "
" हम्म ...., एक बात तो है , तुम सास बनने चली हो, फिर भी तुम्हारे बाल कितने सुन्दर है।  हाँ थोड़ी सी चाँदी झलकने लगी है ! "
   " पचास के पार पहुँच गई हूँ , चाँदी तो झलकेगी ही.....," मुस्कुरा पड़ी वेदिका। मुस्कुराते हुए उखड़े हुए फर्श पर, वहीँ पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े से  एक छोटी सी लकीर खींच दी।
       मुस्कुरा तो पड़ी वेदिका, लेकिन  तारीफ के बोल अब उसके मन को नहीं छूते हैं। जिसके मुहँ से सुनना चाहती थी वह तो कभी बोला ही नहीं।
     उसके बाल तो हमेशा से ही अच्छे थे , काले-घने... सहेलियों की ईर्ष्या मिश्रित प्रशंसा से वह भली भांति परिचित थी। सास जब पहली बार देखने आई तो उसके रूप के साथ-साथ बालों की भी प्रशंसा कर के गई थी। लेकिन राघव ने कभी भी तारीफ नहीं की। हां, एक बार ( विवाह के कुछ ही माह बाद ) वह अपने कमरे के बाहर बेसब्री से कुछ-कुछ रोमांटिक मूड लिए , इंतज़ार कर रही थी तो राघव ने अचानक पीछे से आ कर डरा दिया था और बेजारी से कहा कि क्या डायन की तरह बाल बिखरा कर खड़ी हो। उसे बहुत बुरा लगा था। तारीफ/प्यार के बोल ना सही , लेकिन राघव डायन कहेंगे , यह तो नहीं सोचा था।
         उसकी आँखे भर आई थी। वैसे यह राघव का मज़ाक ही था। लेकिन इस मज़ाक की फ़ांस को वेदिका दिल से कभी निकाल ही नहीं पाई। उसके बाद किसी भी तारीफ ने उसके मन को जैसे छूना ही बंद कर हो।
           " क्या सोचने लगी ? ये आंखे क्यों भर आई ! "
  " कुछ नहीं ।" मन में हल्का सा बुदबुदाते हुए , पहले से खींची लकीर के पास ,एक छोटी लकीर खींच दी।
 सोचने लगी कि काश ये जिंदगी भी सर्दियों के दिन सी होती तो .... कितनी जल्दी व्यतीत हो जाती ...., लेकिन ये तो जेठ की दुपहरी सी है काटे नहीं कटती ....
          आँखे मूंदे , गर्दन उठाये हुए , चेहरा ऊपर किये जाती हुयी धूप को जैसे आत्मसात करती हुई , सोच में डूबी थी कि  नीचे रसोई में  खट -पट सी सुनाई दी। साथ ही सास की बड़बड़ाहट। बड़बड़ाहट ने जैसे उसे जमीन पर ला दिया। झट से बाल समेटे , अपना डिब्बा भी समेट लिया।  पास बैठी वह मुस्कुराई , "  हो गई शुरू बुढ़िया की ताना-कशी ! "
          " ना री ! बुजुर्ग है बेचारी , ऐसे मत कहो... " वेदिका ने हंसी रोकते हुए,आँखों ही आँखों में उसे डांटा।
सीढ़ियों की तरफ भागी।
          जा कर देखा , माता जी चाय बना चुकी थी। कप में डाल कर रसोई से बाहर आते हुए वेदिका के हाथ में पड़े डब्बे को देख कर मुहं बनाते हुए ' सजने-संवरने में ही फुरसत नहीं मिलती , बहू आने वाली है फिर भी ...' बड़बड़ाते हुए , मुहं बनाते हुए अपने कमरे में चली गई। वेदिका की आंखे नम हो गई। उनकी बड़बड़ाहट कुछ स्पष्ट सुनाई  दे गई थी। खिला मुख मलिन हो गया। अपने कमरे की अलमारी में डिब्बे को रखते हुए सोचने लगी , " माता जी को मेरे सजने-संवरने पर इतनी तकलीफ क्यों है ? और ऐसा भी क्या सज रही थी मैं !"
      सोचना तो बहुत चाहती थी कि बाहर  गाड़ी रुकने की आवाज़ सुन कर आँखों की नमी को पौंछते हुए बाहर आ गई। बेटा था।  सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। प्यारी सी मुस्कान देख कर मन और आँखों से नमी छंट गई। ममता उमड़ आई कि इसे क्यों अपने मन की उलझनों में डालूं , चार दिन तो आया है। मेरा क्या है , यही नसीब है। सोच कर हंस पड़ी।
      " क्या हुआ माँ ? " यह हंसी क्यों आ रही है।
     माताजी जी फिर बड़बड़ा उठी, " अरे इसका क्या , ये तो बिना कारण ही हंसती है !हंस ले ! जितना हंसना है ! बहू आएगी तब पता चलेगा। "
    दादी की बड़बड़ाहट पोते ने सुन ली  , हंस कर बोल उठा , "  दादी ! बहू आएगी तो हंसी क्यों बंद हो जाएगी  ? माँ के आ जाने पर आपके साथ भी ऐसा हुआ था क्या !"
     दादी कुछ कहती तभी , " क्या हुआ था भई ...., कहते हुए राघव भी आ गए।
   " मुझे लगता है पापा , माँ को डॉक्टर को दिखाना चाहिए ! मैंने भी कई बार नोट किया है ,खुद ही हँसती रहती है , कभी मन ही मन मुस्कुराती है ! "
  " मतलब ! " वेदिका ने हैरान होते हुए पूछा।
" मतलब कि  दिमाग के डॉक्टर को !" राघव की आवाज़ थी। वे हँस भी रहे थे , और आँखों में लापरवाही भी थी।
 " हाँ माँ ! ये कोई पागलपन की बात नहीं है, ये बीमारी होती है , आम लोग समझते ही नहीं है ! " कहता हुआ बेटा उसे रसोई के दरवाज़े तक ले गया।
         वह हैरान रह गई कि सारी उम्र यहाँ खपा दी और आज वह मानसिक रोगी कही जा रही थी। उसे रोना आ गया, लेकिन उसे रोने का समय भी तो कहाँ था।
     फिर वही शाम का काम शुरू हो गया। वेदिका को सोचने का अवसर ही नहीं मिला ना ही कहने को। रात को फुर्सत मिली तो शादी पर चर्चा चल पड़ी थी। बेटे की छुट्टियां तो कुछ दिन में ख़त्म हो जाएगी। फिर तो शादी से कुछ दिन पहले ही आ पायेगा , इसलिए जो भी बात / कार्यक्रम तय करना था , उसकी ज्यादा से ज्यादा बात कर लेना चाहते थे। उसके बाद तो फ़ोन पर ही बात हो सकनी थी।
          बात करती , राय देती, वेदिका को कोई बात जब समझ नहीं आती या दोबारा पूछ लेती तो बेटा खीझ उठता कि माँ को कुछ समझ ही नहीं आता , तभी तो कह रहा था , माँ को डॉक्टर की जरूरत है।
     अब तो गला और आंखे दोनों ही भर आये। अनवरत आँसू चल पड़े।  राघव चिढ़ गए।
    " काम की बातों  में ये तुम्हारे आंसू विघ्न डालते ही हैं ! कोई बात याद मत आने दिया करो ! "
" मैंने क्या कहा !  मारो-पीटो और रोओ भी मत ! " वेदिका बहुत आहत हो उठी। मन में घटायें शाम से ही भरी थी अब बरस गई तो क्या आश्चर्य था।
      " आपसे तो बात करनी ही बेकार है माँ , और, अब भी समय है  आप डॉक्टर को दिखा ही लो ! " बेटा नाराज़ हो कर कमरे से चला गया।
         वेदिका जोर से रो पड़ी, "ये क्या बात हुई भला ! आप भी उसका साथ देने लग गए ! "
" जाने भी दो वेदिका ! क्या हुआ जो कुछ बोल दिया।  कुछ समय बाद इसकी शादी हो जाएगी तो बेचारा ये भी कहाँ मन की कह पायेगा , मेरी तरह चुप ही तो रहा करेगा। "
    " अच्छा जी , आप भी चुप रहते हैं और वह भी चुप ही रहेगा ! कड़वी बेल के फल भी तो कड़वे लगते हैं !"
" अरे जाने दो भई ! रात बहुत हो गई है , सुबह और भी काम है। " राघव सोने चल दिए।
      वेदिका पीठ घुमाए रोती रही। सोच रही थी कि काश ,  बेटी पास होती तो  मन की तो सुनती, यूँ पागल तो ना कहती ।  काश, एक बार मुझे राघव गले लगा कर चुप ही करवा देते तो मन यूँ अशांत ना रहता। राघव को क्या परवाह थी। वे तो बेफिक्र खर्राटे मार रहे थे। कुछ देर में उसकी भी आँख लग गई।
        अगले दिन फिर वही काम में व्यस्तता रही। कहने को सहायक है मदद के लिए , फिर भी उसके काम तो उसे ही करने होते हैं। वेदिका को काम में व्यस्त देख कर वह भी लौट गई। लेकिन जैसे ही धूप सेवन करने को वेदिका छत पर गई। पीछे -पीछे वह भी आ गई। वेदिका ने चोटी खोल कर बाल फैला लिए। चटाई पर ही लेट कर आँख मूँद ली कि दो बून्द आँखों के किनारों से बह निकले।
             अरे , क्या हुआ ...ये आंसू क्यों ? पास बैठे हुए उसने देखा तो जैसे आंसू अपनी उँगलियों पर ले लिए। वेदिका ने करवट ले कोहनियों पर सर टिकाते हुए , उदासी भरे स्वर में बोली , " हम जिंदगी में सब को खुश नहीं रख सकते ..... , अब मैं हार गई हूँ। कितने बरस हो गए इस घर में  आये हुए।  सिर्फ दो कदम भर जमीन ही मेरी है। पीछे जा नहीं सकती और आगे बढूं तो कितने कांटे है। कोशिश भी की  कभी तो कदम रखने को इजाजत नहीं मिली ..." कह कर सीधे लेट गई। आंसू फिर बह चले।
       " माँ ! आप यहाँ लेटी हो ! मैं सारे घर में ढूंढ आया ! "
      " क्या हुआ ? आप रोये हो क्या ! हैं ! "
" नहीं मैं क्यों रोउंगी ! मैं तो मानसिक रोगी हूँ न ! कुछ भी कर सकती हूँ ...., गला भर्रा गया वेदिका का।
" लो माँ , ये भी क्या बात हुयी , मैंने क्या गलत कहा , कई बार इंसान को खुद मालूम नहीं पड़ता ! "
" अच्छा ! अब मैं ऐसा क्या करती हूँ जो मानसिक रोगी नज़र आती हूँ। " नाराज़ हो गई वेदिका।
" अरे माँ...... जाने दो ना , मुझे भूख लगी है , चलो कुछ बना कर दो। "
" अच्छा क्या खायेगा ..., " भर्राये गले  से भी ममता फूट रही थी।
   बेटे को उसका मनचाहा बना कर दिया। फिर शाम को वही काम -धंधा। उदासी और ख़ुशी में डूबती वेदिका का एक दिन और बीत गया।
       दो दिन बाद बेटा भी चला गया।  बेटा जा रहा था, सो मन तो भारी ही था उस पर माता जी का व्यवहार। वह सोचती रहती कि उससे ना जाने क्या गलती हुई है। हद तो तब थी कि उसे ,माँ नौकरों से भी कम तरजीह देती थी। उस दिन भी यही हुआ। वह रसोई में बेटे के लिए प्याज़ के परांठे बनाने के लिए प्याज़ काट रही थी और बहादुर आटा सान रहा था। मां पूजा की डलिया ले कर रसोई से बाहर ही बहादुर को आवाज़ लगाती हुयी चली गई कि वह मंदिर जा रही है। एक तो प्याज़ की जलन और ऊपर से गले तक छलके हुए आंसू ढ़लक पड़े। जोर से रोना चाहती थी पर ऐसा नहीं कर पाई क्यूंकि रोने की ये कोई बड़ी वजह नहीं थी। फिर भी आंसू रुक नहीं सके। प्याज़ के बहाने से ही सही कुछ छलका हुआ गला तो नीचे बैठा।
    " माँ ! आप रो रहे हो क्या ? "
  " नहीं बेटा , ये तो प्याज़ छील रही हूँ तो कड़वे बहुत है ! " आँखे पोंछती हुयी अपने कमरे के वाश रूम की तरफ गई तो पतिदेव ने कंधे पकड़ कर रोक लिया कि ये प्याज़ के आंसू तो नहीं है। ये तो ....
    " ये तो क्या है फिर ! आप मेरे आंसू कब से समझने लगे .... " कंधे छुड़ा कर जल्दी से वॉशरूम में मुहं धोकर थोड़ा संयत होने की कोशिश की। आँखे फिर भी लाल थी। ऐसे तो वेदिका ने प्याज़ के बहाने ना जाने कितनी ही बार मन को हल्का किया है।
        रसोई में गई तो वह सामने खड़ी थी। होले  से मुस्कुरा कर बोली , " बेटा जा रहा है इसलिए मन भारी है ना ? " 
  " हाँ , सच में ......" कह कर वेदिका ने चाकू से स्लैब पर एक लकीर खींच दी , और फिर उस लकीर के पास , उस लकीर के पास एक छोटी लकीर खींच दी। ऐसा वह तब तक करती गई , जब तक आखिर में एक लकीर की जगह बिंदु बच गया।
          दोपहर तक बेटा भी चला गया। घर एक बार खामोश सा हो गया। उसका मन नहीं किया कि छत पर जाये। अपने कमरे में जा कर रजाई ओढ़ कर सोने का सोचा। नरम-गरम रजाई में घुसते ही भरा हुआ मन फिर बरस पड़ा। बेटे की वजह से  राघव उस दिन ऑफिस नहीं गए थे। उसके जाने के बाद किसी काम से कहीं गए थे। लौटने पर जब कमरे में आये तो उनको लगा कि वेदिका रो रही है। झट से रजाई हटा कर , सर पर हाथ रखा। उदास तो वो भी हो गए थे।
      " क्या बात है वेदिका , यूँ जी छोटा क्यों कर रही हो ! "
   " कुछ नहीं हुआ ! यूँ ही रोने का मन कर गया। " आंसू पोंछते हुए उसने रजाई मुहं पर खींच ली।
" अरे वाह ! ये भी खूब रही , रोने का भी मन करता है कभी ? तुम भी कमाल की हो ! ध्रुव सच ही कहता है। तुमको डॉक्टर से मिलना ही चाहिए ! "
     तमक कर उठी वेदिका तो राघव चाय का आदेश दे कर बाहर निकल गए। भरी आंखे और भारी सर लिए वेदिका चली पड़ी आगे की दिनचर्या पूरी करने में।
         वह सोचती जा रही थी कि अगर उसकी जगह, उनकी  बेटी होती तो राघव  उसके रोने की वजह जान कर उसे खुश करने के हर संभव प्रयास करते। ऐसा क्यों होता है अपनी बेटी इतनी प्रिय और पत्नी जो कि उसी बेटी की जन्मदायनी है , उसके साथ ऐसी बेरुखी। एक बार फिर आँखे छलक पड़ी।
         तभी बेटी का फोन आ गया। मन से मन को राह होती ही है। वह कुछ दिन के लिए आ रही थी। मन को सुकून सा मिला। क्या-क्या शॉपिंग करनी है , कहाँ से करनी है। क्या ज्वेलरी बनानी है। सोचते हुए शाम हो गई और रात भी कट गई।
          अगला दिन कुछ सुकून भरा था। मन शांत था। राघव  ऑफिस के लिए चले गए। मन किया कि कुछ संगीत सुना जाये। मोबाईल को वायर -लेस स्पीकर से जोड़ा , यू -ट्यूब खोला और सोचने लगी की गजल सुनु या गीत।  तभी मेहँदी हसन की गजल पर नज़र पड़ी। उसे ही चला दिया।
       " रंजिशे ही सही , दिल ही दुखने के लिए आ .... "
        मेहँदी हसन  की मखमली आवाज़ जैसे घर की नीरवता भंग कर रही थी। ' नीरवता! ' हां ! यही शब्द सूझता है उसे अपने घर के लिए।  पति घर में हो कर भी अपने में मग्न , माता जी या तो पूजा-पाठ या उसको कोसने के अलावा मुहं फुला कर बैठे रहना ही स्वभाव था। ऐसे में संगीत ही उसका सहारा है।
        ग़ज़ल के साथ-साथ माता जी की बड़बड़ाहट शुरू हो गई , "उम्र हो गई है , लेकिन ये गीत-संगीत की लत नहीं जाती ! बेटी को का क्या संस्कार देगी ! जब खुद ही का मन बस में नहीं ! भजनों में जाने क्यों इसका मन  लगता।  "
        खीझ कर उसने ग़ज़ल बंद कर दी। मन उदास हो गया। 'इनको मेरे सजने संवरने पर , मेरे संगीत सुनने पर इतना ऐतराज़ क्यों है। ' हाथ में पत्रिका ले ,उदास मन आँखों में पानी लिए छत पर चल पड़ी। चटाई बिछा कर लेट गई। सोचने लगी कि इतने बड़े घर में उसके लिए एक कोना नहीं है , जहाँ अपना सुख-दुःख कर सके। तभी वह भी आ गई तो वेदिका को अच्छा सा लगा।
        " कमाल की बात है ना , घर में दो औरतें हैं , फिर भी खामोश , चुप-चुप ! एक छत पर तो दूसरी लॉन में ! "
वह हंस रही थी।
       " यह मुझे भी मालूम है। लेकिन मेरे पास कोई हल नहीं है। मैंने बहुत कोशिश की कि माँ के पास बैठूं बात करूँ, लेकिन उनको तो सिर्फ उनके मतलब की बात या उनका स्तुतिगान ही पसंद है। मैं एक साधारण इंसान ही  हूँ , उनके असाधारण मानसिक स्तर को नहीं छू सकती। " वेदिका ने आहत और स्पष्ट शब्दों में अपनी व्यथा कह दी।
      लेकिन क्या राघव भी ......
          तभी सीढ़ियों से आहट हुई। वह झट से उठ बैठी। अपनी बेटी के क़दमों की आहट  को कैसे ना पहचानती भला ...
           बेटी को गले लगा कर वेदिका की जैसे आत्मा ही तृप्त हो गई। रुनकु के आते ही जैसे घर में रौनक आ गई। थोड़ी देर में तीनों लॉन में बैठी थी। वह माँ और दादी के बीच की कड़ी थी। दादी भी उसके बहाने से वेदिका को खूब सुना लेती थी। और वेदिका के पास सिर्फ मुहँ बनाने के अलावा कोई चारा नहीं था। मन में घुट के रह जाती बस।
     आज भी शुरू हो गई माता जी , उनके पास कौन बैठता है। बूढ़े इंसान की कोई जिंदगी है क्या ! और भी बहुत कुछ न कुछ ...
  " दादी माँ , आज ही सारी भड़ास निकाल देंगी तो कल क्या कहेंगी ! " रुनकु हंस पड़ी। वेदिका चुप रह कर कुढ़ती रही।
          ध्रुव को इसी बात से चिढ़ थी कि वह समय पर नहीं बोलती है और बाद में मन ही मन कुढ़ती रहेगी। और यही बात उसे मानसिक रोगी बनाये जा रही थी। 'मानसिक रोगी', शब्द दिमाग से जैसे टकरा गया हो। एक दम से खड़ी हो गई।
       " क्या हुआ मम्मा ?  उठ कैसे गए , अभी तो कल की प्लानिंग बाकी है ...."
     " कॉफी ले आती हूँ ! " वेदिका ने जाते हुए कहा।
   " रुनकु बेटा , मैं कॉफी -शाफी नहीं पीयूंगी ! बहादुर आएगा तो चाय बना देगा नहीं तो खुद बना लुंगी ! " दादी माँ ने ठसक से कहा।
       वेदिका को गुस्सा आया कि अगर कॉफी नहीं पीनी है तो चाय वह भी तो बना सकती थी। लेकिन कैसे भी हो वेदिका का दिल तो दुखना ही चाहिए था।
        " मम्मा , आप क्यों दादी की बातों को दिल से लगाती हो। उनको अपने हाथ की चाय पसंद है तो अच्छी बात है न ! आप या तो उनको उसी समय जवाब दे दिया करो नहीं तो एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकल दिया करो। "
      " माँ-बाप ने संस्कार यही दिए थे, जो समय के साथ परिपक्व होते गए। इतने बरस नहीं जवाब नहीं दिया तो अब भी जुबान नहीं खुलती...... तू नहीं समझेगी ! बड़ों का मान सम्मान भी तो कुछ होता है ! "
       " और अगर बड़े समझे ही ना तो ,  आखिर हम कितना झुकेगें ? टूटने की हद तक ? यह गलत है भई , मेरी तो इतनी सहन -शक्ति नहीं है मम्मा ! "
       " अच्छा -अच्छा रहने दे .... काम की बात करते हैं अब ! " वेदिका ने बात बदल दी।
        फिर कुछ दिन तक शादी की शॉपिंग में दिन बीते। कभी अम्मा जी भी साथ थी तो कभी राघव के साथ। बहुत सारी शॉपिंग हो गई। कुछ बच भी गई। सबकी पसंद के कपड़े लिए गए। वेदिका की बारी आई तो वह कुछ सोच में पड़ गई।
      " क्या सोच रहे हो मम्मा ? "
      " सोच रही हूँ कि कौनसा रंग लूँ , सभी अच्छे ही हैं ! " स्मित मुसकान लिए बेजारी से वेदिका ने कहा।
      " जो रंग सबसे ज्यादा पसंद हो वह लो ! " राघव कह रहे थे।
" रंग ! " फिर गुम होने को आई वेदिका ....
         उसे यह तो याद ही नहीं रहा कि उसको क्या रंग पसंद है या था। विवाह से पहले तो काला रंग ही पसंद था। कुछ स्वभाव भी विद्रोही था।  नए ज़माने की सोच लिए हुआ था। और फिर एक दिन विवाह हो गया।
       सोच पर पहरे तो नहीं लगे , हाँ अभिव्यक्ति कहीं दब गई। सास और पति की पसंद और ना पसंद के बीच उसकी पसंद कही खो ही गई थी।
     " हां तो फिर ! " राघव ने टहोका।
   " फिर क्या ? बता दीजिये कौनसी साड़ी लूँ .... , "
    " मैं इसमें क्या बताऊँ , जो अच्छी लगे वो लो .... "
    " हाँ जी सही कहा,मैं तो बाद में नुक्स निकलूंगा , क्यों ? " खिलखिला कर हंस पड़ी वेदिका।
       वेदिका को राघव का साथ बहुत अच्छा लगता था। इसमें बड़ी क्या बात थी ! ये तो हर पत्नी  को लगता है ! लेकिन वेदिका को राघव का साथ एक सुरक्षा का घेरा सा लगता था। चाहे वह उसकी उपस्तिथि को तवज्जो दे या ना दे। जाने क्या महक थी राघव में। एक जादू सा है उसकी ख़ामोशी में भी ...., ये महक, ये जादू उसे सम्मोहित किये रहता है और वह सम्मोहित सी उसके मद में डूबी सी रहती है।
       " हाँ जी वेदिका जी ! कहाँ खो गई ! " राघव उसे हैरान से पुकार रहे थे। थोड़े खीझ गए। यह लेडीज़ डिपार्टमेंट उनके बस में नहीं। वह बस मुस्कुरा दी। बोली , " आज नहीं लेना कुछ भी ! कल फिर से आएंगे ! "
   "  कल ! मम्मा  ! कल तो मैं चली जाउंगी ! "
     " कमाल है भई , मुझे कल समय नहीं मिलेगा ! जो भी लेना है आज ही ले लो ! "
       " इसमें चिल्ला कर बोलने की जरुरत तो नहीं थी , ये सेल्समेन क्या सोचेगा ! मेरी कोई इज़्ज़त है कि  नहीं ! "
तुनक गई वेदिका।
            राघव नाराज़ हो कर दुकान से बाहर आ गए। वेदिका और रुनकु  भी पीछे-पीछे आ गई। थोड़ी देर बाद घर की ओर चल रहे थे।  राघव खीझ रहे थे कि जो काम आज-अभी हो सकता था वह कल पर क्यों छोड़ा गया, काम तो और भी बहुत हैं । वेदिका की आंखे नम थी कि राघव को यूँ तो दुकान वाले के सामने खीझना तो नहीं था।
           शॉपिंग आज तो हो सकती थी कल पर छोड़ने  में कोई तुक भी नहीं बनती थी , पर इसके पीछे एक राज़ की बात भी थी ! वह राघव के साथ अगले दिन भी बाजार आना चाहती थी ; सिर्फ उसके साथ अकेले जाने के लिए। उसे उसका साथ और लॉन्ग ड्राइविंग बहुत पसंद थी। राघव को भी यह मालूम  है फिर वह क्यों नहीं जानता-समझता। और भी बहुत सारी  बातें है जो वेदिका मुहं से बिन बोले राघव को समझाना चाहती है पर वह नहीं समझता या समझना नहीं चाहता।
          वह  बाजार से आकर अनमनी सी ही रही। किसको परवाह थी !
           वेदिका को भी तो ऐसे अनमना नहीं रहना चाहिए था। उसको भी थोड़ा समझदार तो होना चाहिए ना ! घर में इतने काम थे और वह अपने बुझे मन को लिए बैठी थी।
          उस रात उसने अपनी डायरी में लिखा ," एक स्त्री क्या चाहती है  ? यह , वह स्वयं जानती है ! फिर भी वह चाहती कि कोई उसका खयाल रखे, उसको सुने और वह सब भी सुने जो उसका अव्यक्त है ।वह  कैसे दौड़ पड़ती है सबके लिए ,कोई तो उसका भी ऐसे ही फ़िक्र करे।  वह कभी-कभी परियों जैसा , राजकुमारी जैसा महसूस करवाना चाहती है जैसे उसके मायके में महसूस करवाया जाता है। कम-से-कम वह अपने पति से तो ये उम्मीद रखती ही है।  तो फिर क्यों ....? "
        लिखते -लिखते कलम मुँह में दबा कर , मुड़ कर देखा तो राघव निन्द्रा में मग्न थे। मुस्कुरा पड़ी। कितना  व्यवहारिक इंसान है। किसी की भावनाओं की परवाह ही नहीं।
        उसने आगे लिखा , " तो फिर क्यों , उसे पराई ही समझा जाता है। कहने को घर की रानी होती है , पर क्या सच में ? सच क्या है , सबको पता है... , यहाँ स्त्री पर जुल्म की बात नहीं है  पर समझने की यह बात भी कि एक स्त्री कब तक स्त्री रहती है ! जब तक वह सास ना बन जाये ,   तब तक ही ? तो उसके बाद क्या वह स्त्री नहीं रहती ?  यह जिंदगी शतरंज की बिसात ही तो है।  सारा खेल शह -मात का है। सारी लड़ाई सत्ता की ही तो है ...."
         " वेदिका ! तुम्हारा लिखना-लिखाना हो गया हो तो आकर सो जाओ ! " राघव की आवाज़ में आदेश था।
       वेदिका आदेश मानती आयी ही है तो आज कैसे मना करती। रात भी तो काफी हो चली थी।  एक अच्छी सी अंगड़ाई ले कर खड़ी हो गई।  आदमकद आईने में देख कर मुस्कुराई। मुस्कुराई कि रात को मुहं बिसूर कर सोने से सपने भी अच्छे नहीं आते।
            आने वाले दिन बहुत व्यस्त थे। शॉपिंग लगभग सम्पूर्ण हो चुकी थी। साँस लेने को भी फुर्सत नहीं थी। फरवरी के प्रथम सप्ताह में विवाह का मुहूर्त था। सभी रिश्तेदारों का आगमन हुआ। गीत-संगीत की धूमधाम रही। तेज़ संगीत और चमकती लाइटों की रौशनी में सब कुछ चमकदार था। कोई गिला-शिकायतें नहीं थी। बेटा दूल्हा बना बहुत प्यारा लग रहा था। नज़रे ही नहीं हट रही थी। दादी तो बार बलैयां ले रही थी। बुआएँ , मौसियां , मामियाँ और चाची -ताईयां सबका आशीर्वाद मिल रहा था। बहुत अच्छे से विवाह -कार्य संपन्न हुआ।
             अब नई बहू के स्वागत में घर में गहमा -गहमी थी।
         " वेदिका ! अब तेरा राज-पाट तो गया भई ! " ध्रुव की ताई ने चुटकी ली।
   " राज-पाट ? वो कब मिला मुझे ! जिसका जाने का डर हो " वेदिका भी हंस पड़ी।
बात हंसी की ही थी और जवाब भी हंसी में ही दिया।  लेकिन कई चेहरों पर रंग आयेऔर चले गए। माहौल देखते हुए कुछ कहा तो नहीं गया अलबत्ता होठों पर तिर्यक रेखा अंकित हो गई।
       वेदिका का मन बुझ सा गया। वह गुम होने को आयी। एक लड़की जो बहू बन कर एक पराये घर में जाती है ,परायी बने रहने के लिए नहीं बल्कि तन -मन से सबको अपनाने ही आती है। फिर भी वह तब तक परायी ही मानी जाती है ,जब तक अगली परायी लड़की उसकी जगह लेने नहीं आ जाती ! तो अब एक पराई लड़की का आगमन होना है और उसका राजपाट छिन जाने वाला था ?
             हमारे समाज में  एक लड़की को सास के नाम पर इतना डराया जाता है कि वह सोचने लगती है कि सास एक बहुत खतरनाक प्राणी है। वह एक असुरक्षा की भावना और  जिद से भर जाती है कि वह अपना वर्चस्व स्थापित करके ही रहेगी। सास को भी तो डराया जाता है कि अब उसकी नहीं चलने वाली। आखिर एक स्त्री ने इतने सालों तक तपस्या से अपने घर को बनाया होता है , सजाया होता है तो उसे कोई और लड़की, वह भी पराये घर से आई हुयी , कैसे हरा सकती है ? जाने-अनजाने वह भी एक असुरक्षा से भर जाती है।और यही कारण है सास-बहू की तकरार का भी ।
      कभी- कभी लगता है , एक स्वस्थ रिश्ते को पनपने देने की बजाए  जैसे अखाड़े में उतरने के लिए दो पहलवानों को तैयार किया जाता है वैसे ही सास-बहू को तैयार किया जाता है। नसीहतें दी जाती हैं , सिखाया-पढ़ाया जाता है।   सोचती हुयी हंस पड़ी।
           " देख कैसी खुश हो रही है , सब पता चल जायेगा जब बहू आएगी।!" दादी ने धीरे से पास बैठी अपनी बेटी को कोहनी मारी।
           " अब नया जमाना है माँ , नयी बातें है...., अब ना तो सास सख्त है और न ही बहू दब कर रहने वाली... " बेटी ने जैसे समझाया हो माँ को या खुद को ही।
           इंतज़ार की घड़ियाँ कम होती जा रही थी। फोन पर जानकारी दी जा रही थी कि नयी बहू कांकड़ पर आ गई है। घर की महिलाओं में उत्साह सा था एक नए सदस्य के स्वागत का। ध्रुव की दादी भी बहुत हर्षोल्लासित थी। जैसे पैरों में घुंघरू बांध लिए हो।
            दुल्हन दहलीज़ पर खड़ी थी। जैसे ही अन्दर आने को कदम बढ़ाया तो साथ खड़ी ध्रुव की बुआ ने आहिस्ता से कहा , " शिवि बिटिया ! पहले दायाँ पैर आगे बढ़ाओ। घर की लक्ष्मी हो , तुम्हारे आने से घर में धन-धान्य की वृद्धि हो। "
         नयी दुल्हन शिवि ने पलकें उठा कर बुआ को देखा और उनकी आज्ञा का पालन किया।
         ध्रुव-शिवि की जोड़ी सराहनीय लग रही है।  वेदिका की तो नज़रें ही नहीं हट रही थी। बहुत प्यार से आरती उतार कर दोनों को गले लगा लिया। वेदिका को शिवि की सांसे वैसी ही महसूस हुयी जैसे नवजात बच्चे की होती है। थोड़ी कच्ची-कच्ची सी , थोड़ी तेज़-तेज़ सी।
           आँखों में सपने और अजनबीपन लिए ..... जैसे एक पौधा इंतज़ार कर रहा हो , अपने रोपे जाने का। एक आशंका भी थी पता नहीं धूप , पानी और थोड़ा सा आसमान मिलेगा या नहीं। बेशक नए ज़माने की लड़कियां बहुत बहादुर और सामंजस्य बिठा लेने वाली होती है लेकिन यह अपनाने वालों पर भी निर्भर करता है कि वे नयी बहू से अपेक्षाओं से अधिक , कितना अधिक प्रेम और स्नेह  देते हैं।
           लाल आलता से रंगे कदमों को आहिस्ता-आहिस्ता बढाती हुई शिवि , वेदिका को साक्षात् लक्ष्मी का रूप ही लग रही थी। घर का वातावरण बहुत खुशनुमा हो गया था। हंसी -ख़ुशी सारी रस्में निभाई  जा रही थी।
     " लो भई शिवि भाभी जीत गई  ! भैया तो हार गए ! " रुनकु  ने ताली बजाई तो सभी औरतें खिलखिला कर हंस पड़ी।
      " बेटियां जीतती ही अच्छी लगती है ! " वेदिका ने भी हंस कर साथ दिया तो शिवि ने वेदिका को गौर से देखा। उसके मन में एक  हिलोर सी उठी , यकायक माँ की याद आ गई।  कितनी भीड़ थी ! सभी अजनबी थे। कहने को ध्रुव से थोड़ी सी पहचान थी वह भी फोन के माध्यम से ही। ऐसे में प्यार और अपनेपन के बोल बहुत सुहाते हैं।
         थोड़ी देर में दादी भी आ गई। बहुत दुलरा रही थी। स्नेह से सर पर हाथ फिराते थक नहीं रही थी।
    " सुनो बहू , अब ये तुम्हारा अपना घर है , फिर भी बहू तो बहू ही होती है  !इसकी मान-मर्यादा भी तुम्हारे हाथ में ही है। अब कहीं भी मुँह उठा कर चल दो या जोर का हंसी ठट्ठा तुमको शोभा नहीं देगा ! " दादी के स्वर में प्यार भरा आदेश था।
     " क्या दादी ! आज ही तो आई है और यह सिखलाई -पढाई शुरू हो गई ! " रुनकु ठुनक सी गई।  अलबत्ता महिलाओं में एक चुप्पी सी पसर गई थी।
          " हाँ कुछ बातें तो हैं जो सिखलाई -पढाई जा सकती है।  शिवि बेटा , मैं चाहती हूँ कि तुम इस घर की अच्छाई को ही बाहर बताओ और कोई भी बात जो तुम्हें बुरी लगे , कैसी भी शिकायत हो वह मुझे बताओ।  मन को अंदर ही अंदर घोट लो , यह मुझे पसंद नहीं आएगा। " वेदिका ने बहुत अपनेपन से कहा।
           शिवि के मन में एक हिलोर फिर से उठी और माँ याद आ गई।
       शिवि नए ज़माने की ही लड़की थी तो सामंजस्य बैठाने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी ।
              दो सप्ताह पुरानी दुल्हन सुबह -सुबह ही रसोई में वेदिका के पास खड़ी थी। चाय लेने आई थी। वेदिका भी आज जल्दी ही उठ गई थी। बेटा -बहू  ने घूमने जाना था और रुनकु ने भी वापस हॉस्टल , इसलिए वह नाश्ते का इंतज़ाम कर रही थी। मौसम  ठंडा था। हल्की  बारिश भी हो चुकी थी।
          " शिवि बेटा ! तुम्हें यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं ! कैसे महसूस होता है ? " वेदिका के शब्द बहुत कोमल थे।
        " मम्मा ..., " कह कर चुप सी हो गई।
      " हाँ बोलो बेटा ! " थोड़ा आशंकित सी हुई वेदिका।
      " मुझे यहाँ ठण्ड का अहसास सा होता है ! ठंडा -ठंडा सा ..., " कहते हुए झिझक सी गई  शिवि।
       " अरे बेटा .... ," हंस पड़ी वेदिका।
        " अभी तुमने यहाँ की , इस घर की गर्माहट को दिल से नहीं अपनाया।  समय लगता है बेटा .... फिर सब ठीक हो जायेगा।  लो  चाय ले जाओ और तैयार हो जाओ , " सर पर स्नेह से हाथ फेर कर चाय की ट्रे थमा दी। मन भर आया वेदिका का , आँखे नम कर के कुछ सोच ने लगी और चाकू से स्लेब पर एक लकीर खींच दी।
         " बीबी जी ! एक बताओ जी ! " वेदिका ने अपनी सोच और हाथ का काम रोक कर बहादुर की और देखा जो कि बहुत गंभीर मुद्रा में कुछ कहना चाह रहा था।
         " हां बोलो ? "
      " बीबी जी ! आप मुझे बताओ कि ये जो बादल होते हैं उनमे पानी धरती का होता या आसमान से आता है ? "
वेदिका हंस पड़ी कि ये कैसा सवाल है। लेकिन उसकी गंभीर मुख मुद्रा देख कर अनजान बनते हुए बोली , " अरे भई , जब बादल आसमान के होंगे तो पानी भी आसमान से ही तो लेगा ना , कोई धरती से से पाईप थोड़ी न जोड़ रखी है ! "
         बहादुर खिलखिला कर हंस पड़ा , " नहीं बीबी जी , धरती पर जो नदी ,तालाब और समंदर होते है उसका पानी धूप में , भाफ बन कर उड़ जाता है और उनसे बादल बनते हैं ! "
           " ओहो , अच्छा ! मुझे तो ये पता ही नहीं था ! तू तो बड़ा सायना है ! " हंस पड़ी वेदिका। उसके साथ-साथ बाहर  से भी  जोर से हँसने आवाज़ आई तो वह चौंक पड़ी।
         " क्या मम्मा आप भी ना , कैसी  बात कर रही हो , इस बहादुर के आगे भोले पन की बात कर रही हो। इसको डांट भी सकती थी। आप का भी ना दिमाग ...., "
       " दिमाग खराब है , मंद-बुद्धि हूँ ! अरे भई , कई बार किसी का मन रखने के लिए अनजान बनना भी अच्छा ही होता है। अगर मैं डांटती या अपना ज्ञान बघारती तो बेचारे मासूम का दिल ना टूट जाता  !  " वेदिका ने ध्रुव की बात काट दी।  वह बहू के सामने आहत महसूस कर रही थी।
         " लेकिन ध्रुव इसमें ना तो  मंद -बुद्धि और दिमाग खराबी की बात तो कहीं नज़र नहीं आई , यह तो मम्मा की सरलता और सहजता है जो एक नौकर का दिल भी दुखाना नहीं चाहती। सरल होना भी तो कर किसी के बस में कहाँ है ! हाँ ना मम्मा ! " शिवि ने बहुत प्यार से वेदिका की और देखते हुए कहा।
           " ले  सुन ले रुनकु ! अब इस घर में तेरी माँ की हिमायती आ गई है तेरी जगह लेने ! " दादी कटाक्ष करने में कहाँ चुकने वाली थी।
          " मेरी जगह कौन लेगा भला ! और शिवि भाभी की अपनी जगह है ! ये तेरी जगह -मेरी जगह मुझे समझ नहीं आती दादी .... चार दिन की जिंदगी है क्यों ना मिल कर गुजारें। "
          दादी-पोती का संवाद वेदिका को कहीं  गुम कर गया और उसने डाइनिंग टेबल पर ऊँगली से एक साथ बड़ी से छोटी लकीरें खींच दी जब तक एक बिंदु की जगह ना रह गई। वेदिका को शिवि बहुत गौर से देखती रही।
       दोपहर तक सभी चले गए। रह गए तो बस वेदिका और अम्मा जी। अम्मा जी सोने चल दिए और वेदिका छत पर। अब सर्दी तो नहीं रही थी फिर भी थोड़ी सी धूप -छाँव देख कर चटाई बिछा दी। उसके पीछे -पीछे वह भी आ गई।
       " बहुत दिन हुए तुमको मेरी याद भी नहीं आई  ! "  उसने उलाहना सा दिया।
      " नहीं तो ! तू तो मेरे दिल में बसी है फिर तुम्हें कैसे भूल जाती !  बस समय ही नहीं मिला।  वेदिका हंस कर बोली।
         " बहू तो तुम्हें अच्छी मिली है ! जैसी तुम चाहती थी वैसी ही .... ,"
        " मेरी बहू को मनभाती सास मिली या नहीं , यह कौन बताये मुझे ? " वेदिका ने झट से जवाब दिया।
      फिर पास ही पड़े उखड़े पत्थर  से वहीँ एक लकीर खींच दी। सोचने लगी ये मनचाहा क्या होता है। जो हमें अच्छा लगे वही मिले। सामने वाले की भी तो यही कामना होती है कि उसे भी मनचाहा मिले। फिर क्यों नहीं हम सामने वाले के हितों की रक्षा करते। अगर ऐसा हो जाय तो फिर सारी समस्या  , प्रतिद्वंदिता ही समाप्त हो जाएगी। पर क्या यह संभव है ! यहाँ तो हर कदम पर खुद को साबित करने की होड़ है। कोई किसी से कम नहीं रहना चाहता।
        " क्या सोचने लगी वेदिका ? " उसने टहोका।
      " कुछ भी नहीं , और बहुत कुछ भी ... , आज माता जी ने मुझे समझाया कि बहू को सर चढ़ाने की जरुरत नहीं। कंट्रोल में रखना सीखो। एक बार हाथ से निकल जाएगी तो बेटा भी हाथ से गया ही समझो ! मुझे हंसी आ गई। पर मन ही मन में हंसी। कि अभी तो मैं भी आपके ही कंट्रोल में हूँ तो किसको बस में करूँ और किस को नहीं। जहाँ तक बेटे की बात है। नदी तो सागर की ओर ही बहेगी। बंधन में किसको बांधना, जो मेरा है वह  तो मेरा ही रहेगा न !"
           " हम्म्म ....," उसे भी कोई जवाब नहीं सूझा।
        घर में एक नए सदस्य आ जाने से वेदिका को  जीवन में परिवर्तन सा महसूस सा हुआ। अपने अंदर आत्मविश्वास सा महसूस करने लगी थी। बेटे के व्यवहार में भी बदलाव आया था अब तुनकता नहीं बल्कि बड़ा और जिम्मेदार सा लगने लगा।
            " वह तो होना ही था वेदिका ! मेरा बेटा है , मुझ पर ही जायेगा न , बीवी का गुलाम !" राघव ने चुहल की।
          वेदिका भी तमक गई कि राघव और गुलाम  ! कुछ कहना चाह रही थी कि  माता जी ने आवाज़ लगा दी। माता जी की ठसक तो वही थी पर खुद को कहीं -न-कहीं असुरक्षित सी महसूस भी कर रही थी। क्यूंकि उनकी नज़र में राजगद्दी उनके हाथ से छिन गई थी। अब डर था कि नया राजा , पदच्युत राजा के साथ कैसा व्यवहार करने वाला है। वेदिका समझ तो रही थी पर वह ऐसा कुछ नहीं सोच रही थी। ' जियो और जीने दो ' उसका तो यही जीवन जीने का लक्ष्य था।
           शिवि ने बहुत गौर से वेदिका की गतिविधि देखी। उसने देखा कि मम्मा दिन में कई-कई बार गुमसुम हो जाती है। और कभी तो ऊँगली से लकीरें खींचने लगती है। उसने ध्रुव से पूछा तो वह हंस कर बोला कि ये मम्मा की उम्र का असर है। इस उमर में औरतें ऐसे मानसिक रोगी हो ही जाती है। वह खुद ही हंसती है और कई बार तो बात भी अपने आप से करती है।
      " अच्छा ! तो फिर दादी तो ऐसे नहीं हुयी और मेरी माँ भी ऐसे गुमसुम नहीं  होती ! मम्मा कुछ भावुक स्वभाव की है। सरल और सहज है। छल-प्रपंच उनको नहीं आते। बस यही नुक्स है उनमें ! " शिवि ने कुछ सोचते हुए कहा।
          " अच्छा ! तुम ने तो आते ही मम्मा को जान-समझ लिया !  बहुत बुद्धिमान हो। लगता है एक दिन तुम भी मम्मा की जगह लेने वाली हो। " ध्रुव बिन सोचे बोल गया।
          " देखो ध्रुव ! मैं , तुम्हें अपने  स्वाभिमान से खेलने की इज़ाज़त कभी नहीं दूंगी। बेशक पति -परमेश्वर कहे जाते हो पर ...." कहते हुए चुप हो गई।
         ध्रुव आहत सा उसे ताकता रहा और वह सोच रही थी कि गलत बात का विरोध तत्काल कर देना चाहिए।
   शिवि और ध्रुव के जाने का वक्त भी पास आने लगा था। दादी को नई बहू की बातें कुछ-कुछ  ही पसंद आती थी और बहुत सारी बातें नापसंद ही थी।  वह नए ज़माने को आत्मसात करने को झिझक रही थी। और करती भी क्या , थोड़ी भौचक्की भी थी। क्यूंकि ज़माने ने एकदम से करवट ली है और बहुत सारी बातें एक दम से बदल गई है। वह अब भी पुरानी  बातें ले कर बैठी रहती थी कि पहले तो ऐसा नहीं होता था। अब तो बहुत बदल गया है।
     " माता जी ! अगर हम पहले की बातें ले कर बैठे रहेंगे और आज को कोसेंगे तो तरक्की कैसे करेंगे ? " वेदिका ने माता जी को टोक ही दिया।
      " सच्ची ! दादी माँ ! मम्मा की बात एक दम सही है ! " शिवि ने कहा।
      " क्या बात सही है ! " माता जी को वेदिका की पैरवी पसंद नहीं आई। वह आगे  कुछ कहती इससे पहले ही वेदिका अनमनी सी छत की तरफ चल दी। अपनी बच्चों के सामने तो अपमानित होती आई थी लेकिन अब बहू के सामने अपनी किरकिरी नहीं करवानी चाहती थी।
            छत पर जाते ही वह भी आ गई।
      " क्या हुआ , आज बहुत दिन बाद मिली हो ? उदास हो ? "
    " हाँ ........ शिवि -ध्रुव के जाने के बाद तो तुमसे रोज ही मिलना होगा। " कहते हुए उसने ऊँगली से फर्श पर लकीरें खींचना शुरू किया ,  तब तक नहीं रुकी , जब  एक बिंदु ना रह गया।
       वेदिका को पता नहीं चला कि कब शिवि उसके पीछे चली आई थी। बहुत गौर से देख रही थी कि मम्मा किस से बात कर रही है। वहां तो कोई  नहीं था।  खुद से ही बात कर रही थी। कोई काल्पनिक पात्र है जिस से वह मन की बात कर रही थी।
         " उफ्फ ! भावुकता की हद है ! " मन ही मन शिवि ने कहा और व्याकुलता से वेदिका को पुकारा।
        " मम्मा ! आप किस से बात कर रहे हो ? "
      वेदिका चौंक पड़ी। जैसे चोरी पकड़ी गई। कोई शब्द नहीं सूझे।
           " यह क्या मम्मा ! कोई बात करने वाला नहीं मिला तो खुद से ही बातें करने लग गए। " शिवि ने बहुत प्यार और कोमलता से पूछा तो वेदिका की जैसे रुलाई फूट ने को आई। लेकिन संयत रही । इस में तो वह वैसे भी बहुत सिद्धहस्त थी।  चुप हो शिवि को ताकती रही।
           " बोलो तो मम्मा , आप ऐसा क्यों करने लगे हो। "
           " मेरे पास और कोई हल नहीं था ...."
         " क्या हल नहीं था ? खुद से बातें करने के अलावा क्या ? "
         " हाँ। " संक्षिप्त सा उत्तर दिया वेदिका ने।  थोड़ा चुप रह कर बोली , " तुम नहीं समझोगी वेदिका ! चालीस की उम्र  के बाद स्त्री के जीवन में कितना  परिवर्तन आता है। यह वह समय होता है जब उसकी छाया में रहने वाले बच्चे उससे ही कद में ना केवल लम्बे बल्कि बड़े भी बनने लग जाते हैं। कितना मुश्किल होता है जब आपको नाकारा जाने लगता है। "
           " अच्छा , और ! " शिवि ने बहुत गौर से वेदिका देखा।
     वेदिका थोड़ी हैरान थी कि वह क्यों इस परायी लड़की के सामने अपना मन खोलने की कोशिश कर रही है। यह तो उसकी प्रतिद्व्न्दि है। अपनी कमज़ोरियाँ क्यों जाहिर कर रही है।
           " मम्मा ! मैं बेशक पराई हूँ , आपकी बहू ही हूँ , बेटी नहीं हूँ ! पर आप मुझे अपना  हमदर्द तो मान ही सकती है , मैं तो सोचती हूँ कि  चालीस की उम्र के बाद कोई भी स्त्री अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से चाहे दिशा में सकारात्मक तरीके से मोड़ सकती है। आप में भी कई हुनर हो सकते हैं तो अपना कोई शौक पूरा क्यों नहीं किया। यह भी क्या बात हुयी ! आपने तो खुद को कछुए की तरह खोल में ही समेट  लिया। " शिवि ने अंतिम वाक्य थोड़ा ठुनकते हुए कहा तो वेदिका को हंसी आ गई।
        " अब तू मुझे समझाएगी कि मुझे क्या करना चाहिए था। " मुस्कराते हुए वेदिका ने आगे कहा , " शिवि बेटा मुझे पता था कि मैं क्या कर सकती थी और क्या नहीं ; लेकिन कर नहीं पाई। बस ..... जैसे तुम कहती हो कि खुद को खोल में ही समेट लिया , कछुए की तरह ही ! " कहते हुए गला भर्रा गया।
          " आपने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अच्छा समय फिजूल की भावुकता में गँवा दिया। यह दुनिया  ऐसी ही है , यहाँ हर किसी को अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है , अपने हिस्से का आसमान भी खुद ही खोजना होता है। आपने क्या सोचा ; कि  कोई आएगा और आपको आगे बढ़ने का मौका देगा। यहाँ मैं स्त्री या स्त्री विमर्श की बात नहीं करती , क्यूंकि आप पर कोई जुल्म नहीं हुआ ना ही दबाया गया कि  आपको आगे बढ़ने से रोका गया हो। बस कोरी भावुकता चलते हुए मम्मा आप बस खुद को कमतर समझते गए। " शिवि ने बहुत दृढ़ता से कहा।
             वेदिका चुप थी।  सच भी यही था। उँगलियाँ फिर से फर्श पर रेंगने लगी और लकीरे खींचने लगी।
     " मम्मा ! इन लकीरों का क्या मतलब हुआ  ? जरा मुझे समझाइये तो ये बिंदु का क्या मतलब हुआ ! " शिवि ने कौतुहल से पूछा।
         वेदिका सोचने लगी कि जरूर उसने पुण्य किये होंगे।  तभी तो शिवि जैसी सुलझी हुई  बहू  मिली। उसको प्यार से देखती हुयी सोचती रही।  फिर बोली , " यह बिंदु मैं हूँ , इस घर में मेरी हैसियत इतनी है ! ना कम ना ही ज्यादा। बाकी सभी बड़ी लकीरें , छोटी लकीरें। "
           " अच्छा मम्मा ! मगर आप इसे ऐसा भी तो सोच सकते हैं। " वह थोड़ा हैरान होते हुए शिवि ने कहा।
     " कैसे ........... "
       " जैसे आप खुद को बिंदु कहते हो तो देखिये मैंने इस बिंदु को बीच में रखा और बाकी लकीरों को इसके बाहर चारों और खींच दिया।  अब देखो आप केंद्र में हो और सभी लकीरें आपके चारों ओर से घेरे हुए हैं। आपके बिना किसी का अस्तित्व ही क्या ? " शिवि हंसी तो वेदिका भी हंस पड़ी।
           वेदिका के पास कोई जवाब नहीं था उसने हाथ बढ़ा कर शिवि को अपनी तरफ खींचा तो शिवि ने भी हंस कर गले में बांहे डाल दी। दो स्त्रियों को वह भी एक ही घर की , यूँ हँसते देख वह चुपके से चल पड़ी। उसे भी वेदिका की निर्मल हंसी बहुत भा रही थी।
 
       
उपासना सियाग
नै सूरज नगरी
गली नम्बर 7
नौवां चौक
अबोहर ( पंजाब ) 152116

8264901089
         
     
       
           
         


 
     
     
           

है दिल को तेरी आरजू

    है दिल को तेरी आरजू...

   पिछले सात दिनों से लगातार हो रही बारिश से  नदी का स्तर भी बढ़ चला था। नदी किनारे बसे गाँव बस्तीपुर में अफरा-तफरी का माहौल था। प्रशासन का  ऐलान हो चुका था कि सभी जन अपने जरुरी सामान समेट  लें। कभी भी घर छोड़ना पड़ सकता है।
       यह कोई पहली बार नहीं था ; बहुत बार ऐसा हो चुका है। कितनी ही बार घर छोड़ना पड़ा है। लेकिन इस बार तो यूँ महसूस हो रहा है कि अबकी बार कुछ न बचेगा। सब कुछ जल मग्न हो जायेगा। साक्षात् प्रलय के दर्शन हो रहे थे।
        चंदना किंकर्तव्यमूढ़ सी बैठी थी। क्या समेटे ? क्या रखे ! दो साल पुरानी गृहस्थी थी। कितने अरमान से सामान बनाया था। पति की थोड़ी सी खेती थी। पिछली बाढ़ से जमीन उपजाऊ हो गई थी तो फसल भी अच्छी ही हुई थी।  घर की मरम्मत के साथ कुछ नया सामान भी बनाया था।
         " ए चंदनी ! क्या सोच रही रही है ! " पति चिल्ला कर बोला तो वह चिहुंक पड़ी। उसे अपना ऐसे नाम लेना पसंद नहीं था। कई बार पति को टोक भी चुकी थी। लेकिन वह ऐसे ही बोलता था। झिड़क कर , चिल्ला कर !
      " आ..हाँ ...! " अभी बहस का समय तो नहीं था। इसलिए उसने सामने रखी संदूकची में कुछ कपड़े रखे। रूपये थे कि नहीं वह तो उसे पता नहीं था।  वह सब तो पति और ससुर के आधीन था।
           एक संदूकची उसकी सास ने भी तैयार कर ली थी।
  " चन्दना बिटिया .... जो कुछ भी तेरे नाक-कान का जेवर है वो तू पहन ले ... संदूकची का पता नहीं कहाँ जाये , हमें मिले या न मिले !" सास का  प्यार भरा लहजा हमेशा उसके हृदय पर रुई के नरम फाहे रख देता था।
  " और अम्मा ! कोई हमारा गला काट कर ले गया तो ! " वह खिलखिला कर हँस पड़ी। विपरीत परिस्तिथियों में उसका यूँ हँसना भैरव को नहीं सुहाया।
   फिर चिल्ला पड़ा ," चंदनी तू  खी -खी मत कर ... बाहर जा कर देख जरा कैसे जल-थल एक हो रहा है। "
    " नहीं जाएँगे हम बाहर ! हमें पानी से डर लगता है ! "
   " डरने से क्या होगा .. जाना तो पड़ेगा ही न ! " यह चिंतित आवाज़ उसके ससुर की थी।जो कि बार -बार आँसू पोंछ रहा था।
   सभी घरों में लगभग यही हाल था। किसी ने तो मकान कुछ अर्से पहले ही पक्का करवाया था। किसी को बेटी की शादी की चिंता थी। हर एक की अपनी चिंता थी। सभी का खेती-कारोबार नष्ट हो रहा था।
     और घर के बाहर  जल का ताण्डव था ; जो कि अब नदी की सीमा पार कर चुका था। दिन चढ़ते-चढ़ते  पानी घरों में घुसने लगा था। त्राहि-त्राहि मची थी। बरसती बारिश में भी घरों की छतों पर पहुँच गए थे। दूर तक कोई सहायता करने वाला नज़र नहीं आ रहा था।  अपनी मेहनत की कमाई को डूबते देख हताश-निराश हो रहे थे। दिमाग में एक साथ असंख्य विचार आ रहे थे कि अब क्या होगा ? करेंगे क्या ?
         तभी सामने से सेना के जवान कश्तियाँ ले कर आते दिखे तो कुछ राहत सी लगी।
    सबसे पहले बच्चों और बूढ़ों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया।  उसके बाद महिलाओं की बारी थी। चन्दना तो छत पर दुबक कर बैठी थी। उसके सास-ससुर को ले जाया जा चुका था। उसने भैरव का हाथ पकड़ लिया , " हम तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाएँगे ... तुम यहीं रह गए तो ! कुछ हो गया तो फिर  ? "
    " तो तुम भी मर जाना ... अभी तो जाओ यहाँ से ! " भैरव चिल्लाया।
" अरे कुछ नहीं होगा , सब की जान बचाएंगे हम ! " एक जवान बोला।
लेकिन चन्दना तो पति का हाथ पकड़ कर और दुबक गई।
" क्या तमाशा है यहाँ  ! " दूसरा जवान चिल्ला कर पूछ रहा था।
" एक महिला है जो अपने पति का हाथ नहीं छोड़ रही है ..."
" जरा रुको , मुझे देखने दो ... ए माई , क्या है ये ? तेरे कारण यहाँ सबकी जान पर बन रही है ; और भी लोगों को ले जाना है हमें ! " सख्ती से बोलते हुए उस जवान में चन्दना को अपनी बाजुओं में उठा कर नाव में डाल दिया।
      उसकी तो, इतना सारा पानी देख कर जान ही निकल गई। वह झट से पास बैठी राजो की गोद में सर दुबका कर बैठ गई।  कानों में सिर्फ स्त्रियों का प्रलाप ही सुनायी दे रहा था।  नदी का शोर मचाता पानी जैसे सब कुछ लील लेना चाहता हो।
       परबतिया हाथ जोड़े सिसकते हुए नदी मैया से प्रार्थना कर रही थी , " मैया ! तू तो जीवन देती है आज जीवन लेने पर कैसे उतर गई। तेरे सहारे ही हम फूलते-फलते हैं और  तू ...." जोर से रो पड़ी। कितनी  चिंता थी सभी के मनों में । सब कुछ बिखरा था। पति कहीं ! बच्चे कहीं ! अगर उनको कुछ हो गया तो हम क्या करेंगी। मनों में हौल उठ रहा था।
        आसमान से पानी अभी भी बरस  रहा था।
       चन्दना ने खुद को सिकोड़ते हुए धीरे से गर्दन उठाई। देखा बहुत सारा पानी ही पानी ! चिल्ला कर वह फिर से राजो की गोद में  दुबक गई। और कोई मौका होता तो सब उसका बहुत मज़ाक बनाती । अभी तो सबकी जान सांसत में थी।
         आखिर में नाव को किनारा मिला। सूखी जगह मिली। थोड़ी ही दूर शिविर बने हुए थे। चन्दना को राहत मिली। अब वह अपनी सास को ढूंढ रही थी। सारा गाँव था सामने कि उसकी सास भागी हुयी आई और उसको लिपटा लिया। दोनों रो पड़ी। सभी का यही हाल था।
         रात तक लोगों को राहत शिविरों में लाया जा चुका था। कपड़े अब तक गीले थे। सामान आया तो था पर रात का समय था। ढूंढा नहीं जा सका। अस्थायी तौर से लाइट की व्यवस्था थी।  कई सारे  शिविरों में पुरुषों और स्त्रियों  की अलग-अलग की व्यवस्था की गई थी। एक बात सभी को राहत दे रही थी कि किसी की जान नहीं गई थी।सभी सुरक्षित थे। अब बारिश भी रुक गई थी।  भीगे कपड़े सूखने तो लगे थे। लेकिन ठंडी हवा सिहरा दे रही थी।
          सेना के जवान मुस्तैदी से लगे थे।  पहले बचा कर लाये ;अब खाने और दवाइयों की व्यवस्था भी कर रहे थे। उनका शिविर अलग था।
          शिविरों में दरी बिछा दी गई थी। ओढ़ने को चादर दी गई थी। खाने को दाल-भात मिला । चहुँ ओर एक रुआँसी सी ख़ामोशी थी। कभी कोई बच्चा चिल्ला पड़ता था तो कोई बुजुर्ग खांस पड़ता था।
     चन्दना ने देखा की उसकी सास काँप रही है। वह झट से उठ बैठी और देखा उसको तो बुखार है। उसने अपनी चादर भी ओढ़ा दी। शिविर के बाहर देखा तो सेना के जवान बाहर बैठे थे। उसने इधर - उधर देखा , पति और ससुर नज़र नहीं आये।
          उसे देख एक बोला , " क्या बात है ? क्या समस्या है ? "
     कितना कोमल और विनम्र स्वर था !आवाज़ उसे जानी- पहचानी सी लगी। शायद यही वह सैनिक था जिसने उसे नाव  में बैठाया था।
          " वो हम ...  अपने पति को देख रही थीं  ... "
       " क्या नाम है ? "
     " भैरव। "
      " अब इतनी लोगों में कैसे पता करूँ कि वह कहाँ मिलेगा ! मुझे बता दो , क्या सन्देश देना है .... "
    चन्दना चकित -सी थी कि कोई पुरुष इतनी कोमलता और धीरजाई से भी बोल सकता है ! चुप सी उसके मुँह  को ताकती रही।
       फिर संभल कर बोली , " अम्मा को ठण्ड लग रही है ; शायद बुखार हो गया है ...."
  " हाँ तो ऐसे बोलो ना .. मैं डॉक्टर को भेजता हूँ ...."
   थोड़ी देर में डॉक्टर ने आ कर ना केवल उसकी सास को बल्कि जिस किसी को भी कोई तकलीफ थी , दवा दे कर गया।
       चन्दना को नींद नहीं आ रही थी। और वह ही नहीं , सो तो कोई भी नहीं रहा था।  बाढ़ ने सब कुछ लूट लिया था।
        वह सास के  पैर दबाने लगी क्यूंकि वह बहुत बैचेन थी।  बहुत साल पहले बाढ़ ने उसके बापू और छोटे बेटे को लील लिया था। तब से हर बरसात के बाद बाढ़  उसके घाव हरे कर जाती थी।  छिले हुए घाव बहुत टीस  दिए जा रहे थे।
     " अरी बिटिया ! अब कुछ नहीं बचेगा , हाय मैं ही मर क्यों नहीं जाती ! "
" देखो अम्मा ,ऐसे करोगी तो दवा  नहीं लगेगी तो सच में ही मर जाओगी ! फिर हमारा कौन है ? " चन्दना ने दुखी होते सास को पुचकारा।
       कितनी लम्बी रात थी।  सुबह होने का नाम नहीं। एक तरफ मच्छरों/ झींगुरों की भिनभिनाहट और दूसरी तरफ नदी का चिंघाड़ता पानी !
         उसे याद आया जब यह नदी शांत हो कर बहती है तो कितनी सुहानी लगती है। कई बार वह और भैरव नदी किनारे  जाते हैं।
 एक दिन भैरव ने उससे प्यार जताते हुए कहा था , " तुझ पर मुझे इतना प्यार आ रहा है कि तुझे नदी में डुबो कर ही मार दूँ ! फिर जोर से हँस पड़ा था। वह चुप उसके मुँह को ताकती रही कि ये कैसा प्यार है !
       राजो और परबतिया उठ कर बाहर चली तो वह भी उनके पीछे चल पड़ी। अम्मा भी सो चुकी थी। वे तीनों बाहर खड़ी हो कर मौसम का जायजा लेने लगी।
       " कितना समय हुआ होगा ..." यह राजो थी।
     " तीन बजने वाले हैं ! क्यों ? अब क्या हुआ है ! " एक सैनिक चिल्ला कर बोला।
   " कुछ नहीं भाई जी ! हम तो ऐसे ही पूछ रहे हैं ! "
 " ठीक है फिर , जाओ सो जाओ ! "
        नींद आ तो नहीं रही थी पर फिर भी बदन ढीला पड़ते ही आँख तो लग ही गई। सुख भरी उम्मीद की सुबह की आस में।
      सुबह तो और भी निराश करने वाली थी। शोर -शराबा , चिल्लाहट -कराहट भरे शब्दों से सराबोर। बरसात थम गई थी पर पानी अभी  उतार पर नहीं था।
          अम्मा का बुखार अब ठीक था। सभी औरतें घेरा डाल कर बैठी थी। तभी शोर सा हुआ तो  सभी का ध्यान शोर की तरफ गया। पता लगा कि सुबह-सुबह पंडित जी जो कि  गांव के मंदिर के पुजारी भी थे ; सुबह का ध्यान -पूजन करने लगे तो कुछ युवाओं का खून खौल उठा।  पंडित जी को घेर लिया।
      " ये क्या है पंडित जी ! किस भगवान को याद कर रहे हो ? "
     " ये मेरा रोज का नियम है ! "
  " होगा नियम ! पर आप उस भगवान को बुलाओ तो सही जो हमें हर साल ऐसे दुःख देता है ....."
  " भगवान किसी को दुःख नहीं देता बेटा ....ये हमारे कर्म हैं जो भोग रहे हैं !
  " तेरे कर्मों की ऐसी की तैसी ! जो दुधमुहाँ बच्चा है , उसके भी कर्म खराब है क्या ? " भैरव तो जैसे मारने को हुआ।
       शोर सुन कर बचावकर्मी भी आ गए।  कैसे ही समझा कर सबको शांत किया।
    चन्दना  ने देखा  कि वही सैनिक सबसे आगे था और उसने कितने आराम से सबको समझा-बुझा कर शांत किया था। उसने उसे गौर से देखा। थोड़े से गहरे सांवले रंग , सुन्दर गठीले बदन का  और बहुत लम्बे कद का था। वह उसे जाते हुए देखती रही। उसके एक -एक कदम पर चन्दना के मन में कुछ हलचल सी हो रही थी।
         किसी के पास  कोई काम तो था नहीं। जब तक धूप नहीं चढ़ गई  पानी के पास ही बैठे रहे। कुछ महिलाएँ खाना बनाने के काम में लग गई। उनमे चन्दना भी थी।
            उसे  दूर से वह सैनिक भी दिख रहा था। जो कि गाँव के गणमान्य लोगों  के साथ हालत का जायजा ले रहा था। उसकी सास भी करीब ही बैठी थी। सैनिकों को आशीष दिए जा रही थी, " ये भी तो अपनी माँ के लाल हैं , किसी के पति ,भाई और पिता हैं ... जान  हथेली पर सब रखे जगह मौजूद होते हैं... जुग-जुग जिए ऐसे माँ के लाल !" उसे देखना चन्दना को बहुत भला  लग रहा था।
         सारा दिन बेकार शिविर में बैठे -बैठे सबको उकताहट सी हो रही थी। चन्दना ने अपनी सहेलियों  को बाहर चल ने  का इशारा करती हुई चल पड़ी। बाहर आ कर सुकून मिला लेकिन सिर्फ तन को ही ; मन को सुकून कहाँ था। एक पेड़ की घनी छाया में बैठ गई। दूर तक फैला पानी और पसरी हुई उदासी , माहौल को भारी बनाये जा रही थी।
          " हमनें  इस धरती पर जन्म ही क्यों लिया ? यहाँ रहना कितना मुश्किल है !  अब यह पानी जाने कब उतरेगा और कब हम घर जायेंगे ......"
          " हाँ और नहीं तो क्या ! घर भी मिलेगा या नहीं ...., अब तो दो महीने के लिए जिन्दगी मुश्किल हो गई है ...., घर की मरम्मत करेंगे या सामान जुटाएंगे ..."
      " सच्ची ! कैसा जीवन है हमारा ! जीवन पटरी पर आएगा तब तक फिर से वही सब-कुछ ..."
        साखियों की वार्तालाप का विषय घूम फिर कर घर की चिंता में ही आ रहा था। तभी खट -खट की आवाज़ से सभी चौंक पड़ी। आवाज़ पेड़ के तने से आ रही थी। उछल कर खड़ी हो कर कौतुहल से देखने लगी। पेड़ के तने में एक कोटर था। वहाँ कठफोड़वे के छोटे-छोटे बच्चे थे।
     उनको देख कर सभी  अपनी  सारी उदासी भूल कर किलक पड़ी।
   " देख तो लक्ष्मी ! कितने प्यारे-प्यारे बच्चे हैं ....."
" सच्ची रे .... , चीं -चीं -चीं ...."
  " हाहाहाहा ये कोई चिड़िया है क्या जो चीं -चीं करेगा , ये तो हुदहुद के बच्चे हैं ....."
     " ए चंदनी ! क्या हँसी - ठट्ठा लगाया है ! कुछ शर्म लिहाज है कि नहीं , सारा गाँव है यहाँ ! " भैरव की कर्कश आवाज़ से सभी चमक पड़ी। चन्दना का मुँह उतर गया और अपमान से रंग काला पड़ गया। तम्बई रंग में जैसे कालिमा घुल गई हो।
        सभी एक कतार में शिविर में चली गई।  राजो धीरे से बोली," चंदी ..ये भैरव ऐसा क्यों है ? "
     " पता नहीं ..."
     " उसकी माँ तो बहुत अच्छी है , कुछ कहती नहीं क्या ! "
     " कभी कहती तो है ....कभी कहती है कि परेशान है  बेचारा , सुन लिया कर ..."
     " यह भी क्या बात हुई ...परेशानी है तो चीखने से कम हो जाएगी क्या ?
     " तो क्या वह रात को भी ऐसा ही ....! " परबतिया ने धीरे से फुसफुसाया तो उसकी बात बीच में ही काट कर चन्दना ने लजा कर उसकी पीठ पर धीरे से धौल जमा दी।
        पानी अगर नहीं उतरा तो आने वाले दिनों में हालात गंभीर होने वाले थे। न केवल इंसानों के खाने-पीने बल्कि मवेशियों के भी खाने पर संकट आने वाला था। बीमारी फैलने का भी तो खतरा था।
          चिंता -मुक्त थे तो बच्चे ! कोई फ़िक्र नहीं ..
    वे  बकरी का बच्चा उठा लाए थे। उसी के पीछे भाग रहे थे। चन्दना के मन का बच्चा भी जाग गया। वह भी भागी और उसे उठा कर दूर झाड़ियों की ओर दौड़ पड़ी। बकरी का बच्चा भी घबरा कर - कसमसा कर उसकी गोद से उछल कर भाग गया।
      इस से पहले वह उसके पीछे भागती ; एक जानी - पहचानी आवाज़ सुन कर ठिठक गई।  यह आवाज़ उसी सैनिक की थी। वह खींची -सी चली गई। वह पेड़ के नीचे दूसरी तरफ मुँह किये फ़ोन पर बात कर रहा था। चन्दना की तरफ उसकी पीठ थी।
       " अरे चिंता मत करो ... मैं ठीक हूँ ! यहाँ कोई खतरा नहीं है और खतरे से जूझना ही तो हमारा काम है ! "
   "  ............................................. "
      " ऐसा तुम क्यों सोचती हो ... नदी का पानी हमें छू तक नहीं गया और देखो हमने एक भी जान नहीं जाने दी..."
 "........................................"
" हाहाहा .. तुम भी ना ! मेरी जान तो तुम सब में बसती है और तुम मुझे अपना राक्षस वाला तोता बता रही हो !"
"........................................ "
" देखो सुमि , हम सब अपने-अपने मोर्चे के सिपाही ही तो हैं। तुमने घर की जिम्मेदारी का मोर्चा संभाला है तभी तो मैं निश्चिंत हूँ।  सैनिक ही सीमा पर लड़ाई नहीं लड़ता है बल्कि उसके घर वाले भी एक लड़ाई लड़ रहे होते हैं ..."
".................................................."
" बातें तो तुम्हारे साथ रह कर ही सीखी है  ! हाहाहा ....."
"......................................."
" अच्छा सुमि अब फ़ोन बंद करता हूँ। तुम सबकी बहुत याद आती है। जल्दी ही मिलेंगे। बाय...."
         चन्दना कदम और दिल थामे  उसकी बातें सुनती जा रही थी। उसका यूँ प्यार और धीरजाई से बातें करना बहुत भा रहा था। उसके खड़े रहने का अंदाज भी बहुत मोहक था। सब कुछ उसके मन की गहराई में कहीं बसता जा रहा था। दिल में प्रेम का दबा हुआ एक सौता फूट पड़ा था ; जिसके सहारे वह सैनिक उसके दिल के तिकोने वाले हिस्से में जा बैठा।
          सहसा ही वह भैरव और सैनिक में तुलना करने लगी।  भैरव का ध्यान आते ही वह जैसे जाग गई  , कदम धीरे से पीछे किये कि पायल छनक गई। पायल की छनक सुनते ही सैनिक पलटा।
       " क्या हुआ ? यहाँ क्या कर रही हो ? ऐसे किसी की बातें सुना करते हैं क्या ? " बहुत प्यारी और सहज मुस्कान से चन्दना को देखते हुए चला गया।
     " हाय दैया ! "
  यह क्या हुआ ! वह तो वही जमीन पर धम से बैठ गई। दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
    " हमको ये क्या हुआ जा रहा है , उसकी आँखे ... उसकी मुस्कान ! जाने कैसी थी .... हाँ यही तो है वो आँखे हैं जिनकी तलाश थी उसको बरसों से या सदियों से ..! "
      वह चित लेट गई धरती पर ही।  मन पंछी उड़ने को आतुर था।
       आसमान में काली घटाएँ घिर आई थी। आज उसको किसी की कोई चिंता नहीं थी। मन कर रहा था कि धरती पर लोट जाये। जहाँ वह सैनिक खड़ा था , वहाँ की धूल अपने माथे पर लगा ले। अपने बदन पर लपेट ले। जोगन हो जाने का मन हो आया। बदन से चंदन की महक उठने लगी।
         भावातिरेक में खिलखिला कर हँस पड़ी।
      " चन्दना बिटिया ! " सास की आवाज़ से चौंकी।  आँखे खुली तो देखा दूर तक उदासी के अलावा कुछ भी नहीं था।
    " अरी क्या हुआ .... ऐसे पगली की तरह क्यों हँस रही है .... तबियत तो ठीक हैं न ...."
   " ना अम्मा ... कुछ भी ठीक नहीं है ..." मुंदी आँखों से उसने कहा।
   " वह तो दिख ही रहा है कि ठीक नहीं है ,तेरे लच्छन बता रहे हैं ! हुँह ..."
    अम्मा की बात सुन कर उसकी पूरी आँखे खुल गई।  सास से पूछने लगी ,  " अच्छा अम्मा ! नदी कब तक उतरेगी  .. "
       " यही तो बताने आई थी ...पानी उतरने  लगा है !  कल तक शायद हम भी लौट चलें !" अम्मा की आवाज़ में ख़ुशी झलक दिखाई दी।
        " इतनी जल्दी ! "
    " क्यों तुझे घर नहीं जाना क्या ? "
    " जाना क्यों नहीं है अम्मा ! "
      चन्दना  कहने को तो कह गई पर उसका दिल बैठ सा गया।  अभी तो जिंदगी मिली थी और फिर से वही जहालत भरी जिंदगी में जाने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन सच्चाई तो यही थी।
      फिर सोचा कि अभी दो दिन की जिन्दगी और है। जी लूंगी.... सारे जीवन को पोषण करने को खाद-पानी जो मिल जायेगा। मुस्कुराती हुई अम्मा के पीछे दौड़ पड़ी।
               अगली सुबह नदी सच में ही उतर चुकी थी। सभी खुश थे। चन्दना भी खुश थी। लेकिन सच में वह खुश नहीं थी।स्थिति को सामान्य होने में  दो दिन लग गए थे। । घरों से पानी ही निकला था। नुकसान भी तो बहुत हुआ था। प्रशासनिक अधिकारी जाँच-पड़ताल में लगे थे। कितना नुक्सान हुआ है और कितना हर्जाना मिलेगा !
          इस बीच चन्दना को सैनिक का इधर -उधर मुस्तैदी से काम में लगे रहना बहुत लुभा रहा था। लेकिन उसकी चंचलता गुम - सी हो गई थी। सखियों ने ,सास ने कई बार पूछा भी ... छू कर भी देखा की कहीं बुखार तो नहीं है। वह तप तो रही थी लेकिन बुखार से नहीं , आने वाले समय में मिलने वाली विरह की अग्नि में !
         कभी वह भैरव से उसकी तुलना करने लगती तो लगता कि वह क्यों सूरज और दीपक में तुलना कर रही है ?  उसे मालूम तो था ही कि उसके अँधेरे जीवन में  दीपक ही प्रकाश करेगा। सूरज का क्या , वह तो शाम को ढल जायेगा किसी और देश में प्रकाश करने के लिए !
           गाँव वालों को छोड़ने के लिए सेना के ट्रक आ गए थे। अब चलने का समय था। एक ख़ुशी भरा शोर था। तभी सरपंच जी ने आ कर कहा कि राखी का त्यौहार नजदीक ही है तो क्यों ना सभी सैनिक भाइयों की कलाइयों पर राखी बांध कर , पहले ही मना लिया जाये।
        पूजा में काम आने वाली मोली लिए औरतें, जिनमें चन्दना भी थी , राखी की तरह सैनिकों की कलाइयों बांधने लगी।  सैनिकों के चेहरे पर बहुत कोमल भाव थे और आँखों में नमी। वे भी तो अपनी बहनों को याद कर  रहे होंगे। चन्दना ने बाकी सैनिकों को तो राखी बाँधी लेकिन उस एक सैनिक के सामने आते ही काँप उठी...  मुँह का रंग पीला पड़ गया। उसने नज़रें उठा कर सैनिक की तरफ देखा तो उसने सहज भाव से मुस्कुरा कर अपनी कलाई आगे बढ़ा दी।
             चन्दना से धागा बाँधा ही नहीं गया और मुँह घुमा कर रो पड़ी।  थोड़ा पीछे हट कर दौड़ पड़ी , कोटर वाले पेड़ के नीचे जा कर रोने लगी। सबको हैरानी हो रही थी कि इसे क्या हुआ ! वह रोई क्यों  !
       " उसे अपना भाई याद आ गया होगा ! छह महीने से मिली जो नहीं ..." चन्दना की सास ने कहा।
       एक दिन वह था जब वह घर नहीं छोड़ना चाहती थी और आज का दिन था  वह यहाँ से जाना नहीं चाहती थी। वह फिर से वही घड़ी -पल आत्मसात का लेना चाहती थी। उसे मालूम था फिर यहाँ नहीं आना होगा। दोनों हाथ फैला कर सूरज को अपने हाथों में समेटने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
        " यहाँ क्या कर रही हो ? तुम्हारे लिए  गाड़ी फिर से आएगी क्या ? " सैनिक की आवाज़ सुन कर चौंक गई।
        आज उसने नज़रें न झुकाई , न ही चुराई और न ही दौड़ लगाई। अनपढ़ चन्दना सैनिक की आँखों में झाँक कर प्रेम की सारी पढाई कर लेना चाहती थी। सैनिक भी थोड़ा चकित था। अपनी ओर  चन्दना को अपलक देखते हुए पाया तो झेंप गया। उसको चलने को बोल कर मुड़ गया।
      ट्रक के छत के सुराख से आती हुई जाते , शाम ढलते हुए सूरज की धूप को पकड़ने की नाकाम कोशिश ने उसे रुला दिया।  ट्रक चल पड़ा था। वह ढलते हुए सूरज को देर तक ताकती रही जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गया।
उपासना सियाग
(अबोहर)

Sunday, October 11, 2020

उसके बाद .....?


   
      गाँव की गलियों के सन्नाटे को चीरती एक जीप एक बड़ी सी हवेली के आगे रुकी।  हवेली की ओर बढ़ते हुए चौधरी रणवीर सिंह की  आँखे अंगारे उगल रही है  चेहरा तमतमाया हुआ है। चाल  में तेज़ी है जैसे बहुत आक्रोशित हो, विजयी भाव तो फिर भी नहीं थे चेहरे पर। चेहरे पर एक हार ही नज़र आ रही थी।
     अचानक सामने उनकी पत्नी सुमित्रा आ खड़ी हुई और सवालिया नज़रों से ताकने लगी। सुमित्रा को जवाब मिल तो गया था, लेकिन उनके मुंह से ही सुनना चाह  रही थी। जवाब क्या देते वह ...! एक हाथ से झटक दिया उसे और आगे बढ़  कर बरामदे में रखी  कुर्सी पर बैठ गए।
     सुमित्रा जाने कब से रुदन रोके हुए थी। घुटने जमीन पर टिका कर जोर से रो पड़ी, " मार दिया रे ...!  अरे जालिम मेरी बच्ची  को मार डाला रे ...!"
   रणवीर सिंह ने उसे बाजू से पकड कर उठाने की भी जरूरत नहीं समझी  बल्कि  लगभग घसीटते हुए कमरे में ले जा धकेल दिया और बोला , " जुबान बंद रख ...! रोने की, मातम मनाने की जरूरत नहीं है ! तुमने कोई हीरा नहीं जना था, अरे कलंक थी वो परिवार के लिए, मार दिया ...! पाप मिटा दिया कई जन्मो का ...पीढियां तर गयी ...!"
 बाहर आकर घर की दूसरी औरतों को सख्त ताकीद की,  कि कोई मातम नहीं मनाया जायेगा यहाँ, जैसा रोज़ चलता है वैसे ही चलेगा। सभी स्तब्ध थी। लेकिन हिम्मत  में थी जो कोई आवाज़ भी मुँह से निकाले। 
    घर की बेटी सायरा जो कभी इन्ही चौधरी रणवीर सिंह के आँखों का तारा थी , आज अपने ही हाथों उसे मार डाला।
     "मार डाला ...!" लेकिन किस कुसूर की सजा मिली है उसे ...!
         प्यार करने की सज़ा मिली है उसे ...!
       एक बड़े घर की बेटी जिसे पढाया लिखाया, लाड-प्यार जताया, उसे क्या हक़ है किसी दूसरी जात के लड़के को प्यार करने का ...! क्या उसे खानदान की इज्ज़त का ख्याल नहीं रखना चाहिए था ? चार अक्षर क्या पढ़ लिए ...! बस हो गयी खुद मुख्तियार ...!
     चौधरी रणवीर सिंह चुप बैठा ऐसा ही कुछ सोच रहा है। अचानक दिल को चीर देने वाली आवाज़ सुनाई दी। सायरा चीख रही थी ..." बाबा, मत मारो ...! मैं तुम्हारी तो लाडली हूँ ... इतनी बड़ी सज़ा मत दो अपने आपको ...! मेरे मरने से तुम्हें  ही सबसे ज्यादा दुःख होगा। तुम भी चैन नहीं पाओगे ...!"
       सुन कर अचानक खड़ा हो गया रणवीर सिंह और ताकने लगा की यह आवाज़ कहाँ से आई। फिर कटे वृक्ष की भांति कुर्सी पर बैठ गया क्यूँकि यह आवाज़ तो उसके भीतर से ही आ रही थी। पेट से जैसे मरोड़ की तरह रुलाई ने  फूटना चाहा।
   लेकिन वह क्यूँ रोये ...! क्या गलत किया उसने। अब बेटी थी तो क्या हुआ, कलंक तो थी ही ना ...! कुर्सी से खड़े हो बैचेन से चहलकदमी करने लगा।
   "अपने  मन को कैसे समझाऊं कि इसे चैन मिले। किया तो तूने गलत ही है आखिर रणवीर ...! कलेजे के टुकड़े को तूने अपने हाथों से टुकड़े कर दिए। किसी का क्या गया , तेरी बेटी गयी , तुझे कन्या की हत्या का पाप भी तो लगा है , क्या तू उसे और समय नहीं दे सकता था। "  रणवीर सिंह सोचते -सोचते दोनों हाथों से मुहं ढांप  कर रोने को ही था कि बाहर से आहट हुई। किसी ने उसे पुकारा था। संयत हो कर फिर से चौधराहट का गंभीर आवरण पहन बाहर को चला।
   आँखे छलकने को आई, जब सामने बड़े भाई को देखा। एक बार मन किया कि लिपट कर जोर से रो पड़े। माँ-बापू के बाद यह बड़ा भाई रामशरण ही सब कुछ था उसका।  मन किया फिर से बच्चा बन कर लिपट  जाये भाई से और सारा दुःख हल्का कर दे। वह रो कैसे सकता था ? उसने ऐसा क्या किया जो दुःख होता उसको। सामने भाई की आँखों में देखा तो उसकी भी आँखों में एक मलाल था। ना जाने कन्या की हत्या का या खानदान की इज्ज़त जाने का। चाहे लड़की को मार डाला हो कलंक तो लग ही गया था।
    दोनों भाई निशब्द - स्तब्ध से बैठे रहे। मानो शब्द ही ख़त्म हो गए सायरा के  साथ -साथ। लेकिन रणवीर को भाई का मौन भी एक सांत्वना सी ही दे रहा था। थोड़ी देर बाद रामशरण उसके कंधे थपथपा कर चल दिया।
  चुप रणबीर का गला भर आता था रह - रह कर, लेकिन गला सूख रहा था। आँखे बंद, होठ भींचे कुर्सी पर बैठा था।
   " बापू पानी ..." , अचानक किसी ने पुकारा  तो आँखे खोली।
    'अरे सायरा ...!'
       यह तो सायरा ही थी सामने हाथ में गिलास लिए। उसे देख चौंक कर उठ खड़ा हुआ रणवीर। बड़े प्यार से हमेशा की तरह उसने एक हाथ पानी के गिलास की तरफ और दूसरा बेटी के  सर पर रखने को बढ़ा दिया।                     लेकिन यह क्या ...?
 दोनों हाथ तो हवा में लहरा कर ही रह गए। अब सायरा कहाँ थी ! उसे तो उसने इन्ही दोनों हाथों से गला दबा कर मार दिया था। हृदय से एक हूक सी निकली और कटे वृक्ष की भाँति कुर्सी पर गिर पड़ा।
    रणबीर की सबसे छोटी बेटी सायरा जो तीन भाइयों की इकलौती बहन भी थी। घर भर में सबकी लाडली थी। जन्म हुआ तो दादी नाखुश हुई कि  बेटी हो गयी कहाँ तो वह चार पोतों को देखने को तरस रही थी और कहां सायरा का जन्म हो गया। तीन ही पोते हुए अब उसके, जोड़ी तो ना बन पाई।
    रणबीर सिंह तो फूला ही नहीं समा रहा था। घर में लक्ष्मी जो आयी थी। बहुत लाड-प्यार से पल रही थी सायरा। जिस चीज़ की मांग की या जिस वस्तु पर हाथ रखा वही उसे मिली।
      तो क्या उसे जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं था ?
     यही सवाल लिए सायरा से बड़ा और रणबीर का छोटा बेटा  यानि तीसरे  नंबर की संतान राजबीर सामने खड़ा था। तीनों भाइयों में राजबीर ही सायरा के पक्ष में बोल रहा था कि वह सोमेश से शादी कर सकती है। जब लड़का हर तरह से लायक है, सायरा को खुश रख सकता है, तो जाति कहीं भी मायने नहीं रखती। आखिर बात तो सायरा की ख़ुशी की है। लोगों का क्या वह चार दिन बात बना कर रह जायेंगे। सारी  उम्र का संताप -दुःख तो सायरा को नहीं भोगना पड़ेगा।
     रणवीर सिंह के दूसरे दोनों  बेटे  अपने पिता जैसी ही सोच रखते थे। लेकिन रणवीर ने अपने तीनो बेटों को ही किसी बहाने से शहर भेज दिया। क्यूंकि वह नहीं चाहता था कि जो कुछ भी वह करने जा रहा था उसके लिए उनके बेटे और उनके परिवार किसी मुसीबत में आये।
  अब राजबीर सामने खड़ा था अपनी आँखों में लिए क्रोध , दर्द और विशुब्ध सा बेबस -लाचार । पिता ने उसे धकेल कर आंगन में आवाज़ लगाई कि खाना क्यूँ नहीं बना आज।
 लेकिन क्या रणवीर सिंह को भूख थी भी या ऐसे ही सामान्य दिखने का ढोंग कर रहा था ...! यह तो वह भी नहीं जानता था। बेचैन सा था जैसे कलेजा फट ही जायेगा उसका।
   कालू राम जो कि घरेलू काम-काज के लिए रखा हुआ था, खाने की थाली सामने रख गया। रणबीर सिंह खाना, खाना तो दूर देखना भी नहीं चाह रहा था।
     रह -रह कर सुमित्रा की सिसकियाँ गूंज रही थी घर में फैले सन्नाटे में। सिसकियाँ कभी करूण  क्रन्दन में बदलना चाहती तो उनको मुहं पर अपनी ओढ़नी को रख कर वापस अंदर ही धकेल दिया जा रहा था।
     ऐसे माहोल में कोई इन्सान कैसे सामान्य रह कर खाना खा सकता था। लेकिन रणबीर ने फिर भी जी कड़ा कर के रोटी का एक कौर तोड़ा, सहसा उसे लगा कि उसके हाथों से खून बह रहा है । रोटी का कोर उसके हाथों से गिर गया।
   हाँ ...! वह तो खूनी है।  अपनी ही बेटी का।  ऐसे खून भरे हाथों से खाना कैसे खा सकता था रणवीर सिंह ?
    तभी एक छोटा सा हाथ उसके सामने आया और रोटी का कोर उसके मुहं में डाल दिया। यह नन्ही सायरा ही थी। बचपन में जब उसको बापू पर लाड़  आता तो वह अपने हाथों से ऐसे ही खाना खिलाया करती थी। रणवीर सिंह पर जैसे जूनून सा छा गया। वह नन्हे हाथों से खाना खाता  रहा और उसके हाथों से खून रिसता रहा। आंसुओं को रोकते -रोकते आँखों में खून उतर आया था  ...!
     " वाह बापू ....! भोजन कर रहा है , अभी पेट नहीं भरा क्या ...?" राजबीर ने थाली उठा ली उसके आगे से और चेहरे पर लानत -धिक्कार ला कर बोल पड़ा।
    रणबीर उसे धकेलते हुए से अपने कमरे की तरफ गया। सावित्री की हालत बुरी थी। गश खा रही थी बार -बार । रणबीर को देख जोर-जोर से दहाड़ें मार रो पड़ी। भाग कर उसके कुर्ते को पकड कर जोर से झंझोड़ने लगी। एक बार तो उसका मन भी हुआ की वह सावित्री को गले लगा कर जोर से रो पड़े।
      लेकिन वह क्यूँ रोये ! उसने तो कलंक ही मिटाया है खानदान का।
    सावित्री को धकेल कर वह घर की छत पर चला गया। वहां पड़ी चारपाई पर  बेजान सा  गिर गया। आँखें मूंद कर कुछ देर लेटा रहा।आँखे खोली तो सामने खुला आसमान था। काली अमावस सी रात थी। कुछ मन के अँधेरे ने रात का अँधेरा और गहरा दिया था। तारे टिमटिमा रहे थे या जाने रणवीर सिंह को देख सहम रहे थे।
      अचानक उसे लगा नन्ही सी सायरा उसके पास आकर उसकी गोद में बैठ गयी हो।जब वह छोटी थी तो ऐसे ही उसकी गोद में  बैठ कर आसमान में तारे देखा करती थी।रणबीर को याद आ रहा था कि कैसे एक रात को बाप -बेटी ऐसे ही तारे देख रहे थे। सायरा बोल पड़ी, " बापू  ...! ये तारे कितने सारे है, मुझे गिन के बताओ ना ...," और दोनों बाप - बेटी तारे गिनने में व्यस्त हो गए। अचानक रणवीर ने रुक कर कहा, " अरे बिटिया, मुझे तो दो ही तारे नज़र आते हैं, तेरी दोनों आँखों में बस ...!"कह कर अपने गले लगा लिया था।
    जब उसकी माँ का देहांत हुआ था तब भी उसने सायरा को यह कह कर बहलाया था कि उसकी दादी उससे दूर नहीं गयी है बल्कि आसमान में तारा  बन गयी है। सायरा भोले पन  से पूछ बैठी, " बापू  , एक दिन मैं भी ऐसे ही तारा बन जाउंगी क्या ? फिर आप भी मुझे देखा करोगे  यहाँ से ...!"
   सुन कर रणबीर काँप उठा था। उसके मुहं पर हाथ रख दिया था और बोला , " ना बिटिया ना , ऐसे नहीं बोलते ...!" आँखे भर कर सीने से लगा लिया था।
  और आज सच में ही वह आसमान को ताक रहा था कि कहीं  शायद सायरा दिख जाये किसी तारे के रूप में।दिल में एक हूक सी, कलेजा फटने को हो रहा था। अब वह केवल पिता बन कर सोच रहा था। एक हारा  हुआ पिता, जिसने  अपने कलेजे के टुकड़े को अपने ही हाथों गला दबा कर मार डाला था वहीं चिता  बना कर अंतिम संस्कार भी कर दिया। आँखे भरती  ही जा रही थी अब रणबीर की।
     तभी छत पर बने कमरे में रोशनी नज़र आयी। यह कमरा सायरा का था। उठ कर कमरे के पास गया तो उसे लगा जैसे सायरा अन्दर ही है। दरवाज़ा धकेला तो आसानी से खुल गया। लेकिन रोशनी कहाँ थी वहां ...! एक सूना सा अँधेरा भरा सन्नाटा ही फैला था। हाथ बढ़ा कर लाईट जला दी रणबीर ने।
           सजा संवरा कमरा लेकिन उदास हो जैसे ..., जैसे उसे उम्मीद हो सायरा के आ जाने की !
रणबीर की नजर सामने की अलमारी पर पड़ी तो उसे खोल ली। अलमारी में सायरा की गुड़ियाँ रखी हुयी थी। उसे गुडिया खेलने का बहुत शौक था। जब भी बाज़ार जाना होता तो एक न एक खिलौना तो होता ही था साथ में गुडिया भी जरुर होती थी। रणबीर सिंह गुड़ियाँ देखता -देखता जैसे रो ही पड़ा जब उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ी। हूक सी उठी , तड़प  उठा , उसने अपनी ही गुडिया का गला दबा दिया। जोर से रुलाई फूटने वाली ही थी कि सामने गुड्डा रखा नज़र आया।
    'ओह यह गुड्डा ! यह गुड्डा कितनी जिद करके लाई थी सायरा।'
  उसे याद आया,  एक बार वह सायरा को शहर ले कर गया था तो बहुत सारे खिलौने दिलवाए थे जिस पर हाथ रख दिया वही खिलौना उस का हो गया। दोनों हाथों में खिलौनों के थैले अभी जीप में रखे ही थे कि सायरा ठुनक गई ! छोटा सा -प्यारा सा मुहं और नाक सिकोड़ कर बोली, " बापू , आपने मुझे गुड्डा तो दिलाया ही नहीं ...! "
रणबीर ने हंस कर उसे गोद में उठा कर कहा , " बिटिया , अगली बार जब हम आयेंगे तो ले दूंगा , अब तो देर हो गयी , रात होने को है। "
  " नहीं बापू , मुझे तो अभी ही लेना है नहीं तो मैं घर ही नहीं जाउंगी ...!" सायरा ने रुठते हुए कहा।
इतनी प्यारी बेटी और रणबीर के कलेजे का टुकड़ा, उसकी बात को वह कैसे नहीं मानता  ...! आखिरकार कई दुकानों पर ढूंढते - ढूंढते सायरा का मन पसंद गुड्डा मिल ही गया था। घर आकर दादी और माँ की डांट पड़ी तो थी लेकिन गुड्डे मिलने की खुशी ज्यादा थी।  डांट एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी गई।
   आज वही गुड्डा हाथ में लिए सोच रहा था रणबीर , कि बेटी के इस बेजान गुड्डे लेने की जिद तो पूरी की लेकिन एक जीते -जागते गुड्डे की मांग पर उसने बेटी की जान ही ले ली ! सायरा ने अपना मन पसंद गुड्डा ही तो माँगा था जो उसे खुश रखता। और उसने क्या किया बेटी की ही जान ले ली ...!
    "हाय ...! मेरी बच्ची, यह  क्या किया मैंने ?" हाथ में गुड्डा ले कर भरे हृदय और  सजल आँखों से सोच रहा था वह। सामने की दीवार पर सायरा की तस्वीरें थी छोटी सी गुड़िया  से ले कर कॉलेज जाने तक की। हर तस्वीर में हंसती हुई सायरा बहुत प्यारी दिख रही थी। मेज़ पर भी एक तस्वीर थी।  रणबीर ने उसे उठा लिया। तस्वीर जैसे चीख पड़ी हो।  सायरा जीवन की भीख मांगती जैसे चीख रही थी, वैसे ही चीख रही थी तस्वीर।
  रणबीर ने तस्वीर को सीने से लगा लिया और जोर से रो पड़ा , " ना मेरी बच्ची ना रो ना , मैं तेरा बापू नहीं हूँ अरे पापी हूँ , कसाई हूँ मैं ...!"
  रोते -रोते कमरे के बाहर आ गया गुड्डे और सायरा की तस्वीर को सीने से लगा रखा था। छत पर ही एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गया और रोता रहा ना जाने कितनी देर तक।  कितनी ही देर बाद उसने गर्दन उठाई और आसमान की तरफ ताकने लगा जैसे सायरा को खोज रहा हो। सामने भोर का तारा  जगमगा रहा था। रणबीर को लगा कि उसमें सायरा है। तारे को देख वह फिर रोने लगा।
    अचानक भोर के तारे के पास एक तारा और जगमगाने लगा। कुछ देर में ही सवेरा हो गया। सवेरा होने के साथ -साथ गाँव दीनासर में एक चर्चा सरे आम थी। एक तो भोर के तारे के पास एक तारे के दिखने का और दूसरी चौधरी रणबीर सिंह की मौत की।


 उपासना सियाग
नई सूरज नगरी
गली नम्बर 7
नौवां चौक
अबोहर ( पंजाब ) 152116

8264901089


Sunday, April 26, 2020

दरवाज़ा खोलो .....!

    दरवाज़ा खोलो .....!

   " दरवाज़ा खोलो !!"
" ठक ! ठक !! दरवाज़ा खोलो !!!
    रात के तीन बजे थे। सुजाता ठक -ठक की आवाज़ की और बढ़ी चली जा रही थी। बहुत बड़ी लेकिन सुनसान हवेली थी। चलते -चलते तहखाने के पास जा कर सुजाता के कदम रुक गए। कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। नीम रोशनी में देखा दुल्हन का सा लिबास पहने  फूल कँवर खड़ी थी।
      " यह यहाँ कैसे ! यह तो मर गई थी ! फिर क्या करने आयी है ? "सुजाता का कलेजा जैसे मुहँ की ओर आ गया ।फूल कंवर  उसकी और  देखती हुई मुस्कुराये जा रही थी।
           बहुत बरस हुए फूल कंवर को अपने देवर की दुल्हन बना कर लाई थी। तब भी  मुख पर ऐसी ही प्यारी सी मुस्कान थी। देवर वीरेश को पुत्र की तरह पाला था। वीरेश की माँ, सुजाता के पति राज सिंह की सौतेली माँ थी। वीरेश छोटा ही था तब उसकी माँ भी चल बसी। ठाकुर साहब ने बड़े बेटे राज सिहं की शादी कर दी। सुजाता ने वीरेश को मातृवत्त स्नेह दिया। यह स्नेह और भी गहरा हो गया, जब उसका पति और ससुर दोनों पारिवारिक रंजिश में मार दिए गए।
      अब दोनों देवर भाभी रह गए  इतनी बड़ी हवेली और जायदाद के साथ। उसने बहुत मुश्किल से वीरेश की परवरिश की। युवा होने पर सुजाता को राय दी गई की अब उसे वीरेश का ब्याह कर लेना चाहिए। परिवार बढ़ेगा। रौनक लगेगी। वंश भी तो आगे बढ़ेगा ! वह चाहती तो नहीं थी कि वीरेश का विवाह हो , लेकिन चाहने से क्या होता है।विवाह तो करना ही था। ना करने का कारण भी तो कोई नहीं था।
      सुकुमार  वीरेश और फूलों सी नाजुक फूल कंवर।
बरसों बाद हवेली में रौनक लगी थी। सब खुश  थे कि अब हवेली में छाई उदासी हट जाएगी और खुशियां ही खुशियां होगी। आज दुल्हन के शुभ कदम पड़े हैं। कल को खानदान  के वारिस की किलकारियां भी गूंजेगी।
        लेकिन  सुजाता खुश क्यों नहीं थी ! उसे वीरेश छिनता हुआ क्यों नज़र आ रहा था। उसने , उसे पाल  पोस कर बड़ा किया था। बैरियों से बचा कर रखा। क्या हुआ जो वीरेश को जन्म नहीं दिया था ! पाला  तो एक माँ ही की तरह था ! तो फिर उलझन क्या थी ?  क्यों सुजाता वीरेश को फूल कंवर के वजूद को सहन नहीं कर पा रही
थी ? माँ थी तो माँ की तरह ही व्यवहार करती ना ! यह सौतिया डाह उसे क्यों डस रहा था ? सीने पर सांप लौट रहे थे। वह चहलकदमी कर रही थी तेज़ी से। सांस तेज़ चल रहा था जैसे कि रुक ना जाये कहीं।
        सहनशक्ति जब असहनीय हो गई तो वह दौड़ पड़ी वीरेश के कमरे की तरफ। दरवाज़े पर आ कर रुकी। ह्रदय से एक पुकार भी उठी कि वह यह क्या करने जा रही है। लेकिन स्त्री के एकाधिकार की प्रवृत्ति कई बार सोचने समझने की शक्ति खत्म भी कर देती है। वह बुदबुदा उठी ," नहीं , वीरेश मेरा है ! मेरा बच्चा है ! इसे कोई दूर नहीं कर सकता मुझसे ! " दरवाज़ा पीटने लगी।
     " दरवाज़ा खोलो !! दरवाज़ा खोलो !! "
        वीरेश ने घबरा कर दरवाज़ा खोला। सुजाता उसे धकेल कर अंदर चली गई। कमरे में इधर -उधर नज़र दौड़ाई और आश्वस्त सी हो गई। कहीं कोई हलचल नहीं दिखी। कमरे में सजाये फूल अभी अनछुए से ही थे। गहरी साँस भर कर वीरेश के पास जा कर अपने आँचल से उसका माथा पोंछने का उपक्रम करने लगी।
   " अरे मेरे बच्चे !! कितनी गर्मी है यहाँ ! चल मेरे साथ ! मैं हवा में सुलाती हूँ !! " नव वधु को आग्नेय दृष्टि से देखती वीरेश को खींचती ले गई।
    और फूल कंवर ! वह एक दम से घटित हुई घटना से सकते में आ गई थी । उन दोनों के पीछे बढ़ी तो थी। लेकिन लाज ने कदम रोक दिए। जिन आँखों में नव जीवन के सपने भरे थे , उनमें आंसू भर गए। वहीँ जमीन पर बैठ गई। रोती  रही ...., फिर ना जाने कब आँख लग गई।
        उधर वीरेश ने कमज़ोर आवाज़ में प्रतिरोध भी किया कि गर्मी नहीं है, अगर  होगी भी  तो पंखा चलाया जा सकता है। वह सुजाता का अधिक विरोध नहीं कर पाया। मन की भावनाओं पर संकोच हावी हो गया। वह भी वहीँ सो गया।
          तीन महीने बीत गए।  सुजाता ने कोई न कोई बहाना बना कर वीरेश और फूल कंवर को एक छत के नीचे एक होने ही नहीं दिया। फूल कंवर सहमी सी रहती और वीरेश संकोच में रहता।  अपने मन की बात कभी कह ही नहीं पाया। फूल कंवर मायके भी जाती तो वीरेश को बहाने से घर पर ही रोक लिया जाता। शायद सुजाता ने जैसे प्रण  ही कर लिया था कि अगर उसे सुख नहीं मिला तो वह दुनिया की किसी भी औरत को सुखी नहीं रहने देगी।
        दिन -रात  समान हुए हैं कभी ! मौसम भी भी तो बदलते हैं। फिर फूल कंवर के जीवन में ईश्वर ने पतझड़ और गर्म लू तो नहीं लिखी थी ! संयोग से सुजाता को मायके से बुलावा आ गया और उसे जाना पड़ा। आशंकित तो थी वह लेकिन कोई बस नहीं था हालात पर।
        अब वीरेश और फूल कंवर अकेले ही थे।
         उस रात बहुत बारिश हुई। छाई उमस खत्म हो गई।  हवा का ठंडा झोंका दोनों के हृदय को सुकून दे रहा था। ह्रदय का सुकून चेहरे पर गुलाब खिला रहे थे। तीन -चार दिन बाद सुजाता लौट आई। दोनों के चेहरों पर खिले गुलाब उसके हृदय में काँटों की तरह चुभ रहे थे।
          सुजाता ने अब भी अपना नाटक जारी रखा। रात होते ही पीड़ा का नाटक शुरू होता जो भोर होने तक थमता। तो क्या फूल कंवर के जीवन में क्या चार दिन की चांदनी ही थी ?
      " नहीं शायद ! "
      उसे कुछ दिनों से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था। तबियत भी गिरी-गिरी  सी थी शायद ये किसी नन्ही जान के आने की आहट थी और उसे ही पता नहीं था।  लेकिन सुजाता को भान हो गया था। वह तड़प उठी। सर को, हाथों को दीवार पर मारा। खुद को लहूलुहान कर लेना चाहती थी। लेकिन तभी कुछ सोच कर फूल कंवर के कक्ष की तरफ भागी। उसे बालों से पकड़ कर बाहर ले आयी।
         मासूम फूल कंवर घबरा गई। रोते हुए कारण पूछने लगी कि उसका क्या कसूर है ?
" कसूर पूछ रही हो ? बताओ कहाँ जाती हो  ? किस से मिलती हो ? किसका पाप है ?  "
" पाप ! मैंने कोई पाप नहीं किया ! आप क्या कह रही हो ? "
"अरी ये जो पेट में पल रहा है तेरे ! "
चौंक गई फूल कंवर। एक साथ कई विचार मन में आये। खुश तो होना चाहती थी पर वह समझ नहीं पा रही थी कि  क्या कहे क्या ना कहे !
" मैंने कोई गलत काम नहीं किया ! यह तो आपके देवर का ही जिज्जी .....! "
 " झूठ मत बोलो ! अभी वीरेश को बुलाती हूँ ! "
वीरेश खुद ही वहां पहुँच गया था शोर की आवाज़ सुन कर।
 " बोलो वीरेश ! ये क्या कह रही है ? पाप किसी और का लिए घूम रही है और नाम तुम्हारा ले रही है !! "
" हाँ बोलो , तुम बोलते क्यों नहीं कि यह बच्चा तुम्हारा ही है !! " फूल कंवर हाथ जोड़े गिड़ गिड़ा  रही थी।
        कायर निकला वीरेश ! गर्दन झुका दी। ख़ामोशी दो तरफा होती है। हां भी और ना भी। सुजाता ने इसे ना समझा। जबकि वह यह जानती थी कि फूल कंवर सच बोल रही थी।
        कैसी विडंबना थी ! वीरेश को मालूम था कि फूल कंवर सच बोल रही थी फिर भी चुप रहा।  ऐसा भी क्या भय था उसे जो सच का साथ ना दे सका। सुजाता को वीरेश की ख़ामोशी का बल मिला। वह  फूल कंवर को घसीटती हुई तहखाने में ले गई और बंद कर दिया। फूल कंवर की आर्त पुकार कोई नहीं सुन रहा था। नौकर भी थे लेकिन वे सब हुकुम के गुलाम और बेजुबान थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि  मालकिन का विरोध कर सकें।
       सुजाता ने वीरेश को मज़बूर कर दिया कि वह उसकी बात माने और रात को तहखाने में ले कर गई। सुजाता में बेसुध फूल कंवर के प्रति नफरत ना केवल शब्दों और आँखों से बल्कि रोम -रोम से फूट रही थी।
   " वीरेश , मार डाल इस कुलक्षिणी को ! यह जीने के लायक नहीं है !! "
फूल कंवर  तीन दिन से भूखी थी। बोलने की भी क्षमता नहीं थी उठती  तो क्या ! पड़ी रही। मौत की बात सुन कर कांप उठी। जमीन पर घिसट कर दीवार की तरफ सरकने की कोशिश की। लेकिन जो सात जन्म का वादा कर के हाथ पकड़ कर लाया था वही साथ नहीं निभा पाया तो शिकायत किस से !
       सुजाता ने फूल कंवर को घसीट कर चारपाई के पास पटक दिया। चारपाई का पाया उसके कलेजे पर रख दिया। वीरेश को कहा कि वह पाये पर जोर दे कर फूल कंवर को मार डाले। वीरेश के एक बार तो हाथ कांपे लेकिन ना जाने क्या डर था उसे भाभी का।  आदेश का पालन हुआ।
          मर गई फूल कंवर ! मर गई या जी गई यह तो कौन बताता।
  परन्तु ईश्वर जो दुनिया बनाता है , सबका रक्षक होता है ! वह क्यों नहीं आया !
        जब कोई पुरुष स्त्री पर अत्याचार करता है तो इंसानो की ना सही लेकिन ईश्वर की अदालत में इंसाफ की उम्मीद जरूर की जाती है। लेकिन यहाँ एक स्त्री थी दूसरी स्त्री पर अत्याचार करने वाली ! ईश्वर स्तब्ध हो जाता है ऐसे दृश्य देख कर। वह हैरान हो जाता है कि स्त्री को बनाते हुए वह पांच तत्वों को गूंधते हुए कुछ ईश्वरीय अर्क भी समाहित करता है। यही ईश्वरीय अर्क स्त्री के दया और ममता भर देता है। फिर कोई स्त्री इतनी क्रूर कैसे हो सकती है ?
           भोर होने पर खबर फैला दी गई कि फूल कंवर  करंट लगने से मर गई। उसके शव के पास सुजाता का विलाप दिलों को जैसे चीर रहा था। माहौल बेहद ग़मगीन था। परन्तु यह विलाप कैसा था ? इसमें तो जैसे आल्हाद छुपा था। वीरेश खामोश था। मन में कुछ नहीं था। ख़ुशी नहीं थी तो गम भी नहीं था।
            फूल कंवर चली गई तो क्या हुआ। देवर को  फिर से ब्याह लिया। रागिनी आ गई। उसे तो आना ही था। घर सूना कैसे रहता। वंश भी तो बढ़ाना था !
         सुजाता ने रागिनी के साथ भी वही खेल शुरू कर दिया जो फूल कंवर के साथ करती थी। नव -वधु ने कुछ दिन तो देखा। फिर सोच -विचार कर कुछ निर्णय किया। वह सुजाता के कक्ष में गई।  लाज संकोच छोड़ कर वीरेश से बोली , " आप हमारे कक्ष में चलें। जिज्जी की सेवा करने को मैं हूँ ! वह जब तक नहीं सो जाती मैं उनके पैर दबाती रहूंगी ! "
         वीरेश भी शायद यही चाहता था। बस हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था। पिंजरे से आज़ाद हुए पंछी की तरह जल्दी से बाहर निकल गया। रागिनी धीरे से सुजाता के पैरों की तरफ झुकी। सुजाता ने झट से पैर खींच लिए। खड़ी हो कर रागिनी पर तमाचा मारने को हाथ उठाया। रागिनी ने हाथ पकड़ लिया ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न !
      " देखो जिज्जी ! माँ हो तो माँ ही बनी रहो ! सौतन बनने की कोशिश ना करो !! " हाथ झटक कर कक्ष से बाहर आ गई।
           यह तो होना ही था एक दिन ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न ! अब सुजाता की बारी थी सकते में आने की !
             जीवन की गाड़ी चल पड़ी वीरेश की। वह खुद को अपराधी तो मानता था फूल कंवर का लेकिन कर भी क्या सकता था ? हालाँकि रात के सूनेपन में एक चीख उसे जगा जाती थी। उसके बाद वह सो नहीं पाता था। अपने गुनाह के बारे में रागिनी को भी क्या बताता।
          रागिनी ! उसे जीवन के सभी रागों को सुर में ढाल कर गाना आता था। अब उसे मातृत्व का सुर ढाल कर ममता का गीत गाना  था। वीरेश बहुत प्रसन्न था लेकिन सुजाता ! वह तो खुश होने का दिखावा भी नहीं कर पा रही थी। अलबत्ता कोई न कोई कोशिश होती कि रागिनी का गर्भ समाप्त हो जाये। यह राज़ एक दिन वीरेश पर भी खुल गया। वह रागिनी को लेकर अलग घर में चला गया।
         सुजाता  क्या करती ? उसने तो वीरेश को माँ बन कर पाला था।
   निःस्वार्थ ! बेशक निःस्वार्थ !
       उसके अवचेतन मन में यही था कि जो भी उसे मिलता है छिन जाता है। इसलिए वह वीरेश के प्रति असुरक्षित थी। पारिवारिक रंजिश की वजह से और परदे की वजह से भी वह बाहर की दुनिया से अधिक सम्पर्क नहीं बना पाई। अपने ही खोल में सिमटी रही। काश,  कि कोई सुजाता को समझने वाला होता तो वह ऐसी नहीं होती। खुले दिल से वीरेश की दुनिया बसते देखती।
            उसका अकेलापन और बढ़ गया। सूनी हवेली में वह अकेली थी। पागलों की तरह यहाँ वहां हर कमरे में भागती। उसकी चीखों से सारी  हवेली तड़प उठती। रागिनी, जो कि समझदार औरत थी उसने वीरेश को सुजाता के ईलाज करवाने को कहा। कहा कि वह सुजाता के प्रति जिम्मेदारी से मुहं नहीं मोड़ सकता। आखिर उसी ने तो उसकी परवरिश की थी।
       ईलाज से तन ठीक होते हैं मन नहीं। हालात से समझोता करने के अलावा सुजाता के पास कोई चारा भी नहीं था।
              कलेजे में हूक सी उठती थी सुजाता के और वीरेश के भी। दोनों को ही उनका पाप जीने नहीं दे रहा था। वीरेश के घर में खुशियां तो आई थी लेकिन कभी हृदय से महसूस नहीं कर पाया। कभी हँसता भी तो फूल कंवर का मरता , दर्द भरा चेहरा सामने खड़ा हो जाता। उसे याद था कि कैसे फूल कंवर के चेहरे पर दर्द था। वह चली गई चिता की अग्नि में भस्म हो गई। दर्द  छोड़ गई , सुजाता और वीरेश के हिस्से में।
                सुजाता को लगता कि फूल कंवर उसके आस -पास ही मंडराती है। वह भयभीत रहती थी। किसी नौकर या नौकरानी को हवेली में रहने ही नहीं देती थी। रात को बार -बार दरवाज़े पर अंदर लगी कुण्डियां जांचती। चलती तो ऐसे लगता कि कोई साया उसके साथ -साथ चल रहा है।
        " आओ जिज्जी ! मेरे साथ चलो !" फूल कंवर बोली तो सुजाता बुरी तरह से चौंक उठी। अतीत की तन्द्रा से जाग गई हो जैसे।
       " नहीं !! मैं तुम्हारे साथ क्यों जाऊँ ? तुम हट जाओ मेरे सामने से ! चली जाओ !! "
पता नहीं यह फूल कंवर का भूत था या मन का वहम। भूत या वहम नहीं था तो यह सुजाता का पाप तो जरूर था जो आज उसके सामने खड़ा था। वह दौड़ पड़ी मुख्य दरवाज़े के पास।
     चीख रही थी ,   " दरवाज़ा खोलो !!"
दरवाज़ा पीट रही थी !   " दरवाज़ा खोलो !!"
           अंदर से बंद दरवाज़े खुलें है भला कभी !!
  दरवाज़ा खोलने के लिए कुण्डी उसके सामने थी लेकिन वह बाहर से दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार करती रही। काश कि वह अपने मन का दरवाज़ा बंद ना करती।
     सुबह दरवाज़ा तोडा गया तो सामने सुजाता मरी पड़ी थी। लहू लुहान , रक्त रंजित कलेजा फटा पड़ा था। सुना था की उसे पेट में कैंसर हो गया था , शायद वही फूट गया हो। या क्या मालूम फूल कंवर ने ही ?


( चित्र का कहानी से कोई संबंध नहीं है। यह मेरी मित्र अंजना बिजारणिया का है उनकी इज़ाज़त से ही यहाँ लगाया गया है )

Monday, August 12, 2019

आप कौन ?

    नयी -नयी लेखिका सुरभि ने पाया कि इंरटनेट  लेखन का अच्छा माध्यम है। यहाँ ना केवल लिखने का ही बल्कि अच्छा लिखने वालों को पढ़ना भी आसान है। उसने कई लिखने वालों को फॉलो करना शुरू किया। जिनमे से एक अच्छे लेखक थे जो कि  लिखते तो अच्छा ही थे पर दर्शाते उससे भी अधिक थे।
     सुरभि उनकी सभी पोस्ट पढ़ती , लाइक भी करती थी। लेकिन संकोची स्वभाव होने के कारण टिप्पणी कम ही कर पाती थी क्यूंकि वह सोचती कि लेखक महोदय इतने महान है तो वह क्या टिप्पणी करे। एक दिन वह उन तथाकथित लेखक महोदय की पोस्ट देख कर चौंक पड़ी।
     लिखा था , " आज से छंटनी शुरू ! जो मेरी पोस्ट पर नहीं आते उनको रोज थोड़ा-थोड़ा करके अलविदा करुँगा। "
      सुरभि ने चुपके से देखा कि वह , वहां है कि  नहीं ?  उस दिन तो वह वहीं थी।
       कुछ दिन बाद उसे ध्यान आया कि आज- कल उन आदरणीय-माननीय लेखक जी की कोई पोस्ट तो नज़र ही नहीं आती !
      झट से देखा ! ये क्या ? सुरभि जी का भी पत्ता कट चुका था !
       वह लेखक जी के इनबॉक्स में पूछ बैठी ," मैं तो आपके लेखन की नियमित पाठक थी ! फिर भी ?
      " मैंने तो आपको कभी देखा नहीं....., " दूसरी और से दम्भ भरा जवाब था।
     " हार्दिक धन्यवाद ! " सुरभि ने भी कह दिया।
        सोचा, " ऐसे बहुत लेखक हैं , हुहँ !"
     तीन - चार दिन बाद इनबॉक्स उन लेखक महोदय जी का गुड -मॉर्निग का सन्देशा था।
            सुरभि ने कहा , " आप कौन ? "

Thursday, June 13, 2019

हौसलों की उड़ान

             जब से बहेलिये ने चिड़िया को अपना कर देख भाल करने का फैसला किया है ;  तभी से  चिड़िया सहमी हुई तो थी ही ,लेकिन  में विचारमग्न भी थी ।वह कैसे भूल जाती बहेलिये का अत्याचार -दुराचार । उसने ना केवल उसके 'पर' नोच कर  उसे लहुलुहान किया बल्कि  उसके  तन और आत्मा को भी कुचल दिया था।  
         अब फैसला चिड़िया को करना था । उसके पिंजरा लिए सामने बहेलिया था  । " मेरे परों में अब भी हौसलों की उड़ान है !" कहते हुए उसने  खुले आसमान में उड़ान भर ली ।
        अशी ये एनिमेटेड-फिल्म देखते -देखते रो पड़ी।  कुछ महीने पहले उसको भी चिड़िया की तरह ही बहेलिये ने नोचा था। और बहेलिये ने अपना बचाव करने लिए उस से विवाह का प्रस्ताव रख दिया था। उसके फैसले का इंतज़ार बाहर किया जा रहा था। यह  एनिमेटेड फिल्म देख कर अशी को भी बहुत हौसला मिला। 
          सोचने लगी , " छोटी सी चिड़िया के माध्यम से कितनी अच्छी बात बताई है।  परों में हौसला या आत्मबल खुद में होना चाहिए। किसी का सहारा क्यों लेना। और वह भी एक आततायी का ! हर एक में एक आत्मसम्मान और स्वभिमान तो होता ही है। "
        उसने कमरे से बाहर आकर बहेलिये के प्रस्ताव पर इंकार कर दिया।

उपासना सियाग


Saturday, August 18, 2018

मन्नत

     दादी रोज मंदिर जाती और अपने परिवार की खुशियाँ , सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना कर आती। और सोचती कि प्रभु से माँगना  क्या ! उसको तो सब पता ही है।
         लेकिन कल से सोच में डूबी है। कल जब वे  रोज़ की तरह दोपहर में धार्मिक चैनल पर प्रसारित होती भागवत कथा सुन रही थी तो उसमें , कथा वाचक बोल रहे थे , " एक गृहस्थ को ईश्वर की पूजा सकाम भाव से करनी चाहिए। जैसे , क्या आपको मालूम भी होता है  कि  आपके बच्चे को कब क्या चाहिए ! वह भी तो बोल कर बताता है ; उसे यह चाहिए या वह चाहिए ! तो वैसे ही प्रभु को क्या मालूम कि  आपको कब -क्या  चाहिए ! उसके सामने तो सारा ब्रह्माण्ड होता है !"
             दादी को भी बात जँचती सी लगी।
     सोच में पड़ी बुदबुदाने लगी , " तभी मैं सोचूं , मेरे घर में इतनी परेशानियां क्यों है ! बेटा परेशान , पोती की शादी नहीं हो रही , पोते को नौकरी नहीं मिल रही ! यह तो भगवान से कभी माँगा ही नहीं  ! ठीक है भई , आज ही लो ! इतने दिन हो गए मंदिर जाते हुए , अब तो प्रभु मेरी भी पुकार सुनेंगे ही। मेरी मन्नत भी सुनेगे और इच्छा-पूर्ण होगी ! "
          उत्साह से पूजा की टोकरी तैयार की और मंदिर चल दी।
          मंदिर का सुवासित वातावरण और बजते घंटे दादी को हमेशा की तरह बहुत सुहा रहे थे। सोमवार होने के कारण कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। उनको लगा की उनकी बारी आने में अभी समय है तो वे एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ गई।
         सभी आने-जाने वाले भक्तों का जायजा लेने लगी।
           सोच रही थी ," संसार में कितना दुःख है , मंदिर में आने वाले सभी अपनी आँखे बंद कर के ,अपना-अपना दुःख भगवान को सुना रहे हैं ! क्या किसी को भगवान की सुन्दर -मुस्कुराती हुई मूर्ति नहीं दिख रही  ? सब आंखे मूंदे हुए अपना ही राग अलाप रहे हैं !यह तो सभी जानते ही हैं कि  सुख- दुःख तो हमारे कर्म फल हैं। मंदिर तो मन की शांति खोजने का तो साधन है फिर यहाँ क्यों अशांति फैलाई जाये।एक बार मुस्कराती मूरत को मन में बसा ले तो शायद कोई हल मिल भी जाये। अरे ! जब प्रभु सारे ब्रह्माण्ड का दुःख हँस कर झेल रहे हैं तो इंसान ऐसा क्यों नहीं करता ! " जोर से बजे घण्टे ने दादी की तन्द्रा भंग की तो उनको लगा कि अब उनकी बरी आ जाएगी।
         बारी आने पर दादी ने भी पूजा की और बोली , " हे प्रभु तेरे द्वार आने वाले हर एक की इच्छा पूर्ण करना। "
          और फिर दादी अपने घर लौट गई।