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Friday, September 22, 2017

देवियाँ बोलती कहाँ है !



     थक गई हूँ मैं , देवी की प्रतिमा का रूप धरते -धरते। ये पांडाल की चकाचौंध , शोरगुल मुझे उबा रहे हैं। लोग आते हैं ,निहारते हैं ,
        " अहा कितना सुन्दर रूप है माँ का !" माँ का शांत स्वरूप को तो बस देखते ही बनता है। "
          मेरे अंतर्मन का कोलाहल क्या किसी को नहीं सुनाई देता !
           शायद मूर्तिकार को भी नहीं ! तभी तो वह मेरे बाहरी आवरण को ही सजाता -संवारता है कि दाम अच्छा मिल सके।
       वाह रे मानव ! धन का लालची कोई  मुझे मूर्त रूप में बेच जाता है। कोई मेरे मूर्त रूप पर चढ़ावा चढ़ा जाता है। कोई मेरे असली स्वरूप की मिट्टी को मिट्टी में दबा देता है।  और मेरे शांत रूप को निहारता है।
  मैं चुप प्रतिमा बनी अब हारने लगी हूँ। लेकिन देवियाँ बोलती कहाँ है ! मिट्टी की हो या हाड़ -मांस की चुप ही रहा करती है।  

Thursday, August 24, 2017

पेपर

          छोटा मनु बहुत परेशान है। उसे पढ़ने का शौक जरा भी नहीं है । पढाई कोई शौक के लिए थोड़ी की जाती है भला ! वह तो जरुरी होती है। यह उसे समझ नहीं आती। उसे तो खीझ हो उठती है, जब घर का हर सदस्य उसे कहता ,'मनु पढ़ ले !'
    हद तो ये भी है कि घर का पालतू , पिंजरे में बंद तोता भी पुकार उठता है ,'मनु पढ़ ले!'
 मनु परेशान हुआ सोच रहा है। ये पढाई बहुत ही खराब चीज़ है। पैंसिल मुँह में पकड़ कर गोल-गोल घुमा रहा है।
    " परीक्षा सर पर है , अब तो पढ़ ले मनु ! " उसकी माँ का दुखी स्वर गूंजा तो मनु ने पैंसिल हाथ में पकड़ी।
" बहू , तुम सारा दिन इसके पीछे ना पड़ी रहा करो ! दूसरी कक्षा में ही तो है अभी। इसे तो मैं  पढ़ाऊंगी , देखना कितने अच्छे नम्बर आएंगे। है ना मनु बेटा.... ," दादी ने प्यार से सर दुलरा दिया।
     तभी गली से गुजरते हुए  कबाड़ इकट्ठा करने वाले ने आवाज़ लगाई , ' पेपर -पेपर। "
मनु फिर परेशान हो गया कि उसे परीक्षा का किसने बता दिया।
     " मनु पता है क्या , ये कबाड़ी पेपर -पेपर क्यों चिल्ला रहा है ! यह भी बचपन में पढता नहीं था। नहीं पढ़ा तो कोई ढंग का काम नहीं कर पाया , इसलिए गली -गली घूम कर , नहीं पढ़ने वाले बच्चों को डरता है कि नहीं पढोगे तो एक दिन यही काम करना पड़ेगा ! " मनु के बड़े भाई ने गोल-गोल आंखे करते हुए मनु को डराया तो मनु ने सहम कर पैन्सिल उठा ली , उसके कानों में  'पेपर-पेपर आवाज़ दूर जा रही थी।

उपासना सियाग 

Monday, June 19, 2017

उसके बाद .....?


   
      गाँव की गलियों के सन्नाटे को चीरती एक जीप एक बड़ी सी हवेली के आगे रुकी।  हवेली की ओर बढ़ते हुए चौधरी रणवीर सिंह की  आँखे अंगारे उगल रही है  चेहरा तमतमाया हुआ है। चाल  में तेज़ी है जैसे बहुत आक्रोशित हो, विजयी भाव तो फिर भी नहीं थे चेहरे पर। चेहरे पर एक हार ही नज़र आ रही थी।
     अचानक सामने उनकी पत्नी सुमित्रा आ खड़ी हुई और सवालिया नज़रों से ताकने लगी। सुमित्रा को जवाब मिल तो गया था, लेकिन उनके मुंह से ही सुनना चाह  रही थी। जवाब क्या देते वह ...! एक हाथ से झटक दिया उसे और आगे बढ़  कर बरामदे में रखी  कुर्सी पर बैठ गए।
     सुमित्रा जाने कब से रुदन रोके हुए थी। घुटने जमीन पर टिका कर जोर से रो पड़ी, " मार दिया रे ...!  अरे जालिम मेरी बच्ची  को मार डाला रे ...!"
   रणवीर सिंह ने उसे बाजू से पकड कर उठाने की भी जरूरत नहीं समझी  बल्कि  लगभग घसीटते हुए कमरे में ले जा धकेल दिया और बोला , " जुबान बंद रख ...! रोने की, मातम मनाने की जरूरत नहीं है ! तुमने कोई हीरा नहीं जना था, अरे कलंक थी वो परिवार के लिए, मार दिया ...! पाप मिटा दिया कई जन्मो का ...पीढियां तर गयी ...!"
 बाहर आकर घर की दूसरी औरतों को सख्त ताकीद की,  कि कोई मातम नहीं मनाया जायेगा यहाँ, जैसा रोज़ चलता है वैसे ही चलेगा। सभी स्तब्ध थी। लेकिन हिम्मत  में थी जो कोई आवाज़ भी मुँह से निकाले। 
    घर की बेटी सायरा जो कभी इन्ही चौधरी रणवीर सिंह के आँखों का तारा थी , आज अपने ही हाथों उसे मार डाला।
     "मार डाला ...!" लेकिन किस कुसूर की सजा मिली है उसे ...!
         प्यार करने की सज़ा मिली है उसे ...!
       एक बड़े घर की बेटी जिसे पढाया लिखाया, लाड-प्यार जताया, उसे क्या हक़ है किसी दूसरी जात के लड़के को प्यार करने का ...! क्या उसे खानदान की इज्ज़त का ख्याल नहीं रखना चाहिए था ? चार अक्षर क्या पढ़ लिए ...! बस हो गयी खुद मुख्तियार ...!
     चौधरी रणवीर सिंह चुप बैठा ऐसा ही कुछ सोच रहा है। अचानक दिल को चीर देने वाली आवाज़ सुनाई दी। सायरा चीख रही थी ..." बाबा, मत मारो ...! मैं तुम्हारी तो लाडली हूँ ... इतनी बड़ी सज़ा मत दो अपने आपको ...! मेरे मरने से तुम्हें  ही सबसे ज्यादा दुःख होगा। तुम भी चैन नहीं पाओगे ...!"
       सुन कर अचानक खड़ा हो गया रणवीर सिंह और ताकने लगा की यह आवाज़ कहाँ से आई। फिर कटे वृक्ष की भांति कुर्सी पर बैठ गया क्यूँकि यह आवाज़ तो उसके भीतर से ही आ रही थी। पेट से जैसे मरोड़ की तरह रुलाई ने  फूटना चाहा।
   लेकिन वह क्यूँ रोये ...! क्या गलत किया उसने। अब बेटी थी तो क्या हुआ, कलंक तो थी ही ना ...! कुर्सी से खड़े हो बैचेन से चहलकदमी करने लगा।
   "अपने  मन को कैसे समझाऊं कि इसे चैन मिले। किया तो तूने गलत ही है आखिर रणवीर ...! कलेजे के टुकड़े को तूने अपने हाथों से टुकड़े कर दिए। किसी का क्या गया , तेरी बेटी गयी , तुझे कन्या की हत्या का पाप भी तो लगा है , क्या तू उसे और समय नहीं दे सकता था। "  रणवीर सिंह सोचते -सोचते दोनों हाथों से मुहं ढांप  कर रोने को ही था कि बाहर से आहट हुई। किसी ने उसे पुकारा था। संयत हो कर फिर से चौधराहट का गंभीर आवरण पहन बाहर को चला।
   आँखे छलकने को आई, जब सामने बड़े भाई को देखा। एक बार मन किया कि लिपट कर जोर से रो पड़े। माँ-बापू के बाद यह बड़ा भाई रामशरण ही सब कुछ था उसका।  मन किया फिर से बच्चा बन कर लिपट  जाये भाई से और सारा दुःख हल्का कर दे। वह रो कैसे सकता था ? उसने ऐसा क्या किया जो दुःख होता उसको। सामने भाई की आँखों में देखा तो उसकी भी आँखों में एक मलाल था। ना जाने कन्या की हत्या का या खानदान की इज्ज़त जाने का। चाहे लड़की को मार डाला हो कलंक तो लग ही गया था।
    दोनों भाई निशब्द - स्तब्ध से बैठे रहे। मानो शब्द ही ख़त्म हो गए सायरा के  साथ -साथ। लेकिन रणवीर को भाई का मौन भी एक सांत्वना सी ही दे रहा था। थोड़ी देर बाद रामशरण उसके कंधे थपथपा कर चल दिया।
  चुप रणबीर का गला भर आता था रह - रह कर, लेकिन गला सूख रहा था। आँखे बंद, होठ भींचे कुर्सी पर बैठा था।
   " बापू पानी ..." , अचानक किसी ने पुकारा  तो आँखे खोली।
    'अरे सायरा ...!'
       यह तो सायरा ही थी सामने हाथ में गिलास लिए। उसे देख चौंक कर उठ खड़ा हुआ रणवीर। बड़े प्यार से हमेशा की तरह उसने एक हाथ पानी के गिलास की तरफ और दूसरा बेटी के  सर पर रखने को बढ़ा दिया।                     लेकिन यह क्या ...?
 दोनों हाथ तो हवा में लहरा कर ही रह गए। अब सायरा कहाँ थी ! उसे तो उसने इन्ही दोनों हाथों से गला दबा कर मार दिया था। हृदय से एक हूक सी निकली और कटे वृक्ष की भाँति कुर्सी पर गिर पड़ा।
    रणबीर की सबसे छोटी बेटी सायरा जो तीन भाइयों की इकलौती बहन भी थी। घर भर में सबकी लाडली थी। जन्म हुआ तो दादी नाखुश हुई कि  बेटी हो गयी कहाँ तो वह चार पोतों को देखने को तरस रही थी और कहां सायरा का जन्म हो गया। तीन ही पोते हुए अब उसके, जोड़ी तो ना बन पाई।
    रणबीर सिंह तो फूला ही नहीं समा रहा था। घर में लक्ष्मी जो आयी थी। बहुत लाड-प्यार से पल रही थी सायरा। जिस चीज़ की मांग की या जिस वस्तु पर हाथ रखा वही उसे मिली।
      तो क्या उसे जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं था ?
     यही सवाल लिए सायरा से बड़ा और रणबीर का छोटा बेटा  यानि तीसरे  नंबर की संतान राजबीर सामने खड़ा था। तीनों भाइयों में राजबीर ही सायरा के पक्ष में बोल रहा था कि वह सोमेश से शादी कर सकती है। जब लड़का हर तरह से लायक है, सायरा को खुश रख सकता है, तो जाति कहीं भी मायने नहीं रखती। आखिर बात तो सायरा की ख़ुशी की है। लोगों का क्या वह चार दिन बात बना कर रह जायेंगे। सारी  उम्र का संताप -दुःख तो सायरा को नहीं भोगना पड़ेगा।
     रणवीर सिंह के दूसरे दोनों  बेटे  अपने पिता जैसी ही सोच रखते थे। लेकिन रणवीर ने अपने तीनो बेटों को ही किसी बहाने से शहर भेज दिया। क्यूंकि वह नहीं चाहता था कि जो कुछ भी वह करने जा रहा था उसके लिए उनके बेटे और उनके परिवार किसी मुसीबत में आये।
  अब राजबीर सामने खड़ा था अपनी आँखों में लिए क्रोध , दर्द और विशुब्ध सा बेबस -लाचार । पिता ने उसे धकेल कर आंगन में आवाज़ लगाई कि खाना क्यूँ नहीं बना आज।
 लेकिन क्या रणवीर सिंह को भूख थी भी या ऐसे ही सामान्य दिखने का ढोंग कर रहा था ...! यह तो वह भी नहीं जानता था। बेचैन सा था जैसे कलेजा फट ही जायेगा उसका।
   कालू राम जो कि घरेलू काम-काज के लिए रखा हुआ था, खाने की थाली सामने रख गया। रणबीर सिंह खाना, खाना तो दूर देखना भी नहीं चाह रहा था।
     रह -रह कर सुमित्रा की सिसकियाँ गूंज रही थी घर में फैले सन्नाटे में। सिसकियाँ कभी करूण  क्रन्दन में बदलना चाहती तो उनको मुहं पर अपनी ओढ़नी को रख कर वापस अंदर ही धकेल दिया जा रहा था।
     ऐसे माहोल में कोई इन्सान कैसे सामान्य रह कर खाना खा सकता था। लेकिन रणबीर ने फिर भी जी कड़ा कर के रोटी का एक कौर तोड़ा, सहसा उसे लगा कि उसके हाथों से खून बह रहा है । रोटी का कोर उसके हाथों से गिर गया।
   हाँ ...! वह तो खूनी है।  अपनी ही बेटी का।  ऐसे खून भरे हाथों से खाना कैसे खा सकता था रणवीर सिंह ?
    तभी एक छोटा सा हाथ उसके सामने आया और रोटी का कोर उसके मुहं में डाल दिया। यह नन्ही सायरा ही थी। बचपन में जब उसको बापू पर लाड़  आता तो वह अपने हाथों से ऐसे ही खाना खिलाया करती थी। रणवीर सिंह पर जैसे जूनून सा छा गया। वह नन्हे हाथों से खाना खाता  रहा और उसके हाथों से खून रिसता रहा। आंसुओं को रोकते -रोकते आँखों में खून उतर आया था  ...!
     " वाह बापू ....! भोजन कर रहा है , अभी पेट नहीं भरा क्या ...?" राजबीर ने थाली उठा ली उसके आगे से और चेहरे पर लानत -धिक्कार ला कर बोल पड़ा।
    रणबीर उसे धकेलते हुए से अपने कमरे की तरफ गया। सावित्री की हालत बुरी थी। गश खा रही थी बार -बार । रणबीर को देख जोर-जोर से दहाड़ें मार रो पड़ी। भाग कर उसके कुर्ते को पकड कर जोर से झंझोड़ने लगी। एक बार तो उसका मन भी हुआ की वह सावित्री को गले लगा कर जोर से रो पड़े।
      लेकिन वह क्यूँ रोये ! उसने तो कलंक ही मिटाया है खानदान का।
    सावित्री को धकेल कर वह घर की छत पर चला गया। वहां पड़ी चारपाई पर  बेजान सा  गिर गया। आँखें मूंद कर कुछ देर लेटा रहा।आँखे खोली तो सामने खुला आसमान था। काली अमावस सी रात थी। कुछ मन के अँधेरे ने रात का अँधेरा और गहरा दिया था। तारे टिमटिमा रहे थे या जाने रणवीर सिंह को देख सहम रहे थे।
      अचानक उसे लगा नन्ही सी सायरा उसके पास आकर उसकी गोद में बैठ गयी हो।जब वह छोटी थी तो ऐसे ही उसकी गोद में  बैठ कर आसमान में तारे देखा करती थी।रणबीर को याद आ रहा था कि कैसे एक रात को बाप -बेटी ऐसे ही तारे देख रहे थे। सायरा बोल पड़ी, " बापू  ...! ये तारे कितने सारे है, मुझे गिन के बताओ ना ...," और दोनों बाप - बेटी तारे गिनने में व्यस्त हो गए। अचानक रणवीर ने रुक कर कहा, " अरे बिटिया, मुझे तो दो ही तारे नज़र आते हैं, तेरी दोनों आँखों में बस ...!"कह कर अपने गले लगा लिया था।
    जब उसकी माँ का देहांत हुआ था तब भी उसने सायरा को यह कह कर बहलाया था कि उसकी दादी उससे दूर नहीं गयी है बल्कि आसमान में तारा  बन गयी है। सायरा भोले पन  से पूछ बैठी, " बापू  , एक दिन मैं भी ऐसे ही तारा बन जाउंगी क्या ? फिर आप भी मुझे देखा करोगे  यहाँ से ...!"
   सुन कर रणबीर काँप उठा था। उसके मुहं पर हाथ रख दिया था और बोला , " ना बिटिया ना , ऐसे नहीं बोलते ...!" आँखे भर कर सीने से लगा लिया था।
  और आज सच में ही वह आसमान को ताक रहा था कि कहीं  शायद सायरा दिख जाये किसी तारे के रूप में।दिल में एक हूक सी, कलेजा फटने को हो रहा था। अब वह केवल पिता बन कर सोच रहा था। एक हारा  हुआ पिता, जिसने  अपने कलेजे के टुकड़े को अपने ही हाथों गला दबा कर मार डाला था वहीं चिता  बना कर अंतिम संस्कार भी कर दिया। आँखे भरती  ही जा रही थी अब रणबीर की।
     तभी छत पर बने कमरे में रोशनी नज़र आयी। यह कमरा सायरा का था। उठ कर कमरे के पास गया तो उसे लगा जैसे सायरा अन्दर ही है। दरवाज़ा धकेला तो आसानी से खुल गया। लेकिन रोशनी कहाँ थी वहां ...! एक सूना सा अँधेरा भरा सन्नाटा ही फैला था। हाथ बढ़ा कर लाईट जला दी रणबीर ने।
           सजा संवरा कमरा लेकिन उदास हो जैसे ..., जैसे उसे उम्मीद हो सायरा के आ जाने की !
रणबीर की नजर सामने की अलमारी पर पड़ी तो उसे खोल ली। अलमारी में सायरा की गुड़ियाँ रखी हुयी थी। उसे गुडिया खेलने का बहुत शौक था। जब भी बाज़ार जाना होता तो एक न एक खिलौना तो होता ही था साथ में गुडिया भी जरुर होती थी। रणबीर सिंह गुड़ियाँ देखता -देखता जैसे रो ही पड़ा जब उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ी। हूक सी उठी , तड़प  उठा , उसने अपनी ही गुडिया का गला दबा दिया। जोर से रुलाई फूटने वाली ही थी कि सामने गुड्डा रखा नज़र आया।
    'ओह यह गुड्डा ! यह गुड्डा कितनी जिद करके लाई थी सायरा।'
  उसे याद आया,  एक बार वह सायरा को शहर ले कर गया था तो बहुत सारे खिलौने दिलवाए थे जिस पर हाथ रख दिया वही खिलौना उस का हो गया। दोनों हाथों में खिलौनों के थैले अभी जीप में रखे ही थे कि सायरा ठुनक गई ! छोटा सा -प्यारा सा मुहं और नाक सिकोड़ कर बोली, " बापू , आपने मुझे गुड्डा तो दिलाया ही नहीं ...! "
रणबीर ने हंस कर उसे गोद में उठा कर कहा , " बिटिया , अगली बार जब हम आयेंगे तो ले दूंगा , अब तो देर हो गयी , रात होने को है। "
  " नहीं बापू , मुझे तो अभी ही लेना है नहीं तो मैं घर ही नहीं जाउंगी ...!" सायरा ने रुठते हुए कहा।
इतनी प्यारी बेटी और रणबीर के कलेजे का टुकड़ा, उसकी बात को वह कैसे नहीं मानता  ...! आखिरकार कई दुकानों पर ढूंढते - ढूंढते सायरा का मन पसंद गुड्डा मिल ही गया था। घर आकर दादी और माँ की डांट पड़ी तो थी लेकिन गुड्डे मिलने की खुशी ज्यादा थी।  डांट एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी गई।
   आज वही गुड्डा हाथ में लिए सोच रहा था रणबीर , कि बेटी के इस बेजान गुड्डे लेने की जिद तो पूरी की लेकिन एक जीते -जागते गुड्डे की मांग पर उसने बेटी की जान ही ले ली ! सायरा ने अपना मन पसंद गुड्डा ही तो माँगा था जो उसे खुश रखता। और उसने क्या किया बेटी की ही जान ले ली ...!
    "हाय ...! मेरी बच्ची, यह  क्या किया मैंने ?" हाथ में गुड्डा ले कर भरे हृदय और  सजल आँखों से सोच रहा था वह। सामने की दीवार पर सायरा की तस्वीरें थी छोटी सी गुड़िया  से ले कर कॉलेज जाने तक की। हर तस्वीर में हंसती हुई सायरा बहुत प्यारी दिख रही थी। मेज़ पर भी एक तस्वीर थी।  रणबीर ने उसे उठा लिया। तस्वीर जैसे चीख पड़ी हो।  सायरा जीवन की भीख मांगती जैसे चीख रही थी, वैसे ही चीख रही थी तस्वीर।
  रणबीर ने तस्वीर को सीने से लगा लिया और जोर से रो पड़ा , " ना मेरी बच्ची ना रो ना , मैं तेरा बापू नहीं हूँ अरे पापी हूँ , कसाई हूँ मैं ...!"
  रोते -रोते कमरे के बाहर आ गया गुड्डे और सायरा की तस्वीर को सीने से लगा रखा था। छत पर ही एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गया और रोता रहा ना जाने कितनी देर तक।  कितनी ही देर बाद उसने गर्दन उठाई और आसमान की तरफ ताकने लगा जैसे सायरा को खोज रहा हो। सामने भोर का तारा  जगमगा रहा था। रणबीर को लगा कि उसमें सायरा है। तारे को देख वह फिर रोने लगा।
    अचानक भोर के तारे के पास एक तारा और जगमगाने लगा। कुछ देर में ही सवेरा हो गया। सवेरा होने के साथ -साथ गाँव दीनसर में एक चर्चा सरे आम थी। एक तो भोर के तारे के पास एक तारे के दिखने का और दूसरी चौधरी रणबीर सिंह की मौत की।


 उपासना सियाग


Tuesday, March 21, 2017

तिलिस्म...

                सुमि अचानक हुई बारिश से घबरा कर तेज़ कदम चलने लगी।  वैसे इतनी अनायास भी नहीं थी ये बारिश। बादल तो सुबह ही से थे पर उसे नहीं मालूम था कि ऐसे ही भिगोने लग जाएगी। घर से चलते हुए माँ ने  छाता ले जाने को कहा भी था पर वो ही लापरवाही से भाग ली थी।  "अरे माँ मिटटी की थोड़ी हूँ जो गल जाउंगी ...!"
 " अब डर क्यूँ रही है सुमि !"मन ही मन सुमि ने अपने आप से ही सवाल किया। चारों तरफ नज़र दौड़ाई कोई टैक्सी  भी नज़र नहीं आ रही थी। लोग भी तेज़ क़दमों से जाते दिख रहे थे। माना के सुमि मिटटी की नहीं थी पर उसके हाथ में कुछ किताबे थी ,वे तो भीग ही सकती थी। सो उन्ही की चिंता में थी वह और उनको दुपट्टे में अच्छे से लपेट कर अपने सीने से लगा लिया।
  तभी अचानक उसके सर पर से बारिश गिरना बंद हुई तो वह चौंक पड़ी और जल्दी से मुड़ी तो एक नौजवान उसके सर पर छाता किये हुए था। सुमि सहम सी गयी।युवक मुस्कुराते हुए बोला ,"मैं भी किसी टैक्सी का इंतजार कर रहा हूँ। आपको भीगते और किताबें सहेजते देखा तो मुझसे रहा नहीं गया। " सुमि की जुबान जैसे तालू के ही चिपक गयी थी और उसके  दिमाग में एक बिजली सी कौंध गयी कि कहीं  ये उसका राजकुमार तो नहीं ! और धीरे से बोल पड़ी "राज कुमार ! "
युवक हंस कर बोला , " जी नहीं ,मेरा नाम लक्ष्य वीर सिंह है। "
पर सुमि तो जैसे वहां  थी ही नहीं और बस उसकी आँखों में ही देखती रही। लक्ष्य स्मित मुस्कान के साथ बोला , "तुम बहुत खूबसूरत हो और ये तुमने जो हल्का आसमानी रंग पहना है, वो तुम पर बहुत खिल रहा है !". फिर उसके कंधे पर तर्जनी से ठक- ठक कर बोला " आपकी टैक्सी आ गयी !!जाइए ...! "
सुमि को जैसे किसी ने उसे तिलिस्म में जकड दिया हो। मंत्रमुग्ध सी, यंत्रचलित सी टैक्सी में  बैठ कर  घर आ गयी। उसे नहीं याद उसने कैसे घर का पता बताया। बस घर आ गयी और सीधे अपने कमरे में ही जा कर रुकी। माँ आवाज़ लगाती ही रह गई। चिंतित सी  पीछे - पीछे ही चली आयी और पूछा ,"क्या बात सुमि  !तबियत तो ठीक है...! ".
   "हां ठीक है ,भीगे  कपडे बदलने आयी हूँ ठण्ड सी लग रही है। आप मेरे लिए चाय ही बना दो ना !"
  थोड़ी देर में वह खिड़की से बाहर बूंदे गिरती  देख रही थी और सोचते हुए मुस्कुरा दी ," आज जिससे मुलाकात हुई थी क्या वह उसका राज कुमार तो नहीं जिसका सपना कई बरसों से देखती आ रही थी। "
  जब वह बचपन को छोड़ केशोर्य की तरफ कदम रख रही थी तो उसने एक कहानी पढ़ी थी  "राजकुमारी पुष्पलता और राजकुमार सुकुमार" की। तभी से उसने एक सपना पाला था कि  उसका भी एक राजकुमार आएगा। 
 कहानी में "राजकुमारी पुष्पलता एक दिन जिद करके ख़राब मौसम में अपनी सखियों के साथ आखेट पर चली जाती है।  अचानक बादलों के गरजने से उसक घोडा बिदक कर भाग लेता है। जिससे वह अपनी सखियों से बिछुड़ जाती है। अचानक से घटी घटना और और तेज़ बारिश उस पर अँधेरा ,राजकुमारी रो ही पड़ी थी। तभी उसने अपने  पास ही एक रोशनी सी महसूस हुई  और बारिश कम होने का अनुमान सा लगा।  सहमते हुए से आँखे खोली तो एक सुन्दर नौजवान खड़ा था अपने दोनों हाथों  में एक बड़ा सा पत्ता छाते की तरह उसके सर पर किये हुए।  उसको जैसे बारिश से बचा रहा हो। वह कुछ बोलती उससे पहले ही युवक बोला , " घबराओ मत ,मैं परी देश का राज कुमार ,सुकुमार हूँ। " धरती पर अक्सर आया करता हूँ। मुझे यह बहुत पसंद है। "फिर बातों ही बातों में परिचय के बाद सुकुमार ने पुष्पलता को उसके महल छोड़ते हुए कहा , " राजकुमारी तुम बेहद खूबसूरत हो। मैं तुम पर अपना दिल हार चुका हूँ। क्या मैं तुमसे हर रोज मिलने आ सकता हूँ...?" वह राजकुमारी को अपलक तकते  हुआ छोड़ चला गया। इस तरह राजकुमारी से वह हर रोज़ रात को मिलने आता और सुबह होने से पहले ही चला जाता।  एक दिन राजा के द्वारा पकड़  लिए जाने पर राजकुमारी ने सुकुमार से विवाह की जिद की।  राजा ने यह कह कर इनकार कर दिया कि उसे ,उसके वर के रूप में एक उत्तराधिकारी भी चाहिए। जिसके लिए सुकुमार उपयुक्त नहीं था। पुत्री के हठ ने राजा को उससे विवाह के लिए मजबूर कर दिया। फिर उनके एक पुत्र भी हो गया। सुकुमार का वही रोज़ का नियम था रात को आना और सुबह सूरज निकलने से पहले चले जाना।  उनका पुत्र अब लगभग एक साल का होने का था। ऐसे ही एक रात छोटे शिशु ने जब सुकुमार के गले में चमकती मोतियों की माला की तरफ हाथ बढाया तो उसने अपने पुत्र को ही गोद से हटा  कर दूर कर दिया। यह बात पुष्पलता को खटक गई  और उसने कहा , " क्या हुआ माला ही तो है इसे दो ना !"सुकुमार बोला ये माला नहीं है ये एक तिलिस्म है जो मुझे देव पहना कर भेजते है। अगर मैं यह उतार  दूंगा तो यहीं  का हो कर रह जाऊंगा। ".पुष्पलता तब तो कुछ ना बोली पर कुछ सोच कर उसकी आँखे चमकने लगी। 
    अगली रात को जब सुकुमार पुत्र को गोद में लेकर दुलार रहा था तभी राजकुमारी ने एक शूल जो वह पहले ही लाकर  रखी थी , पुत्र के पैर में  गड़ा दी जिससे वह जोर से रो पड़ा और पुष्पलता को बोलने का बहाना मिल गया।  " ये माला के लिए ही रो रहा है एक बार दे दो ,मैं वादा करती हूँ  ,जब यह सो जायेगा तब मैं खुद ये माला तुम्हें पहना दूंगी "पुत्र मोह में सुकुमार को यह करना पड़ा। माला लेकर पुत्र भी बहल गया और सो गया। तभी राजकुमारी ने चुपके से सुकुमार का ध्यान भंग करते हुए माला तोड़ दी और सारे मोती बिखर गए और सुकुमार तिलिस्म से आजाद था। सुबह का सूरज एक नया ही नूर ले कर निकला था।  राज कुमारी का जीवन अब  नयी दिशा की ओर चल पड़ा था .
        इस कहानी को ना जाने कब से जीती आ रही थी सुमि। फिर आज हुई घटना को सोच कर मुस्कुरा पड़ी और फिर अपने राजकुमार के बारे में सोचने लगी। चेहरा तो उसको ध्यान ही नहीं आ रहा कैसा था वो तो बस खो ही गयी थी।  फिर अचानक ध्यान आया की उसकी नाक ,अरे हाँ उसकी नाक कितनी सुंदर थी उसका तो दिल ही वही अटक गया। 
       शीशे के सामने खडी बाल संवारती -संवारती अचानक रुक कर उसका नाम सोचा तो हंसी आ गयी ," लक्ष्य वीर सिंह "नाम भी कैसा है जैसे धनुष से तीर ही छोड़ना हुआ हो !"  एक तीर तो चला और सीधे सुमि के ह्रदय को बींध गया। जितनी बार ही नाम लिया एक तीर सा चल गया और हर बार ह्रदय बींधता गया। सोचते-सोचते सुमि कब न जाने  सो गयी। 
    सुबह उसे माँ की आवाज़ कहीं दूर से आती सुनी। वो उसे ही पुकार रही थी। सुमि की आँखे ही नहीं खुल रही थी सर भी बहुत दर्द हो रहा था। माँ उसके माथे पर हाथ रखे उसे पुकार रही थी ,"अरे तुझे तो बहुत तेज बुखार है ...! "उसके बाद डॉक्टर ,दवाईयां..और न जाने कितनी हिदायते और सबसे बड़ी तो यह कि  जब तक ठीक ना हो जाओ घर से बाहर नहीं जाना ना ही  किसी किताब के हाथ लगाना। सुमी का मन तो बार-बार भाग रहा था उसी जगह जहाँ  उसका राज कुमार मिला था। 
      ठीक होने बाद भी वह वहां गयी कई -कई देर खड़ी भी रही। कहीं वह आता ही दिख जाये। लेकिन  इतना तो सुमी भी समझती थी ,कहानियां भी कभी सच होती है भला ...! फिर भी अक्सर वो मुड़ कर देखने लगती शायद कहीं ....!
 मौसम भी बदल गया और ऋतु भी पर उसके मन में तो एक ही मौसम था "आशा का ....."
   साल होने लगा था उस घटना को और अब तो  घर में सुमि की शादी की बात चलने लगी थी।  वह किसे कहती और कहती भी क्या कि  उसे किसका इंतज़ार है। 
        एक दिन माँ ने उसे बताया उसकी मौसी आने वाली है साथ में उदयवीर सिंह जी और उनका परिवार भी है जो उसके रिश्ते के लिए आने वाले है। सुमी  चुप रही।  उसके "आशा" के मौसम पर बाहर का मौसम हावी हो रहा था।  बहुत घुटन सी थी वातावरण में और उसके मन में भी ..!
    दोपहर के लगभग तीन बजे दरवाज़े की घंटी बोलने पर सुमि ने दरवाज़ा खोला तो वही खड़ा था जिसका इंतजार था और उसके मुहं से एक बार फिर निकल पड़ा "राजकुमार ...!" दिमाग में लक्ष्य वीर सिंह का तीर सा चल गया ... वह भी उसी अंदाज़ में हंसा ,"जी नहीं ...! लक्ष्य वीर सिंह !!".
सुमि से कुछ भी कहते नहीं बन रहा था। तभी उसकी मौसी हैरान होते हुए से बोली ,"अरे ...! क्या तुम दोनों एक दुसरे को जानते हो ...? "
    लक्ष्य की माँ सब कुछ भांपते हुए आगे बढ़ कर सुमि को गले से लगा लिया। तभी उदय वीर सिंह बोल पड़े "लो भई ...! अब दरवाज़े पर ही सारा काम हो गया। मिलना -मिलाना भी और गले लगाना भी।  अब तो एक ही काम रह गया है मुहं मीठा करवाना !क्या वो भी दरवाज़े पर ही करना होगा या अन्दर भी चला जायेगा ...!"
   अभी तक सुमि के माँ -पापा सब हतप्रभ से खड़े थे। चौंकते हुए से आगे बढ़ कर उनको अन्दर ड्राइंग रूम में ले गए। वहां बैठ कर जब पूछा गया तो लक्ष्य ने सारी बात बतलाई।  लक्ष्य की माँ अनुसूया हँसते हुए बोली "मुझे तो इसने बताया था। पर जब इसे ही नाम -पता कुछ ही नहीं  मालूम था, तो क्या करती भला मैं भी ...!"
  थोड़ी देर बाद जब वो अकेले बैठे बात कर रहे थे तो लक्ष्य ने पूछा के क्या वो उसको याद रहा और क्यूँ रहा ...
तो सुमि ने कहा ,"क्यूँ याद रहे नहीं मालूम पर याद तो रहे बस यह पता है। "
" तुम फिर मिली ही नहीं !मैंने तुम्हें बहुत ढूंढा। यह शहर मेरे लिए नया ही था। यहाँ तो मैं दोस्त के जन्म दिन पर आया था। फिर कई दिन मैं आता रहा यहाँ। पर तुम तो जैसे परी देश की राजकुमारी थी ! आयी और गुम हो गयी !"
   सुमि ने बताया उसे बहुत तेज़ बुखार हो गया था।  बाद में उसने भी उसे तलाश करने की कोशिश की थी। बाहर हलकी सी फुहारें पड़ रही थी। मौसम खुशगवार हो गया था।  सुमि के लिए बरसात एक ख़ुशी ही ले कर आयी थी। हर बार की तरह इस बार भी।
   फिर तो जैसे समय पंख लगा कर उड़ने लगा। पहले सगाई फिर शादी।  सब कुछ अच्छे से हो गया। सभी खुश थे।  लक्ष्य को एक धुन सी सवार थी काम करने की। वह  अपने काम के  आगे किसी को नहीं समझता था। वह नाम का ही लक्ष्य नहीं था बल्कि उसका एक लक्ष्य था ,जिन्दगी में आगे बढ़ने का और इतना आगे बढ़ने का  कि कोई भी उसको पकड ना सके।  इस जुनून में  उसका साथ पाने को सुमि के सपने भी पिस रहे थे।
   ऐसा नहीं था के लक्ष्य को अहसास  नहीं था सुमि का। कभी -कभी समय निकलने की भी कोशिश भी करता था। ऐसे ही एक दिन वो साथ में बैठे थे। अचानक उसे कुछ याद आया और पूछ बैठा ,"सुमि, जरा बताओ तो , यह  राजकुमार कौन है जिसका नाम तुमने मुझे देखते ही लिया था ...?"
  सुमि थोडा सा झेंप सी गयी और उसकी नाक पर ऊँगली से ठक- ठक करती बोली ,"कोई भी हो ,तुम्हे क्यूँ बताऊँ ...!है एक मेरा अपना राजकुमार। "
        लक्ष्य का अपने काम के प्रति जुनून कुछ ज्यादा ही था। हालाँकि  उसके पिता समझाते थे कि वे  अभी कारोबार सम्भाल सकते हैं। उसको और बहू को कुछ समय बाहर भी जाना चाहिए। यही दिन है फिर ये समय लौट कर नहीं आएगा और उसे अब नए  काम पर ध्यान देने की जरुरत भी नहीं। आखिरकार  जो उन्होंने अपना इतना बड़ा कारोबार बनाया है वो उसे ही तो देखना है। लेकिन  उसे एक नया मुकाम ही हासिल करने का जुनून सा था।
 तभी एक नए नन्हे मेहमान के आने की सूचना से घर में ख़ुशी की लहर सी दौड़ गयी .अब सुमि भी कुछ व्यस्त होने लगी थी अपने नन्हें की तैयारी के स्वागत के लिए .
और वो दिन भी आ गया .बेटा हुआ है यह जान दादा उदय वीर सिंह की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा .गोद में लेते हुए बोले ,"इसका नाम मैं ,अन्नत वीर सिंह  रख रहा हूँ ,ये मैंने पहले ही सोच लिया था."दादी अनुसूया हंसी ,"अगर पोती होती तो क्या नाम रखते ...!" 
"उसका नाम मैं अरुंधती रखता ",मुस्कुराते हुए वे बोले .
बेटे के जन्म के बाद ,लक्ष्य के व्यवहार  में थोडा सा परिवर्तन तो आया पर जुनून कम ना हो सका .बेटे से तो इतना लगाव था के दिन में भी  कई - कई बार उसकी आवाज़ सुनने के लिए फोन करता ....ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे .
 कुछ महीनो के बाद लक्ष्य ने जैसे धमाका ही कर दिया .उसने बताया वो तीन साल के लिए लन्दन जा रहा है कुछ तकनीकी शिक्षा के  लिए ,उसके बाद वो अपनी फेक्ट्री में बहुत बदलाव ला सकेगा ,तो उसका जाना जरुरी है .उसके  पिता  के तो क्रोध का पारावार ही ना रहा .एक दम गरज से पड़े उस पर ,:कोई भी जरूरत नहीं है कहीं जाने की हमें नहीं चाहिए ज्यादा धन -दौलत ,यहीं रहो या फिर बहू और बच्चे को भी ले कर जाओ."
पर लक्ष्य को कहाँ मानना था . उसके पास भी बहुत तर्क थे .माँ ने भी समझाया ...और सुमि का तो रो- रो के ही बुरा हाल हो गया था .
"मैं तुम्हारे बिन तीन मिनिट भी नहीं रहना चाहती ,तीन साल तो बहुत है "...सुमि रोते हुए बोल रही थी .
"अब तुम तो मुझे कमजोर मत बनाओ ,ये सब मैं तुम लोगों के लिए ही तो कर रहा  हूँ ,मैं खुद, तुम दोनों और माँ-बाबा के बिन नहीं रहना चाहता ,पर मैं  एक मुकाम हसिल करना चाहता हूँ ,मुझे मत रोको ", दुखी होते हुए लक्ष्य बोला .
"पर लक्ष्य ,जरा सोचो तुम्हारे इस मुकाम हासिल करने के चक्कर में हम सब तुमसे दूर रहने की कीमत चुकायेंगे ,उसका क्या .वो कम है क्या ...?"सुमि ने फिर से समझाने की कोशिश की .
पर लक्ष्य नहीं माना तो सुमि ने भी सोच लिया अब वह उसे नहीं रोकेगी .
एक दिन रात को  खाना खाने के बाद जब सभी लोग बाहर लान में बैठे थे तो लक्ष्य अपने बेटे को दुलारते हुए बोला बस एक बार मुझे 'पापा ' बोल दे फिर तो तीन साल बाद लौटूंगातब तक तो तूं बहुत बड़ा हो जायेगा .
और माँ का जैसे गला भर आया और रुलाई रोकते हुए बोली, "और बेटा क्या पता मैं मिलूँ या नहीं , ये तुमको यकीन है क्या ...!"
" तुम्हारा तो पता नहीं, पर मैं तो नहीं मिलूँगा इसे "...अपने मन के भावों को छुपाते हुए भी उदय वीर सिंह का गला  रुंध गया .
बस कीजिये माँ ,बाबा ,ऐसे अशुभ मत बोलिए ...!जाने दो इसे ,मैं हूँ ना आप दोनों का ख्याल रखने के लिए और तीन साल तो बहुत जल्दी ही कट जायेंगे ,अब जो समय बिताएंगे  हंस कर बिताएंगे .ताकि इसे भी वहांजाने पर या जाने के बाद आत्म -ग्लानी ना महसूस हो ." सुमि खाली आँखों से बोली .
फिर वो दिन भी आ गया जब लक्ष्य को जाना था .उस दिन मौसम में घुटन और साथ में सुमि में मन में भी जैसे -जैसे जाने का समय नज़दीक आ रहा था सुमि के सब्र का पैमाना भी गले तक पहुंचा जा रहा था .उसे लग रहा था, अगर कोई उससे बात करने की कोशिश करेगा तो वह जोर से रो ही पड़ेगी ..
सामान कार में रख सभी एयर -पोर्ट की तरफ चल पड़े .सभी चुप थे किसी को कोई बात ही नहीं सूझ रही थी .अचानक लक्ष्य ने माहोल को हल्का करने के किये बात शुरू की ," अरे भाई कोई बोलोतो सही , मैं कोई युद्ध पर थोड़ी जा रहा हूँ आज कल इंटरनेट का जमाना है हम दूर कहाँ है जब चाहे लाइव बात कर लेना ".कोई बोलता ,उससे पहले ही उसने गाड़ी रोकने को कहा ड्राइवर से सडक के पास में गुब्बारे  बेचने वाला था सो लक्ष्य ने अन्नत के लिए गुब्बारे लेने के लिए शीशा नीचा किया ...दूर कहीं चित्रा सिंह की ग़ज़ल बज  रही थी ," अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है ,जिस्म से आग निकलती है हवा भी गीली है ...."
सुमि की घुटन बढती ही जा रही थी और उसे कहीं से भी ठंडी हवा का झौंका  आता नहीं दिखा .
अब  विदा की बेला थी .सुमि का मन भीगा -भीगा सा जा रहा था कैसे भी उमड़ते हुए आंसुओं को रोक रही थी .जैसे ही जाने के लिए अनाउन्समेंट हुई ,लक्ष्य ने अन्नत को अपनी माँ थमाना चाहा...
और अन्नत ,लक्ष्य का अंगूठा थामते हुए बोल पड़ा " पापा "..!
लक्ष्य को सिर्फ एक शब्द ही सुना  " पापा "....और उसे लगा जैसे उसकी दुनिया तो यहीं है वह कहाँ जा रहा था ,अब उसे कोई भी अनाउन्समेंट नहीं सुनाई दे रही थी वह तो बस बेटे को सीने में भींचे खड़ा रहा और बाकि सब भी सुखद आश्चर्य से भरे उनको देख रहे थे .और सुमि को लगा जैसे कोई ठंडी हवा का झौंका सा लहरा गया और वो दौड़ पड़ी लक्ष्य की तरफ ये कहते हुए "आज उसका राजकुमार एक बार फिर से तिलिस्म से बाहर आ गया ."...अब तो मौसम की घुटन भी कम होकर बूंदों में बरसने लगी थी .इस बार भी बरसात सुमि के जीवन में खुशिया ही ले कर आयी थी .......


उपासना सियाग ( अबोहर )


Friday, September 30, 2016

विचार कीजिये, कन्या पूजन के समय

           सभी को शारदीय नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ। अब से नौ दिन देवी पूजा के साथ-साथ कन्या पूजन भी होगा। हमारे भारत देश में यह कैसी विडम्बना है कि हम स्त्री को, कन्या को देवी मान कर पूजते तो है लेकिन सम्मान नहीं करते।
           यहाँ अब भी स्त्री मात्र देह ही है,सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं । तभी तो हम मूर्तियों को पूजते हैं, हाड़ -मांस की प्रतिमूर्ति का तिरस्कार करते हैं। उसे अश्लील फब्तियों से ,नजरों से ताका जाता है। हर घर में बेटी है, बहन है।  अपने घर की बहन -बेटी का ही सम्मान और सुरक्षा क्यों ? जब तक दूसरों की बेटियों का सम्मान /सुरक्षा नहीं सोची जाएगी तब तक कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुकेगी। यह पहला कारण है कन्या भ्रूण -हत्या का। क्योंकि हमारे अवचेतन मन में यही होता है कि बेटियां सुरक्षित नहीं है। लेकिन क्यों नहीं है, इस पर विचार कीजिये, कन्या पूजन के समय।
            बेटी का जन्म मतलब , दहेज़ की चिंता ! और दहेज़ देने के बाद भी उसे यह आवश्यक नहीं है कि बेटी को सुख या सम्मान मिलेगा ही , चाहे शारीरिक प्रताड़ना ना मिले, उसे मानसिक सुख भी तो नहीं मिलता ! यहाँ भी हर घर में बेटी है। अपनी बेटी के लिए सब कुछ उत्तम चाहिए तो जो बहू बना लाये हैं उसके लिए सब उत्तम क्यों ना हो ! यह दूसरा कारण है कन्या भ्रूण -हत्या का। क्योंकि हम दूसरे की बेटी जब बहू बना कर लाते हैं तो बेटी जैसा व्यवहार चाह के भी नहीं कर पाते। क्यों नहीं करते, जबकि वह तो अपने परिवार के लिए समर्पित होती है। इस पर भी विचार कीजिये, जब कन्या पूजन करें !
             बेटियां सभी को प्यारी होती है। मेरे विचार में कोई भी बेटी पर जुल्म करना या गर्भ में ही समाप्त करना होगा। बेटी के भविष्य से डर कर ही ऐसा कठोर कदम उठाता होगा। लेकिन डर कैसा ! कारण पर विचार कीजिये। अपने बेटों को सदविचार दें। एक खुली सोच दें जिससे वह स्त्री को बराबर का दर्जा दें।
             
           
         
       
           

Friday, September 2, 2016

इतिहास अपने को दोहराता है ....( लघुकथा )

    इतिहास अपने को दोहराता है ..

   दरवाजे पर घंटी बोली तो राधे मोहन जी ने पत्नी भगवती जी को आवाज़ लगायी।
     " देखो तो, कहीं मिनी ही ना आई हो ! "
    " हां लगता तो है ...."
      दरवाजा खोला तो सामने मिनी के पति और सास खड़े थे।
        आवभगत के साथ-साथ मिनी के ना आने की वजह भी  पूछी गई।
       " जब बच्चों की छुट्टियां होंगी तब मिनी भी आ जायेगी। अभी तो हम किसी रिश्तेदारी में मिलने जा रहे थे  तो सोचा आपसे मिलते चलें।पता चला था कि आपके पैर में फ्रेक्चर हो गया है।  " मिनी की सास ने सहजता से कहा।
राधामोहन जी की आंखे नम हो आई। आँखे नम, पैर के दर्द से कम और मिनी के ना आने से अधिक हुयी।
       भगवती जी से यह छुप ना सका।
       रसोई में मेहमानों के लिए चाय-नाश्ता तैयार करते हुए उन्होंने भी आँखे पोंछ ली। सहसा उनकी स्मृति में बहुत साल पहले की आज से मिलती जुलती घटना तैर गई। कुछ ऐसा ही मंजर था। उनके पिता जी भी  बीमार थे और राधेमोहन जी अकेले ही मिल आये थे, कि उनकी बेटी छुट्टियों  में ही आ पायेगी। भगवती जी और उनके पिता रो कर, मन मसोस कर रह गए थे।
         मेहमानों के चले जाने के बाद राधेमोहन जी मायूसी से बोले, " मिनी नहीं आयी ! "
" तकलीफ तो मुझे भी है उसके ना आने पर, लेकिन मास्टर जी ! सारी उम्र इतिहास पढ़ाते रहे हो और यह भी याद नहीं रहा कि ' इतिहास अपने को दोहराता है .....'

( उपासना सियाग , अबोहर )



Wednesday, August 24, 2016

बाबा मेरे बच्चे कैसे हैं .....

बाबा, मेरे बच्चे कैसे हैं ?"

"............. "

" बोलो बाबा ! हर बार मेरी कही अनसुनी कर देते हो ...., अब तो बोलो !"

" ................ "

" बाबा ! "
"............................"

" मैं क्या कहूँ पुत्री ।"

" क्यों नहीं कह सकते हैं ?  तीन साल हो गए हैं ; अपने बच्चों से बिछुड़े हुए ..... ना जाने किस हाल में होंगे ।"

" देखो पुत्री यूँ रो कर मुझे द्रवित करने की कोशिश ना करो..."

" अच्छा ! तुम द्रवित भी होते हो ? लेकिन मेरे पास रोने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है ! "

" तुम खुद क्यों नहीं चली जाती...."

" मगर कैसे जाऊँ ....यहाँ मेरे पति भी तो है ? "

" वह जा चुका है । नया जन्म ले चुका है । यह तुम ही हो जो यहाँ रुक गई हो ....."

" वह चला गया ?"

" हाँ ! "

" वह पाषाण हृदय हो, शायद तुम्हारी तरह ही, चला गया होगा ; मैं नहीं जा पाईं ....मुझे मेरे बच्चों के अकेले पन के 

अहसास ने रोक लिया....मेरी आत्मा छटपटाहटा रही है! हम कितने उत्साह से तेरे दर्शन को आए थे ; अपने नन्हों की भी 

परवाह नहीं की ,और तुमने क्या किया ! "


" मैं ने कुछ नहीं किया ....और तुम बार-बार यूँ मेरे सामने यह सवाल लेकर मत आया करो.... मैं पाषाण हृदय नहीं हूँ।  हां , 

तुम मुझे पाषाणों में ही तलाशते हो। तुम्हें यहाँ आने की जरूरत भी क्या थी ? तुम्हारे कर्तव्य यहाँ आने से अधिक थे। "

" वाह भोले बाबा ! सवाल तुम खड़ा करते हो और जवाब देते कतराते हो ? "

" शांत पुत्री , क्रोध मत करो ! तुम्हें बच्चों के अकेले होने के अहसास ने नहीं बल्कि अपराधबोध ने रोक लिया है। "

" बाबा , तुम्हारे रौद्र  रूप के आगे मेरा क्रोध तो एक पागलपन है....विवशता है ।"
" मुझे तुम्हारे दुःख का अहसास है ....मगर मै क्या करूँ .....? यह सब विधि का विधान है...पहले से ही लिखा है....!"
अच्छा ! फिर तुम्हारे मंदिर को कैसे बचा लिया तुमने ? "
" .............."
" मैं मंदिर में नहीं  रहता पुत्री ! तुम्हारे हृदय में बसता हूँ..याद करो यात्रा से निकलने से पहले तुम्हारे हृदय में भी तो कुछ खटका था , क्या तुमने सुना था ...।"
" आह ....मुझे अपने बच्चों के सिवा  कुछ भी याद नहीं....ना जाने किसके सहारे होंगे...... "
" उठो पुत्री ; अब तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं है .....दुःख करने से क्या होगा चली जाओ।  उनका, तुम्हारा  साथ तुम्हारे देह होने तक ही था। .....नई शुरुआत करो !"
" नहीं बाबा , यहाँ से जाने के लिए मुझे पत्थर होना पड़ेगा, भगवान बनना होगा और वह मैं नहीं हो सकती....क्योंकि मैं माँ हूँ ....यहीं रहूँगी...छटपटाती , तुमसे सवाल करती....कि मेरे बच्चे कैसे हैं ?"

  
उपासना सियाग