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Monday, February 27, 2012

बेटी

           क्या ये बात किसी को भी हास्य प्रद नहीं लगती कि बेटी का जन्म सिर्फ इस लिए होना चाहिए कि हमे बहू  लानी है या संतति आगे बढ़ानी है। सभी यह कहते है कि बेटी होनी चाहिए, पर दूसरे के यहाँ ही।  हम सब शोर तो बहुत मचाते है कि बेटियां है तो जहाँ है या और भी बहुत कुछ।  लेकिन  जब भी किसी के यहाँ पहली संतान लड़की हो और दूसरी संतान के आने की सम्भावना होती है तो सबसे पहले यही प्रश्न होता है कि क्या तुमने चेक करवाया है कि क्या है लड़का या लड़की !
 मैं भी पूछती हूँ ! इस दुनिया  तो नहीं हूँ मैं  और अगर लड़की पैदा हो जाये तो सभी को पता है कि क्या प्रतिक्रिया  होती है ये यहाँ बताने कि जरुरत नहीं है। 
    लेकिन क्या कभी  किसी ने सोचा है कि हम लड़की का जन्म क्यूँ नहीं चाहते ? यहाँ पर हमारे कई जवाब हो सकते है। 
      पर मेरा मानना है सिर्फ एक ही कारण है कि हम बेटी को जन्म क्यूँ नहीं देना चाहते  कि हम दूसरों की बेटियों का मान नहीं रखते ,तो हमारे अवचेतन मन में कहीं ना कहीं ये धारणा तो होती ही है की कहीं हमारी बेटी के साथ भी बुरा ना हो। 
      हम दूसरों की बेटियों को अपने घर में बहू बना कर लाते है तो क्या हमारे मन उनके लिए वही सम्मान होता है जो अपनी बेटी के लिए होता है ! इस बात पर बहुत सारे लोग कहेगे कि  हाँ  ! लेकिन मैं  कहूँगी के  वो मान नहीं होता है।  एक उम्मीद होती है उनसे। 
      जब किसी बेटी के साथ कोई बद सलूकी हो तो हम में से कितने लोग उसका या उसके परिवार का साथ देता है ,कोई भी नहीं देता।  किसी की बेटी जब दहेज़ के लिए सताई जाती है या मार दी जाती है तो कितने लोग बेटी के परिवार का साथ देते है शायद कोई भी नहीं !
        हम ऊपर से ही समस्या का हल ढूंढते है जड़ को ख़त्म नहीं करते। यह तो वैसे ही हुआ ना जैसे कि कोई किसान अपने खेत में खरपतवार को ऊपर से काटता है जड़ से नहीं और वो खरपतवार खेत को ही ख़त्म कर देती है। ऐसा ही शायद हमारा भी होने वाला है अगर हम  नहीं चेते तो। 

Tuesday, February 21, 2012

पालन का भाव पिता ही में आता है .........

हम सभी हमेशा माँ का ही गुणगान करते है। कविताओं में भी अक्सर माँ की महिमा का गुणगान ही होता है ,और होना ही चाहिए। हम सभी जानते है कि माँ के क़दमों में स्वर्ग है लेकिन यह भी सच है कि पालन का भाव पिता ही में आता है ,माँ अगर प्यार करती है तो पिता पालन करता है।पिता का साथ ही अपने आप में सुरक्षा का भाव आ जाता है।
      मेरे जीवन कि ऐसे कुछ घटनाएँ है जो मुझे याद रही है। एक तो कुछ वर्ष पहले जब हम छोटे बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आने के कुछ दिन बाद जब उसे फोन किया तो मैं तो कई देर तक उसे लाड मैं ही बात करती रही ,पर जब उसके पापा ने बात की तो सबसे पहले पूछा कि" बेटे तुम्हारे कमरे का ए सी ठीक हो गया क्या ?".....(जिस दिन छोड़ने गए थे उस दिन ए सी ठीक हो रहा था उसके कमरे का ),तो यह भाव है पालन का ....!

   
    अब दूसरी घटना मेरे बचपन की ,हमारे स्कूल के आगे एक नदी थी जो बरसात में भर जाती थी तो स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन बहुत बरसात हुई  और नदी में पानी आ गया। स्कूल में छुट्टी की घोषणा के साथ कहा गया की बस्ते यहीं छोड़ दो और घर चले जाओ।सारे बच्चे बहुत खुश थे कि एक तो छुट्टी उपर से बस्ते भी नहीं ले कर जाने।लेकिन मुझे तो पानी से डर बहुत ही लगता था , अभी भी लगता है ...!
   नदी में ज्यादा पानी नहीं था पर मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कदम बढाने की। साथ वाली सखियों ने कहा भी कि आओ हम है न हाथ पकड़ो और चलो। मगर  मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी ,जोर से आँखे बंद कर ली। सोच रही थी कि क्या करूँ। तभी मुझे दूर से मेरे पापा आते दिखे। उनको मेरे डर के बारे में पता था। वो लगभग भागते हुए से आ रहे थे। पास आने पर में उनकी टांगों से लिपट कर जोर से रो पड़ी ,पर जो सुरक्षा का अहसास मुझे महसूस हुआ .उसका में वर्णन नहीं कर सकती।
पिता के  पालन की भावना माँ की ममता से भी बड़ी लगती है मुझे।

  और तीसरी घटना कुछ समय पूर्व की है। जब माँ ( सासू माँ ) अपने मायके गयी। अब पिता जी का सारा काम वह स्वयंम ही देखती है तो मुझे उनका काम करने की आदत भी नहीं है। वैसे भी पिता जी को बहू से बात करना पसंद नहीं है।हालाँकि  कोई काम हो तो कह भी देते हैं .नहीं तो बात नहीं करते।
   हाँ तो माँ के जाने बाद  , मैं उनको नाश्ता ,दिन का और रात का खाना तो समय पर दे देती पर रात को दूध देना भूल जाती क्यूंकि टीवी  में मग्न जो हो जाती थी। फिर पौने ग्यारह बजे याद आता ," अरे पिताजी का दूध तो रह ही गया ...!" फिर संजय जी को  ढूध का गिलास  दे कर आना पड़ता .. दो दिन तो ऐसा ही रहा।
तीसरे दिन पिताजी रात का खाना खा कर जाने लगे तो मुझे बोले के रात को 10  बजे मैं खुद ही आ जाऊंगा। संजय को ऐसे ही तकलीफ होगी।
मुझे  बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और बड़ी मुश्किल से बोली नहीं पिताजी आज मैं समय से ही दूध दे जाउंगी और उस दिन मैंने सबसे पहले यही काम किया।
    मन ही मन बहुत अभिभूत हुई एक पिता का अपने पुत्र के प्रति प्यार को देख कर जो 75  वर्ष की उम्र में भी अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ नहीं दे सकता है।जबकि यह कोई मुश्किल काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ भी बनता है एक पुत्र का ...
 पिता ऐसे ही होते हैं जो माँ की तरह अपना प्यार दिखा नहीं सकते पर महसूस तो करवा सकते है।



Thursday, February 16, 2012

क्या वो प्यार था .......


       जब तीसरी बार डोर बेल बजाने बाद भी दरवाज़ा नहीं खुला तो थोडा सा मैं चौंकी ,क्या बात हो सकती है कुहू दरवाज़ा क्यूँ नहीं खोल रही ,उसी ने तो बुलाया था फोन कर के," आजाओ जूही आज फ्री हूँ उमंग तो बिजनस टूर पर गए है ,बातें करेंगे बहुत सारी लंच भी यही कर लेना बस आ जाओ  तुम "...........एक सांस मैंने कितनी सारी बातें करने की आदत जो थी उसको .....

 यहाँ आसाम में मेरे  ज्यादा कोई जानकर भी नहीं थे बस पति के कार्यालय में काम करने वालों की पत्नियों के अलावा ,और एक कुहू थी बस अपनी कहने को या पुरानी जानकार कह लो ,हम ने  इंदौर में एक साथ हॉस्टल में तीन साल एक ही कमरे में बिताये थे तो एक दूसरे के राज़ दार भी थे और पक्की  वाली सहेलियां भी ,
शादी के बाद भी फोन -खतों से जुड़े रहे और फिर जब मेरे पति की पोस्टिंग यहाँ हुई तो हम दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था और अब .........मेरी सोच को विराम देते हुए कुहू ने दरवाज़ा खोला तो मुख पर वही उजली किरन सी निश्छल मुस्कान थी और हाथ पकड कर खींच लिया आओ आओ जल्दी आओ जूही . मुझे भांपते देर नहीं लगी कि आज वो बहुत रो चुकी है , चेहरे पर हलकी उदासी के साथ एक  निश्चिंत भाव भी था, मैं मुसुकुराने लगी और बोली एक बात तो उमंग सच कहते है कि तुम्हारी आँखे रोने के बाद और भी खुबसूरत हो जाती है .....उसके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान के साथ आँखों के कोर भी भीगते दिखे ,पर वो बात बदलते बोली चलो खाना खाते है खड़ी होने का उपक्रम किया तो मैंने हाथ पकड लिया बात क्या है कुहू?.........वो हंस कर बोली अरे कुछ नहीं यार ,आज मैंने एक वाइरस को खत्म कर दिया जो मेरी लाइफ की विंडो को खा रहा था ....बात तो बड़े बिंदास तरीके से शुरू की पर ख़त्म करते -करते उसका गला भर आया . मैंने धीरे से पूछा" क्या पराग की बात कर रही हो तुम ? वो धीरे से गर्दन हिला कर बोली  हाँ ....."!

पराग कौन था उसका या वो पराग की वो कौन थी ये बात दोनों ही नहीं जानते और एक दूसरे से जुड़े भी रहे बरसों तक............ और कुहू , उसकी  तो हर बात अनूठी थी , ज्यादा सुंदर नहीं थी पर एक चुम्बकीय आकर्षण था उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों में जो एक बार देख ले वो बस कहीं खो ही जाता ,मासूम सी मुस्कान ,कभी किसी से झगडा करते नहीं देखा एक अच्छी मददगार भी थी ,मन में दूसरों के लिए तो करुणा का अथाह सागर था किसी का भी बुरा तो सोच भी नहीं सकती थी ,शरारती और चंचल तो बहुत थी पर किसी को सताना उसका काम नहीं था ,बस हँसना और हँसाना सभी को...... और इसी हंसी मजाक में एक दिन दोपहर में जब हॉस्टल का फोन खाली पड़ा था तो उसने ऐसे ही रोंग नम्बर मिला लिया कभी किसी से तो कभी किसी  से बात करने लगी और एक फ़ोन नंबर मिला तो दूसरी तरफ एक मर्दाना आवाज़ (बहुत अच्छी और कर्ण प्रिय, दिल को छूने वाली भी ये बात मुझे कुहू ने बाद में बताई थी ) आयी ,तो कुहू ऐसे बातें करने लगी जैसे उसको जानती हो ,फिर बड़े ही खुश अंदाज़  में फोन रखते हुई बोली" अच्छा पराग आपसे फिर और भी बातें करुँगी ,"फिर मेरी तरफ  घूमकर मेरे गले में बाहें डाल कर बोली चल "आज तो मज़ा ही आ गया बातें कर के यार, पहली बार किसी लड़के से बात की है "
"अच्छा तुझे क्या पता वो लड़का ही है तूने देखा था क्या?" मैंने डांटते हुए कहा
वो बोली पराग ने बताया था की वो वकालत कर रहा है ,तो लड़का ही हुआ न .....
अच्छा अब मुझे जाने दे पढाई भी करनी है तेरी तरह इंटेलिजेंट नहीं हूँ मैंने कहा और अपने कमरे में आ गयी पीछे -पीछे वह भी पर वो तो बहुत खुश थी की आज उसने कोई बड़ा काम ही कर दिया वह ज्यादा नहीं पढ़ती फिर भी नम्बर अच्छे ही आते थे और मुझे बहुत पढने के बाद ही नम्बर आते थे ,ऐसे ही कुहू ने फिर पराग से बातें शुरू कर दी कभी दिन में एक बार या कभी दो बार और उस दिन तो बहुत खुश थी वो जिस दिन पराग हॉस्टल आने वाला था पर घबराई भी हुई उसने सिर्फ बातें ही बनाई थी किसी लड़के  से कभी मिली या बातें तो की ही नहीं ,पर पराग तो आने वाला था .........उस दिन बड़ी घबराई सी थी कुहू और हॉस्टल के बहार बैठने वाली तारा बाई जी ने आवाज़ लगाईं कुहू मेहता कोई मिलने आया है ,मैं भी भागी कुहू के पीछे -पीछे अरे जरा देखूं तो कैसा है कुहू का बॉय -फ्रेंड (वो खुश हो कर मुहं टेढ़ा कर के ऐसा ही बताया करती थी )

पराग तो देखा तो वो भी कुछ घबराया हुआ सा था ........ गोरा रंग ,कुछ भूरापन लिए आँखे और घुंघराले सुनहरी आभा लिए बाल, बहुत सुन्दर नौजवान था ,वो दोनों होस्टल के गार्डन में पेड़ के नीचे आमने सामने बैठे थे और मैंने देखा की पराग तो शायद सोच रहा था की क्या बात करूँ ,वैसे बातूनी तो वो भी कम नहीं था पर मुलाक़ात पहली ही थी उसकी भी किसी लड़की से और वो भी गर्ल्स -हॉस्टल में ,आखिर वो अपनी रिस्क पर  ही आया होगा वहां पर ...... लेकिन कुहू भी ना बस ,रहा नहीं गया और उसके हाथ पर बने एक बड़े काले निशान के बारे में पूछ ही लिया" ये क्या है ,ग्रीस लगा है क्या स्कूटर का ,या जल गया था या क्या हुआ था ,बस एक सांस में ही बोल गयी सब और पराग के चेहरे पर हंसी सी दौड़ गयी आखिर उसको भी तो बोलने का बहाना मिल गया था बताया की ये उसका 'बर्थ -मार्क 'है .........फिर थोड़ी देर बाद इधर उधर की बातें करके चला गया ..........
 वो संगीत का बहुत शौकीन था वहीँ कुहू को ज्यादा नहीं था बस सुन लिया ,उसे तो सोने का था नींद लेने का ,ऐसे ही एक दिन सो रही थी तो तारा बाई जी की आवाज़ आयी कुहू मेहता का फोन आया है .....और जब कई देर बाद वो आयी तो जोर जोर से हंस रही थी और  बताने लगी आज तो पराग ने गाना सुनाया आवाज़ तो अच्छी है उसकी, मेरे पूछने पर उसने बताया "बड़े अच्छे लगते है ये धरती ,ये नदिया ये रैना ,और तुम"वाला गाना सुनाया था ,और  पिक्चर देखने का बोल रहा था फिर मुझसे मना नहीं किया गया यार कितना भोला सा है ना थोडा सा बुद्धू भी है पर यार जूही तू साथ चलना अकेले तो मैं नहीं जाउंगी बड़ा अजीब सा लग रहा है "वो फिर एक सांस में शुरू हो गयी ,
"ठीक है बाबा "मैंने उसको चुप करते हुए कहा "चलूंगी "
फिर वो ओ पी नैयेर के संगीत से सजी पिक्चर दिखाने ले गया ,बाद में मैंने कुहू को छेड़ा क्या उसने तेरा हाथ नहीं पकड़ा अँधेरे में ,तो वो हैरानी से बोली" क्यूँ कोई डरावनी पिक्चर थी क्या जो वो डर के मारे मेरा हाथ पकड़ता !! "और मुझे बड़ी जोर से हंसी आयी पर वो  नहीं समझी और मुझे थोडा -थोडा समझ आ गया था जब उसने बताया की यार जूही ये पराग तो बहुत बड़ा गायक बनेगा अगर इसकी वकालत नहीं चली आज उसने फिर एक गाना सुनाया था "आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है  आपसे भी खूबसूरत आपके अंदाज़ है "..........मैंने उसे धीरे से टटोला कहीं उसको तुमसे प्यार तो नहीं हो गया और वो दोहरी हो गयी हंस -हंस कर बोली" देख जूही ,ये प्यार -व्यार कुछ नहीं होता बस एक केमिकल रिअक्शन ही होता है यार "तू छोड़ ये बातें और चल मैस में खाना खाने ...............उसके बाद हम सब पढाई में व्यस्त हो गए और एक्जाम्स की तैयारी में जुट गए और कुहू के पेपर पहले खत्म हो गए और वो घर जाने की तैयारी में लगी अगले दिन सुबह उसकी बस थी सात बजे ,मेरे साथ एक और सहेली बिंदु भी थी उसको बस स्टेंड छोड़ने के लिए और पराग भी आया था,  चलते हुए उसने बड़े बिंदास तरीके से मुझसे और बिंदु से हाथ मिलाया और पराग से भी और चली गयी
......................

"पर जूही मैं जा ही नहीं पायी वहां से अभी भी वहीँ खड़ी हूँ उसका हाथ थामे ,जब मैंने उसकी तरफ हाथ बढाया तो तो मैंने उसकी आँखों वो देखा जो मैं कभी समझ ही नहीं पायी, उसकी बातें उसके सुनाये हुए गाने और क्यूँ उसका मुहं उतर गया था मेरी सगाई की खबर सुन कर ........मेरा शरीर जरुर गया पर मेरी आत्मा वहीँ है अभी भी ..........."आंसू पोंछते हुए कुहू ने बताया .और चाय बनाने चली रसोई  मे ,मैं उसके पीछे -पीछे ही आ गयी और पूछा अच्छा कुहू फिर तुम उसके बाद अभी मिली हो क्या उससे फेस बुक पर .............उसने हाँ मैं सर हिला दिया और बताने लगी ...
हॉस्टल से घर आने के कुछ समय बाद कुहू का विवाह उमंग से हो गया ,उमंग एक बहुत अच्छा और सच्चा इंसान था, उसका एक ही फंडा था लाइफ का 'जियो और जीने दो' ....पार्टियाँ करने का शौकीन ,बाहर घूमने घुमाने का भी बहुत शौक है उसे ,जहाँ जाता कुहू जरुर उसके साथ होती ,कई बार दोनों विदेश भी जा चुके है  .बेटे की पढ़ाई खराब ना हो इसके लिए उसको भी होस्टल भेज रखा है पर कुहू का साथ नहीं छोड़ सकता .......कुहू अक्सर बताया करती है विवाह के पन्द्रह साल होने के बाद भी उमंग का हनीमून नहीं ख़त्म हुआ ,पर कभी- कभी हंसती हुयी कुहू की आँखों के आगे एक जोड़ी कुछ भूरी कुछ काली आँखे सामने आ जाती तो वो संजीदा भी हो जाती ............ ऐसे ही एक दिन उमंग ने कहा चलो कुहू हम भी फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाते है अपने सारे पुराने फ्रेंड्स को ढूंढेंगे ये अच्छा जरिया है ....दोनों ने अपना -अपना अकाउंट बना लिया लेकिन एक दिन कुहू अकेली थी और अपने फ्रेंड्स सर्च कर रही थी तो एक दम से ख्याल आया, कही पराग ने भी तो अपना अकाउंट नहीं बना रखा और लगी ढूंढने पर यहाँ तो सेंकडो पराग थे अब उसका वाला कौनसा है ,तभी एक चेहरे पर नज़र पड़ी तो चौंकी क्या ये हो सकता है अब उसकी कोई फोटो तो थी नहीं उसके पास(बस याद ही थी ) ,उसने उसके प्रोफाइल खोल कर देखा ,अरे हाँ वही जन्म तारीख, शहर ........उसने झट से उसके मेसेज  -बॉक्स में एक सन्देश छोड़ दिया अपना परिचय देते हुए और ये भी लिख डाला "क्या मैं अभी भी तुम्हें याद हूँ ?"............पर उसके बाद उसे थोडा सा संकोच भी हुआ अरे ये कोई और निकला तो ,मुझे कितना गलत समझेगा उसने फिर से उसका प्रोफाइल चेक किया और उसकी फोटो देखने लगी तो देख कर बस कुहू रो ही पड़ी ख़ुशी के मारे ,ये तो वही है पराग ,फोटो में उसके हाथ पर उसका काला निशान यानि 'बर्थ -मार्क 'था उसने धीरे से माउस के तीर से वो निशान छू दिया ,  पंद्रह दिन बाद पराग का सन्देश आया "हाँ ".............अब ये हाँ का मतलब दोनों तरह से लिया जा सकता है के "हां, मैं पराग ही हूँ या ये भी की तुम मुझे अभी भी याद हो "........पर कुहू को तो दोनों ही मतलब से हाँ ही दिखा ............

कुहू ने  सन्देश के उत्तर मैं अपना फोन नंबर दे दिया ,कुछ देर बाद पराग ऑन लाइन दिखा तो एक दोनों ही भूल गए के उनका जीवन अब पंद्रह साल आगे निकल  चुका है कुहू एक बेटे की माँ तो पराग दो बच्चों का पिता बन चुका था .........फिर फोन पर भी बात हुई तो उसने पूछा "पराग तुमने अपने घर मैं बात की है क्या मेरी "क्यूँ की पराग की माँ को उसके बारे में पता था  की वह कुहू से बात करता था ,जब उसने अपनी माँ को कुहू की सगाई के बारे में बताया था तो उसकी माँ ने एक रहत की सांस ली थी यह पराग ने ही कुहू को बताया था ,इस पर बिना पराग की प्रतिक्रिया जाने वो बहुत हंसी थी और वह उसका मुहं ही देखता रहा बस ...........
 हाँ तो जब कुहू के  यह पूछने पर की क्या उसने घर पर बताया है क्या उसके बारे में तो पराग हंस पड़ा नहीं बताया और बताऊंगा भी नहीं ,माँ तो रही नहीं कई सालों से बीमार थी ,और मेरी पत्नी मुझे ले कर बहुत शक्की है ऐसे में मेरी हिम्मत ही नहीं है बताने की ...........!
 फिर कई दिन चैटिंग का सिलसिला चलता रहा पराग अक्सर उससे शिकायत कर बैठता के वो भाग निकली बीच में ही इस पर कुहू को बहुत अफ़सोस सा होता ,एक दिन उसने भी नाराज़ हो कर कह ही दिया "क्यूँ नहीं जाती क्या तुमने रोका था ,किसके भरोसे रूकती "
पराग बोला एक बात पूछता हूँ अब हालाँकि इस बात का कोई भी मतलब भी नहीं है और तुम क्या जवाब दोगी ये भी मैं जानता हूँ फिर भी बताओ ,अगर मैं तुम्हारी तरफ हाथ बढ़ता तो  तुम इनकार  तो नहीं करती  और आज कहानी कुछ और ही होती "
और कुहू के पास सच में ही  कोई जवाब भी नहीं था ,और होता भी क्या ........!
एक दिन पराग हंस कर बोला "कुहू अगर कोई टाइम मशीन होती तो हम वापिस पंद्रह साल पीछे चले जाते " और कुहू अपने वही चिरपरिचित अंदाज़ में बोली (लिखा )"अरे मैं तो कई दिनों से वहीँ हूँ और तुम कहाँ हो ".........पराग भी भूल गया और जोर से हंस पड़ा अरे तुम तो मेरे पीछे ही खड़ी हो और मैंने देखा नहीं बहुत शरारती हो और फिर एक गीत गुनगुनादिया"बंदा-परवर थाम लो जिगर ..................." कुहू भी जोर से हंसी की तुम्हारी ये गानों की आदत गयी नहीं ,पर अब वो मतलब खूब समझ रही थी पर उसके क्या मायने थे अब ,.........

 दिल की सच्ची और इमानदार कुहू को अब थोड़ी आत्म -ग्लानी महसूस हुई ,ये गलत था अब ,उसने उमंग को बताने का फैसला किया  और रात को खाने के बाद उसने पति को सब सच बता दिया और कहा की ये सारा मेरा ही कुसूर है पहले भी मैंने ही पराग को ढूंढा था और अब भी मैंने ही ,मुझसे झूठ  नहीं बोला जाता  अब आप चाहे जो सोचो ,उमंग भी थोड़े से संजीदा हो कर बोले तुम मज़ाक कर रही या सच बोल रही हो ,देखो मेरी दिल की धड़कन रुक रही है ,उसने कहा की ये सच है .......पर गीत सुनाने और साथ पिक्चर जाने की बात बताने की उसमे हिम्मत नहीं थी ,उमंग ने भी बहुत हलके से लिया बोला कोई बात नहीं ऐसा होता है .ये जीवन चलता रहता है जाने दो ,.............अगले दिन कुहू ने पराग को सारी बात बताई तो उसे बहुत अचम्भा सा हुआ बोला ,बहुत किस्मत वाली हो कुहू ऐसा जीवन साथी मिला ,नहीं तो मोनिका ने मुझे एक कैद सी में जकड रखा है ,तो कुहू बोली ये तुम्हारा ही फाल्ट है जो अपने साथी में विश्वास जमा नहीं पाए  नहीं ऐसा नहीं है मैंने बहुत कोशिश की है वो भी मेरे साथ वकील ही है फिर भी ना जाने क्यूँ ऐसा करती है ........पराग का जवाब था
फिर एक दिन कुहू की बात मोनिका से करवा ही दी पराग ने ,उसने कुहू से तो बहुत मीठी -मीठी बातें की पर पराग की जान सांसत में डाल दी बोली या तो वह जान देदेगी नहीं तो उसको बाहर निकालो ,अगले दिन पराग का फोन  पर मेसेज आया की मैं तुमसे कोई भी बात नहीं करना चाहता मोनिका को सख्त ऐतराज़ है ................और कुहू जोर से रो पड़ी उस समय वो खाना खा रही थी ,उमंग के पूछने पर वो क्या बताती पर बेटे की याद आ रही है कह कर टाल दी बात को ,कई दिन उखड़ी सी रही वो, फोन भी मिलाया पर पराग ने नहीं बात की ,हार कर कुहू ने मेसेज किया के एक बार तो बात करनी ही होगी,आखिर मुझे भी तो पता चले  के क्या हुआ है .............!!
इतने में फोन भी आ गया पराग का बोला ,"वहां कुछ भी ठीक नहीं है तीन दिन हो गए है किसी ने भी सो कर नहीं देखा,मोनिका को हमारी निर्दोष मित्रता से सख्त ऐतराज़ है , अब मैं तुमसे प्रार्थना ही कर सकता हूँ की मुझे माफ़ करदो ,मुझे पता है तुम्हें कितनी तकलीफ हो रही है और मुझे ये कहते हुए भी, पर विधि का विधान भी यही है हम उससे बंधे हुए है "...........कुहू ने बहुत मुश्किल से बोला गया "कोई बात नहीं अब मैं तुमसे मिलने का पंद्रह साल और इंतजार करुँगी "................और पराग ने  यही सही रहेगा कह कर फोन काट दिया ..........
कुहू ने भी उसका फोन नम्बर डिलीट कर दिया उसे भी अपनी लिस्ट से बाहर कर दिया .
"पर जूही"अब कुहू मेरा हाथ पकड कर बोल रही थी ,"मैंने  उसका नंबर डिलीट कर दिया लेकिन जो नम्बर मैं पिछले पंद्रह साल से नहीं भूली तो ये कैसे भूल जाऊं ,मुझे नहीं पता की क्या कारण है ,कुछ बातें इंसान के बस मैं कहाँ होती है ,मुझे उससे प्यार नहीं था ,फिर भी मैं  नहीं भूली उसको क्यूँ ?ये भी मुझे नहीं पता पर मेरा दिल बहुत दुखा है और मैं इसको समझाने के लिए क्या करूँ ,ये भी नहीं मुझे पता"और उसने ऐसा क्यूँ किया मेरे साथ ,जब उसको ये मालूम था तो मुझे पहचाना ही क्यूँ उसने ,फिर जब तक उसको सहूलियत लगी बातें करता रहा और जब जान पर बन आयी तो "तू कौन मैं खामख्वाह ".................. !!!वो कितनी ही देर रोती रही और मैंने रोका भी नहीं  ये सोच कर के आज जितना भी बोझ दिल पर है आंसुओं की राह से निकल कर बह जाएगा ........!
है ...............!!

  पर उसे क्या बताती और वो  खुद जानती ही थी कि वो प्यार ही था जो वह भूल नहीं पाई कभी पराग को ,एक बार उसने खुद ही कहा था कि" हम औरतों के दिल में कई चेम्बर होते है एक में उसकी गृहस्थी और एक में उसका मायका ,सखियाँ होती है और जो दिल का जो तिकोना हिस्सा होता है उसमे उसकी अपनी कुछ छुपी हुई यादें होती है जिनको वो कभी फुरसत में  निकाल कर देख कर धो -पोंछ कर वापस रख देती है "..............मैंने सोचा जो लड़की प्यार को सिर्फ केमिकल -रिएक्शन मानती थी और दिल को खून सप्लाई का साधन, उसने दिल कि ऐसी व्याख्या कर दी और कहती है उसे पराग से प्यार नहीं है !
उसे तो मैंने  यही समझाया और वो भी ये समझती - जानती थी कि कोई भी विधि का विधान नहीं बदल सकता है जो जिसे मिला है वो सबसे अच्छा ही मिला. ( 3,095)

                   

Monday, February 13, 2012

मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई

मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई है। मैंने जब उनको पहली बार देखा तो उनसे मुहब्बत हो गयी। .एक सीधा सादा सा चेहरा मोहरा पर असाधारण व्यक्तित्व ...!
      मैंने उनको पहली बार मेरी शादी के बाद देखा था जब माँ उनका आशीर्वाद दिलवाने पास के घर  ले कर गयी थी। उनका प्यार से मेरे सर पर हाथ रखना मुझे अंतर्मन तक महसूस हुआ और मुझे लगा जैसे मेरे मन के तार उनसे जुड़ गए हो हालांकि मैंने उनको १० साल बाद गुरु धारण किया था पर उनसे प्यार उसी दिन हो गया था.
 महाराज जी का जीवन भी मुझे बहुत कारुणिक और मार्मिक लगता है। एक संपन्न परिवार में जन्मी और विवाहित मथुरा ,एक हादसे का शिकार हो कर एक टांग गवां बैठी तो पति ने त्याग दिया और मायके में रहने लगी। जहाँ उनके पति ने दूसरा विवाह कर के नई दुनिया बसा ली वहीँ मथुरा ने भी अपने ही गाँव में अपनी गुरु के माध्यम से ईश्वर से प्रीत जोड़ कर एक नई दुनिया में खो गयी। 
       कुछ साल बाद उनके पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ तो किसी ने उसको याद करवाया कि  हो सकता है ये मथुरा का श्राप हो और मैं भी  मानती हूँ कि  होता भी क्यूँ नहीं जिस के साथ सुख -दुःख निभाने का वादा किया था। उसको मुश्किल में अकेला  छोड़ दिया। 
 तब उनके पति को भी लगा और सपत्नीक माफ़ी मांगने आया।  तब तक मथुरा हर मोह माया से मुक्त थी और उनको ना केवल माफ़ी दी और आशीर्वाद भी दिया। 
  बाद में जब बेटा हुआ तो  वह ,बेटे को  भी आशीर्वाद दिलवाने लाया और कहा कि  वह उनके गाँव में आ कर रहे और वह उनके लिए एक आश्रम का  निर्माण भी  करवा देगा पर उन्होंने मन कर दिया के जो गलियां छोड़ दी वहां पर अब बसेरा नहीं होगा। लेकिन उनके  पति एक पत्नी के तो गुनहगार तो थे ही। उन्होंने एक मासूम ह्रदय को तो दुखाया ही था। अपने अंतिम समय में बहुत ही नारकीय यातना झेल कर गए है वे ...!

 जब मैं उसने पहली बार मिली तो उन्होंने मुझे औरतो की तीन श्रेणी समझाई कि "औरते तीन तरह की  होती है  "  शंखिनी , हंसिनी और डंकिनी "
'हंसिनी '.. वह  होती है जो कि  हंसमुख तो होती ही  है और हंस की  तरह होती है जो मोती चुनती ही है। 
'शंखिनी'... वह जो दिखावे में कुछ और होती है अंदर से कुछ और होती है  और 
'डंकिनी '.....वह  जो हर बात में डंक सा मारती रहती है सामने वाले के गले पड़ कर बोलती है। 
 वो बोली कि  ये तुम्हें देखना है कि कैसे औरत बनना है ,तो मैंने तो हमेशा हंसिनी बनने का प्रयास ही किया है अब मुझे नहीं पता कि मैं इसमें कामयाब हुई या नहीं .............:)
एक और बात जो मुझे उनकी पसंद आयी, वो कहते है नारी को अपने शरीर की सुरक्षा करनी ही चाहिए हमेशा सावधान रहना चाहिए। 
     मैं एक बार उनके आश्रम गयी तो उन्होंने स्वयं चाय बना कर पिलाई और साथ में बिस्किट्स भी खिलाये ,अपना काम वे खुद ही करती थी।  एक पैर होने के बावजूद किसी की भी  सहायता नहीं लेती थी। दिन में आश्रम में रहती थी पर शाम होते ही अपने मायके के परिवार में चली जाती है। उनका मानना था  कि आखिर उनका शरीर नारी का ही है तो उसकी रक्षा करनी ही होगी तभी वह  घर चली जाती थी।  आत्मा शुद्ध होती है उसे कोई रोग नहीं छू सकता लेकिन यह जो हमारा शरीर है इसे कर्मो के अनुसार व्याधियां झेलनी ही होती है। महाराज जी भी मधुमेह और उच्च रक्तचाप से ग्रसित थे। यही बीमारियां उनके शरीर के अंत का कारण बनी। शरीर का अंत ही होता है आत्मा का नहीं। वो आज भी हमारे आस -पास ही मौजूद है। आज-कल जहाँ ढोंगी साधू वेशधारी चहुँ ओर  मिल जायेंगे वहीँ मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई जैसे पवित्र आत्माएं भी मिलेगी जिनको अपने प्रचार कि कोई जरूरत ही नहीं हुई। ईश्वर करे हमें उनका आशीर्वाद सदैव मिलता रहे। 
                             
       

Thursday, February 9, 2012

बेलन


मैं जब भी बेलन की बुराई के बारे में सुनती हूँ तो मुझे कुछ अच्छा सा नहीं लगता ..क्या ये सचमुच हथियार है ,मैं तो नहीं मानती की जिस वस्तु से इतनी चीज़ें बन सकती है उसका हथियार के रूप मैं भी प्रयोग भी हो सकता है ....आगे कुछ बात करूँ ,पहले दो घटनाओं का जिक्र करना चाहती हूँ ...........
कुछ 15-16 साल पहले की बात है ,मेरी एक सहेली कहीं घूमने गयी तो हम कई सहेलियों के लिए बेलन लेकर आयी ,क्यूँ कि जहाँ वह गयी थी वहां लकड़ी का काम बहुत मशहूर था ,तो उसे और कुछ नहीं सूझा तो वह बेलन ही ले आयी .........यह देख मेरे पति मेरी सहेली को मजाक में कहने लगे कि "आपको तो टाडा में गिरफ्तार करवाना पड़ेगा ,कितने खतरनाक हथियार सप्लाई किये है आपने "......बात ऐसे हंसी की थी तो हंसी में ही उड़ गयी ........
दूसरी घटना पहली से 4-5 साल बाद की है .मेरी माँ ने एक बार पापड़ बनाने के बेलन, मेरे लिए और मेरी बहन के लिए मायके से भिजवाये तो मैं उनको  बैग से निकाल कर रख रही थी कि कितने है और कैसे है ....दोनों बहनों के मिला कर पूरे बारह थे .........यह देख पति देव को फिर से चुहल सूझ गयी और हाथ जोड़ कर बोले ---"देवी में तो तुम्हारे साथ अच्छे से ही रहता हूँ ,तो तुम्हारी माँ ने ये हथियार क्यूँ सप्लाई किये है ,क्या महा समर का इरादा है उनका ?".........उनकी ये बात मुझे अच्छी तो नहीं लगी पर कुछ बोली भी नहीं .............!
  मैं   यह पूछना चाहती हूँ क्या कोई महिला बेलन मार भी सकती है क्या ,........क्यूँ कि मैंने तो आज तक कभी किसी महिला को बेलन से मारते नहीं देखा ,.........
जैसे एक कारीगर या कलाकार के लिए उसके औजार होते है ,मैं वैसे ही बेलन को कलाकृति बनाने का साधन मानती हूँ ,जिससे हम महिलाएं कई तरह कि चीज़ें बना कर अपने प्रिय परिवार -जन का पेट भरती है ,

Friday, February 3, 2012

किसान



भारत जैसे कृषि प्रदान देश में ,किसानो की जैसी दुर्दशा है वैसी कही भी नहीं है ,क्या किसी ने सोचा है की ऐसा क्यूँ है .........क्यूँ की हमारा किसान अनपढ़ है ,और अनपढ़ इंसान दिशाहीन ही तो होता है ,उसे कैसे ही हांक लो ,शिक्षा के बिना जागरूक कैसे होगा वह ......

नहीं तो कभी कोई वस्तु का उत्पादन इतना कम होता है कि उसकी महंगाई हो जाती है और कभी इतना ज्यादा कि सड़कों पर फेंकनी पड़ती है , क्या ये एक भेड़ चाल सी नहीं लगती किसी को ! क्यूँ कि वो सोचता है कि पिछली बार इस वस्तु कि मांग ज्यादा थी तो वह भी इस वर्ष ये ही अपने खेत उगाएगा .......और फिर दाम गिर जाता है तो ......!!!
एक अनपढ़ किसान अपने संतानों को भी पढ़ने में रूचि नहीं दिखाता वो कहता है कि आखिर जाना तो खेत ही है ,और पढ़ा लिखा किसान खेतों की तरफ जाना नहीं चाहता क्यूँ की उसे शहर की सुख -सुविधाएँ भाती है ,अब सोचने वाली बात ये है कि करोड़ों कि भूमि का मालिक कुछ हजारों के लिए दूसरों की चाकरी करता है ,वह अपने खेत में नए प्रयोग भी तो कर सकता है और उत्पादन को बढ़ा कर देश की अर्थ -व्यवस्था में सुधार ला सकता है ,पर हमें तो आदत है की बस सरकार को कोसा जाये ,और कोस कर अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया जाये कि ये सरकार किसानो की नहीं है ,..........,अब इसमें सरकार भी क्या करेगी वह तो योजनायें ही लागू करेगी और अनपढ़ किसान को मालुम ही नहीं होगा की क्या उसके लिए अच्छा है तो फिर तो कुछ भी नहीं होगा .....किसानी की खून -पसीने की कमाई ऐसे ही सड़कों पर गिराई जाएगी .......