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Monday, December 31, 2012

चिंता.......

अपनी - अपनी चिंता...

जल्दी -जल्दी से बढे जा रहे हैं रजनी के कदम। आज तो देर हो गयी। पहुँचते ही डांट  पड़ेगी सर से। जिम में समय पर पहुंचना उसकी ड्यूटी  है लेकिन छोटे  बच्चे और भाई बहनों को सँभालते -सँभालते देर हो ही जाती है।

जिम पहुंचकर सर पर एक नज़र डाल  कर जल्दी से पहुँच जाती है औरतों के समूह में जो उसके इंतजार में दुबली ( ? ) हो रही थी।
अब सभी के पैर थिरक रहे थे तेज़ संगीत की लय पर। हर -एक के एक साथ हाथ और पैर चल रहे थे।और दिमाग में सभी को अपने-अपने  बढे हुए पेट सपाट करने की चिंता थी।

और रजनी ?

उसे भी तो चिंता थी अपने पेट को सपाट करने की , जो कि अंतड़ियों से चिपका हुआ था ...!

Friday, December 14, 2012

सज़ा ....

   जब से सुनयना को डॉक्टर श्री कान्त ने,विजय और सुमन को उम्र कैद की सजा की खबर सुनायी है तब से उसके मन में  एक अजीब सी हलचल मची हुई है। उसे नहीं मालूम यह बैचेनी है या अजीब सा सुकून। जैसे कुछ मिला भी है और सब कुछ  खो भी दिया।
    सोचते -सोचते वह आईने के सामने खड़ी हो गयी।सामने देख वह खुद ही डर  गयी अपने रूप को देख कर। कैसी थी और क्या हो गयी सुनयना।बहुत अधिक रूपवती तो नहीं थी पर एक अच्छे  व्यक्तित्व की मालकिन तो थी ही वह। ज्यादा देर खड़ी रह ना सकी और बिस्तर पर लेट गयी।
     विजय और सुनयना का प्रेम विवाह हुआ था।घर वालों के विरोध के बावजूद उसने विजय को जीवनसाथी के रूप में अपना लिया, जबकि विजय की आजीविका कोई ऐसी भी नहीं थी जिससे वह दोनों का खर्च वहन कर सके।सुनयना पर तो प्रेम का प्रेत सवार  था। कुछ भी नहीं सुझा बस एक विजय के सिवा। 
घर छोड़ कर एक मंदिर में विवाह कर लिया दोनों ने और विजय अपने घर ले कर गया।वहां कोई विरोध नहीं हुआ तो ज्यादा स्वागत भी नहीं हुआ। और विरोध होता भी क्यूँ , उनको तो उनके नाकारा बेटे के लिए घर बैठे  ही बहू मिल गयी।
   विजय सुबह ही नौकरी के नाम निकल जाता शाम पड़े घर आता।पीछे सुनयना से  काम तो बहुत लिया जाता पर व्यवहार के नाम पर अजनबियत या बाहर  से आयी हुई ही सहन करना पड़ता।
      कभी विजय से उसने पूछा भी के वह क्या कमाता है या दिन भर कहाँ जाता है तो उसे झिडक कर चुप करवा दिया जाता।यह हमारे भारतीय समाज में ऐसा ही होता है कि किसी स्त्री को उसका पति नहीं पूछता तो घर में भी कोई पूछ नहीं होती। कई बार सुनयना सोचती थी जो प्रेम उसने किया था वो प्रेम क्या हुआ?
    कभी वह घर वालों की शिकायत भी करती तो विजय उसे ही उलाहना देता कि  वह बड़े घर की है तो उसके परिवार से सामंजस्य नहीं बैठा रही। मायके से भी कोई आस नहीं थी। उन्होंने भी अभी तक नाराजगी का  दामन नहीं छोड़ा था ।
   ऐसे ही एक दिन वह बीमार पड़ गयी। उसे अस्पताल ले जाने के बजाय घर पर दवा ला दी। दूसरे  दिन विजय एक औरत को ले कर आया जिसे वह नर्स बता रहा था। उसने सुनयना के एक इंजेक्शन लगाया। लेकिन उसे उन दोनों के रंग-ढंग कुछ अजीब से लगे। नर्स जिसका नाम सुमन  था, वह विजय की और देख कर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी और विजय भी।विजय उसको छोड़ने गया तो देर रात ही घर लौटा। 
   तबियत  ठीक होने पर सुनयना के वही दिन और वही रात।
       कुछ समय बाद सुनयना की तबियत कुछ गिरी -गिरी सी रहने लगी। थकान सी और हल्का बुखार भी। कभी खाना भी हजम नहीं होता।शरीर  का भार भी तेज़ी से कम होता जा रहा था। लेकिन घर वालों को कोई परवाह नहीं थी  होती भी क्यूँ जब विजय ही उसके प्रति लापवाह था। अब तो वह कई बार रातों को भी नहीं आता।
     एक बार जब वह घर के पिछवाड़े में चक्कर खा कर गिर पड़ी तो घर वालों को होश आया और उसे होस्पिटल में भर्ती करवाया गया।वहां डॉक्टर ने उसकी शारीरिक परिस्तिथि भांपते हुए सभी तरह के टेस्ट करवाए।
टेस्ट्स की रिपोर्ट्स देख और सुन कर घर वालों और विजय के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गयी क्यूंकि सुनयना का एच .आई .वी . पोजिटिव था यानी एड्स। 
      एका -एक सभी की निगाहों में सुनयना के प्रति घृणा तैर रही थी और उसके कानो में कुलटा और ना जाने कैसे-कैसे आरोप लगाये  जा रहे थे। सुनयना खुद हैरान थी की ऐसे कैसे हो गया।कोई उसकी बात सुनने को तैयार ही नहीं था। वह लगभग बेहोश सी हुई जा रही थी। 
          कुछ देर बाद वह अकेली थी सभी उस पर लांछन की चादर ओढा कर उसे छोड़ कर जा चुके थे। 
उसने हिम्मत कर के टेक्सी पकड़ी और घर गयी पर उस कुलटा का उस घर में कोई स्थान नहीं है ,कह कर दरवाजे से ही धकेल दिया उसे।
   अब एक आस मायके से भी थी उसे।उसने पड़ोस में जा कर मायके फोन मिलाया तो दूसरी तरफ उसकी माँ थी। जब माँ ने बेटी की व्यथा सुनी तो फफक पड़ी और घर लौट आने को कहा। मायके पहुँची तब तक उसकी माँ ने सारी बात उसके पिता ,भाई और भाभी को बता चुकी थी। माँ ने तो गले लगाया पर पिता ने अभी भी माफ़ नहीं किया था उसे। वे कुछ नहीं बोले ।भाई की नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी। और भाभी तो उसे ऐसे देख रही थी जैसे कोई छूत की बीमारी ही आ गयी।अपने आप को समेट कर खड़ी हो गयी।
        उसे उसी वक्त अस्पताल ले जाया गया और वहां से जहाँ पर एड्स रोगियों की देखभाल करने वाली संस्था में भर्ती करवा दिया ।क्यूंकि उसे बहुत घृणित  बीमारी थी जो कि समाज की नज़रों में निंदनीय भी थी। उसके वहीं रहने की व्यवस्था कर दी गयी। उसकी जरूरत की वस्तुए उसे पहुंचा  दी जाती। कभी माँ आती तो वह बहुत कुछ सवाल माँ से करना चाहती पर माँ की बेबस और कातर आँखों में झाँक चुप हो जाती।
उसने प्रेम करने का जुर्म किया था। उसी को खमियाजा भी भुगतना पड़ा। 
      वहां पर डॉक्टर श्रीकांत भी थे।सभी मरीजों से घुलते - मिलते ,  हाल -चाल पूछते ,एक मुस्कुराहट सी रहती थी उनके चेहरे पर।जब उन्होंने सुनयना को एकांत में घुलते हुए देखा तो उसके पास चले आये।और उसके बारे में पूछने लगे।बातों -बातों में उन्होंने पूछा कि  क्या कभी बीमारी के वक्त उसे कोई इंजेक्शन तो नहीं दिया गया था।तब अचानक उसके दिमाग में एक बिजली सी कोंध गयी और वह समझ गयी के उस दिन सुमन ने उसे जो इंजेक्शन लगाया था हो ना हो वही एच . आई . वी. संक्रमित ही था। याद कर वह जोर से रो पड़ी। डॉक्टर ने उसे सांत्वना देते हुए उसे विजय पर कानूनी कार्यवाही करने की सलाह दी और अपना सहयोग देने का भी वादा किया।
       अगले दिन उसने डॉक्टर के साथ जा कर उन दोनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस के अपनी कार्यवाही करते हुए और दोनों को गिरफ्तार कर लिया और केस दर्ज करवा दिया।
       वहां पर उसे यह भी पता चला कि  विजय ने सुमन से विवाह भी कर लिया है। उसे इस बात पर बहुत धक्का पहुंचा और अपने प्रेम  पर बहुत ग्लानि भी हुई कि क्या यही वह व्यक्ति था जस पर उसने भरोसा कर अपना सब कुछ त्याग दिया था।
     अब वह और भी बीमार रहने लगी थी।
कोर्ट में विजय और सुमन ने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया। जिस दिन कोर्ट में उन दोनों के खिलाफ फैसला सुनाना था, सुनयना की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब थी इसलिए वह जा ना पायी।
    सुनयना सोचते -सोचते गई।  थोड़ी देर में डॉक्टर श्रीकांत ने उसे देखा तो कुछ चौंके और छू कर देखा।
वह नींद में थी पर ना जागने वाली नींद में एक चिरनिद्रा में। डॉक्टर श्रीकांत का मन भर आया और मन ही मन बोले आज सुनयना को मुक्ति मिल गई  इस दोगली दुनिया से। और चादर से मुहं ढांप दिया।

उपासना सियाग

Wednesday, December 12, 2012

ममता की मिठास ......

       माँ की जगह कोई भी नहीं ले सकता। हर औरत को  महसूस होता है कि वह अपनी माँ से बेहतर माँ नहीं  सकती। मुझे भी ऐसा लगता है,  जैसा मेरी माँ मुझे प्यार करती है वैसा और उतना प्यार  मैं अपने बच्चों को नहीं करती। एक घटना जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ , वह मेरे कथन को प्रमाणित करती है।

     बात जुलाई की है इसी साल की जब  मेरा छोटा बेटा हॉस्टल चला गया। मैं बहुत उदास थी। लेकिन मुझे उससे मिलने का जल्दी ही संयोग मिल गया। मेरी बड़ी दीदी का छोटा बेटा  भी उसी स्कूल-होस्टल में है।वैसे दोनों भाई साथ ही जाते हैं पर इस बार किसी कारण -वश वह बाद में गया। दीदी के साथ मैंने भी जाना  तय किया।
           जिस दिन जाना था उस दिन मेरा शुक्रवार का व्रत था।इस व्रत में खास बात यह थी कि  इसमें बाहर यानि किसी के घर का कुछ भी यहाँ तक पानी भी नहीं पीना होता। सोचा व्रत करूँ या नहीं क्यूँकि यह शुक्रवार दूसरा ही था व्रत करने वाला। मन में आया अभी एक व्रत ही हुआ है तो दूसरा किसलिए छोड़ना। व्रत, वह भी प्रद्युमन के लिए था। वह बहुत शरारती है , मुझे उसके लिए भगवान् को बहुत मनाना  पड़ता है , शायद थोड़ी शरारते कम करके पढने लग जाये। उसके लिए मैंने ब्रेड और बीकानेरी भुजिया( ये दोनों ही चीज़ें मेरी कमजोरी है ) तक का त्याग किया हुआ है पिछले चार वर्षों से।भगवन को बोला हुआ है जिस दिन यह दसवीं पास करेगा उसी दिन इनको हाथ लगाउंगी।

हाँ तो मैं बेटे से मिलने जाने की बात कर रही थी ...!
सुबह आठ बजे निकले घर से। रास्ते में एक जगह दीदी और उसके बेटे ने खाना खाया तो मैंने चाय ही पी वह भी अपने  ही रुपयों से खरीद कर। सफ़र  में मुझे  वैसे भी बहुत घबराहट सी होती है। उस दिन तो खाली पेट था।
हाँ एक बात तो बताई ही नहीं मैंने ...! उन दिनों सावन का महीना था। और मैं सावन के महीने में चीनी का सेवन नहीं करती यानि कि  किसी भी प्रकार का मीठा भोजन। कहा जाता है के सावन के महीने में अगर किसी प्रिय वस्तु का त्याग किया जाए  तो शिव जी प्रसन्न होते है। अब सारा साल शिव जी के कानो में पता नहीं क्या-क्या गीत गाती रहती हूँ तो एक महीने कुछ  शिव जी के लिए छोड़ भी दिया तो क्या हुआ ...!

      एक तो खाली  पेट और उस पर चाय भी फीकी पी जी तो घबराना ही था।लेकिन बेटे के भविष्य का भी तो सवाल था।
 लगभग एक बजे के करीब वहां पहुंचे। बेटे का चेहरा देख कलेजा मुहं को आ गया ," अरे ...! ये स्कूल वाले भी न , बच्चों की जान ही निकाल देते है, हम कैसे खिला पिला कर ,अच्छा सा, सुन्दर सा बना कर यहाँ भेजते हैं और इन्होने तो एक सप्ताह में ही हवा सी  निकाल दी।" फिर पति -देव की बात याद आ गयी , ' या तो बच्चो को खिला-पिला लो या इनको पढ़ा लो'...बात उनकी भी सही है।

     आगे बढ़ कर बेटे को गले लगाया तो जल्दी से पीछे हट गया और बोला बस मम्मा सब देख रहे हैं। लो जी ये भी क्या बात हुयी ...! माना के वह दसवीं में आ गया खुद को बहुत बड़ा समझने लग गया , मुझे तो अभी भी वही छोटा सा मुन्ना ही लगता है।फिर भी ढेर सारा लाड तो उंडेल  ही दिया ...

              कुछ देर मिल कर बातें कर हम दोनों बहनें  वापस चल पड़ी। बिना कुछ खाए मेरा हाल खराब सा हुआ जा रहा था। रास्ते में रुक कर एक जगह नीम्बू -पानी पिया तो लगा कि कुछ जान सी आ रही है।

      रास्ते में मेरा मायका भी है। अब मायका रास्ते  में हो और कोई औरत मायके जाये बिना कैसे रह सकती है तो हमने भी ड्राइवर को मायके की तरफ गाडी मोड़ने को कह दिया।गाडी से उतरते ही माँ की वही प्रतिक्रिया थी जो मेरी , मेरे बेटे को देख कर हुई  थी। बोल पड़ी , "अरे ...! तुझे क्या हुआ ऐसा चेहरा क्यूँ उतरा हुआ है ...!"
मैंने व्रत का बताया तो नाराज़ होने लगी के सफर में कोई भूखा रहता है क्या।
मैंने कहा , " बेटे के भविष्य का मामला है , अब भूख के पीछे भगवान को नाराज़ कैसे कर सकती हूँ।"
माँ ने चाय या दूध का पूछा तो मैंने मना  कर दिया क्यूंकि इस व्रत में बाहर का नहीं खा सकते । माँ यहाँ भी नाराज़ हुयी के बाहर का या किसी और के घर का मत खाओ पर यह ते तेरा अपना ही घर है यहाँ तो कुछ ले लो।पर मैंने मना कर दिया क्यूंकि व्रत की किताब में ऐसा ही लिखा था।

    माँ ने एक सुझाव दिया के मैं दूध पी लूँ और दूध के बदले में उनको एक रुपया दे दूँ। उनके मुताबिक मैं खरीद कर तो कुछ खा पी सकती हूँ। एक गिलास दूध मेरे लिए  ले लाई। एक तो भूखे पेट उस पर इतनी गर्मी बहुत राहत सी महसूस हो रही थी। बंद हुयी आँखे खुलने लगी थी।मैंने पर्स टटोला  तो उसमे दो रूपये का सिक्का था तो मैंने कहा की एक रुपया वापस दीजिये।
माँ हंस पड़ी और बोली  , " मेरे पास भी नहीं एक का सिक्का , वैसे आज तो हमारी कमाई का दिन है इस लिए तुम एक गिलास दूध और पी लो , एक रुपया और कमा लूंगी  मैं ...!" और दूध का गिलास थमा दिया।
सच में बहुत राहत सी महसूस हुई ,  दूध से ज्यादा माँ की बातों  और प्यार से।

              कई देर से हमारा वार्तालाप सुन रहे पापा भी मुझे डांटते हए से ग्लुको - मीटर ले आये( माँ को मधुमेह है तो घर में ही रखते हैं यह )। वे कह रहे थे, " कुछ दिन पहले तुम्हारा शुगर  -लेवल नार्मल से कम था फिर  भी तुम मीठा छोड़ कर बैठी हो ...! लाओ चेक करवाओ ...अगर शुगर - लेवल कम हुआ तो तुम्हें अभी मीठा खाना पड़ेगा। "

       मैंने चुप चाप हाथ आगे कर दिया। मुझे उस पल  ऐसा लग रहा था  वही उनकी छोटी सी बेटी ' टिंकू ' हूँ एक बार तो अपनी उम्र ही भूल सी गयी । बचपन में हम बहनों में जो भी बीमार पड़ती थी तो पापा सरहाने ही बैठे रहते थे। तब लगता था के बार -बार बीमार पड़ें और पापा की स्पेशल बेटी बन जाएँ। आज भी जब बीमार पड़ती हूँ तो पापा की बहुत याद आती है।बेटी होने का बस यही दुःख है मुझे के अपने माँ -पापा से दूर रहना पड़ता है।

    हां तो ...!पापा ने शुगर चेक किया तो बिलकुल ठीक था अपने स्तर के मुताबिक ...! मैं हंस पड़ी , " देखो पापा ...! माँ के हाथों में ही मिठास है ...:)

और यही सच है के माता - पिता के प्यार के आगे सब कुछ गौण है। यह बात हम जब तक खुद माता - पिता ना बन जाएँ नहीं समझ सकते।