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बुधवार, 21 मार्च 2012

प्रद्युमन

मेरा बेटा प्रधुमन शरारती और नटखट ,बिलकुल कान्हा जैसा ,15 साल का हो गया है फिर भी शरारतें कम नहीं होती .
पिछले बुधवार को मुझ से कहने लगा कि मैं कार चला रहा हूँ और जल्दी से बाहर भागा ...और कार स्टार्ट कर ली ,सुन
कर मैंने दीवार के उपर से ही आवाज़ दी अरे रुको ....पर वो नहीं रुका ...मैं भाग कर बाहर की तरफ भागी वो जा चुका था ;बाहर जा कर देखा तो अरुंधती और मोनिका हंस रही थी कि प्रधुमन कार  ले कर चला गया ,पहले वो दोनों भी बैठने वाले थे पर ऊनको शर्म आ गयीकि एक बच्चा ही कार चला रहा है और बच्चे ही बैठे हैं.लेकिन कार मे दीपू और अम्बरीश भी बैठे है ;मेरी घबराहट के मारे जान निकली जा रही थी और मैं वहीँ दरवाज़े के बाहर बैठ गयी .....और सोचने लगी कि अगर कहीं कार किसी से टकरा गयी तो ....किसी को टक्कर ही मार दी तो ...ना जाने कितने "तो "........मेरे दिमाग मे चक्कर लगा रहे थे .

१० मिनिट बाद अरुंधती बोली कि "बड़ी मम्मी " वो आ रहा है .मैं भागी पर वह तो सररर ....से निकल गया ;मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी . इतने में वह दूसरी तरफ से आता दिखा .....मेरी जान में जान आयी.
यह १० मिनिट कैसे निकले यह मैं ही जानती हूँ ....कितने ही गायत्री मंत्र -- महा मर्त्युन्जय मन्त्रों का जाप कर दिया........अगर वह थोड़ी देर और नहीं आता तो मैं १६ सोमवार के व्रत भी बोल देती ..
  हाँ तो , उसने कार पास ला कर रोकी और उतर कर मेरा पास आया .
   मुझे लग रहा था कि वो कार से नहीं हवाई -जहाज से उतर कर आया है मुझे बहुत ख़ुशी और राहत महसूस  हो रही थी पर मैंने प्रकट नहीं कि बल्कि उसे डांट ही लगाईं .
     लेकिन उसे कोई फर्क नहीं...चेहरे पर वही शरारती मुस्कान . आगे बढ़ कर गले लग गया और बोला मन ही मन तो बड़े खुश हो रहे हो ना ,आपका बेटा कार चलाना सीख गया .
     शाम को कहने लगा  कि मुझे प्रधान -मंत्री का फ़ोन नंबर चाहिए .पूछने पर बोला कि मैं उनसे कहूँगा "ड्राइविंग -लाइसेंस कि उम्र 16 साल कर देनी चाहिए .अब  मैं 16 साल का हो जाऊंगा और मुझे कार चलानी आगई है ! "
     मेरे पास कोई जवाब नही था.
मुझे क्या कहना चाहिए था ?

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

कन्फ्यूजन


जब से मेरी एक सज्जन से बहस हुयी है, मैं कन्फ्यूजन में हूँ कि क्या मेरे सचमुच  माइंड नहीं है ??? उन सज्जन से मेरी मुलाकात सिर्फ फेसबुक पर ही हुयी और वो एक बहुत बड़ी संस्था से संम्बंध रखते है ........
एक  दिन वो अचानक मुझसे मेरा हाल -चाल पूछने के बाद मुझसे पूछने लगे कि क्या आप सुखी हो ??? मैंने कहा जी हाँ !
वो बोले पूरा सच बताना ,मैंने कहा जी हाँ पूरा का पूरा सच !! मैं सुखी हूँ .......
तो कहने लगे कि क्या आप भगवान को मानते है ,तो मैं बोली कि जी हाँ मैं शिव जी कि भक्त हूँ .........तो उन्होंने मुझसे शिव जी से सम्बन्धित कई सारे सवाल किये ,मैंने सारे जवाब दे दिए ....तो उन्होंने कहा कि बातें बनाने में आज-कल सभी स्मार्ट है ........!! लो करलो बात अब मैंने सारे जवाब सही दे दिए तो मैं बातें बनाने लगी ..अब उनको क्या पता कि शिव जी मेरे साथ पिछले 29 सालों से है (वैसे तो हर जन्म से कृपा है उनकी पर,.. इस जन्म मैं मुझे 7july 1982 से कृपा महसूस होने लगी है ),......
फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि इस संसार में सुख ज्यादा है या दुःख ......तो मैंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि कोई भी इंसान दुखी है ,सबके आपने -अपने सुख है ,अगर कोई भी दुखी भी है तो वो दुसरे के सुख से ,तो वो बोले कि सिस्टर आपके माइंड ही नहीं है आप क्या बोल रही है ??? फिर मैंने भी बहस की उनसे कुछ देर तक............!!
मैं अधिकतर चुप ही रहती हूँ और शांत भी ,पर एक ओसामा मेरे भीतर भी निवास करता है जो कभी -कभी मुझ पर हावी हो जाता है तो वो मुझमे कुलबुलाने लगा था फिर मैंने ओसामा को शांत करते हुए उन सज्जन से बात बंद कर दी ...
अगले दिन जब मैंने उनको फिर से ऑन-लाइन  देखा तो मुझे थोडा अफ़सोस सा हुआ कि मुझे बहस नहीं करनी चाहिए थी पता नहीं क्या ज्ञान देने वाले थे ...तो मैंने क्षमा मांगते हुए बात करनी चाही तो ,सबसे पहले अपनी खुद की तारीफों के पुल बाँध दिए ......फिर बोले अच्छा सिस्टर बताओ की भगवान क्या है ??
  मैंने कहा आप ही बता दीजिये ,वो बोले क्यूँ आपको नहीं पता मैंने कहा जो मुझे पता है हो सकता वो आपको पसंद ना आये ...तो उन्होंने कहा कि नहीं आप ही बताओ ,फिर मैंने कहा तो सुनिए..........
  आज -कल भगवान् कुछ भी नहीं है .सबके अपने -अपने भगवान है नेता का कुर्सी ,बच्चे का माँ ,एक भिखारी का भीख ,एक औरत का उसका पति ही भगवान् है ,जो मंदिर में भगवान है उसको कौन पूछता है ....इस मतलबी दुनिया के मतलब के ही भगवान्  है मैं आगे ही बोलने वाली थी कि वो जोर से बोले (जोर से मतलब है कि उनकी लिखावट छोटी abcd से बड़ी ABCD में आगई थी )........सिस्टर आपका कुछ भी नहीं हो सकता .........आपके सचमुच ही माइंड नहीं है !!!!!


अब तो मेरा ओसामा भी जाग गया ,मैं कुर्सी से उठ कर संजय जी के पास गयी और कहा कि क्या सचमुच मेरे माइंड नहीं है ???उन्होंने अखबार से चेहरा उठा कर बोले "देवी यह कहने कि क्या  मुझमे सचमुच हिम्मत है "!! 
और मैं बिना बोले वापस कुर्सी पर बैठ कर उन सज्जन को बिना कहे कुछ भी आउट कर दिया ........!!
पर कन्फ्यूजन अभी भी बरकरार है ..........!!!!

शिवानी का टुनटुनवा


      शिवानी  आज सुबह से मन ही मन बहुत खुश थी। रात को  अच्छे से नींद भी नहीं आयी फिर भी एक दम तरो-ताज़ा लग रही थी। पूजा पाठ में भी मन नहीं लग रहा था।  बार -बार ध्यान अपने कमरे में रखे हुए बॉक्स पर जा रहा था जो  उसके पति ने गिफ्ट दिया था।
     रोज़ स्कूल जाने की जल्दी में वह पूजा -पाठ में समय दे नहीं पाती इसलिए रविवार को आराम से बैठ कर अपने प्रभु की सेवा करती है। लेकिन  आज वह इसमें भी ध्यान नहीं लगा पा रही थी  सो बस अपने प्रभु से माफ़ी मांग कर एक दो घंटी की आवाज़ सुना कर जल्दी से खड़ी होगई।  
    बहादुर को चाय कमरे में ही दे जाने को कह भागती हुई सी कमरे में पहुंची और बेड पर बैठ कर बॉक्स को खोला और उसमे रखे हुए मोबाइल फोन को बाहर निकला, ऐसे जैसे कोई हीरे की अंगूठी ही हो !
    और फिर अपनी डायरी में लिखे फोन -नम्बर को एक -एक कर के फीड करने लगी अपने मोबाइल में। जब सभी नंबर एड कर दिए तो एका-एक अपने पति पर प्यार उमड़ आया और कुछ नहीं सूझा तो "आई लव यू"ही लिख दिया अपने मेसेज -बॉक्स में और भेज दिया। 

 पर यह क्या मेसेज भेजते ही तो उसको लगा कि यह तो गलत हो गया क्यूँ कि वह पति की जगह उसके स्कूल के शिक्षा -अधिकारी को चला गया। उसके तो चेहरे का रंग ही उड़ गया , "अरे !ये क्या कर दिया !!"
सोच ही रही थी कि सन्देश का जवाब भी आ गया "आई लव यू टू !" यह  देख कर शिवानी के तो होश ही उड़ गए।  कुछ सोचती , एक और सन्देश "आप कौन है !" भी आ गया। 
   अब तो शिवानी  का दिल बैठा जा रहा था कि अरे आज मैंने क्या कर दिया। तभी फोन भी टुनटुना  उठा शिवानी  ने देखा उन्ही शिक्षा अधिकारी का फोन था और उसके हाथ से फोन गिर गया जैसे कोई करंट ही लगा हो। घंटी बज कर बंद हो गयी तो वह जल्दी से  उठी , फोन को अलमारी में अपने कपड़ों के नीचे रख कर अलमारी को कस के बंद कर दिया  और बैठ गयी। 
उसकी चाय के साथ उसका उत्साह भी ठंडा पड़  गया।
      थोड़ी देर बाद धीरे से उठी और अलमारी के पास जा कर कान लगा कर सुनने लगी तो जल्दी से घबराकर पीछे हो गयी क्यूँ कि फोन अभी भी टुनटुना रहा था। वह  जल्दी से अपने कमरे के बाहर हो गयी और अपने आप को सामान्य करने की कोशिश करने लगी पर ध्यान उधर ही था। 

     कुछ देर बाद जब रोहन (उसके पति )घर आये तो उनको भी देख कर लगा की शिवानी आज कुछ अजीब सा व्यवहार कर रही है ,इतनी परेशान क्यूँ है ?पूछा "शिवानी  आज तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ा हुआ सा  लग रहा है क्या बात है ?"
   बस शिवानी तो फिर जोर -जोर से रोने लग गयी और  रो -रो कर सारी गाथा गा दी के  उससे आज क्या हुआ है। रोहन  जोर से हंस पड़े "अच्छा तो फोन का ये इस्तेमाल हो रहा है !"  फिर बोले , "रोने वाली क्या बात है शिवानी ,       तुम्हारा नम्बर तो उनके पास है नहीं और जब कभी उनसे बात करनी हो तो मेरे फोन से कर लेना। "
यह सुन कर शिवानी  को कुछ सांत्वना पहुंची और अलमारी से फोन निकाल कर देखा तो सात मिस्ड -काल थी अब तो उसे भी बहुत हंसी आयी।
  (उपासना सियाग )
upasnasiag@gmail.com

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

बेटी

           क्या ये बात किसी को भी हास्य प्रद नहीं लगती कि बेटी का जन्म सिर्फ इस लिए होना चाहिए कि हमे बहू  लानी है या संतति आगे बढ़ानी है। सभी यह कहते है कि बेटी होनी चाहिए, पर दूसरे के यहाँ ही।  हम सब शोर तो बहुत मचाते है कि बेटियां है तो जहाँ है या और भी बहुत कुछ।  लेकिन  जब भी किसी के यहाँ पहली संतान लड़की हो और दूसरी संतान के आने की सम्भावना होती है तो सबसे पहले यही प्रश्न होता है कि क्या तुमने चेक करवाया है कि क्या है लड़का या लड़की !
 मैं भी पूछती हूँ ! इस दुनिया  तो नहीं हूँ मैं  और अगर लड़की पैदा हो जाये तो सभी को पता है कि क्या प्रतिक्रिया  होती है ये यहाँ बताने कि जरुरत नहीं है। 
    लेकिन क्या कभी  किसी ने सोचा है कि हम लड़की का जन्म क्यूँ नहीं चाहते ? यहाँ पर हमारे कई जवाब हो सकते है। 
      पर मेरा मानना है सिर्फ एक ही कारण है कि हम बेटी को जन्म क्यूँ नहीं देना चाहते  कि हम दूसरों की बेटियों का मान नहीं रखते ,तो हमारे अवचेतन मन में कहीं ना कहीं ये धारणा तो होती ही है की कहीं हमारी बेटी के साथ भी बुरा ना हो। 
      हम दूसरों की बेटियों को अपने घर में बहू बना कर लाते है तो क्या हमारे मन उनके लिए वही सम्मान होता है जो अपनी बेटी के लिए होता है ! इस बात पर बहुत सारे लोग कहेगे कि  हाँ  ! लेकिन मैं  कहूँगी के  वो मान नहीं होता है।  एक उम्मीद होती है उनसे। 
      जब किसी बेटी के साथ कोई बद सलूकी हो तो हम में से कितने लोग उसका या उसके परिवार का साथ देता है ,कोई भी नहीं देता।  किसी की बेटी जब दहेज़ के लिए सताई जाती है या मार दी जाती है तो कितने लोग बेटी के परिवार का साथ देते है शायद कोई भी नहीं !
        हम ऊपर से ही समस्या का हल ढूंढते है जड़ को ख़त्म नहीं करते। यह तो वैसे ही हुआ ना जैसे कि कोई किसान अपने खेत में खरपतवार को ऊपर से काटता है जड़ से नहीं और वो खरपतवार खेत को ही ख़त्म कर देती है। ऐसा ही शायद हमारा भी होने वाला है अगर हम  नहीं चेते तो। 

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

पालन का भाव पिता ही में आता है .........

हम सभी हमेशा माँ का ही गुणगान करते है। कविताओं में भी अक्सर माँ की महिमा का गुणगान ही होता है ,और होना ही चाहिए। हम सभी जानते है कि माँ के क़दमों में स्वर्ग है लेकिन यह भी सच है कि पालन का भाव पिता ही में आता है ,माँ अगर प्यार करती है तो पिता पालन करता है।पिता का साथ ही अपने आप में सुरक्षा का भाव आ जाता है।
      मेरे जीवन कि ऐसे कुछ घटनाएँ है जो मुझे याद रही है। एक तो कुछ वर्ष पहले जब हम छोटे बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आने के कुछ दिन बाद जब उसे फोन किया तो मैं तो कई देर तक उसे लाड मैं ही बात करती रही ,पर जब उसके पापा ने बात की तो सबसे पहले पूछा कि" बेटे तुम्हारे कमरे का ए सी ठीक हो गया क्या ?".....(जिस दिन छोड़ने गए थे उस दिन ए सी ठीक हो रहा था उसके कमरे का ),तो यह भाव है पालन का ....!

   
    अब दूसरी घटना मेरे बचपन की ,हमारे स्कूल के आगे एक नदी थी जो बरसात में भर जाती थी तो स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन बहुत बरसात हुई  और नदी में पानी आ गया। स्कूल में छुट्टी की घोषणा के साथ कहा गया की बस्ते यहीं छोड़ दो और घर चले जाओ।सारे बच्चे बहुत खुश थे कि एक तो छुट्टी उपर से बस्ते भी नहीं ले कर जाने।लेकिन मुझे तो पानी से डर बहुत ही लगता था , अभी भी लगता है ...!
   नदी में ज्यादा पानी नहीं था पर मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कदम बढाने की। साथ वाली सखियों ने कहा भी कि आओ हम है न हाथ पकड़ो और चलो। मगर  मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी ,जोर से आँखे बंद कर ली। सोच रही थी कि क्या करूँ। तभी मुझे दूर से मेरे पापा आते दिखे। उनको मेरे डर के बारे में पता था। वो लगभग भागते हुए से आ रहे थे। पास आने पर में उनकी टांगों से लिपट कर जोर से रो पड़ी ,पर जो सुरक्षा का अहसास मुझे महसूस हुआ .उसका में वर्णन नहीं कर सकती।
पिता के  पालन की भावना माँ की ममता से भी बड़ी लगती है मुझे।

  और तीसरी घटना कुछ समय पूर्व की है। जब माँ ( सासू माँ ) अपने मायके गयी। अब पिता जी का सारा काम वह स्वयंम ही देखती है तो मुझे उनका काम करने की आदत भी नहीं है। वैसे भी पिता जी को बहू से बात करना पसंद नहीं है।हालाँकि  कोई काम हो तो कह भी देते हैं .नहीं तो बात नहीं करते।
   हाँ तो माँ के जाने बाद  , मैं उनको नाश्ता ,दिन का और रात का खाना तो समय पर दे देती पर रात को दूध देना भूल जाती क्यूंकि टीवी  में मग्न जो हो जाती थी। फिर पौने ग्यारह बजे याद आता ," अरे पिताजी का दूध तो रह ही गया ...!" फिर संजय जी को  ढूध का गिलास  दे कर आना पड़ता .. दो दिन तो ऐसा ही रहा।
तीसरे दिन पिताजी रात का खाना खा कर जाने लगे तो मुझे बोले के रात को 10  बजे मैं खुद ही आ जाऊंगा। संजय को ऐसे ही तकलीफ होगी।
मुझे  बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और बड़ी मुश्किल से बोली नहीं पिताजी आज मैं समय से ही दूध दे जाउंगी और उस दिन मैंने सबसे पहले यही काम किया।
    मन ही मन बहुत अभिभूत हुई एक पिता का अपने पुत्र के प्रति प्यार को देख कर जो 75  वर्ष की उम्र में भी अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ नहीं दे सकता है।जबकि यह कोई मुश्किल काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ भी बनता है एक पुत्र का ...
 पिता ऐसे ही होते हैं जो माँ की तरह अपना प्यार दिखा नहीं सकते पर महसूस तो करवा सकते है।



गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

क्या वो प्यार था .......


क्या वो प्यार था   
    

         तीसरी बार डोर बेल बजाने बाद भी दरवाज़ा नहीं खुला तो मैं चौंकी ,क्या बात हो सकती है कुहू दरवाज़ा क्यूँ नहीं खोल रही ,उसी ने तो बुलाया था फोन कर के," आजाओ जूही , आज फ्री हूँ उमंग तो बिजनस टूर पर गए हैं  ,बातें करेंगे बहुत सारी... लंच भी यही कर लेना बस आ जाओ  तुम "...........एक सांस  में कितनी सारी बातें करने की आदत जो थी उसको !

       यहाँ आसाम में मेरे  ज्यादा कोई जानकर भी नहीं थे। पति के कार्यालय में काम करने वालों की पत्नियों के अलावा , एक कुहू ही थी बस अपनी कहने को या पुरानी जानकार कह लो। हम ने  इंदौर में एक साथ हॉस्टल में तीन साल एक ही कमरे में बिताये थे तो एक दूसरे के राज़ दार भी थे और पक्की  वाली सहेलियां भी।
शादी के बाद भी फोन -खतों से जुड़े रहे और फिर जब मेरे पति की पोस्टिंग यहाँ हुई तो हम दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था और अब ...
             मेरी सोच को विराम देते हुए कुहू ने दरवाज़ा खोला तो मुख पर वही उजली किरन सी निश्छल मुस्कान थी और हाथ पकड़  कर खींच लिया आओ- आओ ,जल्दी आओ जूही ! मुझे भांपते देर नहीं लगी कि आज वो बहुत रो चुकी है , चेहरे पर हलकी उदासी के साथ एक  निश्चिंत भाव भी था।
       मैं मुसुकुराने लगी और बोली ,"एक बात तो उमंग सच कहते है कि तुम्हारी आँखे रोने के बाद और भी खुबसूरत हो जाती है ! "
         उसके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान के साथ आँखों के कोर भी भीगते दिखे , वह  बात बदलते बोली चलो खाना खाते हैं। खड़ी होने का उपक्रम किया तो मैंने हाथ पकड लिया, " बात क्या है कुहू ?"
    वह हंस कर बोली, " अरे कुछ नहीं यार ,आज मैंने एक वाइरस को खत्म कर दिया जो मेरी लाइफ की विंडो को खा रहा था। "
       बात तो बड़े बिंदास तरीके से शुरू की पर ख़त्म करते -करते उसका गला भर आया . मैंने धीरे से पूछा" क्या पराग की बात कर रही हो तुम ? वह  धीरे से गर्दन हिला कर बोली,  "हाँ ..."

     पराग कौन था उसका या वो पराग की वो कौन थी ये बात दोनों ही नहीं जानते और एक दूसरे से जुड़े भी रहे बरसों तक... ! और कुहू !उसकी  तो हर बात अनूठी थी  ! ज्यादा सुंदर नहीं थी पर एक चुम्बकीय आकर्षण था उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों में जो एक बार देख ले वो बस कहीं खो ही जाता। मासूम सी मुस्कान ,कभी किसी से झगड़ा  करते नहीं देखा। एक अच्छी मददगार भी थी। मन में दूसरों के लिए तो करुणा का अथाह सागर था।   
       किसी का भी बुरा तो सोच भी नहीं सकती थी। शरारती और चंचल तो बहुत थी पर किसी को सताना उसका काम नहीं था। बस हँसना और हँसाना सभी को...!
         और इसी हंसी मजाक में एक दिन दोपहर में जब हॉस्टल का फोन खाली पड़ा था तो उसने यूँ ,ही रोंग नम्बर मिला लिया। कभी किसी से तो कभी किसी  से बात करने लगी और एक फ़ोन नंबर मिला तो दूसरी तरफ एक मर्दाना आवाज़ (बहुत अच्छी और कर्ण प्रिय, दिल को छूने वाली भी ये बात मुझे कुहू ने बाद में बताई थी ) आयी।  कुहू तो ऐसे बातें करने लगी जैसे उसको जानती हो।
          फिर बड़े ही खुश अंदाज़  में फोन रखते हुई बोली," अच्छा पराग आपसे फिर और भी बातें करुँगी !"
     मेरी तरफ  घूमकर मेरे गले में बाहें डाल कर बोली चल "आज तो मज़ा ही आ गया बातें कर के यार, पहली बार किसी लड़के से बात की है !"
    "अच्छा तुझे क्या पता वो लड़का ही है तूने देखा था क्या?" मैंने डांटते हुए कहा।
    "पराग ने बताया था कि वह वकालत कर रहा है ,तो लड़का ही हुआ न ....."
" अच्छा अब मुझे जाने दे पढाई भी करनी है तेरी तरह इंटेलिजेंट नहीं हूँ !"मैंने कहा और अपने कमरे में आ गयी। पीछे -पीछे वह भी। वह  तो बहुत खुश थी कि  आज उसने कोई बड़ा काम ही कर दिया। वह ज्यादा नहीं पढ़ती फिर भी नम्बर अच्छे ही आते थे और मुझे बहुत पढने के बाद ही नम्बर आते थे।
       और उस दिन के बाद से कुहू ने  पराग से फोन पर बातें शुरू कर दी। कभी दिन में एक बार या कभी दो बार ! और एक  दिन तो वह बहुत खुश थी।  जिस दिन पराग हॉस्टल आने वाला था ; थोड़ी घबराई भी हुई थी क्यूंकि उसने सिर्फ बातें ही बनाई थी। किसी लड़के  से कभी आमने-सामने बैठ कर मिली या बातें तो की ही नहीं थी।
     लेकिन पराग तो आने वाला था ...!
         बड़ी घबराई सी थी कुहू।  हॉस्टल के चौकीदार ने आवाज़ लगाईं कि कुहू मेहता कोई मिलने आया है। मैं भी भागी कुहू के पीछे -पीछे अरे जरा देखूं तो कैसा है कुहू का बॉय -फ्रेंड (वो खुश हो कर मुहं टेढ़ा कर के ऐसा ही बताया करती थी ) .

        पराग को  देखा तो वह  भी कुछ घबराया हुआ सा था।  गोरा रंग ,कुछ भूरापन लिए आँखे और घुंघराले सुनहरी आभा लिए बाल, बहुत सुन्दर नौजवान था। वो दोनों होस्टल के गार्डन में पेड़ के नीचे आमने सामने बैठे थे और मैंने देखा कि  पराग तो शायद सोच रहा था कि  क्या बात करूँ। वैसे बातूनी तो वो भी कम नहीं था पर मुलाक़ात पहली ही थी उसकी भी किसी लड़की से और वो भी गर्ल्स -हॉस्टल में ,आखिर वो अपनी रिस्क पर  ही आया होगा वहां पर।
       लेकिन कुहू से भी ना बस ,रहा नहीं गया और उसके हाथ पर बने एक बड़े काले निशान के बारे में पूछ ही लिया" ये क्या है ,ग्रीस लगा है क्या स्कूटर का ,या जल गया था या क्या हुआ था ...बस एक सांस में ही बोल गयी सब और पराग के चेहरे पर हंसी सी दौड़ गयी आखिर उसको भी तो बोलने का बहाना मिल गया था बताया कि  ये उसका 'बर्थ -मार्क 'है .फिर थोड़ी देर बाद इधर उधर की बातें करके चला गया।
           वह  संगीत का बहुत शौकीन था। वहीं कुहू को संगीत से ज्यादा लगाव  नहीं था ; बस सुन लिया !उसे शौक था तो सोने का , नींद लेने का  !
       ऐसे ही एक दिन जब वह सो रही थी तो  चौकीदार  की आवाज़ आयी , "कुहू मेहता का फोन आया है !"
        जब कई देर बाद वो आयी तो जोर जोर से हंस रही थी और  बताने लगी आज तो पराग ने गाना सुनाया आवाज़ तो अच्छी है उसकी।
          मेरे पूछने पर उसने बताया, "बड़े अच्छे लगते है ये धरती ,ये नदिया ये रैना ,और तुम !वाला गाना सुनाया और   पिक्चर देखने का भी बोल रहा था।  मुझसे मना नहीं किया गया यार कितना भोला सा है ना थोडा सा बुद्धू भी है पर यार जूही तू साथ चलना अकेले तो मैं नहीं जाउंगी बड़ा अजीब सा लग रहा है "वो फिर एक सांस में शुरू हो गयी।
     "ठीक है बाबा "मैंने उसको चुप करते हुए कहा चलूंगी !
     एक दिन हमें वह  ओ पी नैयेर के संगीत से सजी पिक्चर दिखाने ले गया। बाद में मैंने कुहू को छेड़ा, "क्या उसने तेरा हाथ नहीं पकड़ा अँधेरे में !"
   तो वो हैरानी से बोली" क्यूँ कोई डरावनी पिक्चर थी क्या जो वो डर के मारे मेरा हाथ पकड़ता ?  मुझे बड़ी जोर से हंसी आयी पर वह नहीं समझी। लेकिन  मुझे थोड़ा  -थोड़ा  समझ आ गया था ;जब उसने बताया कि  यार जूही ये पराग तो बहुत बड़ा गायक बनेगा ;अगर इसकी वकालत नहीं चली तो !आज उसने फिर एक गाना सुनाया था " आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज़ है  आपसे भी खूबसूरत आपके अंदाज़ है ..."
        मैंने उसे धीरे से टटोला "कहीं उसको तुमसे प्यार तो नहीं हो गया ? " वह  हंस -हंस कर दोहरी हो गयी थी ।  बोली" देख जूही ,ये प्यार -व्यार कुछ नहीं होता है , बस एक केमिकल रिअक्शन ही होता है यार  !तू छोड़ ये बातें और चल मैस में खाना खाने ...!"
       उसके बाद हम सब पढाई में व्यस्त हो गए और एक्जाम्स की तैयारी में जुट गए।  कुहू के पेपर पहले खत्म हो गए।  वह  घर जाने की तैयारी में लगी थी।  अगले दिन सुबह सात बजे उसकी बस थी।   उसको बस स्टेंड छोड़ने के लिए हमारे  साथ हमारी सहेली  बिंदु भी थी।  पराग भी आया था।  चलते हुए उसने बड़े बिंदास तरीके से मुझसे और बिंदु से हाथ मिलाया और पराग से भी और चली गयी।

    "पर जूही मैं जा ही नहीं पायी वहां से अभी भी वहीँ खड़ी हूँ उसका हाथ थामे ,जब मैंने उसकी तरफ हाथ बढाया तो तो मैंने उसकी आँखों वो देखा जो मैं कभी समझ ही नहीं पायी, उसकी बातें उसके सुनाये हुए गाने और क्यूँ उसका मुहं उतर गया था मेरी सगाई की खबर सुन कर ... वहां से मेरा शरीर जरुर गया पर मेरी आत्मा वहीं है अभी भी ...!"आंसू पोंछते हुए कुहू ने बताया और चाय बनाने चली रसोई  में।
        मैं उसके पीछे -पीछे ही आ गयी और पूछा अच्छा कुहू फिर तुम उसके बाद अभी मिली हो क्या उससे फेस बुक पर ...! उसने हाँ मैं सर हिला दिया और बताने लगी।
    
        हॉस्टल से घर आने के कुछ समय बाद कुहू का विवाह उमंग से हो गया ,उमंग एक बहुत अच्छा और सच्चा इंसान था।  उसका एक ही फंडा था लाइफ का 'जियो और जीने दो' ....पार्टियाँ करने का शौकीन ,बाहर घूमने घुमाने का भी बहुत शौक है उसे ,जहाँ जाता कुहू जरुर उसके साथ होती। कई बार दोनों विदेश भी जा चुके है। 
       बेटे की पढ़ाई खराब ना हो इसके लिए उसको भी होस्टल भेज रखा है पर कुहू का साथ नहीं छोड़ सकता।  कुहू अक्सर बताया करती है विवाह के पन्द्रह साल होने के बाद भी उमंग का हनीमून नहीं ख़त्म हुआ। पर कभी- कभी हंसती हुयी कुहू की आँखों के आगे एक जोड़ी कुछ भूरी कुछ काली आँखे सामने आ जाती तो वो संजीदा भी हो जाती। 
       ऐसे ही एक दिन उमंग ने कहा चलो कुहू हम भी फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाते है अपने सारे पुराने फ्रेंड्स को ढूंढेंगे। ये अच्छा जरिया है। दोनों ने अपना -अपना अकाउंट बना लिया। एक दिन कुहू अकेली थी और अपने फ्रेंड्स सर्च कर रही थी तो एक दम से ख्याल आया कि  कही पराग ने भी तो अपना अकाउंट नहीं बना रखा और लगी ढूंढने पर यहाँ तो सेंकडो पराग थे ! अब उसका वाला कौनसा है ?तभी एक चेहरे पर नज़र पड़ी तो चौंकी क्या ये हो सकता है !अब उसकी कोई फोटो तो थी नहीं उसके पास(बस याद ही थी ) !        उसने उसके प्रोफाइल खोल कर देखा ,अरे हाँ वही जन्म तारीख, शहर ........उसने झट से उसके मेसेज  -बॉक्स में एक सन्देश छोड़ दिया अपना परिचय देते हुए और ये भी लिख डाला "क्या मैं अभी भी तुम्हें याद हूँ ?"
       उसके बाद उसे थोडा सा संकोच भी हुआ, "अरे ये कोई और निकला तो ! मुझे कितना गलत समझेगा उसने फिर से उसका प्रोफाइल चेक किया और उसकी फोटो देखने लगी तो देख कर बस कुहू रो ही पड़ी ख़ुशी के मारे कि ये तो वही पराग  है  ! फोटो में उसके हाथ पर उसका काला निशान यानि 'बर्थ -मार्क 'था उसने धीरे से माउस के तीर से वो निशान छू दिया। 
     पंद्रह दिन बाद पराग का सन्देश आया "हाँ !"
            अब ये हाँ का मतलब दोनों तरह से लिया जा सकता है के "हां, मैं पराग ही हूँ या ये भी कि तुम मुझे अभी भी याद हो !" 
     पर कुहू को तो दोनों ही मतलब से हाँ ही दिखा ...
    कुहू ने  सन्देश के उत्तर मैं अपना फोन नंबर दे दिया। कुछ देर बाद पराग ऑन लाइन दिखा तो एक दोनों ही भूल गए के उनका जीवन अब पंद्रह साल आगे निकल  चुका है ! कुहू एक बेटे की माँ तो पराग दो बच्चों का पिता बन चुका था। फिर एक दिन फोन पर भी बात हुई तो उसने पूछा "पराग तुमने अपने घर में मेरे बारे में बताया क्या ? "
      क्यूँ कि  पराग की माँ को उसके बारे में पता था कि  वह कुहू से बात करता था। जब उसने अपनी माँ को कुहू की सगाई के बारे में बताया था तो उसकी माँ ने एक राहत की सांस ली थी। यह पराग ने ही कुहू को बताया था। इस पर बिना पराग की प्रतिक्रिया जाने वो बहुत हंसी थी और वह उसका मुहं ही देखता रहा बस ... 
    हाँ तो, जब कुहू के  यह पूछने पर कि  क्या उसने घर पर बताया है उसके बारे में तो पराग हंस पड़ा कि नहीं बताया और बताऊंगा भी नहीं ! माँ तो रही नहीं कई सालों से बीमार थी ,और मेरी पत्नी मुझे ले कर बहुत शक्की है ऐसे में मेरी हिम्मत ही नहीं है बताने की ..!
     फिर कई दिन चैटिंग का सिलसिला चलता रहा पराग अक्सर उससे शिकायत कर बैठता के वो भाग निकली बीच में ही।  इस बात पर कुहू को बहुत अफ़सोस सा होता। एक दिन उसने भी नाराज़ हो कर कह ही दिया "क्यूँ नहीं जाती क्या तुमने रोका था ,किसके भरोसे रूकती !"
     पराग बोला एक बात पूछता हूँ अब हालाँकि इस बात का कोई भी मतलब भी नहीं है और तुम क्या जवाब दोगी ये भी मैं जानता हूँ फिर भी बताओ ,अगर मैं तुम्हारी तरफ हाथ बढ़ता तो  तुम इनकार  तो नहीं करती  और आज कहानी कुछ और ही होती। "
और कुहू के पास सच में ही  कोई जवाब भी नहीं था ,और होता भी क्या ..!
      एक दिन पराग हंस कर बोला "कुहू अगर कोई टाइम मशीन होती तो हम वापिस पंद्रह साल पीछे चले जाते !"  
    कुहू ने  अपने वही चिरपरिचित अंदाज़ में बोली (लिखा ),"अरे मैं तो कई दिनों से वहीँ हूँ और तुम कहाँ हो ....!"
       पराग भी भूल गया और जोर से हंस पड़ा, "अरे तुम तो मेरे पीछे ही खड़ी हो और मैंने देखा नहीं बहुत शरारती हो .
     और फिर एक गीत गुनगुनादिया"बंदा-परवर थाम लो जिगर .........." कुहू भी जोर से हंसी कि  तुम्हारी ये गानों की आदत गयी नहीं !"
लेकिन अब वह इन सबका  मतलब खूब समझ रही थी लेकिन अब  उसके मायने भी क्या थे !

        दिल की सच्ची और इमानदार कुहू को अब थोड़ी आत्म -ग्लानी महसूस हुई। ये गलत था।उसने उमंग को बताने का फैसला किया  और रात को खाने के बाद उसने  सब सच बता दिया और कहा कि  ये सारा मेरा ही कुसूर है ; पहले भी मैंने ही पराग को ढूंढा था और अब भी मैंने ही ! मुझसे झूठ  नहीं बोला जाता  अब आप चाहे जो सोचो !"
       उमंग भी थोड़े से संजीदा हो कर बोले, "तुम मज़ाक कर रही या सच बोल रही हो ,देखो मेरी दिल की धड़कन रुक रही है !
   " यह सच है !" लेकिन गीत सुनाने और साथ पिक्चर जाने की बात बताने की उसमे हिम्मत नहीं थी। उमंग ने भी बहुत हलके से लिया बोला, " कोई बात नहीं ऐसा होता है .ये जीवन चलता रहता है जाने दो ....."
             अगले दिन कुहू ने पराग को सारी बात बताई तो उसे बहुत अचम्भा सा हुआ बोला ,"बहुत किस्मत वाली हो कुहू ऐसा जीवन साथी मिला ,नहीं तो मोनिका ने मुझे एक कैद सी में जकड रखा है !
    कुहू बोली , "ये तुम्हारा ही फाल्ट है जो अपने साथी में विश्वास जमा नहीं पाए !"
   " नहीं ऐसा नहीं है मैंने बहुत कोशिश की है वह भी मेरे साथ वकील ही है ,फिर भी ना जाने क्यूँ ऐसा करती है !" पराग का जवाब था।
        एक दिन कुहू की बात मोनिका से करवा ही दी पराग ने। उसने कुहू से तो बहुत मीठी -मीठी बातें की पर पराग की जान सांसत में डाल दी बोली या तो वह जान दे देगी नहीं तो उसको बाहर निकालो ,अगले दिन पराग का फोन  पर मेसेज आया कि  मैं तुमसे कोई भी बात नहीं करना चाहता मोनिका को सख्त ऐतराज़ ह।  और कुहू जोर से रो पड़ी।  उस समय वो खाना खा रही थी। उमंग के पूछने पर वह वो क्या बताती।  बेटे की याद आ रही है कह कर बात  टाल दी। कई दिन उखड़ी सी रही। फोन भी मिलाया पर पराग ने नहीं बात की। हार कर कुहू ने मेसेज किया कि  एक बार तो बात करनी ही होगी। आखिर मुझे भी तो पता चले  के क्या हुआ है ..!
          इतने में फोन भी आ गया पराग का बोला ,"वहां कुछ भी ठीक नहीं है तीन दिन हो गए है किसी ने भी सो कर नहीं देखा,मोनिका को हमारी निर्दोष मित्रता से सख्त ऐतराज़ है , अब मैं तुमसे प्रार्थना ही कर सकता हूँ कि मुझे माफ़ करदो ,मुझे पता है तुम्हें कितनी तकलीफ हो रही है और मुझे ये कहते हुए भी, पर विधि का विधान भी यही है हम उससे बंधे हुए है  ! "
        कुहू ने बहुत मुश्किल से बोला गया "कोई बात नहीं अब मैं तुमसे मिलने का पंद्रह साल और इंतजार करुँगी। और पराग ने  यही सही रहेगा कह कर फोन काट दिया।
      कुहू ने भी उसका फोन नम्बर डिलीट कर दिया उसे भी अपनी लिस्ट से बाहर कर दिया।
"लेकिन जूही ...." अब कुहू मेरा हाथ पकड कर बोल रही थी ,"मैंने  उसका नंबर डिलीट कर दिया लेकिन जो नम्बर मैं पिछले पंद्रह साल से नहीं भूली तो ये कैसे भूल जाऊं ,मुझे नहीं पता  क्या कारण है ,कुछ बातें इंसान के बस में  कहाँ होती है ,मुझे उससे प्यार नहीं था ,फिर भी मैं उसे  नहीं भूली , क्यूँ ? ये भी मुझे नहीं पता लेकिन मेरा दिल बहुत दुखा है और मैं इसको समझाने के लिए क्या करूँ ,ये भी नहीं मुझे पता !"और उसने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया  ,जब उसको ये मालूम था तो मुझे पहचाना ही क्यूँ उसने ,फिर जब तक उसको सहूलियत लगी बातें करता रहा और जब जान पर बन आयी तो "तू कौन मैं खामख्वाह ..!"
      वो कितनी ही देर रोती रही और मैंने रोका भी नहीं  ये सोच कर के आज जितना भी बोझ दिल पर है आंसुओं की राह से निकल कर बह जाएगा ......
       एक बार उसने खुद ही कहा था कि" हम औरतों के दिल में कई चेम्बर होते है एक में उसकी गृहस्थी और एक में उसका मायका ,सखियाँ होती है और जो दिल का जो तिकोना हिस्सा होता है न ,उसमे उसकी अपनी कुछ छुपी हुई यादें होती है जिनको वो कभी फुरसत में  निकाल कर देख कर धो -पोंछ कर वापस रख देती है !"
    मैंने सोचा जो लड़की प्यार को सिर्फ केमिकल -रिएक्शन मानती थी और दिल को खून सप्लाई का साधन, उसने दिल कि ऐसी व्याख्या कर दी और कहती है उसे पराग से प्यार नहीं है !
        मैं  उसे क्या बताती और वह  खुद जानती ही थी कि वो प्यार ही था जो वह भूल नहीं पाई कभी पराग को। फिर भी उसे तो मैंने  यही समझाया और वो भी ये समझती - जानती थी कि कोई भी विधि का विधान नहीं बदल सकता है जो जिसे मिला है वो सबसे अच्छा ही मिला है। 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई

मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई है। मैंने जब उनको पहली बार देखा तो उनसे मुहब्बत हो गयी। .एक सीधा सादा सा चेहरा मोहरा पर असाधारण व्यक्तित्व ...!
      मैंने उनको पहली बार मेरी शादी के बाद देखा था जब माँ उनका आशीर्वाद दिलवाने पास के घर  ले कर गयी थी। उनका प्यार से मेरे सर पर हाथ रखना मुझे अंतर्मन तक महसूस हुआ और मुझे लगा जैसे मेरे मन के तार उनसे जुड़ गए हो हालांकि मैंने उनको १० साल बाद गुरु धारण किया था पर उनसे प्यार उसी दिन हो गया था.
 महाराज जी का जीवन भी मुझे बहुत कारुणिक और मार्मिक लगता है। एक संपन्न परिवार में जन्मी और विवाहित मथुरा ,एक हादसे का शिकार हो कर एक टांग गवां बैठी तो पति ने त्याग दिया और मायके में रहने लगी। जहाँ उनके पति ने दूसरा विवाह कर के नई दुनिया बसा ली वहीँ मथुरा ने भी अपने ही गाँव में अपनी गुरु के माध्यम से ईश्वर से प्रीत जोड़ कर एक नई दुनिया में खो गयी। 
       कुछ साल बाद उनके पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ तो किसी ने उसको याद करवाया कि  हो सकता है ये मथुरा का श्राप हो और मैं भी  मानती हूँ कि  होता भी क्यूँ नहीं जिस के साथ सुख -दुःख निभाने का वादा किया था। उसको मुश्किल में अकेला  छोड़ दिया। 
 तब उनके पति को भी लगा और सपत्नीक माफ़ी मांगने आया।  तब तक मथुरा हर मोह माया से मुक्त थी और उनको ना केवल माफ़ी दी और आशीर्वाद भी दिया। 
  बाद में जब बेटा हुआ तो  वह ,बेटे को  भी आशीर्वाद दिलवाने लाया और कहा कि  वह उनके गाँव में आ कर रहे और वह उनके लिए एक आश्रम का  निर्माण भी  करवा देगा पर उन्होंने मन कर दिया के जो गलियां छोड़ दी वहां पर अब बसेरा नहीं होगा। लेकिन उनके  पति एक पत्नी के तो गुनहगार तो थे ही। उन्होंने एक मासूम ह्रदय को तो दुखाया ही था। अपने अंतिम समय में बहुत ही नारकीय यातना झेल कर गए है वे ...!

 जब मैं उसने पहली बार मिली तो उन्होंने मुझे औरतो की तीन श्रेणी समझाई कि "औरते तीन तरह की  होती है  "  शंखिनी , हंसिनी और डंकिनी "
'हंसिनी '.. वह  होती है जो कि  हंसमुख तो होती ही  है और हंस की  तरह होती है जो मोती चुनती ही है। 
'शंखिनी'... वह जो दिखावे में कुछ और होती है अंदर से कुछ और होती है  और 
'डंकिनी '.....वह  जो हर बात में डंक सा मारती रहती है सामने वाले के गले पड़ कर बोलती है। 
 वो बोली कि  ये तुम्हें देखना है कि कैसे औरत बनना है ,तो मैंने तो हमेशा हंसिनी बनने का प्रयास ही किया है अब मुझे नहीं पता कि मैं इसमें कामयाब हुई या नहीं .............:)
एक और बात जो मुझे उनकी पसंद आयी, वो कहते है नारी को अपने शरीर की सुरक्षा करनी ही चाहिए हमेशा सावधान रहना चाहिए। 
     मैं एक बार उनके आश्रम गयी तो उन्होंने स्वयं चाय बना कर पिलाई और साथ में बिस्किट्स भी खिलाये ,अपना काम वे खुद ही करती थी।  एक पैर होने के बावजूद किसी की भी  सहायता नहीं लेती थी। दिन में आश्रम में रहती थी पर शाम होते ही अपने मायके के परिवार में चली जाती है। उनका मानना था  कि आखिर उनका शरीर नारी का ही है तो उसकी रक्षा करनी ही होगी तभी वह  घर चली जाती थी।  आत्मा शुद्ध होती है उसे कोई रोग नहीं छू सकता लेकिन यह जो हमारा शरीर है इसे कर्मो के अनुसार व्याधियां झेलनी ही होती है। महाराज जी भी मधुमेह और उच्च रक्तचाप से ग्रसित थे। यही बीमारियां उनके शरीर के अंत का कारण बनी। शरीर का अंत ही होता है आत्मा का नहीं। वो आज भी हमारे आस -पास ही मौजूद है। आज-कल जहाँ ढोंगी साधू वेशधारी चहुँ ओर  मिल जायेंगे वहीँ मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई जैसे पवित्र आत्माएं भी मिलेगी जिनको अपने प्रचार कि कोई जरूरत ही नहीं हुई। ईश्वर करे हमें उनका आशीर्वाद सदैव मिलता रहे।