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Tuesday, December 3, 2013

जीवन के रंग

       यह हमारा जीवन चलते -चलते ना जाने  कब क्या मोड़ ले लेता है कोई नहीं जानता।  मैं एक सामान्य गृहिणी , जो कि बेलन -कलछी चलाने तक ही सिमित थी। जिसे रचना 'र ' और कलम का ' क ' भी नहीं लिखना आता था , उसकी रचना भी छपेगी सोच नहीं था कभी। विज्ञान की छात्रा का कलम से क्या वास्ता। कलम उठाई भी तो बच्चों को पढ़ाने या राशन के सामान की  लिस्ट बनाने के लिए या घर में काम करने वालों , दूध -अखबार या सब्जी का हिसाब करने के लिए ही।  हां ! कभी कभार बच्चों को स्कूल के लिए कुछ लिख कर दिया वह बात अलग है। एक दिन एकाकीपन से तंग हो कर फेसबुक पर प्रोफाइल बनाया वह भी देर रात को ,बच्चों को फोन पर पूछ कर।
   8 जून 2011 को पहली कविता लिखी। वह भी तब , जब  मुझे कॉपी-पेस्ट करना भी नहीं आता था। कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना भी नहीं आता था। मोबाइल से लिखी थी। फिर धीरे -धीरे कदम बढ़ाना सीखा। चुनौतियों को स्वीकार कर उनको पार करना मुझे बहुत भाता है।
  मुझे प्रेरित करने वाले श्री रविन्द्र शुक्ला जी अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने मुझ सहित कई प्रतिभाओं को प्रेरित किया है।उनको निजी तौर पर नहीं जानती। एक अनजान व्यक्ति आपको प्रेरित करता है  तो  उसे


ईश्वर का भेजा हुआ दूत ही समझना चाहिए। मैं आस्तिक हूँ और ईश्वर कि सत्ता में पूर्ण विश्वास करती हूँ तो मुझे मेरे ईश्वर ने घुट -घुट कर मिटने से पहले ही उबार लिया।
  ऐसा नहीं है कि मुझे जिंदगी से कोई शिकायत रही है।  जो दिल से चाहा वह मिला मुझे। हाँ ! जो नहीं मिला वह   दिल से नहीं  माँगा मैंने शायद। जब इंसान कि बुनियादी जरूरतें हाथ बढ़ाने से पहले ही पूरी होने लगे तो इंसान एक अवसाद में आ जाता है। मेरे लेखन ने मुझे फिर से जीवन दान सा दिया है जैसे !
    सबसे पहले जब " स्त्री हो कर सवाल करती है " काव्य संग्रह के लिए रचनाएं भेजनी थी तो मुझे मेल भी नहीं करना आता था। तब मैंने शोभा मिश्रा जी का सहयोग माँगा। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया तो मैं मेल कर पाई। बाद में शोभा जी ने मुझे ब्लॉग बनाने में भी सहायता की।
  उसके बाद मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मेरी कुछ कहानियाँ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है। मेरे लेखन कि वजह से सबसे अधिक प्रसन्न मेरे पापा और मेरी माँ है। मेरे पापा ने बहुत प्यार से सर पर हाथ फिराया जैसे कह रहे हों बेटियां भी नाम रोशन कर सकती है। मेरे भाई नहीं है चार बहने ही हैं हम। पापा मेरी साडी कहानियां कवितायेँ पढ़तें है और समीक्षा भी करते हैं।

  आज जब गुलमोहर साँझा काव्य संग्रह मेरे हाथ में आया तो मैं बहुत अभिभूत हुई। इससे पहले मेरी कुछ कवितायेँ , " स्त्री हो कर सवाल करती है " और  " पगडंडियां "काव्य संग्रह में भी छपी है।
 आज मैं रविन्द्र शुक्ला जी , माया मृग जी , लक्ष्मी शर्मा जी ,अंजू चौधरी जी और मुकेश कुमार सिन्हा जी , शोभा मिश्रा जी और मेरी प्रिय सखी नीलिमा जी का भी (जिन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया , चैट बॉक्स में आ कर। नीलिमा जी हमेशा मुझे सही राय देती है )सभी को शुक्रिया करती हूँ जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित किया है। और आप सभी का भी जिन्होंने मेरी लिखी हुई रचनाये पढ़ी और  सराहना कर के हौसला दिया।

5 comments:

  1. बहुत ही सीधे और सच्चे शब्दो में भावनाए प्र्स्तुति करन हे ,एक ओरत चाहे तो क्या नही कर सकती घर बहार दोहरी जिमेदारी बखूबी निभाती हे ,अबला नही सबला हे वो फिर आपके कलम में सरस्व्ती विराजित हे जी

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  2. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आदरेया-

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (05-12-2013) को "जीवन के रंग" चर्चा -1452
    पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

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  5. बहुत-बहुत बधाई आपको..
    शुभकामनायें...
    :-)

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