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Saturday, July 12, 2014

देवव्रत

  देवव्रत

  इस बार गर्मी की छुट्टियों में गांव आया तो रामेसर बाबा के देहांत की खबर सुनी तो बहुत दुःख हुआ और विश्वास सा नहीं हुआ।
            मैं तो चौंक ही पड़ा था, जब दिनेश ने कहा ," अब के तो रामेसर बाबो चालतो रह्यो !!"
         " क्या !! रामेसर बाबा  ! चल बसे ! ऐसे कैसे इतनी जल्दी !!"
       " ले करले बात! तू भी  कैसी बात  कर रहा है  विवेक ! साठ साल के तो हम लोग होने को आए हैं। बाबा तो सौ के पार हो चले थे ! " दिनेश कहा तो मुझे ख्याल आया।
        "अरे हां ! सच में !"
     गर्मियों की छुट्टियों में मैं सपरिवार गाँव आता हूँ। बच्चे बड़े हो गए हैं तो उनको भी छुट्टियों के लिए अकेला छोड़ कर उनके बच्चों यानि मेरे पोते -पोतियों को लेकर पत्नी समेत गाँव आ जाता हूँ।
बचपन यहीं बीता है। अपनी  जड़ों से इंसान दूर कैसे रह सकता है। मैं भी यहाँ अपनी जड़ों को पोषण देने आ जाता हूँ।
पिता जी की सरकारी नौकरी थी इसलिए शहर में रहना पड़ा। यहाँ गर्मियों की छुट्टियों में ही आना होता था ।
     आज अपने संगी साथियों से मिलने पहुंचा तो दिनेश ने  रामेसर बाबा की खबर दी।मुझे सुन कर बहुत दुःख हुआ।
           क्या  वह सच में ही नहीं रहा.... ! जिस इंसान को बचपन से देखने की आदत थी।  जिसकी गोद में खेल कर , पीठ पर झूल कर बड़े हुए , उसका जाना असहनीय सा लग रहा  था।
     रामेसर बाबा हमारे खेत में काम करते थे और बागों की रखवाली भी किया करते थे। मध्यम कद और दरमियाना सा बदन। मटमैले से कमीज - पायजामा पहने रहते थे और कंधे पर एक अंगोछा रहता था। बहुत अच्छे और रौनक लगा देने वाले इंसान थे। बात से बात निकालना ,झूठी कहानियां घड़ना बाबा का काम था।
     " अरे यार , मुझे तो बहुत अफ़सोस , दुःख हो रहा है , बाबा के बारे में सुन कर ! " मैंने अफ़सोस जताते हुए कहा।
       " कितना जिन्दादिल इंसान था और मज़ाकिया भी कितना !! " अशोक बोला।
       " तुम सबको याद है वो नेहरू जी वाली घटना !" मैंने कहा।
       " अरे वो बात !! हा हा !!! यार वो तो अब भी हंसा देती है। कितना बढ़िया मज़ाक किया था उन्होंने !!" रामकुमार भी जोर से हंस कर बोला।
   हम चार भाई या साथी ( दिनेश , रामकुमार , अशोक और मैं ) हमेशा साथ होते थे। मैं छुट्टियों के बाद शहर लौट जाता था ; नहीं तो पूरे  डेढ़ महीने का साथ तो पक्का था हमारा। दिनेश सगे चाचा जी का बेटा है ,अशोक और राम मेरे चचेरे भाई ही हैं पर थोड़ी सी दूर का रिश्ता पड़  जाता है। रिश्ते मनों के होते हैं जो मन से ही निभाए जाते हैं। दूर -पास क्या मायने रखते हैं। अब तो हम चारों ही दादा-नाना बन चुके हैं लेकिन साथ नहीं छूटा।
   बैलगाड़ी पर खेत जाना और वहां सारा दिन खेल कर शाम को घर आना हमेशा याद आते हैं। बचपन में बैलगाड़ी की सवारी जो आनंद देती थी वह आनंद अब  ठंडी वातानुकूलित कारों में नहीं  मिलता है।
       रामेसर बाबा तब हमारे खेत में ही रहते थे। एक दिन हम जब खेत गए तो बाबा अपने लिए खाना बना रहे थे या शायद बना चुके थे , खाने की तैयारी कर रहे थे। काम करते हुए उनकी नज़र पास ही जाती हुई ,धूल उड़ाती हुई जीप पर थी।
            हम लोग पास पहुंचे तो वो झट से बोले ," जानते हो बच्चों उस जीप में हमारे प्रधानमंत्री नेहरू जी थे !"
    " हैं !! पंडित जवाहर लाल नेहरू जी !!!" हम चारों एक साथ चौंक  कर बोले।
      " हाँ भई ! वो नेहरू जी ही थे। उनको मेरे हाथ का बना खाना बहुत पसंद है। जब भी इस तरफ आते हैं तो मेरे पास जरूर आते हैं। " बाबा बहुत गंभीर बने बोल रहे थे।
 हमें ऐसे लगा ही नहीं कि वे झूठ बोल रहे हैं। और हम सब तो दस-बारह साल के ही तो थे। बहुत भोले थे। आज की पीढ़ी जैसे बच्चे नहीं थे।
   " तो बाबा आपने हमें क्यों नहीं बताया हम भी तो मिल लेते !!" मैंने थोड़ा सा मचलते और निराशा से कहा।
" वो कल भी आएंगे ! कल मिल लेना। लेकिन किसी को बताना मत। उनको भीड़ नहीं चाहिए यहाँ। " बाबा ने बहलाते हुए कहा तो हम सब बहुत खुश हुए।
    फिर खेत में खेलने लगे। बहुत सारे पेड़ थे। उन पर बंदरों की तरह चढ़ जाना कितना आसान था। शहतूत के पेड़ों से शहतूत तोड़ कर खाना। खट्टे  शहतूत खाने की प्रतियोगिता भी करते थे कि दोनों आँखे खोल कर जो खायेगा वही जीतेगा। लेकिन कोई नहीं जीत पाता था क्यूंकि एक आँख तो बंद हो ही जाती थी। फिर एक निश्छल हंसी गूंज जाती थी।
   और डिग्गी में बड़े -बड़े मेंढक थे। जिनके नाम रखे जाते थे। खेलते -कूदते शाम हो जाती और बैलगाड़ी घर जाने को तैयार हो जाती। बैल गाड़ी में मक्की के पौधे रखे जाते जो कि  घर के पशुओं के चारे के लिए होते थे। हम उन पर ही बैठ कर जाते और उन पौधों पर लगी छोटी कच्ची मक्की तोड़ कर खाते  रहते। रास्ते में कई बार बैल गाड़ी की दौड़ भी हो जाती। हमको लगता कि  हमारी गाड़ी पीछे है तो हम गाड़ी चलाने वाले को कहते कि वह गाड़ी तेज़ भगाए।
     लेकिन !!
       उस दिन तो मन में और कोई ही हलचल थी। बाबा ने कहा था कि कल नेहरू जी आने वाले हैं। तो वक्त जैसे कट ही नहीं रहा था। बैलगाड़ी में भी चुप बैठे -कुछ सोचते हुए ही कब घर आ गया। रात को भी ढंग से नींद नहीं आई।
     अगले दिन आँख भी जल्दी ही खुल गई थी। मन में एक हलचल सी , एक गुड़गुड़ सी थी कि  बात बतानी भी नहीं थी और हज़म  भी नहीं हो रही थी।
   खैर ! हम खेत पहुंचे तो बाबा अपने काम में व्यस्त थे। हम सब भाग कर उनके पास गए और नेहरू जी का पूछा तो बाबा ने बताया कि  वो आज नाश्ता कर के ही चले गए। वे प्रधानमंत्री हैं , उनके बहुत काम होते हैं। इसलिए उन्होंने , उनको रोका  नहीं।
    हम चारों मित्र निराश हो गए। सारा दिन मन ही नहीं लगा। शाम को घर आये तब दादा जी को बताया कि  पिछले दो दिनों से हमारे खेत में नेहरू जी आ रहे हैं ,रामेसर बाबा से मिलने। दादा जी बहुत हँसे थे। अगले दिन बाबा को बुला कर डांट भी लगाई थी कि वह इस तरह बच्चों से झूठ ना  बोला करे।
     " डाँट का बाबा को कोई असर नहीं था। वह तो कई बार पिट भी चुके थे अपनी इस झूठ बोलने की आदत से। "दिनेश ने मेरी तन्द्रा भंग करते हुए कहा।
     एक बार तो मुझे भी याद है उनका पिटना ! जब उन्होंने मनोहर लाल के मरने की खबर का मज़ाक बनाया  था। तब मनोहर लाल के बेटों ने इतना मारा था कि वह कई दिन चारपाई से भी उठ नहीं सके थे।
   ' हुआ यूँ था कि एक बार बाबा शहर गए तो उनको वहां हमारे गाँव के दामाद मिल गए। उन्होंने अपने ससुराल की खैर -खबर पूछी। बाबा आदतन मज़ाक कर बैठे कि मनोहर लाल जी यानि उनके ससुर जी तो स्वर्ग सिधार गए हैं। दामाद जी का चौंकना तो स्वाभाविक ही था । अब उस भले आदमी ने यह सोचना भी गवारा नहीं किया कि अगर उनके ससुर जी गुजर जाते तो सबसे पहले उनको ही तो सूचना दी जाती !वो उल्टे पाँव अपने गाँव पहुंचे और दुःखद खबर दी।
      मनोहर लाल जी की बेटी के दुःख का तो  पारावार ही नहीं था। वह अपने ससुराल-जन के साथ हमारे गाँव पहुँच गई। बेचारी का कलेज़ा दुःख से फटा जा रहा था। बस -स्टैंड से उतरते ही विलाप करना शुरू कर दिया और घर तक जोर से विलाप  करती हुई चल पड़ी। जिसने भी सुना हैरान रह गया कि अरे मनोहर लाल को क्या हुआ !! कई लोग साथ हो लिए उसके। घर के पास पहुँच कर देखा तो मनोहर लाल तो बाहर चौकी पर हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। बाप-बेटी दोनों ही हैरान थे अब। पूछने पर पता चला कि ये कारस्तानी तो रामेसर की है तो बेचारे की बहुत पिटाई हुई।'
   दादा जी उनको बहुत समझाया करते थे । लेकिन शायद उनके मनोरंजन का साधन ही यही था !
 दादी कहा करती थी , " वह तो है ही मार खाने के भाग का  !!"
     जन्म हुआ तो माँ मर गई। दस साल तक दादी ने पाला। वो भी कितने साल बिखरी गृहस्थी संभालती। हार कर पिता को दूसरी शादी करनी पड़ी। सौतेली माँ ना अच्छी थी , ना बुरी थी।  नन्हा रामेसर तब तक दिहाड़ी-मज़दूरी करने वाला हो गया था। हमारे घर में छोटे मोटे काम करने के लिए रख लिया गया। दादी को रसोई में मदद हो या मेहमानों को चाय-पानी देना हो , वह हमेशा तत्पर रहते थे।
     दोपहर में बाहर बैठक में कमरे की छत के बीच  एक लम्बा बांस  होता था ,जिस पर  झालरदार ,लगभग एक मीटर चौड़ा और  बाले की लम्बाई के अनुरूप ही लम्बा कपड़ा लगा होता था। बाले साथ ही एक लम्बी धरती को छूती हुई रस्सी बंधी होती थी , जिसे पकड़ कर हिलाने पर कमरे में हवा होती थी। तब बिजली नहीं होती थी तो पंखे भी नहीं होते थे। तब यही इलाज़ था गर्मी भगाने का। नन्हा रामेसर वो पंखा खींचता तो कभी वहीँ उंघने भी लग जाता बैठे -बैठे।  तब दादा जी उसे सो जाने को कह देते।
      दादा जी , दादी को भी रामेसर का विशेष ख्याल रखने को कहते कि  बेचारा बिन माँ का बच्चा है। जैसे अपने दो बेटे हैं वैसे ही ये है।
       झूठ बोलने की या मज़ाक करने की आदत भी उनके साथ ही बड़ी होने लगी। कई बार लोग हंस लेते तो कई बार पीट भी देते तंग आ कर। दादा जी बहुत समझाते लेकिन कुछ आदतें बदन में लहू बन ही दौड़ती है। नहीं छूटनी थी तो नहीं छूटी।
      कहते हैं की जिसकी जन्म होते ही माँ मर जाती है वह आधा भाग्य तो गवाँ ही देता है। माँ के बिन कौन मन की सुने किसके आगे मचले कौन उसकी ढ़ाल बन कर खड़ा हो। सौतेली माँ थी उसके तो। कभी दुत्कारा नहीं तो कभी प्यार से सर पर हाथ भी नहीं रखा।
     कुछ बरसों में ही तीन बच्चों की माँ बन गई। तीसरे बच्चे के जन्म होते ही वह भी चल बसी। बापू वैसे भी कमज़ोर था। दादी भी चारपाई में। सोलह बरस के रामेसर पर पांच लोगों को सँभालने की ज़िम्मेदारी आन पड़ी।       खाने -पीने की कमी नहीं थी। उस ज़माने में लोग एक - दूसरे की जिम्मेदारी संभाल लेते थे। तब इंसान की कीमत थी , रुपयों की नहीं। लेकिन बीमार दादी , बूढ़ाता बाप और छोटे तीन भाई इनकी देखभाल तो किसी -न -किसी ने तो करनी ही थी। तय हुआ की रामेसर की शादी कर दी जाय।बहू आएगी तो घर संभल जायेगा।
    रामेसर ने विवाह करने से  मना  कर दिया। कारण क्या था मना करने का ! पूछने पर बताया कि जो भी इस घर में आएगी वह क्या मालूम उसके छोटे भाइयों की देखभाल करेगी भी या नहीं। बहुत समझाने पर उसने हाँ कर दी लेकिन एक शर्त भी रख  दी कि वह अपनी संतान को जन्म नहीं लेने  देगा या जब तक मेरे छोटे भाई अपनी -अपनी जिम्मेदारी संभाल नहीं लेंगे वह पिता नहीं बनेगा। अब इस शर्त को किसी  भी लड़की का पिता क्यों मानता भला !
    फिर ! फिरकभी भी  विवाह नहीं हुआ रामेसर का।
      बूढ़ी दादी भी कब तक ज़िंदा रहती। कुछ बरस बाद बापू भी चल बसा। मेरे दादा -दादी ने फिर से समझाया रामेसर को कि ज़िद छोड़ दे और शादी कर ले। पर नहीं माना। दादी का हृदय पसीज़ उठा , " पता नहीं कैसी किस्मत लाया है ! बेचारा बिन माँ का बच्चा। " ओढ़नी के कोने से आंसू पौंछ लिए। ईश्वर से दुआ ही मांग सकती थी वह , और चारा भी क्या था।
       जीवन संग्राम में अब रामेसर अकेला ही था। सहारा था तो बस उसके मज़ाक करने की आदत ही थी जो कि उसका मन -बहलाव थी।  कभी पिट जाता तो कभी कोई हंस कर टाल  देता।
     तीनों भाइयों को खेत में ही ले गया। पढाई -लिखाई का कोई महत्व नहीं था तब। मज़दूर का बेटा मज़दूर ही बनेगा। यही रीत थी। भाई भी बड़े हो गए , मेहनत मज़दूरी करने लगे। एक -एक कर के सब का ब्याह कर दिया। अब अभी खेत से घर में रहने लगे। लेकिन रामेसर को शायद घर और घर का सुख था ही नहीं। उसके लिए अब घर में जगह थी भी कहाँ। छोटे से दो कमरों के घर में छत पर एक कमरा और बनाया गया। तभी उसके तीनों भाइयों की गृहस्थी जमाई गई।
     उसके पिता के पास यही एक मकान था और कोई जायदाद तो थी नहीं। मकान  के बंटवारे  पर तीनों भाई में खटपट रहने लगी। साथ रहने को कोई  तैयार ही नहीं था। मेरे दादा जी ने कहा कि  मकान बेच कर अपने हिस्से कर लो और अपना - अपना ठौर  ठिकाना बना लो। हिस्से चार की बजाय तीन किये गए। रामेसर को क्या करना था हिस्से का ! उसके कौनसी घर-गृहस्थी है। वह बोला तो कुछ नहीं पर मन में पहली बार कुछ टूट गया था उसके। उदास मुख लिए रहा कई दिन तक , फिर हालत से समझोता कर लिया।
    फिर "वही घोड़े और वही मैदान  " , वाली कहावत जैसी ही जिंदगी चल पड़ी।
रामेसर तीनों भाइयों के घर जाता। उनकी हंसती , फलती -फूलती जिंदगी देख वह भी प्रसन्न ही होता। सबसे बड़े  भाई( रामेसर से छोटे ) के संतान नहीं हुई। उसके विवाह को पंद्रह बरस होने को थे। अपनी समझ में डॉक्टर का इलाज़ भी करवाया लेकिन उस ज़माने में डॉक्टर से अधिक झाड़  फूंक और मन्नत पर अधिक विश्वास होता है। तब  इलाज़ था भी क्या ?और एक गरीब मज़दूर की पहुँच भी कितनी थी। सब कुछ राम भरोसे था। जिस ने भी बता दिया वहीँ चल पड़े दवा या दुआ करने।
  " जहाँ काम ना करे लाख ( रूपये ) , वहां काम करे एक चुटकी राख " ,  वे सभी इस कहावत को चरितार्थ करने को आमदा थे।
      किसी ने बता दिया कि देवी माँ के मंदिर जो पुजारी है वह बहुत पहुंचा हुआ है। माता के हवन की राख को मन्त्र पढ़ कर देगा तो संतान हो जाएगी। संयोग वश नवरात्रि  भी पास ही थी। तीनो भाई मय पत्नी  चल पड़े माता के दरबार, तीनों  बच्चों ( मंझले भाई के एक बेटा -एक बेटी और सबसे छोटे भाई  के एक बेटा ) को रामेसर बाबा के पास छोड़ कर।
     ईश्वर जब परीक्षा लेने पर आता है या पिछले जन्म का कोई लेन -देन चुकता करने पर आ जाता है तो वह किसी की नहीं सुनता। बाबा के साथ भी यही हुआ। तीनों भाई सपत्नीक गए तो थे, एक नव जीवन की आशा ले कर और लौटे खुद ही निर्जीव बन कर। मालूम हुआ था कि मंदिर में भगदड़ मच जाने से उन सब की मौत हुई।
       बाबा का विलाप देख नहीं जा रहा था। एक हंसोड़ व्यक्ति , जिसे हँसते -हँसाते ही देखा था। वह आज कितना मज़बूर था। उसे क्या कह कर समझाते। तीनों बच्चों को सीने से लगाये बिलखते रहे। कई दिन जैसे बेसुध से पड़े रहे बाबा। फिर खुद ही संभाला खुद को।
    मैं तो  जब छुट्टियों में घर आया तो मुझे सारे वाकये के बारे में पता चला।
    बाबा अब हमारे घर के पिछवाड़े में बने कमरे में रहने लगे थे। मेरी चाची ने बुजुर्ग देखते हुए और सारी  उम्र की सेवाएं देखते हुए उनका और बच्चों का प्रबंध वहीँ कर दिया था। बाबा एक तरह से बच्चों के पालक बन गए थे। एक अस्सी वर्षीय वृद्ध में कितनी ताकत हो सकती थी भला ! लेकिन उनको  बच्चों के लिए ताकत जुटानी पड़ी। आठ से दस बरस के तीन मासूम बच्चे और एक कमज़ोर कंधो लेकिन मज़बूत इरादों का बूढ़ा ,जवान व्यक्ति चल पड़े थे  जिंदगी की जंग लड़ने।
     मिलने की रस्म ही अदा कर सका मैं ! जो चले गए उनको तो नहीं ला सकता था, ना ही उनका दुःख कम कर सकता  था।वह मेरा हाथ पकड़ कर बिलख पड़े। कई देर तक रोते और मैं उनका हाथ सहलाता और थपथपाता रहा। वो रोते हुए कहे जा रहे थे कि अब तो वह भगवान से मौत भी नहीं मांग सकते इन बच्चों को कौन देखेगा।
     समय एक बार फिर चल पड़ा। बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया। हम सब व्यस्त हो गए अपनी जिंदगी में। बाबा अब भी हंसी मज़ाक कर लिया करते थे। आदत जो थी !! बेटी का ब्याह कर दिया। बेटे भी गांव में काम धंधा करने लगे थे। सात -आठ जमातें पास कर ली थी उन्होंने भी।
   पिछली बार जब छुट्टियों में आया तो बाबा खुश थे कि  आखा तीज बेटी पर ब्याह दी और अगली आखा - तीज तक बेटों को ब्याह दें तो  वह  भी राम जी के घर की राह पकड़ लेंगे। उनकी आँखों में दुःख का सागर था लेकिन होठों पर मुस्कान थी।
     बाबा के बारे में सोचते हुए मैं कहीं दूर निकल गया था जैसे। एक जन्म दुबारा जी लिया हो। मेरे साथी नींद में मगन थे। गर्मियों की दोपहर का सन्नाटा पसरा हुआ था। कूलर की आवाज़ से कुछ नीरवता भंग हो रही थी।
       मैं अब भी बाबा के बारे में सोच रहा था। बाबा का जीवन भी महाभारत के संग्राम की तरह ही था। जैसे वे देवव्रत की तरह इच्छा मृत्यु का वरदान ले कर आये हों। मैं तो बाबा की आत्मा की शांति की प्रार्थना ही कर सकता हूँ जिसे जीते जी तो कभी शांति मिली नहीं।
     
 उपासना सियाग

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, थम गया हुल्लड़ का हुल्लड़ - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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