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Wednesday, September 11, 2013

एक लेखिका की मौत

        एक लेखिका की  मौत ....

 ' हाँ , रखूंगी  अपना ख्याल ! अच्छा दीदी  …. ! बाय। " कहते हुए वसुधा ने फोन बंद  किया। फोन हाथ में लिए बहुत गौर से उसे  देख रही थी , मानो जो  खुशखबर उसकी दीदी ने उसे दी है वह अभी भी फोन से महक रही है। सोचने लगी कि उसने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं कि वह कुछ लिखेगी और लोग उसे पढेंगे। आज दीदी ने बताया की उसकी लिखी कहानी एक पत्रिका में छप गयी है।
        घर -गृहस्थी में व्यस्त , सबका ख्याल रखती और सदा अपने में ही मगन रहने वाली वसुधा कब लिखने लगी। पता ही ना चला उसे। एक डायरी में अपने ख्याल -विचार लिखती रहती थी। वह डायरी उसकी दीदी के हाथ लग गई। जब वह पिछली गर्मियों की छुट्टी में आई थी।  उनके प्रोत्साहन से ही उसने लिखना भी शुरू किया। 
      पहले -पहल जब उसने डायरी में लिखना शुरू किया तो अपने परिवार की अन्य महिलाओं को भी दिखाती थी और राय  मांगती थी। मगर वह मन ही मन कट कर रह जाती कि वो महिलाएं जोकि उसको जानती है फिर भी उसकी लिखी हुई रचनाओं में ना जाने क्या राज़ तलाशती है।  उनके व्यंग्यात्मक भाव वाले चेहरे और शक भरी निगाहों ने उसके उत्साह को तोड़ ही दिया। वह सोचती कि ऐसा क्यूँ सोचती है वे  सभी।  कोई भी अपने बारे में क्यूँ लिखेगा भला ! कोई भी इन्सान जो भावुक और संवेदनशील है वह कोई भी घटना को अपनी कलम के द्वारा उभार सकता है।  हर बार उसके लेखन में उसके व्यक्तिगत जीवन को क्यूँ घसीटा जाता है।  उसके बाद जब भी उसे फुर्सत मिलती लिख डालती लेकिन खुद तक ही सिमित रखती। 
     और आज तो जैसे उसके पंख ही लग गए हों। पैरों में जैसे घुंघरू ही बांध गए हो। उसकी अभिव्यक्ति को नया आसमान मिल गया था । वह खुश थी कि अब उसके शब्द अब डायरी के पन्नो में कैद नहीं रहेंगे। उसके शब्दों को नया आसमान मिल गया है।  उसके गालों पर खुशियों के इंद्र -धनुष खिल गए जैसे।  भाव विभोर हो कर उसने आँखें बंद कर ली। 
       " ये रोहन , अमित , राघव आदि -आदि कौन है ? " एक जोरदार कड़क आवाज़ से उसकी आँखे खुल गई। सामने संजीव खड़ा था हाथ में उसकी डायरी ,आँखों में शक और बहुत सारे  संदेह के साथ सवाल लिए। वसुधा अपने पति का ऐसा रूप देख सहम सी गयी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले।  
कुछ बोलने को हुई कि संजीव बोल पड़ा , " ये तुम्हारे विवाह से पहले के दोस्त हैं या बाद के , या दोस्ती से कुछ ज्यादा रहा है उनसे। " 
       वसुधा सन्न रह गई कि उसे एक दिन यह भी सुनना पड़ेगा।उसका लेखन उसके लिए  कलंक का कारण  जायेगा , यह तो उसने नहीं सोचा था ! उसने संजीव  समझाने की कोशिश भी की। लेकिन वह नहीं समझा। बहुत कुछ कह गया उसे , डायरी को जोर से उसके सामने पटक कर  गया।
      वसुधा की ख़ुशी तो पल भर की ही साबित हुई।  उसे बहुत जोर से रुलाई फूट पड़ी।  इतने बरसों के  साथ में यह इन्सान मुझे जरा भी समझ नहीं पाया।


" किसी की व्यथा को अगर वह अपनी लेखनी में ढाल लेती है तो क्या बुरा है ! " सोचती रही और रोती  रही।
रोती रही तो रोती रही ! चुप कौन करवाता ?
       कुछ देर बाद वह कुछ सोच कर उठी और छत पर गयी। हाथ में उसके डायरी थी उसकी।  वह डायरी ही नहीं थी उसकी बल्कि वह तो उसकी आत्मा थी। जोकि उसे , उसके होने का  पता देती थी। आज उसे वह अपने से दूर करने जा रही थी। थोड़ी ही देर में उसके हाथो में उसकी कराहती आत्मा थी ,चिंदी-चिंदी टुकड़ों में ! जाने डायरी चिंदी -चिंदी थी या वह और उसकी लहुलुहान आत्मा।
      आग में जलती डायरी में वसुधा ने जैसे खुद को ही जलते देखा।  वह रो पड़ी अपनी ही मौत पर।

----उपासना सियाग