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Saturday, June 15, 2013

पालन का भाव पिता ही में आता है .........

हम सभी हमेशा माँ का ही गुणगान करते है। कविताओं में भी अक्सर माँ की महिमा का गुणगान ही होता है ,और होना ही चाहिए। हम सभी जानते है कि माँ के क़दमों में स्वर्ग है लेकिन यह भी सच है कि पालन का भाव पिता ही में आता है ,माँ अगर प्यार करती है तो पिता पालन करता है।पिता का साथ ही अपने आप में सुरक्षा का भाव आ जाता है।
      मेरे जीवन कि ऐसे कुछ घटनाएँ है जो मुझे याद रही है। एक तो कुछ वर्ष पहले जब हम छोटे बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आने के कुछ दिन बाद जब उसे फोन किया तो मैं तो कई देर तक उसे लाड मैं ही बात करती रही ,पर जब उसके पापा ने बात की तो सबसे पहले पूछा कि" बेटे तुम्हारे कमरे का ए सी ठीक हो गया क्या ?".....(जिस दिन छोड़ने गए थे उस दिन ए सी ठीक हो रहा था उसके कमरे का ),तो यह भाव है पालन का ....! जहाँ माँ  सिर्फ लाड़ -प्यार में ही व्यस्त थी तो पिता उसकी बुनियादी जरूरतों को अधिक महत्व दे रहा था।

 
    अब दूसरी घटना मेरे बचपन की ,हमारे स्कूल के आगे एक नदी थी जो बरसात में भर जाती थी तो स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन बहुत बरसात हुई  और नदी में पानी आ गया। स्कूल में छुट्टी की घोषणा के साथ कहा गया की बस्ते यहीं छोड़ दो और घर चले जाओ।सारे बच्चे बहुत खुश थे कि एक तो छुट्टी उपर से बस्ते भी नहीं ले कर जाने।लेकिन मुझे तो पानी से डर बहुत ही लगता था , अभी भी लगता है ...!
   नदी में ज्यादा पानी नहीं था पर मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कदम बढाने की। साथ वाली सखियों ने कहा भी कि आओ हम है न हाथ पकड़ो और चलो। मगर  मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी ,जोर से आँखे बंद कर ली। सोच रही थी कि क्या करूँ। तभी मुझे दूर से मेरे पापा आते दिखे। उनको मेरे डर के बारे में पता था। वो लगभग भागते हुए से आ रहे थे। पास आने पर में उनकी टांगों से लिपट कर जोर से रो पड़ी ,पर जो सुरक्षा का अहसास मुझे महसूस हुआ .उसका में वर्णन नहीं कर सकती।
पिता के  पालन की भावना माँ की ममता से भी बड़ी लगती है मुझे।

  और तीसरी घटना कुछ समय पूर्व की है। जब माँ ( सासू माँ ) अपने मायके गयी। अब पिता जी का सारा काम वह स्वयंम ही देखती है तो मुझे उनका काम करने की आदत भी नहीं है। वैसे भी पिता जी को बहू से बात करना पसंद नहीं है।हालाँकि  कोई काम हो तो कह भी देते हैं .नहीं तो बात नहीं करते।
   हाँ तो माँ के जाने बाद  , मैं उनको नाश्ता ,दिन का और रात का खाना तो समय पर दे देती पर रात को दूध देना भूल जाती क्यूंकि टीवी  में मग्न जो हो जाती थी। फिर पौने ग्यारह बजे याद आता ," अरे पिताजी का दूध तो रह ही गया ...!" फिर संजय जी को  ढूध का गिलास  दे कर आना पड़ता .. दो दिन तो ऐसा ही रहा।
तीसरे दिन पिताजी रात का खाना खा कर जाने लगे तो मुझे बोले के रात को 10  बजे मैं खुद ही आ जाऊंगा। संजय को ऐसे ही तकलीफ होगी।
मुझे  बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और बड़ी मुश्किल से बोली नहीं पिताजी आज मैं समय से ही दूध दे जाउंगी और उस दिन मैंने सबसे पहले यही काम किया।
    मन ही मन बहुत अभिभूत हुई एक पिता का अपने पुत्र के प्रति प्यार को देख कर जो 75  वर्ष की उम्र में भी अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ नहीं दे सकता है।जबकि यह कोई मुश्किल काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ भी बनता है एक पुत्र का ...
 पिता ऐसे ही होते हैं जो माँ की तरह अपना प्यार दिखा नहीं सकते पर महसूस तो करवा सकते है।