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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

खुशी की ओर पहला कदम ...

 "दर्द ! कैसा दर्द !! "
   " अब दर्द कहाँ होता है डॉक्टर  ?   कहीं भी हाथ रखो , दर्द नहीं होता मुझे !  यह तो मेरे बदन में लहू बन कर दौड़ रहा है ! मैंने सुना है कि प्रसव पीड़ा भी बहुत दर्द दायक होती है। अब मैं वही दर्द महसूस करना चाहती हूँ।  मेरा इलाज़ करो। अगर इस दौरान मैं मर भी जाती हूँ तो आपको कोई दोष नहीं लगाएगा। यह भी मैं लिखने को तैयार हूँ। "
       खुशी  मेरे सामने गिड़गिड़ा सी रही थी।
" लेकिन यह मैं अपनी जिम्मेदारी पर नहीं कर सकती  ख़ुशी , तुम साथ में अपने पति को लाओ या सास को ही ले आओ। "
       " ठीक है डॉक्टर , आज मेरा दिन है मेरे पति के साथ ! बात करती हूँ ! "
  खुशी नाम ना जाने क्या सोच कर रखा था माता -पिता ने ,जबकि ख़ुशी का कोई स्थान ही नहीं इसके जीवन में। कुछ महीनों से यह मेरे पास इलाज़ के लिए आ रही है। पहले मुझसे जूनियर डॉक्टर के पास इसका केस था।
    शादी के बाद माँ नहीं बनी। घर में किसी को इसके माँ बनने की कोई चिंता नहीं थी शायद इसलिए अकेली ही आती थी। मैंने कहा भी था कि उसका पति साथ क्यों नहीं आता। क्या उसे बच्चे की चाहत नहीं है ? वह बस काम का बहाना कर देती कि उसके पति को काम है। लेकिन अब , जब उसके सभी परीक्षण किये जा सकते थे कर लिए थे मैंने। यह आखिरी परीक्षण था जिसमें मैंने उसे पति  को साथ लाने  को कहा। एक तो उस प्रक्रिया में दर्द बहुत था और दूसरे कि अगर मुझे कुछ दोष नज़र आये तो मैं उसके पति को समझा सकूँ।
      वह बोल कर चली गई कि आज उसका ' दिन ' है पति के साथ। जब उसने पहली बार यह कहा तो मैं बहुत चौंकी थी कि वह ऐसा क्यों बोली। पूछा भी था। वह चुप सी चली गई।
     अगले दिन मेरे आग्रह से पूछने  पर बताया कि वह उसके पति की दूसरी पत्नी है।
" तो क्या पहली पत्नी जिन्दा नहीं है ? "
" ज़िंदा है !"
संक्षिप्त सा उत्तर दे कर चली गई।
      मुझे हैरानी और खीझ हो आई। कैसे पहेलियाँ सी बुझा कर चली जाती है यह औरत। फिर ख्याल भी आया कि मुझे क्या पड़ी है ? मैं क्यों इसकी निज़ी जिंदगी में झाँकने की कोशिश कर रही हूँ। कोई उसके साथ आये या ना आये मुझे इससे क्या ?
        अगले दिन वह अकेली ही आई। मेरे पूछने पर वह रोने लगी कि उसके साथ कोई नहीं है। घर में सबके होते हुए भी वह अकेली है। वह चाहती है कि  उसके एक बच्चा हो जाये। कोई तो हो जो उसे अपना कहे। जो उसने अपने बारे में बताया , उसे  सुन कर मुझे बहुत दुःख हुआ।
          खुशी के पिता की  मौत उसके बचपन में ही हो गई थी। माँ ने पिता की जगह नौकरी करते हुए जैसे -तैसे  उसे और बड़े भाई को पाला। अभी दसवीं में ही थी कि माँ भी चल बसी। तब तक भाई की नौकरी लग गयी थी। बचपन की चंचलता तो माँ को हाड़ तोड़ मेहनत करते हुए देख कर  ही खत्म हो गई थी और किशोरावस्था के सुहाने सपने माँ के चले जाने से टूट गए। बस  ख़ुशी थी वह , दिल से खुश कब हुई थी , नहीं याद उसको।
        रिश्तेदारों ने भाई की शादी करवा दी। घर भी सँभालने वाला चाहिए। भाभी को वह  मुफ्त की नौकरानी से कम नहीं लगी। स्कूल और घर का काम दोनों करती ख़ुशी का जीवन मशीन की तरह बन गया था। मन में कोई चाह नहीं थी। जैसे -तैसे बारहवीं पास की। दूर के रिश्ते की मामी ने रिश्ता करवा दिया। ख़ुशी ने विरोध भी किया लेकिन पढ़ कर कौनसा कलक्टर बनना है उसे , कह कर चुप करवा दिया।
           कपिल से विवाह हो गया। दुल्हन बन ससुराल आ गई। सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार था। ससुराल में इतना प्यार मिला कि वह मायके के सारे दुःख भूलने लगी।  सास-ससुर बहुत प्यार करने वाले। जेठ पिता समान तो जेठानी माता समान थी , उनके दो बच्चे भी बहुत प्यारे थे। कपिल भी बहुत प्यार और ख्याल करने वाला पति था। कभी -कभी उसे सपने जैसा लगता और सोचने लगती कि क्या जीवन में इतनी खुशियाँ भी हो सकती है।
      मगर नाम से खुशी होने से क्या होता है। वह तो किस्मत में भी तो होनी चाहिए ! नहीं थी उसकी किस्मत में कोई भी ख़ुशी।
         ईश्वर क्या सच में इतना बेरहम हो सकता है !
          शायद हाँ !
             पता नहीं !! तभी तो शादी के छह महीने बाद ही उसका सपना टूट गया। बिखर गई खुशियाँ एक बार फिर। कपिल का शव जब घर पहुंचा तो जैसे भूचाल सा आ गया हो। घर की दीवारें जैसे भरभरा कर टूट गई हो। बताया गया कि फैक्टरी में  मशीन से करन्ट आ गया था।
              छोटी सी उमर में ही कितने हादसे झेल  चुकी  खुशी अब टूट गयी थी। सदमा सा दिल में बैठ गया था। जीवन एक बार फिर यंत्रवत्त हो गया।
                           बेरंग सा !!
           बेचारा सा महसूस करवाने वाला।
  सास का रवैया बदलने लगा था। ससुर गुमसुम से हो गए थे। जेठ से पहले भी कोई सरोकार नहीं था अब भी  नहीं , पर्दा करती थी। जेठानी का बर्ताव जरूर हमदर्दी वाला था। बच्चों से बातें  कर कुछ दुःख भुला देती थी।
      एक दिन फैक्टरी से एक आदमी आया और कागज़ों पर दस्तखत करवा कर गया।  उसे समझ नहीं आया कि यह कैसे कागज़ थे और सास इतनी मीठी क्यों बनी हुई थी। उस रात देर तक सास -ससुर के कमरे में आवाज़ें आती रही थी। जेठ जी भी बोल रहे थे। क्या बात हो रही थी, उसे समझ नहीं आ रही थी।
     सुबह का आलम कुछ अजीब सा लगा उसे। अजीब सा सन्नाटा था घर में। रसोई में गई। जेठानी चाय बना रही थी। पैर छूने को हुई तो पीछे सरक गई। ख़ुशी अचरज से उसे ताकने लगी तो मुहं फेर लिया जेठानी ने। शायद आँखे भरी थी लेकिन चेहरे पर घृणा जैसे भाव थे।
      सारा दिन उस के साथ कोई नहीं बोला। ना ही बच्चों को पास आने दिया गया। वह हैरान थी। हिम्मत करके जेठानी से पूछा भी। " चल यहाँ से !दूर होजा मेरी नज़रों से मनहूस  !! " कह कर वह फूट -फूट कर रोने लगी।
वह  हैरान- परेशान सी थी। कोई बोलता नहीं।  कोई बताता भी नहीं। घर में फोन भी नहीं था कि मायके ही बात कर ले।ससुर और जेठ के पास अपने-अपने मोबाईल फोन थे। उसे कौन बात करवाता।
         मायका ! आह निकली उसके दिल से ! कौन था उसका अब वहां ? फिर भी एक आस रहती है कि कोई तो ठंडी हवा का झोंका आएगा जो उसके मन को शीतल कर जायेगा। भाई की बहुत याद आ रही थी उसे।
      दो दिन बाद वह आश्चर्य चकित रह गई जब सच में उसका भाई उसके सामने खड़ा था। वह दौड़ कर भाई के गले लग गई और बिलख पड़ी। भाई भी अपने आप पर काबू ना रख सका। वह भी रो पड़ा। क्यों कि  कहीं न कहीं एक अपराध बोध भाई के मन में भी था।कुछ देर बहन -भाई ने सुख दुःख किया। उसे  को पता चला कि भाई को बुलवाया गया था। किस वजह से बुलाया , यह नहीं पता था।
          वजह पता चली तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई जैसे। फिर जो हुआ वह सिर्फ गुनाह ही था।  खुशी को भाई की रजामंदी से जेठ की चादर ओढ़ा दी गई।
          पिता समान जेठ अब पति था और माता समान जेठानी अब उसकी सौत थी। उसे अब जेठानी की समझ आ गई थी।   स्वाभाविक भी था , कोई भी औरत अपने पति को बाँट नहीं सकती। खुशी की हालत तो और भी बदतर थी कि जिस इंसान से पर्दा करती थी , जो पिता तुल्य था , उसे पति रूप में कैसे स्वीकार करे। यह अनैतिक तो था ही  गैरकानूनी भी तो था। काश कि वह और उसकी  जेठानी पढ़ी लिखी होती , विरोध करती तो दोनों की ही जिंदगी इतनी बदतर नहीं होती।
       लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दोनों स्त्रियों ने ही गलत परम्परा के आगे घुटने टेक दिए। तय किया गया कि पति एक दिन बड़ी बहू के साथ तो दूसरे दिन छोटी बहू के साथ रात बिताएगा । बहुत अच्छा न्याय था दोनों पत्नियों के साथ !
               जिस रात पति ख़ुशी के साथ होता वह रात दोनों के लिए जैसे मौत की रात होती , बड़ी को यह सहन ही नहीं हो रहा होता  उसका पति अब बँट गया है। और खुशी ! वह यह स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी कि पिता समान जेठ  अब पति है।
         चाहने से क्या होता है। हालात थे  ! दोनों स्त्रियां झुकती ही चली गई। बच्चे भी बेरुख  गए थे। उसे  लगने लगा कि  कोई बच्चा आ जाये तो  कुछ सुकून  मिले।  दो साल तक माँ नहीं बनी तो  उसे चिंता होने लगी। सास को कहा तो बोली वह क्या करेगी बच्चों का , दो बच्चे तो हैं। यही जवाब पति की और  से भी मिला। वह रोई ,कुछ दिन मिन्नत भी की। तरस आ गया पति को , अस्पताल जाने की इज़ाज़त तो दे दी। लेकिन इस शर्त के साथ कि वह साथ नहीं जायेगा।
        अब वह मेरे सामने बैठी थी। अपनी कहानी सुनाती , आँसू पौंछती हुई। मैंने पानी  का गिलास थमाते हुए पूछा , " खुशी ! मुझे एक बात नहीं समझ आई कि तुम्हारी शादी तुम्हारे जेठ से ही क्यों करवाई गई ? जबकि तुम्हारा विवाह किसी और  के साथ भी तो  किया जा सकता था ! "
        " लालच था ! "
" पति की मृत्यु के बाद कम्पनी ने  बीमे और मुआवजे का रुपया मुझे ही देना था। घर का पैसा घर में ही रहे इसलिए मुझे जेठानी की सौत बना दिया गया। "
     ओह ! लालच की कैसी पराकाष्ठा थी !!
" तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ है खुशी। " मैंने बुरा शब्द पर जोर देते हुए कहा।
     " अब तुम क्या चाहती हो ? तुम्हारा पति तुम्हारे साथ नहीं है। बल्कि वह तो खुश ही हो रहा होगा कि बच्चे का झंझट भी नहीं है और बिस्तर गर्म करने का साधन भी सहज उपलब्ध है। तुम्हें पता भी है क्या  , तुम्हारी शादी गैरकानूनी है। अगर तुम शिकायत करती तो तुम्हारे पति पर दबाब पड़ता कि ऐसे  में उसकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है तो वह तुमसे यह शादी नहीं करता।  "
    " जी डॉक्टर ! मुझे मालूम है कि गैर क़ानूनी है। लेकिन मेरे साथ  नहीं था।  मैं क्या करती ?"
     " अगर मैं कहूँ तो हर इंसान अपनी हालत का खुद जिम्मेदार होता है। तुमने विरोध की  एक आवाज़ तो उठानी  थी। फिर देखती कितने हाथ आ  जाते तुम्हारे सहारे  के लिए। घर में कोई नहीं था तो बाहर किसी  राज़दार बनाती। अब तो कितनी ही सरकारी -गैर सरकारी संस्थाएं हैं जो बे -सहारा औरतों को स्वाबलंबी बनने  सहायता करती है। "
      " आपने सही कहा डॉक्टर। मैं कमजोर पड़ गई क्यूंकि जीवन ने मुझे दुःख और हादसों के सिवा कुछ नहीं मिला है। कोई सहारा -सांत्वना देने वाला भी नहीं। यहाँ तक कि मेरा माँ जाया भाई भी राखी की लाज निभा नहीं सका। अपना बोझ ही समझा मुझे। "
      " खैर ,अब तुम अपने घर से किसी को तो साथ लाओ। वैसे मैं तुम्हारे भाई और तुम्हारे पति की पहली पत्नी से मिलना चाहती हूँ। तुम किसी तरह मना कर ले आओ उनको। "
       खुशी ने कहा कि वह कोशिश करेगी। चली गई।
मुझे मालूम है कि मुझे किसी की जिंदगी में दखल देने का अधिकार नहीं है। मगर मैं एक डॉक्टर होने के साथ -साथ एक स्त्री भी हूँ जो दूसरी स्त्री का दर्द समझ सकती हूँ। मेरे मन में उस बिन माँ की बच्ची के लिए ममता उमड़ पड़ी। ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि ईश्वर उसकी  गोद जरूर हरी करे।
        लगभग एक सप्ताह बाद ख़ुशी अपने भाई -भाभी और जेठानी के साथ आई। परीक्षण के  बाद  सभी को  अपने पास बुलाया  कहा कि ख़ुशी माँ नहीं बन सकती।  उसकी जेठानी और भाभी तो बिना प्रतिक्रिया बैठी रही। भाई  दुखी था। ख़ुशी को जरूर एक आस थी कि शायद ! क्या मालूम !!लेकिन अब वह मायूस हो कर फूट -फूट कर रो पड़ी।
    " मुझे बहुत दुःख हो रहा है कि तुम दोनों ख़ुशी को रोते हुए देख कर भी नहीं पसीजी। क्यूंकि एक की वह सौतन है और दूसरी इस डर  से कि प्रेम से पेश आएगी तो कहीं यह तुम्हारे गले ना पड़ जाए। जरा इंसान बन कर भी तो सोचो। " मैं उन दोनों महिलाओं से कहा।
      ख़ुशी को चुप करवाते हुए उसके भाई से कहा , " क्या तुम्हें अपनी बहन पर जरा भी तरस नहीं आया ! एक विवाहित को ब्याह दिया अपनी बहन को। क्या तुम्हारा फ़र्ज़ नहीं था कि  तुम उसका उत्तरदायित्व निभाओ। "
    भाई बगलें झाँकने के अलावा कुछ नहीं कर सका।
 " और तुमने अपने पति की दूसरी शादी के लिए हाँ कर दी और खुशी को  सौत स्वीकार कर लिया। "
 " मैं क्या करती ! मेरी कौन सुन रहा था ? "
   " क्यों , तुम  बे -जुबान थी ? या समझ नहीं थी ! अरे ! तुम दो बच्चों की माँ थी। तुम्हारे कदम जम चुके थे घर में ! तुम जरा सी हिम्मत करती। अपने बच्चों सहित घर छोड़ देने की धमकी देती। और नहीं तो आगे बढ़ कर ख़ुशी को ही बेटी के रूप में स्वीकार कर उसके सर पर हाथ रख देती। तुम्हारे पति का क्या ? वह पुरुष है। भोगने को सहज सुलभ स्त्री मिल रही थी। लोभ रोक नहीं पाया होगा। तुम्हारा फ़र्ज़ था कि तुम पति को समझाती। अपनी गृहस्थी को उजड़ने दिया स्वयं  तुमने और दोष ख़ुशी को देती रही !" मैं जरा आवेश में आ गई।
     मधु ( खुशी की जेठानी ) को अब समझ आया कि उसने क्या गलती की। " मुझमें इतनी हिम्मत आई ही नहीं थी डॉक्टर जी ! "  पछतावा मिश्रित दुःख था चेहरे पर।
    " रोशनी (खुशी की भाभी ) तुमने क्या किया !! एक बिन माँ की बच्ची को बोझ समझ कर घर से बाहर धकेल दिया ! सोचो अगर तुम्हारी बेटी ऐसे हालात से गुज़रती तो तुम क्या करती ? "
    रोशनी निरूत्तर थी। जवाब देती भी क्या ?
" तुम रोशनी के भाई हो , तुम अब भी इसके लिए कुछ कर सकते हो। तुम इसे ससुराल से ले आओ। वैसे भी वह शादी गैर क़ानूनी है। तुम पुलिस की धमकी का इस्तेमाल कर सकते हो। यह बाहरवीं तक पढ़ी है। कई संस्थाए हैं जो लड़कियों -महिलाओं की मदद करती है। वहां इसे प्रशिक्षण दिलवाओ और अपने पैरों पर खड़ी होने में मदद करो। "
    " लेकिन , लोग क्या कहेंगे ! "
" लोग तो अब भी कहते ही होंगे कि यह कैसी ना इंसाफी है ! कुछ लोग तो तुम्हे भी बुरा कहते होंगे कि कैसे भाई -भाभी हैं। अब जो तुम करोगे उस से ना केवल ख़ुशी का जीवन संवरेगा बल्कि तुम्हारे दिवगंत माता-पिता की आत्मा भी शांत होगी। यह बहन है तुम्हारी , तुम्हारा फ़र्ज़ है ! तुम ऐसे मुहं नहीं फेर सकते ! और मधु , तुम भी भाई की सहायता करोगी तो तुम्हारी गृहस्थी एक बार फिर खुशहाल हो जाएगी और ख़ुशी के जीवन में खुशियाँ आ जाएगी। "
          वे सभी चले गए। खुशी के जीवन में क्या होता है और कितनी ख़ुशी आती है , यह उसकी किस्मत पर निर्भर करता है ? नहीं !  उसकी खुद की हिम्मत पर है ! आखिर में पहला कदम तो उसे   ही उठाना होगा अपने जीवन को खुशहाल करने के लिए। मैं तो सिर्फ दुआ और शुभकामना  के साथ उसकी  हर सम्भव सहायता कर  सकती हूँ।

      उपासना सियाग 
नयी सूरज नगरी 
गली न 7 
नौवां चौक 
अबोहर ( पंजाब )
पिन  152116 
फोन न  8264901089 

       

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

बदलता रंग

    लेखिका जी के चेहरे पर एक रंग आ रहा था , एक रंग जा रहा था। बहुत आवेश में थी और कुछ कहते नहीं बन रहा था।
कारण !
   अभी -अभी उनकी ननद का फोन आया था कि उसे भी पिता की  जायदाद से हिस्सा चाहिए। ननद की इतनी हिम्मत कैसे हुई यह सब कहने को ! सोच कर ही गुस्सा आ रहा था।
      पानी पीने उठी तो सामने के मेज  पर रखे अखबार में उनका ताज़ा तरीन लेख ," बेटियां भी पिता की जायदाद में बराबर की हिस्सेदार होती है " जैसे उनको  मुहँ चिढ़ा रहा हो। जल्दी से अख़बार को पलट के रख दिया गया। 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

आईना ...

(आईना ...)
" अरे बेटा ! तू झाड़ू हाथ में मत ले , झाड़ू लगाना कोई लड़कों का काम है ? "
 " लेकिन माँ ! ये छोटू भी तो लड़का ही है ना ! तो यह झाड़ू क्यों लगा रहा है ? "
   " ओह ,चलो भी यहाँ से !!"
" और छोटू !! तुझे हंसी क्यों आ रही है ? चल काम कर अपना !! "

उपासना सियाग

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

बहार की उम्मीद....



"ओह्ह !! आज फिर ये फूल पड़े है !! "
"कौन रखता है इनको ?"
 " पतझड़ के मौसम में बहार की किसको उम्मीद है !!"
 " इन पत्तों के साथ इन महकते फूलों को फेंकते मुझे बहुत दुःख सा होता है !!"बलबीर खुद से ही जैसे बात कर रहा हो।
 " बलबीर बेटे !! तुम दुखी ना हुआ करो , मेरी आशा को मैं रोज़ ताज़ा फूल ला देता हूँ। मेरी जीवन साथी आशा जो न हो कर भी यहाँ इन फूलों की महक लेने आ ही जाती है। "प्रकाश जी भावुक हुए जा रहे थे। 

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

अस्तित्व

  जैसे यह वट वृक्ष है। कितना सुकून है यहाँ ।वैसा साया मुझे क्यूँ न मिला !  मैं ही सब के लिए दुआ करती रही। मेरे लिए क्यों नहीं कोई मन्नत मानी किसी ने। सबकी जरूरत पूरी कर के भी मेरी जरूरत क्यों नहीं किसी को।
मैं नदिया सी , सागर में घुल कर अपना अस्तित्व खोती रही।
  और सागर ?  सागर को नदिया का त्याग कहाँ समझ आता है।
डायरी में अपनी ही लिखी पंक्तियाँ पढ़ कर ,विभू भरी आखों
से मंज़र निहारती रही। 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

लघु चित्र कथाएं ...

पर.....

" बाबा ! मुझे कहाँ ले जा रहे हो !"
" मैं तुम्हे खुले आसमान की हद दिखाना चाहता हूँ। खूब उड़ान भरो। आसमान को छू लो एक दिन। "
" अच्छा बाबा
!! तो आप उस दिन माँ से क्यों कह रहे थे कि उनके बहुत पर निकल आये हैं , काटने पड़ेंगे !!"

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अब हर दिन उसका है

  शराबी पति की मार से तंग आ कर सड़क किनारे  गोद में बेटी लिए कमली सोच रही थी कि अब वह क्या करे !कहाँ जाए ? चेहरे को तो धूप से ढक लिया लेकिन जिंदगी कि हकीकतों की धूप से सामना तो अब करना ही था। सर पर छत ना सही लेकिन हौसले तो है ही। उसी हौसले ने उसे नई उड़ान भरने का संकल्प दिए। उसे क्या मतलब कि महिला दिवस क्या है और कब है ! अत्याचारी से मुक्ति मिली। अब हर दिन उसका है।

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क़ीमत

 रामस्वरूप गेहूं की लहलहाती फसल पर संतुष्टि और गर्व भरी नज़र पर डालते हुए सोच रहा था कि इस बार बहुत कमाई होगी। महंगी पेस्टीसाइड का खर्च निकलने के बाद भी बहुत रुपया बचेगा।
   तभी एक चिड़िया के चीखने जैसी आवाज़ ने उसके कदम थाम दिए।
मुड़ कर देखा तो एक चिड़िया , दूसरी मरी हुई चिड़िया पर आर्त्तनाद कर रही है। वह सहम गया कि वह किस कीमत पर कमाई कर रहा है।

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शाखा..

 " चटाक् " जोर से पड़ा थप्पड़।
पोती के गाल पर पड़ा थप्पड़ सुनीता जी के हृदय में लगा।
" हमारे परिवार की  लड़कियाँ बाहर काम नहीं करती ! विवाह हो जाए तो अपनी मर्ज़ी कर लेना !"
" लेकिन जमाना बदल गया है !हर्ज़ ही क्या है ?"
" तुम अपनी बेटी का पक्ष ले कर सर मत चढ़ाओ !"
सुनीता जी की आँखे भर आई। ऐसा लगा जैसे मन मारती हुई महिलाओं के वट - वृक्ष में शाखा और जुड़ गई।

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पत्थर

नवजात के रोने की आवाज़ के साथ ही नानी का रोते हुए कमरे से बाहर आना हुआ तो कुसुम के मामा पूछ बैठे ," क्या हुआ है ?"
" क्या बोलूं रमा की किस्मत में तो पत्थर ही पत्थर !!"
सात वर्षीय कुसुम एक पल में हैरान रह गई कि ' पत्थर  !!'
कहानियों में सुना था कि रानी ने पत्थर को जन्म दिया , तो क्या आज माँ ने भी पत्थर को जन्म !!!
भाग कर माँ के पास जाने लगी तो मामा को कहते सुना कि ओह फिर से  लड़की का जन्म !
कुसुम को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि पत्थर का जन्म हुआ या लड़की का।
लड़की हुई तो पत्थर कैसे हुई वह !
सवाल बहुत थे नन्हे से मन में लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था , ना नानी के पास ना ही मामा  के पास।

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माँ

" पापा ! माँ कैसी होती है ?" नन्ही टुनिया एक बार फिर पूछ बैठी।
"  तुम्हारी माँ  चली गयी हमें छोड़ कर दूर !!! ना सुनती है ,ना बोलती है ! अब वह पत्थर की मूरत है !! पापा का खीझ भरा उत्तर था।
और टुनिया ! उसे सिर्फ पत्थर की मूरत ही समझ आई।  वह समझ गई। घर के पास एक पार्क में एक मूरत तो थी।
 छुट्टी के बाद सीधा वहीँ  पहुंची हाथ में गुब्बारे लिए।
" माँ !!! " टुनिया किलक कर बोली।
माँ सुनने के बाद पत्थर की मूरत भी पिघले बिन कहाँ रह सकी। झट से झुक गई।

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वो कौन थी ..

" अरी बिटिया ! तुम  यहाँ क्या कर रही हो ! तुम्हारे साथ क्या कोई नहीं ? स्टेशन मास्टर  सतीश जी उस लडक़ी से पूछ  रहे थे जो किसी का  इंतजार कर रही थी शायद।
" अंकल ! हरिद्वार वाली गाड़ी कब आएगी !! "
" क्यों !! तुम्हारा कोई आने वाला है क्या ? "
" मेरे माँ-बापू आने वाले हैं ! तीन महीने पहले  यहीं से गये थे। "
" गाड़ी तो सुबह आएगी। तुम अकेली क्यों आई हो। साथ में कौन है तुम्हारे ? "
लड़की चुप बैठी रही और नज़रें इंतज़ार मे जमा दी।
सतीश जी इधर -उधर देखने लगे कि इसके साथ कौन है। उन्होंने चाय वाले को पूछा कि इसके साथ कोई आया है क्या ? वह बोला कि इसके माता -पिता केदार-नाथ त्रासदी मारे गये थे। यह अपने दादा -दादी साथ घर पर ही थी। जब उसे मालूम हुआ तो वह सदमे मे बीमार पड़ कर मर गई। तब से अक्सर इसे यहाँ देखा जाता है।
सतीश जी उसी जगह गये तो वहाँ कोई नहीं था। सतीश जी अचम्भित थे कि वो कौन थी !

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धूल...

       राज्य  सरकार ने हर ग्राम पंचायत में गरीब किसानों के लिए एक  ट्रैक्टर मुफ्त उपलब्ध करवाने का ऐलान किया , जिससे किसान अपने खेत में आसानी से खेती कर सके। कमलू बहुत खुश था। सुबह जल्दी ही पंचायत-घर पहुँच गया ताकि उसका नम्बर पहले आ सके।
   तभी  धूल के गुबार ने उसकी आँखे मूँद दी। आँखे खुली तो सरकारी ट्रैक्टर  तो गाँव के बड़े जमींदार का ड्राईवर लिए जा रहा था। कमलू आँखे पोंछ रहा था। पता नहीं वजह क्या थी ! उसकी आँखों में पड़ी धूल या उसके सपनों पर पड़ी धूल !!

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दिवा -स्वप्न

मैं क्या सोच रहा था ! इतनी मेहनत कर के माँ -बापू ने मुझे पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि कुछ कमा  सकूँ। लेकिन मैं अब भी बेकार हूँ और माँ -बापू आज भी मेहनत कर रहे  है।
  तो अब मैंने यह सोचा है कि पढाई-लिखाई सब बेकार है।
सोच रहा हूँ कि !!
माँ ने तो कहा है  ," बेटा , मेहनत में कोई बुराई नहीं। जब तक नौकरी नहीं मिलती तब तक तू कहीं ड्राइवरी का काम कर ले। तेरे बापू साहब लोगों के यहाँ बात कर लेगें। कोई तो जुगाड़ हो ही जायेगा। साहब लोगों के साथ रहेगा तो हो सकता है कि तुझे भी कोई सिफारिश से कोई नौकरी मिल ही जाएगी। "
लेकिन मैंने सोचा कि  जब इतनी  डिग्री ली है तो ड्राइवर क्यों बनूँ !! जबकि मैं एक गाड़ी का मालिक बन सकता हूँ।
  इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि क्यों ना फिल्म लाइन में ही किस्मत आजमाऊँ। एक ही फिल्म हिट हो गई तो न जाने कितनी गाड़ियां मेरे आगे पीछे होंगी।
 या सोच रहा हूँ कि कोई बाबा ही बन जाऊँ लोगों पर कृपा बरसाता रहूँगा।कोई भक्त ही मुझे अच्छी सी गाड़ी  दे ही देगा।
  दिन भर सोचता ही रहता हूँ। सोचने के कोई रूपये या मेहनत थोड़ी लगती है। माँ-बापू के राज़ में ज्यादा क्या सोचना , नौकरी तो मिल ही जाएगी कभी न कभी !
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स्नेह बंधन

मैं पत्नी समेत पार्क में  बेंच पर बैठा सोच रहा था। प्रेम की कोई भाषा नहीं होती। यह तो मूक होता है। आँखों और हृदय को पढ़ लेता है। सौम्या जो सामने टहल कदमी कर रही है । विदेशी लड़की है। यह नाम हमने ही दिया है।
   चार महीने पहले जब हम कहीं जा रहे थे तो यह भागती हुई हमारी गाड़ी के आगे आते-आते बची। गाड़ी रोक कर देखा तो गोद में बेटा थामे काँप रही थी। वह भाग कर गाड़ी में बैठ गई। क्या भाषा बोल रही थी ,हमें नहीं समझ आया। समझ आया तो उसका  भय से कातर हुआ चेहरा। उसके पीछे कुछ लोग थे। जाने क्या मंशा थी उनकी !
    हम ने गाड़ी आगे बढ़ा लेना ही उचित समझा , क्यूंकि रात को  सुनसान इलाके में हमें बहादुरी दिखाने  में समझदारी नज़र नहीं आई।घर आकर उसने कुछ टूटी -फूटी अंग्रेजी में समझाया तो समझे कि वह विदेशी है। किसी कम्पनी में कार्य करती है। तीन महीने की गर्भवती है। तलाकशुदा है।  उसके घर के आस -पास के कुछ आवारा लोग उसे विदेशी होने के नाते सहज उपलब्ध समझ रहे थे। इसलिए वह उनसे बच कर भाग निकली थी।   बस तभी से वह हमारे साथ रह रही है और हम उसके साथ।  एक स्नेह बंधन में हम बंधे हैं।

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फोटो कॉन्टेस्ट

 "अरे वाह !! "
"यह ठीक है ! कितना सूटेबल सीन है। "
"यह लेडी , किड्स  ! बिलकुल नेचुरल है। "
"घर , चूल्हा सब अपनी जगह परफैक्ट !"
"फोटो कॉन्टेस्ट के लिए इसे क्लिक कर लेती हूँ। "

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 जिंदगी के रंग

" आज कल सब अपने -अपने में मग्न है ,किसी के पास समय ही कहाँ !"
" ओह !! ये माँ जी भी ना , सारा दिन कुड़ - कुड़ करती रहती है ! अब क्या सारा दिन इनके पास ही बैठूं !! मेरी भी कोई अपनी जिंदगी है , हुंह !!"
" कुमुद ! जरा देखो तो , ये पेच किसके हैं ? दो दिन से देख रहा हूँ, खिड़की में पड़े हैं । अब आँसू पोंछने वाली क्या बात हुई , माँ की तो आदत है बोलते रहने की !!"
" पापा शायद ये पेच माँ के दिमाग के हैं। सारा दिन फोन पर अकेले ही हंसती रहती है !!
आंसू हंसी में धुल गए। जिंदगी का कोई भी पन्ना कोरा कहाँ रहता है।

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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

मरने का मन करता है , तो मर जाईये !

    "मरने का मन करता है , तो मर जाईये !"
 चौंकिए नहीं ! मैं ऐसा ही कहती हूँ , जो लोग मुझे यह वाक्य कहते हैं।
 हम बहुत सारे लोगों से कहते सुनते हैं कि 'हम मर जाएँ तो अच्छा है ! क्या पड़ा है जीने में ! हमारे जीने की वजह बच्चे हैं , नहीं तो अब तक खुद को कभी का ख़त्म कर लेते!'
    बच्चे ही नहीं , और भी बहुत सारी वजहें होती है मरने वालों के पास। कितने सारे कारण गिना देते हैं , जिसकी वजह से वे लोग ज़िंदा रहते हैं , वरना उनको कोई जीने का शौक ही नहीं होता। उनको लगता है कि वे अगर जिन्दा हैं तो दुनिया चल रही है। उनके ना रहने से  प्रलय ही आ जाएगी।
        लेकिन ,जब जीने का शौक नहीं है ,तो मर जाना ही बेहतर है। किसलिए धरती का बोझ बढ़ा रखा है। एक तो शरीर रूपी भार  और दूसरा जो मन पर 'मन भर ' भार  लाद रखा है।
   किसी के मर जाने से यह संसार रुका है क्या ? मरने वाला जो अपने पीछे परिवार छोड़ कर जाता है क्या वह जीना छोड़ देता हैं ? तो फिर मरने से डर कैसा ? मरिए ना !
     "ईश्वर ने जिसे चोंच दी है ,चून ( दाना/भोजन )भी देगा। " मेरी माँ के इस वाक्य से मैं भी सहमत हूँ।
फिर कैसा अहसान किसी पर कि हम किस वजह से जिन्दा है।
     ईश्वर ने इतनी सुन्दर दुनिया बनाई है। इतनी सारी  खुशियां दी हैं तो उनमे कुछ गम भी दिए हैं। हर किसी  को अपना  दुखः बड़ा ही लगता है। समय पर किसी का भी बस नहीं चलता है बुरे के बाद अच्छा समय भी आता ही है तो हम सुख के आने की सब्र से प्रतीक्षा क्यों नहीं करते। मरने के ही गीत क्यों गाते हैं।
       जो इंसान खुद से ही प्रेम नहीं करता , पल-पल मरने की सोचता है उसके  जिन्दा रहने  या मर जाने में फर्क ही क्या है। अपने आस पास नकारात्मकता फ़ैलाने से अच्छा ही है कि वह  ख़ुशी -ख़ुशी दुनिया से विदा ले ले और दूसरों को बे-मौत मरने से बचा दे।