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शुक्रवार, 6 मई 2022

कुल्हड़ में गुड़ फोड़ना

      25/02/2022  

          कई लोगों की आदत होती है बात छुपाने की। मैं इसे ' कुल्हड़ में गुड़ फोड़ना ' कहती हूँ। मतलब कि कुल्हड़ में गुड़ फोड़ोगे तो नतीजा क्या निकलेगा ? गुड़ के साथ कुल्हड़ भी तो फूटेगा न ! 

      तो भई जरुरी नहीं है हर किसी को बात बताई जाये। लेकिन कोई तो ऐसा होना ही चाहिए जिसे मन की बात कही जा सके। हो सकता है हल न निकले , मन तो हल्का हो ही जायेगा। 

        यह आदत स्त्री - पुरुषों  , दोनों में हो सकती है। 

       कई लोग सोचते हैं , सामने वाला खुद ही उनको समझ जाये और उनके मन के अनुरूप व्यवहार करे , उनकी जरूरतें पूरी कर दे। अरे भई , आपके कोई बल्ब तो नहीं लगा कि इस रंग की बत्ती जली तो ये बात है , और उस रंग की बत्ती जली तो वो बात है। खुल कर बोलिये।  विरोध कीजिये। और अपनी बात  रखिये हक़ से !

            बहुत लोग होते हैं जो बोलते नहीं फिर भी  उनके हाव -भाव बता देते हैं कि उनको क्या समस्या है। मेरे लिए उनके लिए एक ही सलाह है , बिन रोये तो माँ भी दूध नहीं पिलाती !

          

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

सोच

सोच
 दादी नन्ही सी पोती को दुलरा रही थी, " ये तो मेरी सरोजनी नायडू है, रानी लक्ष्मी है, मेरी लता मंगेश्कर भी है."
       माँ ख्यालों में गुम हुई सी बोली, " मैं तो मेरी बेटी को विदेश भेजूंगी, यहाँ क्या रखा है? "
        दादी  एक नज़र अपनी बहू पर डालते हुए पोती को फिर से दुलराने लगी, हाँ- हाँ. मेरी गुड़िया तो सारा संसार घुमेगी फिर रॉकेट में बैठ कर चाँद पर जायेगी...."
    और वहाँ से बोलेगी , " सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा.."
उपासना सियाग (अबोहर) 

बुधवार, 12 जनवरी 2022

पदक


      विभा शाम को  अक्सर पास के पार्क चली जाया करती है .उसे छोटे बच्चों से बेहद लगाव है, सोचती है कितने प्यारे कितने मासूम, दौड़ते, भागते, मस्त हो कर दीन -दुनिया के ग़मों से बेखबर, बस चिंता है तो इस बात की सबसे पहले झूला किसको मिलेगा ,कौन दौड़ कर अपनी माँ के हाथ लगा कर उसे छू कर फर्स्ट आएगा या आज कुल्फी खानी है या पॉप-कॉर्न...!
     जब से बच्चे होस्टल में रहने लगे है और पति भी बिजनस के सिलसिले में बाहर जाते ही रहते है तो विभा के मन बहलाव की सबसे अच्छी जगह यह पार्क ही है  ...अक्सर वह, एक लड़की जिसकी उम्र कोई बीस -बाइस वर्ष होगी ,को देखा करती के वो बच्चो से कैसे घुल मिल रही है या कभी कुछ बता रही है. एक दिन वो उसे ऐसे ही गौर से देख रही थी उसने भी विभा की तरफ देखा और मुस्कुरा दी ,उत्तर में विभा ने भी प्यारी मुस्कान से जवाब दिया ...
    कुछ देर बाद वह उसके पास आ बैठी और पूछा"मैम आपको मैं रोज़ देखती हूँ ,आपका घर पास में ही है क्या ?"
विभा ने हाँ में सर हिला दिया फिर उसके बारे में पूछा तो मालूम हुआ ,उसका नाम रेवती है और वो एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती है फिर ट्यूशन भी पढ़ाती है .शाम को कुछ देर दिमाग को राहत देने के लिए पार्क में आ जाती है ...
जब स्कूल का नाम पता चला  तो विभा ने पूछा कि क्या वो सनाया को जानती है ...सनाया, विभा के देवर की बेटी थी ...जैसे ही रेवती को मालूम हुआ के वो सनाया की बड़ी माँ है तो एक दम खड़ी हो कर विभा का हाथ पकड लिया और ख़ुशी से लगभग चीखती हुई सी बोली "अरे ! आप हैं उसकी बड़ी माँ !मुझे बहुत तमन्ना थी आपसे मिलने की ...!आपका क्या तरीका है पढ़ाने का, मै उसकी कायल हूँ और सनाया खुद  भी कहती है उस में जो भी अच्छी आदतें हैं वो उसकी बड़ी माँ ने ही डाली हुई है !मुझे बहुत ही ज्यादा ख़ुशी हो रही है आपसे मिल कर".
          विभा हंस पड़ी "अरे रेवती ! ऐसा कुछ नहीं है सनाया है ही इतनी प्यारी बच्ची ,उसे हर कोई प्यार करता है "...
        कुछ देर बाद बातें करने के बाद विभा अपने घर आ गयी पर आज उसे बहुत ख़ुशी महसूस हो रही थी और राहत भी ,रेवती की बातें सुन कर .लग रहा था जैसे कोई पदक ही मिल गया हो ....नहीं तो अक्सर उसके जेहन में तो शक भरी आँखे और कुछ कड़वे बोल ही  कानो में गूंजा करते थे ..."आपने क्या किया बच्चों के लिए ये तो हमारा बड़प्पन था, जो आपके पास हमने , हमारे बच्चों को रखा !"
        विभा ने तो कभी अपने सर पर दायित्व लिया ही नहीं था कि उसने दूसरों के बच्चे अपने पास रखे थे उनको अपने बच्चे ही बताये थे ...अजीब सी मनस्थिति हो रही थी उसकी, खाना खाने का मन नहीं हुआ, उसने बहादुर से कुछ बना कर खा लेने को कहा और उसे भूख नहीं है आज कह कर  बस फ्रिज में से दूध निकाल गर्म करके कप में डाल बाहर लान  में ले आयी ...
         लान में लगे झूले पर बैठ कर लान कि हरी भरी घास में अपने पैरों को सहलाती विभा न जाने कब छः साल पीछे पहुँच गयी ,जब वो राघव ,कान्हा ,सनाया और वसुंधरा के पीछे भागम-भगाई खेला करती थी और उनको कभी कहानी -चुटुकुले सुनाया करती थी.....
          विभा का परिवार पास के गाँव में था .राघव की  पढ़ाई के लिए शहर में घर बना कर रहने लगे.छोटे कान्हा का जन्म हुआ  . फिर सनाया को भी नर्सरी में दाखिला  दिला दिया ,सनाया जन्म से ही रक्त से सम्बन्धित एक ला-इलाज़ बीमारी से ग्रसित थी. तब हर महीने उसे खून चढाने की जरुरत होती थी .वैसे सामान्य बच्चों की तरह ही व्यवहार करती थी और  पढ़ाई में भी अच्छी थी.
        सभी की लाडली भी थी . शरीर में रोगों से लड़ने की ताकत कम होने की वजह से अक्सर बीमार भी हो जाया  करती थी .सर्दियों में खांसी भी हुई ही रहती थी और रात को खांसी ज्यादा ही आती थी कई बार तो खांसते -खांसते उल्टी भी आ जाती थी. ऐसी ही एक रात को उसे खांसी शुरू हो गयी तो विभा जल्दी से उसे बाथरूम के वाश-बेसिन के पास ले जा कर खड़ा कर दिया की कहीं फिर से उल्टी ना आजाये कल की तरह ,दिन भर काम बच्चों को संभालते -संभालते विभा थक भी जाती थी बेशक सहायता के लिए बहादुर था फिर भी तीन बच्चों की देख भाल करने से थकावट होना स्वाभाविक ही था उपर से नींद लगी ही हो तो ऐसे में जागना पड़े तो थोडा खीझ भी गयी वह ...पर बच्चे मन की बात बहुत जल्दी समझ जाते हैं और दो बूंदे आंसुओं की ढलक पड़ी सनाया की आँखों से ...विभा भी जोर से बोल पड़ी "अब रो क्यूँ रही हो "! सनाया थोड़ी सी सहमते  बोली "नहीं बड़ी माँ !रो नहीं रही ,ऐसे ही आँखों से पानी आ रहा है !"और विभा की ममता पिघल गयी ,हाय इस मासूम सी बच्ची पर जोर से क्यूँ बोल पड़ी और गोद में उठा कर सीने से लगा लिया और उसके बिस्तर पर लेटा कर माथे को सहलाती रही जब तक की वह सो न गयी .
           कुछ दिन बाद उसकी ननद गौरी का आना हुआ तो पता लगा, उनको ,अपने बेटे के साथ उसकी कोचिंग के लिए दूसरे शहर जाना होगा और वो भी दो साल के लिए ,वो अपनी बेटी वसुंधरा के लिए चिंतित थी की दो साल के लिए उसकी पढाई खराब होगी ....तो सरल ह्रदय विभा बोल पड़ी कोई बात नहीं दीदी मेरे पास छोड़ दो मैं संभाल लूंगी...थोड़ी सी न-नुकुर के बाद बेटी को छोड़ना ही पड़ा क्यूँ की कोई चारा भी नहीं था. फिर विभा की सास को भी साथ में आकर रहना पड़ा ,क्यूँ कि कोई सहायता के लिए भी तो चाहिए  उसे ,बच्चों कि जिम्मेवारी कम तो नहीं होती आखिर !
         अब चार बच्चों के साथ विभा का दिन शुरू होता राघव ,वसुंधरा और सनाया को स्कूल भेजती और नन्हे कान्हा को संभालती. वो अभी छोटा था स्कूल के लिए .
       राघव जहाँ बहुत जहीन ,शांत लेकिन बेहद बातूनी था वहीं कान्हा तो बस कान्हा ही था नटखट ,दूसरों को पीटने वाला  यहाँ तक बाहर सड़क पर भी डंडा ले कर खड़ा हो जाता और आने जाने वाले बच्चों या बड़ों को पीट डालता और दिन में ना जाने कितनी बार शिकायतों की डोर- बेल उसको सुननी पड़ती ...अब बाहर का दरवाज़ा भी तो कितनी देर बंद किया जा सकता था ....वसुंधरा भी शरारती थी और पढने का कोई ज्यादा शौक नहीं था पर पढ़ लेती थी और चीखने का शौक था पर विभा की रौबीली आँखों से डरती थी ...सनाया तो हमेशा से बेहद शांत ,बिन कहे ही समझ रखने वाली और पढाई में भी ठीक थी ....
         विभा को लगता की बच्चियां कुछ उदास सी है और हो भी क्यूँ ना हो उदास आखिर जो बात माँ समझ सकती है वो और कौन समझ सकता था। यह देख उसने दोनों बच्चियों को अपने पास बैठा कर बोली "अच्छा सना और वसु मुझे तुम दोनों बताओ , तुम्हारे सर में कितने रंगों के बल्ब लगे हुए हैं "!और वे दोनों हैरान हो कर सर पर हाथ रख दिया और दोनों एक साथ हंस कर और लगभग उछलते हुए से बोल पड़ी "क्या !"
   विभा बोली "हां बल्ब !अब जब तुम्हे कुछ चीज़ चाहिएगी तो हरा बल्ब जल जायेगा ,और कोई बात पसंद नहीं है तो लाल या फिर मन में कोई बात है तो नीला बल्ब जल जायेगा और मुझे पता चल जायेगा ...!"
  यह सुन दोनों हंस पड़ी "अरे ,ऐसा भी कभी होता है क्या".विभा भी उनको दुलारते हुए बोली "तो मुझे कैसे पता चलेगा की तुम्हारे मन में क्या है ,आज से जो भी बात है वो सब मुझे बताओगी और स्कूल की भी अपनी सहेलियों की भी और तुम दोनों को क्या चाहिए यह भी ".कह कर दोनों को अपने करीब करके गले से लगा लिया उन दोनों के चेहरे पर भी एक प्यारी सी मुस्कान के साथ ख़ुशी थी।
      स्कूल से आने पर राघव तो अपने कपड़े  बदल कर अखबार ले कर बैठ जाता। वसुंधरा अगले  दिन के लिए बैग तैयार करने लग जाती पर सनाया सबसे पहले अपने कपड़े  बदल कर हाथ मुँह  धो कर खाना लेने उसके पास पहुँच जाती जहाँ उसकी दादी पहले से ही मौजूद होती की कही विभा अपने और पराये बच्चों में भेद तो नहीं कर रही ..लेकिन माँ को नहीं पता था कि  बच्चियों और विभा ने अपने तार आपस में जोड़े हुए हैं अब कोई भेद भाव भी नहीं था किसी के मन में। आस पास के लोग जो उनको  नहीं जानते थे वे  कहते  कि आज कल के ज़माने में चार बच्चों को जन्म कौन देता है और वो हंस पड़ती के सब भगवान् की मर्ज़ी है ...!"
      अब चार बच्चों को देखना, उनको समझना भी मुश्किल होता है। घर में व्यवस्था कायम रखने के लिए कुछ नियम बना दिए गए सब बच्चों के लिए और पुरस्कार भी रखा गया।  जो बच्चा अपना काम खुद करेगा अपना सामान कपडे और किताबें सहेज कर रखेगा ,अपनी अलमारी भी साफ रखेगा और साथ में कोई भी झगड़ा  या शोर शराबा नहीं करेगा उसके पॉइंट लिखे जायेंगे और महीने के आखिर में और मन पसंद खिलौना दिया जायेगा।  तीनो बड़े  बच्चे तो बहुत खुश भी थे और काम भी करते थे पर कान्हा नहीं बदला वो बिखेरा कर के बहादुर को आवाज़ लगाता, "बहादुर कचरा उठा ले !"  अब बहादुर की क्या मजाल  छोटे साहब का काम न करे ...     तीनो  बच्चों को उनकी मन पसंद के खिलौने दिला दिए जाते और कान्हा जिद कर के ले लेता ...
     कान्हा जब सना या वासु को पीट देता तो विभा धमकाते हुए बोलती "आगे से तुम्हे कोई भी राखी नहीं बांधेगी, तुम्हारी वाली भी राघव के बाँध देगी" तो वो भी गाल फुला कर बोलता "मत बांधना! मैं खुद ही बाँध  लूँगा...!"
     कभी कहीं जाना होता तो मुश्किल होती क्यूंकि तीनो बच्चे ही कार में खिड़की के पास वाली जगह लेना चाहते थे।   एक को तो बीच में बैठना होता ही था और ना बैठने की वजह भी बहुत बड़ी थी। जो भी खिड़की के पास बैठा ,वो चिल्ला कार बोलता" मैं तो भई रामचंद्र हूँ"! दूसरी खिड़की वाला भी बोल पड़ता "हाँ भई ! मैं  भी रामचंद्र हूँ "! और बीच वाला जोर से रो कर बोलता "नहीं ! मैं बूढ़ा बन्दर नहीं हूँ !."
     विभा और उसके पति अतुल दोनों हंस  पड़ते पर वो मुड़ कर कुछ घूर  कर देखती तो सभी चुप हो जाते पर एक दबी हुई हंसी उसके कानों में पड़ती  तो वो भी मुस्कान को रोक नहीं पाती......:)
   आखिर बच्चे तो बच्चे है यहाँ भी भेद भाव नहीं किया जा सकता था तो अगली बार कहीं जाने लगे तो विभा ने तीनो बच्चों को बैठा कर कहा "तीन कागज़ के टुकड़े लाओ , उन पर अपने -अपने नाम लिखो  और समेट कर डाल दो और एक  उठा लो जिसका भी नाम आता है वही बीच वाली सीट पर बैठेगा फिर ऐसे ही आने के लिए भी एक नाम चुन लो  जिसका नाम आएगा वही बीच वाली सीट पर बैठ कर आएगा ,ये तरीका बच्चों को बहुत भाया।
      जनवरी शुरू होते ही विभा सभी बच्चों को बता देती कि   अब इम्तिहान में थोड़ा  ही समय है तो सुबह पांच बजे उठना होगा। सभी बच्चे हाँ भर देते .........और वह पौने  पांच ही उठ जाती जैसे ही बेड से उठती तो अतुल लगभग उसे खींचते हुए से बोलते "अरे सो जाओ और बच्चों को भी सोने दो ,हो जायेंगे पास क्यूँ पीछे पड़ी हो नन्ही सी जानों  के ! "
         वो लगभग डांटते  हुए से कहती "नहीं जी !शरीर का क्या है जैसा ढाल लो ढल जायेगा ,यही दिन है पढ़ाई के ... "और वो चल देती उनको उठाने के लिए सभी को प्यार से सर पर हाथ रख कर पुकारती जाती और वो उठते जाते .
     राघव चूँकि बड़ी क्लास में था उस पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती और सना -वसु पर कम ,ये देख माँ को लगता के तो अपने बेटे को ही पढ़ा रही है उनको नहीं ,जोर से बोल पड़ती "अरे ! सना -वसु तुम भी तो पढो देखो राघव पढ़ रहा है !"
    आखिर विभा को बोलना ही पड़ता माँ ! मुझे पता है किसको कितना पढाना है ...
जब इम्तिहान होते तो लगता विभा को ,उसकी खोपड़ी ही पिलपिली हो गयी। वह  हंसती थी अगर उसके सर पर ऊँगली रखी जाये  तो वह  भी वहां धंस जाएगी ...बच्चों  को अच्छे से पेपर की तैयारी करवाती और कहती अगर उनको कुछ याद ना आये तो गायत्री मन्त्र का जप कर लेना याद आ जायेगा  !
     ऐसे ही एक दिन जब वसु पेपर दे कर आयी तो उदास हो कर बोली "मामी जी, आज मैंने बहुत गायत्री मन्त्र का जाप किया पर उत्तर तो याद ही नहीं आया .. ! विभा हँसते हुए बोली "बेटा ये प्रश्नोत्तर तो तुमने तैयार ही नहीं किया था तो  मन्त्र क्या करेगा !"
    उन दिनों कान्हा  भी स्कूल जाने लगा था पर वो पढ़ाई के नाम पर बहुत बदमाशी करता था .जब इम्तिहान होते तो विभा उसे कहती कि तेरे तो शिव जी रक्षा करेंगे मेरे पास भी कोई भी हल नहीं है। विभा को उस दिन बहुत हंसी आयी जब वो स्कूल से आकर बोला "माँ ! ये शिवजी कोई भी काम के नहीं है वो मेरे पास तो बैठे थे मुझे नीला -नीला सा दिखाई दे रहा था ,मैंने उनसे सवाल का जवाब पूछा तो बोले बेटा घर पर पढ़ कर आया करो मुझे क्या पता"!
    फिर रिजल्ट आता तो राघव के नम्बर सबसे ज्यादा आते और विभा को फिर से सुनना पड़ता इसका तो बेटा है ज्यादा पढाया है पर उसको पता था कि उसने सभी को एक जैसा ही समझा है।  मन अन्दर से कट जाता जब वसु की माँ यानी उसकी ननद रिपोर्ट कार्ड ले कर उससे सवाल जवाब करने लग जाती कि  इसमें नंबर कम क्यूँ है या ऐसे क्यूँ है ....पर अतुल तो उसे समझते ही थे वो बाद में उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर समझा  देते के उसने कोई भी किसी के साथ गलत नहीं किया तो मन को छोटा मत करो। हाँ  सनाया के माँ -पिता कभी शिकायत ले कर नहीं आये। लेकिन सनाया की माँ को धीरे -धीरे लगने लगा कि उनकी बेटी बीमार रहती है तो उसको , उनके साथ ही रहना चाहिये और गलत भी नहीं था उसका यह सोचना !
    वसुंधरा दो साल रह कर अपने घर चली गयी। सनाया भी अपने माँ -पापा के साथ अपने नए घर में चली गयी अब उनके बच्चे थे  एक दिन तो जाना था ही ! विभा भी क्या कर सकती थी पर जब छुट्टी के समय बच्चे आते तो विभा का मन और आँखे दोनों भर आते क्यूँ कि वो उस समय दोनों बच्चियों को भी याद करती थी। 
   अब  उसके अपने बच्चे भी बाहर चले गए और घर में रह गए दो जन सिर्फ विभा और अतुल। अतुल को भी टूर पर जाना पड़ता है कई बार , तो विभा घर में ,कमरों में गूंजती बच्चों की हंसी ,शरारती खिखिलाहट ढूंढ़ ती  रहती है और ...
     सहसा उसे लगा कोई उसे पुकार रहा है तो अपनी सोच से बाहर आयी ,देखा सामने बहादुर खड़ा है बोल रहा है "बीबी जी ,मैं जाऊं क्या काम तो सब हो गया ...! विभा ने उसे जाने के लिए कहा और उठ  कर दरवाज़ा बंद कर के अन्दर आ गयी। आज उसका मन कुछ हल्का सा था।  जैसे कोई पदक ही मिल गया हो। 
 उपासना सियाग
upasnasiag@gmail.com

सोमवार, 31 मई 2021

रास्ते का पत्थर

       सुमन ने जैसे ही घर में कदम रखा नवविवाहिता भाभी के शब्द कानों में पड़े , " क्यों अमित , हम अकेले भी तो जा सकते हैं।  हर समय दीदी को साथ ले जाना अच्छी बात है ? " 

       " देखो सुमन , दीदी ने हम भाई -बहनों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाया है। कभी माँ -पापा की कमी महसूस नहीं होने दी। मैं उनको घर में अकेला कैसे छोड़ कर जा सकता हूँ ?"

          " इसमें अकेले छोड़ कर जाने वाली क्या बात है , चंद घंटे की ही तो बात है , फिल्म देखेंगे , खाना खाएंगे और बस घर आ जायेंगे ! हमारी भी तो कोई प्राइवेसी है , और देखना वह हमेशा की तरह जाने के लिए  मना भी कर देगी !"

          " जब जानती हो तो पूछ लेने में हर्ज ही क्या है ! " भाई ने चिरौरी की। 

         " ना भई , कहीं अबकी बार हाँ कर दी तो ? उकताए स्वर में भाभी बोल रही थी। 

            वार्तालाप सुन कर सुमन का मन न जाने कैसा हो आया। कमरा बंद कर के खिड़की के पास खड़ी बाहर देखने लगी। वह सोच रही थी कि उसे कॉलेज की तरफ से घर मिला है ,उसके लिए एप्लाई कर देगी।  तभी उसकी नज़र सड़क पर पड़े पत्थर पर पड़ी ,जिसे सड़क के एक तरफ किया जा रहा था। यह वही पत्थर था जो  पिछले दो दिन तक बारिश के  पानी से भरी  सड़क पर लोगों के आने -जाने का सेतु बना हुआ था। 


शुक्रवार, 19 मार्च 2021

अंतर्द्वंद

       वेदिका ने प्रभाकर को बताया कि उसका लिखा पहला नॉवल प्रेस में जा चुका है तो  प्रभाकर ने फोन पर बधाई दी। वह बहुत खुश थी। घर में भी सभी खुश थे कि उनके परिवार में एक लेखिका भी है। वह जल्दी से सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। चढ़ते हुए उसे साल-डेढ़ साल पहले की रात याद आ गई। तब भी वह ऐसे ही खुश थी।
         दौड़ कर सीढियाँ चढ़ रही थी ।  उस की चूड़ियाँ और पायल  कुछ ज्यादा ही खनक -छमक  रहे हैं । 'कलाई भर चूड़ियाँ और बजती पायल'  परिवार की रीत है और फिर उसके पिया जी को भी खनकती चूड़ियाँ और पायल बहुत  पसंद है।
   मगर ये पायल - चूड़ियाँ  पिया के लिए  नहीं खनक रही थी ....
     छत पर पूनम का चाँद खिल रहा है।उसे छत पर से चाँद देखना नहीं पसंद । उसे तो अपने कमरे की खिड़की से ही चाँद देखना पसंद है , उसे लगता है कि खिड़की वाला चाँद ही उसका है .....छत वाला चाँद तो सारी  दुनिया का है।
        कमरे में जाते ही देखा राघव तो सो गए हैं। थोडा मायूस हुई वेदिका , उसे इस बात से सख्त चिढ थी कि  जब वह कमरे में आये और राघव सोया हुआ मिले। राघव से बतियाने का उसे रात को ही समय मिलता था।  दिन भर तो दोनों ही अपने-अपने काम  , जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं।
       लेकिन अब वह तो सो गया था।अक्सर ही ऐसा होता है !
     थोड़ी दूर रखी कुर्सी पर वह बैठ खिड़की में से झांकता चाँद निहारती रही।  सोये राघव को निहारती सोच रही थी कि कितना भोला सा मासूम सा लग रहा है ...एकदम प्यारे से बच्चे जैसा निश्छल सा ... और है भी वैसा ही ... ! वेदिका का मन किया झुक कर राघव का माथा चूम ले , हाथ भी बढाया लेकिन रुक गयी।
          संयुक्त परिवार में वेदिका सबसे बड़ी बहू है।राघव के दो छोटे भाई और भी है। सभी अपने परिवारों सहित साथ ही रहते है। राघव के माँ-बाबा भी अभी ज्यादा बुजुर्ग नहीं है।
        बहुत बड़ा घर है . जिसमे से तीसरी मंजिल पर  कमरा वेदिका का है। साथ ही में एक छोटी सी रसोई है। रात को या सुबह जल्दी चाय-कॉफ़ी बनानी हो तो नीचे नहीं जाना पड़ता। बड़ी बहू  है सो  घरेलू काम  तो नहीं है पर जिम्मेदारी तो है ही।
             पिछले बाईस बरसों से उसकी आदत है कि सभी बच्चों को एक नज़र देख कर संभाल कर , हर एक के कमरे में झांकती किसी को बतियाती तो किसी बच्चे की कोई समस्या हल करती हुई  ही अपने कमरे में जाती है। वह केवल अपने बच्चों का ही ख्याल नहीं रखती बल्कि सभी बच्चों का ख्याल रखती है। ऐसा आज भी हुआ  और आदत के मुताबिक राघव सोया हुआ मिला।
       राघव की आदत है बहुत जल्द नीद के आगोश में गुम  हो जाना। वेदिका ऐसा नहीं कर पाती वह रात को बिस्तर पर लेट कर सारे  दिन का लेखा  -जोखा करके ही सो  पाती है।
         लेकिन आज वेदिका का मन कही और ही उड़ान  भर रहा था।वह धीरे से उठकर खिड़की के पास आ गयी। बाहर अभी शहर भी नहीं सोया था। लाइटें कुछ ज्यादा ही चमक रही थी। कुछ तो शादियाँ ही बहुत थी इन दिनों ....   तेज़ संगीत का थोड़ा कोलाहल भी था .....  शायद नाच-गाना चल रहा है ।
            उसकी नज़र चाँद पर टिक गयी। देख कर ख़ुशी थोड़ी और बढ़ गयी जो कि राघव को सोये हुए देख कर कम हो गयी थी। सहसा उसे चाँद में प्रभाकर का चेहरा नज़र आने लगा था । खिड़की वाला चाँद तो उसे सदा ही अपना लगा था  लेकिन इतना अपनापन भी देगा उसने सोचा ना था।
    तभी अचानक एक तेज़ संगीत की लहरी कानो में टकराई। एक बार वह खिड़की बंद करने को हुई मगर गीत की पंक्तियाँ सुन कर मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी। आज-कल उसे ऐसा क्यूँ लगने लगा है कि हर गीत ,हर बात  बस उसी पर लागू हो रही है। वह गीत सुन रही थी और उसका भी गाने को मन हो गया ...," जमाना कहे लत ये गलत लग गयी , मुझे तो तेरी लत लग गयी ...!"
    अब वेदिका को ग्लानि  तो होनी चाहिए , कहाँ भजन सुनने वाली उम्र में ये भोंडे गीत सुन कर मुस्कुरा रही है।लेकिन उसका मन तो आज-कल एक ही नाम गुनगुनाता है , ' प्रभाकर '
        वेदिका इतनी व्यस्त रहती है और घर से कम ही निकलती है , कहीं जाना हो तो पूरा परिवार साथ ही होता है तो यह प्रभाकर कौन है ...?
         तो क्या वह उसका कोई पुराना ...?
     अजी नहीं ...! आज कल एक चोर दरवाज़ा घर में ही घुस आया है। कम्प्यूटर  -इंटरनेट के माध्यम से ...!
नयी -नयी टेक्नोलोजी सीखने का बहुत शौक है वेदिका को इंटरनेट पर बहुत कुछ जानकारी लेती रहती है। उसे  बच्चों के पास बैठना बहुत भाता है  तो  उनसे ही कम्प्यूटर चलाना सीख लिया । ऐसे ही एक दिन फेसबुक पर भी आ गयी।
    फेसबुक की दुनिया भी क्या दुनिया है ...अलग ही रंग -रूप .... एक बार घुस जाओ तो बस परीलोक का ही आभास देता है ! ऐसा ही कुछ वेदिका को भी महसूस हुआ।
         सभी जान -पहचान के लोगों में एक अनजान व्यक्ति की फ्रेंड -रिक्वेस्ट देख कर वह चौंक पड़ी थी। फिर उसके प्रोफ़ाइल को अच्छी से जाँच परख कर और थोड़ी बहुत फेस-रीडिंग कर के मित्रता स्वीकार कर ली। प्रभाकर ने मित्रता होते ही चैट शुरू कर दी।
        पहले-पहल तो वह झिझकी कि वह एक अनजान व्यक्ति से क्यों बात कर रही है ! लेकिन उसकी बातें और सुझाव कभी उसकी तारीफ में कहे गए वाक्य उसे प्रभावित करते गए। एक दिन तो प्रभाकर ने उसे मेहँदी हसन की गजल का लिंक ही भेज दिया।
     ग़ज़ल थी, " ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,मैं तो  मेरी जान मर के भी तुझे चाहूंगा ....." वह चकित सी रह गई। दिल की धड़कनों कुछ अजीब सी हलचल महसूस करने लगी। झट से कम्प्यूटर बंद किया और आईने के सामने खड़ी हो गई। आईने में तो कोई और ही वेदिका थी। दिल के धड़कने का उस वेदिका को क्या ! ढलती उम्र के पायदान पर खड़ी वेदिका को यूँ दिल नहीं धड़काना था !
         सोच में डूब गई। फिर कम्प्यूटर ऑन किया , फेसबुक लॉगिन किया और प्रभाकर को सन्देश भेजा , " सुंदर ग़ज़ल ! "
   " थैंक्स ! " प्रभाकर का दिल की इमोजी के साथ जवाब आया।
   उसके बाद वार्तालाप का सिलसिला तो चला ही साथ ही वेदिका का खुद पर ध्यान रखने की कवायद भी शुरू हो गई। आँखों की चमक बढ़ गई। अपनी सेहत का ख्याल भी रखने लगी।
   ना जाने कब वह प्रभाकर को मित्र से मीत समझने लगी। और आज खुश भी इसीलिए है कि ...,
" खट -खट " आईने के आगे रखा मोबाईल खटखटा उठा था। वेदिका ने उठाया तो प्रभाकर का सन्देश था। शुभरात्रि कहने के साथ ही बहुत सुंदर मनभाता कोई शेर लिखा था। देख कर उसकी आखों की चमक बढ़ गयी। तो यही था आज वेदिका की ख़ुशी का राज़ ...पिछले एक साल से प्रभाकर से चेटिंग से बात हो रही थी आज उसने फोन पर भी बात कर ली। और अब यह सन्देश भी आ गया....
     वह  नाईट -सूट पहन अपने बिस्तर पर आ बैठी।  राघव को निहारने लगी और सोचने लगी कि  यह जो कुछ भी उसके अंतर्मन में चल रहा है क्या वह ठीक है ?
         यह प्रेम-प्यार का चक्कर ...! क्या है यह सब ...? वह भी इस उम्र में जब बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने की उम्र है... तो क्या यह सब गलत नहीं है ? और राघव से क्या गलती हुई  ...! वह तो उसका  हर बात का ख्याल रखता है ! कभी कोई चीज़ की कमी नहीं होने दी। उसे काम ही इतना है कि  वह घर और उसकी तरफ ध्यान कम दे पाता है तो इसका मतलब यह थोड़ी है की वेदिका कहीं और मन लगा ले !
         वेदिका का मन थोड़ा  बैचैन होने लगा था।
  वेदिका थोड़ी बैचेन  और हैरान हो कर सोच रही थी। उसके इतने उसूलों वाले विचार  , इतनी व्यस्त जिन्दगी !जहाँ हवा भी सोच -समझ कर प्रवेश करती है वहाँ  प्रभाकर को आने की इजाजत कहाँ से मिल गयी। उसके दिल में   सेंधमारी कैसे हो गयी ?
        सहसा एक बिजली की तरह एक ख्याल दौड़ पड़ा , " अरे हाँ , दिल में सेंध मारी तो हो सकती है क्योंकि  विवाह  के बाद , जब पहली बार राघव के साथ बाईक पर बाज़ार गयी थी और सुनसान रास्ते में उसने जरा रोमांटिक जोते हुए राघव की कमर में हाथ डाला था और कैसे वह बीच राह में उखड़ कर बोल पड़ा था कि यह कोई सभ्य घरों की बहुओं के लक्षण नहीं है , हाथ पीछे की ओर झटक दिया था। बस उसे वक्त उसके दिल का जो तिकोने वाला हिस्सा होता है ... तिड़क गया ... ! वेदिका उसी रस्ते से रिसने लगी थोड़ा - थोड़ा , हर  रोज़ ...., "
          हालाँकि बाद में राघव ने मनाया भी उसे लेकिन दिल जो तिड़का उसे फिर कोई भी जोड़ने वाला सोल्युशन बना ही नहीं। वह  बेड -रूम के प्यार को प्यार नहीं मानती ! जो बाते सिर्फ शरीर को छुए लेकिन मन को नहीं वह प्यार नहीं है !
  सोचते-सोचते मन भर आया वेदिका का और सिरहाने पर सर रख सीधी लेट गयी और  दोनों हाथ गर्दन के नीचे रख कर सोचने लगी।
     " पर वेदिका तू बहुत भावुक है और यह जीवन भावुकता से नहीं चलता ...! यह प्रेम-प्यार सिर्फ किताबों में ही अच्छा लगता है.... हकीकत की पथरीली जमीन पर आकर यह टूट जाता है ...और फिर , राघव बदल तो गया है न .... जैसे तुम चाहती हो वैसा  बनता तो जा ही रहा है ...!" वेदिका के भीतर से एक वेदिका चमक सी पड़ी।
  " हाँ तो क्या हुआ ...!' का वर्षा जब कृषि सुखाने ' .....मरे , रिसते  मन पर कितनी भी फ़ुआर डालो जीवित कहाँ हो पायेगा ...!" वेदिका भी तमक गयी।
     करवट के बल लेट कर कोहनी पर चेहरा टिका कर राघव को निहारने लगी और धीरे से उसके हाथ को छूना चाहा लेकिन ऐसा कर नहीं पायी और धीर से सरका कर उसके हाथ के पास ही हाथ रख दिया। हाथ सरकने -रखने के सिलसिले में उसका हाथ राघव के हाथ को धीरे से छू गया । राघव ने झट से उसका हाथ पकड़  लिया। लेकिन वेदिका ने अपना हाथ खींच लिया  , राघव चौंक कर बोल पड़ा ,"क्या हुआ ...!"
   " कुछ नहीं आप सो जाइये ..." वेदिका ने धीरे से कहा और करवट बदल ली।
     सोचने लगी , कितना बदल गया राघव ...! याद  करते हुए उसकी आँखे भर आयी उस रात की जब उसने पास लेट कर सोये हुए राघव के गले में बाहें डाल दी थी और कैसे वह वेदिका पर भड़क उठा था , हडबड़ा  कर उठा बैठा था ...!   वेदिका को कहाँ मालूम था कि राघव को नींद में डिस्टर्ब करना पसंद नहीं ...!
        उस रात उसके 'तिड़के हुए दिल' का कोना थोडा और तिड़क गया , वह भी टेढ़ा हो कर  ...सारी रात दिल के रास्ते से वेदिका रिसती रही।
     " तो क्या हुआ वेदिका ...! हर इन्सान का अपना व्यक्तित्व होता है , सोच होती है। वह तुम्हारा पति है तो क्या हुआ ,  अपनी अलग शख्शियत तो रख सकता है। तुम्हारा कितना ख्याल भी तो  रखता है। हो सकता है उसे भी तुमसे कुछ शिकायतें हो और तुम्हें कह नहीं पाता  हो और फिर अरेंज मेरेज में ऐसा ही होता है पहले तन और फिर एक दिन मन  मिल ही जाते है।थोडा व्यावहारिक बनो ! भावुक मत बनो ...!" अंदर वाली वेदिका फिर से चमक पड़ी।
    " हाँ भई , रखता है ख्याल ...लेकिन कैसे ...! मैंने ही तो बार-बार हथोड़ा मार -मार के यह मूर्त गढ़ी है लेकिन अभी भी यह मूर्त ही है  अभी इसमें प्राण कहाँ डले  है  ...! " मुस्कुराना चाहा वेदिका ने।
    वेदिका को बहुत हैरानी होती जो इन्सान दिन के उजाले में इतना गंभीर रहता हो ,ना जाने किस बात पर नाराज़ हो जायेगा या मुँह  बना देगा ..... वही रात को बंद कमरे में इतना प्यार करने वाला उसका ख्याल रखने वाला कैसे हो सकता है।
    आज अंदर वाली वेदिका , वेदिका को सोने नहीं दे रही थी फिर से चमक उठी , " चाहे जो हो वेदिका , अब तुम उम्र के उस पड़ाव पर हो जहाँ तुम यह रिस्क नहीं ले सकती कि  जो होगा देखा जायेगा और ना ही सामाजिक परिस्थितियां ही तुम्हारे साथ है , इसलिए यह पर-पुरुष का चक्कर ठीक नहीं है। "
  " पर -पुरुष ...! कौन ' पर-पुरुष ' क्या प्रभाकर के लिए  कह रही हो यह ... लेकिन मैंने तो सिर्फ प्रेम ही किया है और जब स्त्री किसी को प्रेम करती है तो बस प्रेम ही करती है कोई वजह नहीं होती। उम्र में कितना बड़ा है ,कैसा दिखता है , बस एक अहसास की तरह है उसने मेरे मन को छुआ है ...!" वेदिका जैसे कहीं गुम  सी हुई  जा रही थी। प्रभाकर का ख्याल आते ही दिल में जैसे प्रेम संचारित हो गया हो और होठों पर मुस्कान आ गयी।
" हाँ ...! मुझे प्यार है प्रभाकर से , बस है और मैं कुछ नहीं जानना चाहती ,समझना चाहती ..., तुम चुप हो जाओ ...," वेदिका कुछ  हठी होती जा रही थी।
    " बेवकूफ मत बनो वेदिका ...! जो व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं है वो तुम्हारे प्रति कैसे वफादार हो सकता है , जो इन्सान अपने जीवन साथी के साथ इतने बरस साथ रह कर उसके प्रेम -समर्पण को झुठला सकता है और कहता है कि  उसे अपने साथी से प्रेम नहीं है वो तुम्हें क्या प्रेम करेगा ? कभी उसका प्रेम आज़मा कर तो देखना ,कैसे अजनबी बन जायेगा , कैसे उसे अपने परिवार की याद आ जाएगी ...!" वेदिका के भीतर जैसे जोर से बिजली चमक पड़ी।
      वह एक झटके से उठ कर बैठ गयी।
     " हाँ यह भी सच है ...! लेकिन ...! मैं भी तो राघव के प्रति  वफादार नहीं  हूँ  ...! फिर मुझे यह सोचना कहा शोभा देता है कि प्रभाकर ...! " वेदिका फिर से बैचेन हो उठी।
      बिस्तर से खड़ी हो गयी और खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर कोलाहल कम हो गया लेकिन अंदर का अभी जाग रहा है। आज नींद जाने कैसे कहाँ गुम हो गई ...क्या पहली बार प्रभाकर से बात करने की ख़ुशी है या एक अपराध बोध जो उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था।
   सोच रही थी क्या अब प्रभाकर का मिलना सही है या किस्मत का खेल कि यह तो होना ही था ! अगर होना था तो पहले क्यूँ ना मिले वे दोनों ....
       राघव के साथ रहते -रहते उसे उससे एक दिन प्रेम हो ही गया या समझौता है ये ...या जगह से लगाव या नियति कि  अब इस खूंटे से बन्ध  गए हैं तो बन्ध ही गए बस.....
    नींद नहीं आ रही थी तो रसोई की तरफ बढ़ गई। अनजाने में चाय की जगह कॉफ़ी बना ली। बाहर छत पर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर जब एक सिप लिया तो चौंक पड़ी यह क्या ...! उसे  तो कॉफ़ी की महक से भी परहेज़ था और आज कॉफ़ी पी रही है ...? तो क्या वेदिका बदल गयी ...! अपने उसूलों  से डिग गयी ? जो कभी नहीं किया वह आज कैसे हो हो रहा है ...!
       राघव की निश्छलता वेदिका को अंदर ही अंदर कचोट रही थी कि  वह गलत जा रही है ,जब उसे वेदिका की इस हरकत का पता चलेगा क्या वह सहन कर पायेगा या बाकी सब लोग उसे माफ़ करेंगे उसे ?
     अचानक उसे लगने लगा कि वह कटघरे में खड़ी है और सभी घर के लोग उसे घूरे  जा रहे हैं नफरत-घृणा और सवालिया नज़रों से ..., घबरा कर खड़ी हो गई वेदिका ...
      वेदिका जितना सोचती उतना ही घिरती  जा रही है ...रात तो बीत जाएगी लेकिन वेदिका की उलझन खत्म नहीं होगी। क्यूंकि यह उसकी खुद की पाली हुई उलझन है ...
     तो फिर क्या करे वेदिका ...? यह हम क्या कहें ...! उसकी अपनी जिन्दगी है चाहे बर्बाद करे या ....
रात के तीन बजने को आ रहे थे। वेदिका घड़ी  की और देख सोने का प्रयास करने लगी। नींद तो उसके आस - ही नहीं थी।
     यह जो मन है बहुत बड़ा छलिया है। एक बार फिर से उसका मन डोल गया और प्रभाकर का ख्याल आ गया। सोचने लगी क्या वह भी सो गया होगा क्या ...? वह जो उसके ख्यालों में गुम हुयी जाग रही तो क्या वह भी ...!
" खट -खट " फोन  खटखटा उठा , देखा तो प्रभाकर का ही सन्देश था। फिर क्या वह बात सही है कि मन से मन को राह होती है !  हाँ ...! शायद ....
     रात तो अपने चरम से निकल कर भोर की तरफ कदम बढ़ा रही थी लेकिन वेदिका का अंतर्द्वंद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था।
    उसका प्रभाकर के प्रति कोई  शारीरिक आकर्षण वाला प्रेम  नहीं है बल्कि प्रभाकर से बात करके  उसको एक सुरक्षा का अहसाह सा देता है। वह उसकी सारी  बात ध्यान से सुनता है और सलाह भी देता है, उसकी बातों में भी कोई लाग -लपेट नहीं दिखती उसे ,फिर क्या करे वेदिका ? यह तो एक सच्चा मित्र ही हुआ और एक सच्चे मित्र  से प्रेम भी तो हो सकता है।
     लेकिन उसका इस तरह फोन करना या मेसेज का आदान -प्रदान भी तो ठीक नहीं ...! सोचते -सोचते वेदिका मुस्कुरा पड़ी शायद उसे कोई हल मिल गया हो।
  वह सोच रही है कि फेसबुक के रिश्ते फेसबुक तक ही सीमित रहे तो बेहतर है। अब वह प्रभाकर से सिर्फ फेसबुक पर ही बात करेगी वह भी सीमित मात्रा में ही।
       नया जमाना है पुरुष मित्र बनाना कोई बुराई  नहीं है लेकिन यह मीत बनाने का चक्कर भी उसे ठीक नहीं लग रहा था। वह प्रभाकर को खोना नहीं चाहती थी।उसने तय कर लिया कि अब वह फोन पर बात या मेसेज नहीं करेगी और सोने की कोशिश करने लगी।
         सुबह देर से आँख खुली तो देखा राघव नीचे जा चुके थे।  नौ बजने वाले थे। गर्दन घुमा कर देखा  तो मुस्कुरा पड़ी। हमेशा की तरह साइड टेबल पर पानी की बोतल पड़ी थी, राघव जिसे रखना कभी नहीं भूलते। वह उठते ही थायराइड की गोली लेती है। सामने मेज़ पर रखी राघव संग अपनी तस्वीर को देख कर वह फिर से मुस्कुरा पड़ी।
         नहा कर जल्दी से नीचे गई। नाश्ते की तैयारी चल रही थी। वह सीधे पूजा घर में जा कर अपने प्रभु के आगे प्रार्थना करने लगी। हमेशा तो सबके लिए भगवान से कुछ ना कुछ मांगने की लिस्ट दे देती है ; आज अपने लिए सद्बुद्धि माँग रही थी।
           दिनचर्या से निबट कर अपना फोन लेकर बैठी तो प्रभाकर के बहुत सारे सन्देश थे। एक बार तो दिल धड़का , मुँह लाल हो गया। फिर घबराहट के मारे  मुँह सफ़ेद भी पड़ गया। अगर कोई देख लेता तो ... फोन किसी के हाथ लग जाता तो ...? एक बार फिर से कई सारे तो ने घेर लिया ..
       "क्या हुआ भाभी....!  किस सोच में हो ...तबियत तो ठीक है न , आज देर से भी उठे .थे .."
     " आ हाँ ..., कुछ नहीं , रात को देर से सोई थी !" देवरानी को तो टाल दिया।  फिर जल्दी से पढ़ते हुए सारे सन्देश मिटाये। पढ़ते हुए दिल में कुछ हो भी रहा था। कभी मीठा -सा दर्द तो कभी अपराध बोध भी ...
      सोचती जा रही थी कि कोई पुरुष इतना भी बेवफा हो सकता है ! घर में सुशिक्षित पत्नी है फिर भी किसी और की पत्नी से इश्क फ़रमा रहा है। बेवफाई की बात पर वह रुक गई क्यूंकि वह खुद भी तो ईमानदार नहीं थी।
        तभी प्रभाकर का सन्देश आ गया कि वह फोन पर बात करना चाहता है। उसने मना  कर दिया।
      " क्यों बात नहीं करना चाहती ...? "
       " क्यूंकि यही सही है ..."
    " यह तुम्हें पहले सोचना चाहिए था .."
      " अब क्या हो गया  ? "
      " अब भी कुछ नहीं हुआ , प्रभाकर जी ...."
     "हम दोनों उम्र के उस मोड़ पर हैं जहाँ पर वापसी कहीं  नहीं है सिर्फ फिसलन ही है  ...! "
     "अब तुम लेखकों वाली भाषा में बात करने लगी हो .."
    " यह आपने पहले भी बताया था कि मैं लेखकों की तरह बात करती हूँ ..."
    " हाँ यह सही है तुम्हारी भाषा बहुत समृद्ध है ..."
    " तो क्या मैं लेखन में हाथ आज़मा सकती हूँ ? "
    " क्यों नहीं ! लेकिन तुमने बात बदल दी और घुमा भी दी ..."
    " अच्छा तो प्रभाकर जी आज से आप मेरे पथप्रदर्शक होंगे , मैं कुछ भी लिखने की कोशिश करुँगी वह आप पढ़ कर राय देंगे ...,"
      " मतलब कि फ़ोन पर बात नहीं करोगी ..., "
    " जरूर करुँगी न ! लेकिन कुछ लिख कर आपसे राय लेने के लिए ! "
  " वेदिका तुम बहुत समझदार हो ... लव यू ! "
    इस लव यू पर दिल तो धड़का पर दिल के किवाड़ बंद कर लिए गए।
      उसके बाद वह छोटी-बड़ी रचनाएँ लिखने लगी। अपने पथ प्रदर्शक से राय जरूर लेती। कभी फोन पर भी बात होती थी। और आज बहुत बड़ी ख़ुशी की बात थी। उसका लिखा नॉवेल प्रेस में जा चुका था। इंतज़ार था तो उसके छप कर आने का। राघव को धीरे से छू लिया और सो गई।
   


शुक्रवार, 5 मार्च 2021

मंगनी का अखबार

मंगनी का अखबार

       बुजुर्ग  मकान मालिक के अखबार मांगने की आदत से परेशान हर्षिता अपने पति से बहस कर रही थी, " हमें यहाँ आए हुए लगभग एक साल होने को आया है , और तभी से मलिक साहब हम से अखबार माँग कर ले जाते हैं और वापस देने का नाम नहीं...! "
     " तो क्या हुआ..! शाम को ही तो ले जाते हैं.. हमारे लिए तब तक बेकार ही होते हैं न.., "
    "  अपने रुपयों से ली चीज कोई बेकार कैसे हो सकती है, अरे भई, हमारा अखबार है कुछ भी करें,अलमारी में बिछाना हो या कुछ भी करें और फिर ऐसा भी नहीं है कि उनके अखबार आता नहीं..! 
      " कोई बात नहीं हर्षिता, वो बुजुर्ग हैं, उनके बच्चे भी बाहर रहते हैं ... अखबार उनके समय काटने का साधन भी तो है! "
     वर्तालाप चल ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. देखा तो मलिक साहब खड़े थे. वे मुस्कुरा रहे थे. उनके हाथों में अखबार की जिल्द लगी दो किताबें सी थी.
      उन्होंने आगे बढ़कर किताबें मेज पर रख दी. और बोले, " ये हर्षिता बिटिया और छोटी मुनिया के लिए मेरी तरफ से उपहार है.. "
      मुनिया के सर पर हाथ फिरा कर मुस्कुराते हुए चले गए. पति- पत्नी सकपकाए से खड़े रहे कि कहीं उनकी बातें मलिक साहब ने सुन तो नहीं ली! 
       मेज पर रखी किताबें उठाई तो दोनों में अखबार से काटी गई कतरने चिपकाई हुईं थी... मुनिया की किताब में छोटे- छोटे कार्टून, सुविचार और कहानियों की कतरने थी तो हर्षिता की किताब में पाक कला, कोई व्रत, उत्सव और महिला उपयोगी लेख की कतरने चिपकाई हुईं थी.

उपासना सियाग
(अबोहर) 
नई सूरज नगरी
गली न.7
9 वां चौक
अबोहर ( पंजाब) 
पिन 152116
8264901089
Upasnasiag@gmail.com
     

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

मिली हवाओं में उड़ने की सज़ा.....(लघु कथा )

     उस  को रोज शाम को पार्क में बैठे देख ,माली से रहा नहीं गया। पूछ ही बैठा ," बाबूजी , आप कहाँ से आये हो ?आपको अकेले बैठा  ही देखता हूँ , कोई संगी - साथी भी नहीं आता है आपके पास ! शहर में नए आये हो क्या ?" 
       " हाँ माली जी  .... , कुछ दिन हुए  गाँव से आया हूँ ... काम की तलाश में " 
      " गांव में काम धंधा नहीं है क्या ?"
       " काम तो है  ; बापू की परचून  की दुकान है ,अच्छी चलती है ! लेकिन मुझे अपनी जिंदगी गाँव में नहीं गंवानी थी तो शहर चला आया। गाँव में ही रहना था तो पढाई करने का क्या फायदा  ! "
      " चलो कोई बात नहीं बाबूजी ,सबकी अपनी सोच है और अपनी जिंदगी ! " माली अपने काम लग गया।  
वह माली को काम करते देखने लगा। माली ने एक पेड़ पर चढ़ कर एक डाली काट डाली। डाली घसीटते हुए उसके आगे से ले जाने लगा तो वह पूछ बैठा , अरे माली जी , आपने हरी-भरी डाली क्यों काट दी ? "
       "अजी बाबूजी, इसका यही होना था , बहुत दिनों से पेड़ से अलग निकल कर झूल रही थी ,ज्यादा ही हवा में उड़ रही थी !" माली ने बेपरवाही से कहा और  सूखे पत्तों के ढेर पर फेंक दिया।