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शुक्रवार, 19 मार्च 2021

अंतर्द्वंद

       वेदिका ने प्रभाकर को बताया कि उसका लिखा पहला नॉवल प्रेस में जा चुका है तो  प्रभाकर ने फोन पर बधाई दी। वह बहुत खुश थी। घर में भी सभी खुश थे कि उनके परिवार में एक लेखिका भी है। वह जल्दी से सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। चढ़ते हुए उसे साल-डेढ़ साल पहले की रात याद आ गई। तब भी वह ऐसे ही खुश थी।
         दौड़ कर सीढियाँ चढ़ रही थी ।  उस की चूड़ियाँ और पायल  कुछ ज्यादा ही खनक -छमक  रहे हैं । 'कलाई भर चूड़ियाँ और बजती पायल'  परिवार की रीत है और फिर उसके पिया जी को भी खनकती चूड़ियाँ और पायल बहुत  पसंद है।
   मगर ये पायल - चूड़ियाँ  पिया के लिए  नहीं खनक रही थी ....
     छत पर पूनम का चाँद खिल रहा है।उसे छत पर से चाँद देखना नहीं पसंद । उसे तो अपने कमरे की खिड़की से ही चाँद देखना पसंद है , उसे लगता है कि खिड़की वाला चाँद ही उसका है .....छत वाला चाँद तो सारी  दुनिया का है।
        कमरे में जाते ही देखा राघव तो सो गए हैं। थोडा मायूस हुई वेदिका , उसे इस बात से सख्त चिढ थी कि  जब वह कमरे में आये और राघव सोया हुआ मिले। राघव से बतियाने का उसे रात को ही समय मिलता था।  दिन भर तो दोनों ही अपने-अपने काम  , जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं।
       लेकिन अब वह तो सो गया था।अक्सर ही ऐसा होता है !
     थोड़ी दूर रखी कुर्सी पर वह बैठ खिड़की में से झांकता चाँद निहारती रही।  सोये राघव को निहारती सोच रही थी कि कितना भोला सा मासूम सा लग रहा है ...एकदम प्यारे से बच्चे जैसा निश्छल सा ... और है भी वैसा ही ... ! वेदिका का मन किया झुक कर राघव का माथा चूम ले , हाथ भी बढाया लेकिन रुक गयी।
          संयुक्त परिवार में वेदिका सबसे बड़ी बहू है।राघव के दो छोटे भाई और भी है। सभी अपने परिवारों सहित साथ ही रहते है। राघव के माँ-बाबा भी अभी ज्यादा बुजुर्ग नहीं है।
        बहुत बड़ा घर है . जिसमे से तीसरी मंजिल पर  कमरा वेदिका का है। साथ ही में एक छोटी सी रसोई है। रात को या सुबह जल्दी चाय-कॉफ़ी बनानी हो तो नीचे नहीं जाना पड़ता। बड़ी बहू  है सो  घरेलू काम  तो नहीं है पर जिम्मेदारी तो है ही।
             पिछले बाईस बरसों से उसकी आदत है कि सभी बच्चों को एक नज़र देख कर संभाल कर , हर एक के कमरे में झांकती किसी को बतियाती तो किसी बच्चे की कोई समस्या हल करती हुई  ही अपने कमरे में जाती है। वह केवल अपने बच्चों का ही ख्याल नहीं रखती बल्कि सभी बच्चों का ख्याल रखती है। ऐसा आज भी हुआ  और आदत के मुताबिक राघव सोया हुआ मिला।
       राघव की आदत है बहुत जल्द नीद के आगोश में गुम  हो जाना। वेदिका ऐसा नहीं कर पाती वह रात को बिस्तर पर लेट कर सारे  दिन का लेखा  -जोखा करके ही सो  पाती है।
         लेकिन आज वेदिका का मन कही और ही उड़ान  भर रहा था।वह धीरे से उठकर खिड़की के पास आ गयी। बाहर अभी शहर भी नहीं सोया था। लाइटें कुछ ज्यादा ही चमक रही थी। कुछ तो शादियाँ ही बहुत थी इन दिनों ....   तेज़ संगीत का थोड़ा कोलाहल भी था .....  शायद नाच-गाना चल रहा है ।
            उसकी नज़र चाँद पर टिक गयी। देख कर ख़ुशी थोड़ी और बढ़ गयी जो कि राघव को सोये हुए देख कर कम हो गयी थी। सहसा उसे चाँद में प्रभाकर का चेहरा नज़र आने लगा था । खिड़की वाला चाँद तो उसे सदा ही अपना लगा था  लेकिन इतना अपनापन भी देगा उसने सोचा ना था।
    तभी अचानक एक तेज़ संगीत की लहरी कानो में टकराई। एक बार वह खिड़की बंद करने को हुई मगर गीत की पंक्तियाँ सुन कर मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी। आज-कल उसे ऐसा क्यूँ लगने लगा है कि हर गीत ,हर बात  बस उसी पर लागू हो रही है। वह गीत सुन रही थी और उसका भी गाने को मन हो गया ...," जमाना कहे लत ये गलत लग गयी , मुझे तो तेरी लत लग गयी ...!"
    अब वेदिका को ग्लानि  तो होनी चाहिए , कहाँ भजन सुनने वाली उम्र में ये भोंडे गीत सुन कर मुस्कुरा रही है।लेकिन उसका मन तो आज-कल एक ही नाम गुनगुनाता है , ' प्रभाकर '
        वेदिका इतनी व्यस्त रहती है और घर से कम ही निकलती है , कहीं जाना हो तो पूरा परिवार साथ ही होता है तो यह प्रभाकर कौन है ...?
         तो क्या वह उसका कोई पुराना ...?
     अजी नहीं ...! आज कल एक चोर दरवाज़ा घर में ही घुस आया है। कम्प्यूटर  -इंटरनेट के माध्यम से ...!
नयी -नयी टेक्नोलोजी सीखने का बहुत शौक है वेदिका को इंटरनेट पर बहुत कुछ जानकारी लेती रहती है। उसे  बच्चों के पास बैठना बहुत भाता है  तो  उनसे ही कम्प्यूटर चलाना सीख लिया । ऐसे ही एक दिन फेसबुक पर भी आ गयी।
    फेसबुक की दुनिया भी क्या दुनिया है ...अलग ही रंग -रूप .... एक बार घुस जाओ तो बस परीलोक का ही आभास देता है ! ऐसा ही कुछ वेदिका को भी महसूस हुआ।
         सभी जान -पहचान के लोगों में एक अनजान व्यक्ति की फ्रेंड -रिक्वेस्ट देख कर वह चौंक पड़ी थी। फिर उसके प्रोफ़ाइल को अच्छी से जाँच परख कर और थोड़ी बहुत फेस-रीडिंग कर के मित्रता स्वीकार कर ली। प्रभाकर ने मित्रता होते ही चैट शुरू कर दी।
        पहले-पहल तो वह झिझकी कि वह एक अनजान व्यक्ति से क्यों बात कर रही है ! लेकिन उसकी बातें और सुझाव कभी उसकी तारीफ में कहे गए वाक्य उसे प्रभावित करते गए। एक दिन तो प्रभाकर ने उसे मेहँदी हसन की गजल का लिंक ही भेज दिया।
     ग़ज़ल थी, " ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,मैं तो  मेरी जान मर के भी तुझे चाहूंगा ....." वह चकित सी रह गई। दिल की धड़कनों कुछ अजीब सी हलचल महसूस करने लगी। झट से कम्प्यूटर बंद किया और आईने के सामने खड़ी हो गई। आईने में तो कोई और ही वेदिका थी। दिल के धड़कने का उस वेदिका को क्या ! ढलती उम्र के पायदान पर खड़ी वेदिका को यूँ दिल नहीं धड़काना था !
         सोच में डूब गई। फिर कम्प्यूटर ऑन किया , फेसबुक लॉगिन किया और प्रभाकर को सन्देश भेजा , " सुंदर ग़ज़ल ! "
   " थैंक्स ! " प्रभाकर का दिल की इमोजी के साथ जवाब आया।
   उसके बाद वार्तालाप का सिलसिला तो चला ही साथ ही वेदिका का खुद पर ध्यान रखने की कवायद भी शुरू हो गई। आँखों की चमक बढ़ गई। अपनी सेहत का ख्याल भी रखने लगी।
   ना जाने कब वह प्रभाकर को मित्र से मीत समझने लगी। और आज खुश भी इसीलिए है कि ...,
" खट -खट " आईने के आगे रखा मोबाईल खटखटा उठा था। वेदिका ने उठाया तो प्रभाकर का सन्देश था। शुभरात्रि कहने के साथ ही बहुत सुंदर मनभाता कोई शेर लिखा था। देख कर उसकी आखों की चमक बढ़ गयी। तो यही था आज वेदिका की ख़ुशी का राज़ ...पिछले एक साल से प्रभाकर से चेटिंग से बात हो रही थी आज उसने फोन पर भी बात कर ली। और अब यह सन्देश भी आ गया....
     वह  नाईट -सूट पहन अपने बिस्तर पर आ बैठी।  राघव को निहारने लगी और सोचने लगी कि  यह जो कुछ भी उसके अंतर्मन में चल रहा है क्या वह ठीक है ?
         यह प्रेम-प्यार का चक्कर ...! क्या है यह सब ...? वह भी इस उम्र में जब बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने की उम्र है... तो क्या यह सब गलत नहीं है ? और राघव से क्या गलती हुई  ...! वह तो उसका  हर बात का ख्याल रखता है ! कभी कोई चीज़ की कमी नहीं होने दी। उसे काम ही इतना है कि  वह घर और उसकी तरफ ध्यान कम दे पाता है तो इसका मतलब यह थोड़ी है की वेदिका कहीं और मन लगा ले !
         वेदिका का मन थोड़ा  बैचैन होने लगा था।
  वेदिका थोड़ी बैचेन  और हैरान हो कर सोच रही थी। उसके इतने उसूलों वाले विचार  , इतनी व्यस्त जिन्दगी !जहाँ हवा भी सोच -समझ कर प्रवेश करती है वहाँ  प्रभाकर को आने की इजाजत कहाँ से मिल गयी। उसके दिल में   सेंधमारी कैसे हो गयी ?
        सहसा एक बिजली की तरह एक ख्याल दौड़ पड़ा , " अरे हाँ , दिल में सेंध मारी तो हो सकती है क्योंकि  विवाह  के बाद , जब पहली बार राघव के साथ बाईक पर बाज़ार गयी थी और सुनसान रास्ते में उसने जरा रोमांटिक जोते हुए राघव की कमर में हाथ डाला था और कैसे वह बीच राह में उखड़ कर बोल पड़ा था कि यह कोई सभ्य घरों की बहुओं के लक्षण नहीं है , हाथ पीछे की ओर झटक दिया था। बस उसे वक्त उसके दिल का जो तिकोने वाला हिस्सा होता है ... तिड़क गया ... ! वेदिका उसी रस्ते से रिसने लगी थोड़ा - थोड़ा , हर  रोज़ ...., "
          हालाँकि बाद में राघव ने मनाया भी उसे लेकिन दिल जो तिड़का उसे फिर कोई भी जोड़ने वाला सोल्युशन बना ही नहीं। वह  बेड -रूम के प्यार को प्यार नहीं मानती ! जो बाते सिर्फ शरीर को छुए लेकिन मन को नहीं वह प्यार नहीं है !
  सोचते-सोचते मन भर आया वेदिका का और सिरहाने पर सर रख सीधी लेट गयी और  दोनों हाथ गर्दन के नीचे रख कर सोचने लगी।
     " पर वेदिका तू बहुत भावुक है और यह जीवन भावुकता से नहीं चलता ...! यह प्रेम-प्यार सिर्फ किताबों में ही अच्छा लगता है.... हकीकत की पथरीली जमीन पर आकर यह टूट जाता है ...और फिर , राघव बदल तो गया है न .... जैसे तुम चाहती हो वैसा  बनता तो जा ही रहा है ...!" वेदिका के भीतर से एक वेदिका चमक सी पड़ी।
  " हाँ तो क्या हुआ ...!' का वर्षा जब कृषि सुखाने ' .....मरे , रिसते  मन पर कितनी भी फ़ुआर डालो जीवित कहाँ हो पायेगा ...!" वेदिका भी तमक गयी।
     करवट के बल लेट कर कोहनी पर चेहरा टिका कर राघव को निहारने लगी और धीरे से उसके हाथ को छूना चाहा लेकिन ऐसा कर नहीं पायी और धीर से सरका कर उसके हाथ के पास ही हाथ रख दिया। हाथ सरकने -रखने के सिलसिले में उसका हाथ राघव के हाथ को धीरे से छू गया । राघव ने झट से उसका हाथ पकड़  लिया। लेकिन वेदिका ने अपना हाथ खींच लिया  , राघव चौंक कर बोल पड़ा ,"क्या हुआ ...!"
   " कुछ नहीं आप सो जाइये ..." वेदिका ने धीरे से कहा और करवट बदल ली।
     सोचने लगी , कितना बदल गया राघव ...! याद  करते हुए उसकी आँखे भर आयी उस रात की जब उसने पास लेट कर सोये हुए राघव के गले में बाहें डाल दी थी और कैसे वह वेदिका पर भड़क उठा था , हडबड़ा  कर उठा बैठा था ...!   वेदिका को कहाँ मालूम था कि राघव को नींद में डिस्टर्ब करना पसंद नहीं ...!
        उस रात उसके 'तिड़के हुए दिल' का कोना थोडा और तिड़क गया , वह भी टेढ़ा हो कर  ...सारी रात दिल के रास्ते से वेदिका रिसती रही।
     " तो क्या हुआ वेदिका ...! हर इन्सान का अपना व्यक्तित्व होता है , सोच होती है। वह तुम्हारा पति है तो क्या हुआ ,  अपनी अलग शख्शियत तो रख सकता है। तुम्हारा कितना ख्याल भी तो  रखता है। हो सकता है उसे भी तुमसे कुछ शिकायतें हो और तुम्हें कह नहीं पाता  हो और फिर अरेंज मेरेज में ऐसा ही होता है पहले तन और फिर एक दिन मन  मिल ही जाते है।थोडा व्यावहारिक बनो ! भावुक मत बनो ...!" अंदर वाली वेदिका फिर से चमक पड़ी।
    " हाँ भई , रखता है ख्याल ...लेकिन कैसे ...! मैंने ही तो बार-बार हथोड़ा मार -मार के यह मूर्त गढ़ी है लेकिन अभी भी यह मूर्त ही है  अभी इसमें प्राण कहाँ डले  है  ...! " मुस्कुराना चाहा वेदिका ने।
    वेदिका को बहुत हैरानी होती जो इन्सान दिन के उजाले में इतना गंभीर रहता हो ,ना जाने किस बात पर नाराज़ हो जायेगा या मुँह  बना देगा ..... वही रात को बंद कमरे में इतना प्यार करने वाला उसका ख्याल रखने वाला कैसे हो सकता है।
    आज अंदर वाली वेदिका , वेदिका को सोने नहीं दे रही थी फिर से चमक उठी , " चाहे जो हो वेदिका , अब तुम उम्र के उस पड़ाव पर हो जहाँ तुम यह रिस्क नहीं ले सकती कि  जो होगा देखा जायेगा और ना ही सामाजिक परिस्थितियां ही तुम्हारे साथ है , इसलिए यह पर-पुरुष का चक्कर ठीक नहीं है। "
  " पर -पुरुष ...! कौन ' पर-पुरुष ' क्या प्रभाकर के लिए  कह रही हो यह ... लेकिन मैंने तो सिर्फ प्रेम ही किया है और जब स्त्री किसी को प्रेम करती है तो बस प्रेम ही करती है कोई वजह नहीं होती। उम्र में कितना बड़ा है ,कैसा दिखता है , बस एक अहसास की तरह है उसने मेरे मन को छुआ है ...!" वेदिका जैसे कहीं गुम  सी हुई  जा रही थी। प्रभाकर का ख्याल आते ही दिल में जैसे प्रेम संचारित हो गया हो और होठों पर मुस्कान आ गयी।
" हाँ ...! मुझे प्यार है प्रभाकर से , बस है और मैं कुछ नहीं जानना चाहती ,समझना चाहती ..., तुम चुप हो जाओ ...," वेदिका कुछ  हठी होती जा रही थी।
    " बेवकूफ मत बनो वेदिका ...! जो व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं है वो तुम्हारे प्रति कैसे वफादार हो सकता है , जो इन्सान अपने जीवन साथी के साथ इतने बरस साथ रह कर उसके प्रेम -समर्पण को झुठला सकता है और कहता है कि  उसे अपने साथी से प्रेम नहीं है वो तुम्हें क्या प्रेम करेगा ? कभी उसका प्रेम आज़मा कर तो देखना ,कैसे अजनबी बन जायेगा , कैसे उसे अपने परिवार की याद आ जाएगी ...!" वेदिका के भीतर जैसे जोर से बिजली चमक पड़ी।
      वह एक झटके से उठ कर बैठ गयी।
     " हाँ यह भी सच है ...! लेकिन ...! मैं भी तो राघव के प्रति  वफादार नहीं  हूँ  ...! फिर मुझे यह सोचना कहा शोभा देता है कि प्रभाकर ...! " वेदिका फिर से बैचेन हो उठी।
      बिस्तर से खड़ी हो गयी और खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर कोलाहल कम हो गया लेकिन अंदर का अभी जाग रहा है। आज नींद जाने कैसे कहाँ गुम हो गई ...क्या पहली बार प्रभाकर से बात करने की ख़ुशी है या एक अपराध बोध जो उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था।
   सोच रही थी क्या अब प्रभाकर का मिलना सही है या किस्मत का खेल कि यह तो होना ही था ! अगर होना था तो पहले क्यूँ ना मिले वे दोनों ....
       राघव के साथ रहते -रहते उसे उससे एक दिन प्रेम हो ही गया या समझौता है ये ...या जगह से लगाव या नियति कि  अब इस खूंटे से बन्ध  गए हैं तो बन्ध ही गए बस.....
    नींद नहीं आ रही थी तो रसोई की तरफ बढ़ गई। अनजाने में चाय की जगह कॉफ़ी बना ली। बाहर छत पर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर जब एक सिप लिया तो चौंक पड़ी यह क्या ...! उसे  तो कॉफ़ी की महक से भी परहेज़ था और आज कॉफ़ी पी रही है ...? तो क्या वेदिका बदल गयी ...! अपने उसूलों  से डिग गयी ? जो कभी नहीं किया वह आज कैसे हो हो रहा है ...!
       राघव की निश्छलता वेदिका को अंदर ही अंदर कचोट रही थी कि  वह गलत जा रही है ,जब उसे वेदिका की इस हरकत का पता चलेगा क्या वह सहन कर पायेगा या बाकी सब लोग उसे माफ़ करेंगे उसे ?
     अचानक उसे लगने लगा कि वह कटघरे में खड़ी है और सभी घर के लोग उसे घूरे  जा रहे हैं नफरत-घृणा और सवालिया नज़रों से ..., घबरा कर खड़ी हो गई वेदिका ...
      वेदिका जितना सोचती उतना ही घिरती  जा रही है ...रात तो बीत जाएगी लेकिन वेदिका की उलझन खत्म नहीं होगी। क्यूंकि यह उसकी खुद की पाली हुई उलझन है ...
     तो फिर क्या करे वेदिका ...? यह हम क्या कहें ...! उसकी अपनी जिन्दगी है चाहे बर्बाद करे या ....
रात के तीन बजने को आ रहे थे। वेदिका घड़ी  की और देख सोने का प्रयास करने लगी। नींद तो उसके आस - ही नहीं थी।
     यह जो मन है बहुत बड़ा छलिया है। एक बार फिर से उसका मन डोल गया और प्रभाकर का ख्याल आ गया। सोचने लगी क्या वह भी सो गया होगा क्या ...? वह जो उसके ख्यालों में गुम हुयी जाग रही तो क्या वह भी ...!
" खट -खट " फोन  खटखटा उठा , देखा तो प्रभाकर का ही सन्देश था। फिर क्या वह बात सही है कि मन से मन को राह होती है !  हाँ ...! शायद ....
     रात तो अपने चरम से निकल कर भोर की तरफ कदम बढ़ा रही थी लेकिन वेदिका का अंतर्द्वंद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था।
    उसका प्रभाकर के प्रति कोई  शारीरिक आकर्षण वाला प्रेम  नहीं है बल्कि प्रभाकर से बात करके  उसको एक सुरक्षा का अहसाह सा देता है। वह उसकी सारी  बात ध्यान से सुनता है और सलाह भी देता है, उसकी बातों में भी कोई लाग -लपेट नहीं दिखती उसे ,फिर क्या करे वेदिका ? यह तो एक सच्चा मित्र ही हुआ और एक सच्चे मित्र  से प्रेम भी तो हो सकता है।
     लेकिन उसका इस तरह फोन करना या मेसेज का आदान -प्रदान भी तो ठीक नहीं ...! सोचते -सोचते वेदिका मुस्कुरा पड़ी शायद उसे कोई हल मिल गया हो।
  वह सोच रही है कि फेसबुक के रिश्ते फेसबुक तक ही सीमित रहे तो बेहतर है। अब वह प्रभाकर से सिर्फ फेसबुक पर ही बात करेगी वह भी सीमित मात्रा में ही।
       नया जमाना है पुरुष मित्र बनाना कोई बुराई  नहीं है लेकिन यह मीत बनाने का चक्कर भी उसे ठीक नहीं लग रहा था। वह प्रभाकर को खोना नहीं चाहती थी।उसने तय कर लिया कि अब वह फोन पर बात या मेसेज नहीं करेगी और सोने की कोशिश करने लगी।
         सुबह देर से आँख खुली तो देखा राघव नीचे जा चुके थे।  नौ बजने वाले थे। गर्दन घुमा कर देखा  तो मुस्कुरा पड़ी। हमेशा की तरह साइड टेबल पर पानी की बोतल पड़ी थी, राघव जिसे रखना कभी नहीं भूलते। वह उठते ही थायराइड की गोली लेती है। सामने मेज़ पर रखी राघव संग अपनी तस्वीर को देख कर वह फिर से मुस्कुरा पड़ी।
         नहा कर जल्दी से नीचे गई। नाश्ते की तैयारी चल रही थी। वह सीधे पूजा घर में जा कर अपने प्रभु के आगे प्रार्थना करने लगी। हमेशा तो सबके लिए भगवान से कुछ ना कुछ मांगने की लिस्ट दे देती है ; आज अपने लिए सद्बुद्धि माँग रही थी।
           दिनचर्या से निबट कर अपना फोन लेकर बैठी तो प्रभाकर के बहुत सारे सन्देश थे। एक बार तो दिल धड़का , मुँह लाल हो गया। फिर घबराहट के मारे  मुँह सफ़ेद भी पड़ गया। अगर कोई देख लेता तो ... फोन किसी के हाथ लग जाता तो ...? एक बार फिर से कई सारे तो ने घेर लिया ..
       "क्या हुआ भाभी....!  किस सोच में हो ...तबियत तो ठीक है न , आज देर से भी उठे .थे .."
     " आ हाँ ..., कुछ नहीं , रात को देर से सोई थी !" देवरानी को तो टाल दिया।  फिर जल्दी से पढ़ते हुए सारे सन्देश मिटाये। पढ़ते हुए दिल में कुछ हो भी रहा था। कभी मीठा -सा दर्द तो कभी अपराध बोध भी ...
      सोचती जा रही थी कि कोई पुरुष इतना भी बेवफा हो सकता है ! घर में सुशिक्षित पत्नी है फिर भी किसी और की पत्नी से इश्क फ़रमा रहा है। बेवफाई की बात पर वह रुक गई क्यूंकि वह खुद भी तो ईमानदार नहीं थी।
        तभी प्रभाकर का सन्देश आ गया कि वह फोन पर बात करना चाहता है। उसने मना  कर दिया।
      " क्यों बात नहीं करना चाहती ...? "
       " क्यूंकि यही सही है ..."
    " यह तुम्हें पहले सोचना चाहिए था .."
      " अब क्या हो गया  ? "
      " अब भी कुछ नहीं हुआ , प्रभाकर जी ...."
     "हम दोनों उम्र के उस मोड़ पर हैं जहाँ पर वापसी कहीं  नहीं है सिर्फ फिसलन ही है  ...! "
     "अब तुम लेखकों वाली भाषा में बात करने लगी हो .."
    " यह आपने पहले भी बताया था कि मैं लेखकों की तरह बात करती हूँ ..."
    " हाँ यह सही है तुम्हारी भाषा बहुत समृद्ध है ..."
    " तो क्या मैं लेखन में हाथ आज़मा सकती हूँ ? "
    " क्यों नहीं ! लेकिन तुमने बात बदल दी और घुमा भी दी ..."
    " अच्छा तो प्रभाकर जी आज से आप मेरे पथप्रदर्शक होंगे , मैं कुछ भी लिखने की कोशिश करुँगी वह आप पढ़ कर राय देंगे ...,"
      " मतलब कि फ़ोन पर बात नहीं करोगी ..., "
    " जरूर करुँगी न ! लेकिन कुछ लिख कर आपसे राय लेने के लिए ! "
  " वेदिका तुम बहुत समझदार हो ... लव यू ! "
    इस लव यू पर दिल तो धड़का पर दिल के किवाड़ बंद कर लिए गए।
      उसके बाद वह छोटी-बड़ी रचनाएँ लिखने लगी। अपने पथ प्रदर्शक से राय जरूर लेती। कभी फोन पर भी बात होती थी। और आज बहुत बड़ी ख़ुशी की बात थी। उसका लिखा नॉवेल प्रेस में जा चुका था। इंतज़ार था तो उसके छप कर आने का। राघव को धीरे से छू लिया और सो गई।
   


शुक्रवार, 5 मार्च 2021

मंगनी का अखबार



       बुजुर्ग  मकान मालिक के अखबार मांगने की आदत से परेशान हर्षिता अपने पति से बहस कर रही थी, " हमें यहाँ आए हुए लगभग एक साल होने को आया है , और तभी से मलिक साहब हम से अखबार माँग कर ले जाते हैं और वापस देने का नाम नहीं...! "
     " तो क्या हुआ..! शाम को ही तो ले जाते हैं.. हमारे लिए तब तक बेकार ही होते हैं न.., "
    "  अपने रुपयों से ली चीज कोई बेकार कैसे हो सकती है, अरे भई, हमारा अखबार है कुछ भी करें,अलमारी में बिछाना हो या कुछ भी करें और फिर ऐसा भी नहीं है कि उनके अखबार आता नहीं..! 
      " कोई बात नहीं हर्षिता, वो बुजुर्ग हैं, उनके बच्चे भी बाहर रहते हैं ... अखबार उनके समय काटने का साधन भी तो है! "
     वर्तालाप चल ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई. देखा तो मलिक साहब खड़े थे. वे मुस्कुरा रहे थे. उनके हाथों में अखबार की जिल्द लगी दो किताबें सी थी.
      उन्होंने आगे बढ़कर किताबें मेज पर रख दी. और बोले, " ये हर्षिता बिटिया और छोटी मुनिया के लिए मेरी तरफ से उपहार है.. "
      मुनिया के सर पर हाथ फिरा कर मुस्कुराते हुए चले गए. पति- पत्नी सकपकाए से खड़े रहे कि कहीं उनकी बातें मलिक साहब ने सुन तो नहीं ली! 
       मेज पर रखी किताबें उठाई तो दोनों में अखबार से काटी गई कतरने चिपकाई हुईं थी... मुनिया की किताब में छोटे- छोटे कार्टून, सुविचार और कहानियों की कतरने थी तो हर्षिता की किताब में पाक कला, कोई व्रत, उत्सव और महिला उपयोगी लेख की कतरने चिपकाई हुईं थी.

उपासना सियाग
(अबोहर) 
     

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

मिली हवाओं में उड़ने की सज़ा.....(लघु कथा )

     उस  को रोज शाम को पार्क में बैठे देख ,माली से रहा नहीं गया। पूछ ही बैठा ," बाबूजी , आप कहाँ से आये हो ?आपको अकेले बैठा  ही देखता हूँ , कोई संगी - साथी भी नहीं आता है आपके पास ! शहर में नए आये हो क्या ?" 
       " हाँ माली जी  .... , कुछ दिन हुए  गाँव से आया हूँ ... काम की तलाश में " 
      " गांव में काम धंधा नहीं है क्या ?"
       " काम तो है  ; बापू की परचून  की दुकान है ,अच्छी चलती है ! लेकिन मुझे अपनी जिंदगी गाँव में नहीं गंवानी थी तो शहर चला आया। गाँव में ही रहना था तो पढाई करने का क्या फायदा  ! "
      " चलो कोई बात नहीं बाबूजी ,सबकी अपनी सोच है और अपनी जिंदगी ! " माली अपने काम लग गया।  
वह माली को काम करते देखने लगा। माली ने एक पेड़ पर चढ़ कर एक डाली काट डाली। डाली घसीटते हुए उसके आगे से ले जाने लगा तो वह पूछ बैठा , अरे माली जी , आपने हरी-भरी डाली क्यों काट दी ? "
       "अजी बाबूजी, इसका यही होना था , बहुत दिनों से पेड़ से अलग निकल कर झूल रही थी ,ज्यादा ही हवा में उड़ रही थी !" माली ने बेपरवाही से कहा और  सूखे पत्तों के ढेर पर फेंक दिया। 


      

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

पारुल

       स्कूल से निकलते हुए पारुल सोच रही थी कि घर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो जायेगा। उसके स्कूल में आज से एक्स्ट्रा क्लास थी। वह अपने गांव के पास के कस्बेनुमा शहर के स्कूल में बारहवीं कक्षा की छात्रा है। शिक्षकों पर दिवाली से पहले कोर्स समाप्त करने का दवाब होता है। उसके बाद प्री -बोर्ड की परीक्षा की तैयारी भी तो होती है। इसलिए स्कूल की छुट्टी के बाद दो घंटे एक्स्ट्रा क्लास लेना तय हुआ है।
           " यह तो रोज की बात हो जाएगी ! " वह बुदबुदाई।
     गाँव पहुँचने से पहले थोड़ा सा जंगल और फिर खेतों से हो कर गुजरना पड़ता है। रोज तो चार बजे तक घर लौट आती है   तो खेतों में काम करने वाले होते हैं , साथ में और सहेलियां भी साथ होती है । ऐसे में उसका रास्ता भी अच्छे से गुजर जाता है। कोई डर की बात नहीं होती है।
           शाम के छह बजने वाले थे। राम-राम करके जंगल तो पार कर लिया। अँधेरा बढ़ने लगा था। तभी उसके आगे से कोई जानवर भागते हुए निकल गया। कोई जंगली कुत्ता था या  फिर कोई  भेड़िया था। वह जोर से चिल्ला पड़ी। साईकल से  गिरते-गिरते बची !
        " हे कृष्ण भगवान , रक्षा करो ...." मन ही मन भगवान को पुकारा।
          " अरे कौन है वहाँ ?  "  उसकी चिल्लाहट सुन कर एक व्यक्ति चिल्लाया ,दौड़ते हुए उसके पास आया।
  अजनबी को देख कर वह और भी डर गई। वह खेत में काम करने वाला हट्टा -कट्टा मजदूर दिखने वाला व्यक्ति था। वह चुप  साईकल ले कर चलने लगी।
            "यह हमारे गाँव का तो नहीं है !" दिमाग में एक साथ बहुत सारे विचार दौड़ गए , कुछ सोच कर सहम गई।             
             हाँ तो छोरी ! तू कौन है .. कहाँ से आई है ... किधर जा रही है ? "
              " वो भाई जी , मैं स्कूल से आ रही हूँ .... " सारी  बात बता दी।
            " अच्छा तो यह बात है ! फिर तू ऐसा कर अपने बापू या भाई को बोल दे , जो रोज शाम को तुझे यहाँ लेने आ जाये ! यह जंगल है, यहाँ चार पैरों वाले भेड़ियों से ज्यादा दो पैर वाले भेड़िये भी खतरनाक हो सकते हैं ! "
          " मेरे बापू और भाई नहीं है , सिर्फ माँ ही है ! "
       " अरे , ओह्हो ! " वह कुछ बोल नहीं पाया।  उसके साथ ही चलता रहा।  थोड़ी देर में गाँव की सीमा आ गई।
         माँ दरवाजे पर ही खड़ी थी। पारुल को आते देख कर साँस में साँस आई।  पारुल के देर से आने का कारण माँ को तो मालूम ही था।
         रात को सोते समय  सारे दिन के विवरण के साथ उसने अजनबी के बारे में भी बताया। माँ सोच में पड़ गई।  बोली , उसकी बात तो सही है। आज कल किसका भरोसा है ! मैं तो मेरी माँ की बताई एक ही बात जानती हूँ और गाँठ भी बाँध रखी है कि अपनी सावधानी को कोई नहीं भेद सकता ! "
     " हाँ माँ ! मैंने भी यही बात गाँठ बांध ली है .... " खिलखिला कर हंस पड़ी।
    " अब तो श्री कृष्ण भगवान का ही सहारा है ... हे प्रभु रक्षा करना इस बिन बाप की बेटी की  , अब तू ही भाई है इसका ...." प्रार्थना करते हुए गला भर आया , दो बून्द आँसू ढलक पड़े आँखों के कोनों  से।
        " हाँ माँ , उसका ही तो सहारा है .... चलो अब सो जाओ , मुझे चार बजे उठा देना ...."  सहसा  वातावरण सुगंधित धूप -इत्र की महक से महक उठा। माँ-बेटी नींद के आगोश में समा गई।
        सुबह चार बजे पारुल को जगा कर माँ भी अपने काम में लग गई। दो गाय और एक भैंस थी। जिनके दूध से माँ बेटी का गुजर बसर होता था। थोड़ी जमीन भी थी जो कि उसके ताऊ जी सँभालते थे। उसकी कमाई रो पीट कर ही पूरी मिलती। कभी माँ शिकायत करती तो घुड़क दिया जाता , पारुल की शादी भी तो वही करेंगे !
         इस बात पर वह दब जाती कि  जेठ से बिगाड़ करेगी तो बेटी को ब्याहने में कौन सहायता करेगा। पारुल माँ को समझाती थी।  वह  पढ़-लिख कर बहुत काबिल बनेगी। शादी की जरूरत कोई ही नहीं है। माँ उसकी बातों से परेशान हो जाती  और समझाती कि शादी समाज का नियम है और उसकी जिम्मेदारी भी। फिर लोग क्या कहेंगे ! बाप है नहीं , बेटी को बिगाड़ दिया ! पारुल भी नाराज़ हो जाती। कहती कि हमारी परेशानी  और ताऊजी की ना-इन्साफी तो लोगों को दिखती नहीं ?
           माँ  पारुल के लिए सद्बुद्धि मांगती हुयी अपने काम में जुट जाती।
          दरवाजे के पास साईकिल की घंटियों की आवाज़ सुनते ही वह बस्ता साईकिल पर टाँग कर अन्य सहेलियों के साथ हो ली।
  " कल शाम को मुझे बहुत देर हो गई थी , अँधेरा घिर आया था ...." पारुल ने कहा।
" हाँ, हम्म्म ...., क्या किया जा सकता है... हम भी तो बिना काम नहीं रुक सकते ! " एक लड़की ने कहा।
" तू सर से क्लास जल्दी ख़त्म कर देने के लिए नहीं कह सकती क्या , गाँव जाना होता है ! "
" कहा था ... लेकिन ..."
" कोई बात नहीं पारुल बीस दिन की ही तो बात है , फिर तो हम सब साथ ही आएँगी।
     खेत और जंगल पार करने में और उसके बाद स्कूल की दूरी छह किलोमीटर थी। सहेलियों के समूह में साथ आने में कोई डर भी नहीं था। बीस दिन तो यूँ ही निकल जायेंगे।
शाम को वही समय हो गया। डरते-सहमते जंगल पार किया ही था कि सामने वही व्यक्ति खेत में काम करते दिखा तो उसे हौसला मिला। संयत हो कर साईकिल चला ने लगी।
" ए छोरी ! आज तू फेर देर से आई है ? "
" हाँ , भाई जी ... प्रणाम "
"प्रणाम बाई ! सुबह तो और छोरियां भी थी तेरे साथ , कहाँ गई वो सारी ? '
" मेरे पास विज्ञान विषय है इसलिये हमारे अध्यापक जी अलग से क्लास लगाते हैं ... स्कूल की छुट्टी पहले हो जाती है तो मेरे लिये दो घंटे के लिए कौन रुके...मुझे तो बीस दिन तक अकेले ही आना होगा ! "
" अच्छा ! चल कोई ना ! मैं हूँ ना यहाँ ... मैं तुझे गाँव तक छोड़ आया करूँगा। "
पारुल ने गर्दन हिला कर हामी भरी।
माँ हमेशा की तरह दरवाजे पर खड़ी मिली। उसने माँ को अजनबी के बारे में बताया। माँ ने सावधान किया। अनजान लोगों से दूर ही रहना चाहिए।
अगले दिन फिर वही दिनचर्या रही। शाम को जंगल पार करते ही वह अजनबी मिल गया।
" प्रणाम भाई जी ! " माँ के सावधान करने के बावजूद उसने कह ही दिया।
" प्रणाम बाई ! आज का दिन कैसा रहा। "
" अच्छा रहा ..."
" भाई जी आपका नाम क्या है ? "
" मेरा नाम है चतुर्भुज ... "
" आप हमारे गाँव के तो नहीं लगते ...." अजनबी से खुलना तो नहीं चाह रही थी फिर भी पूछ बैठी।
" मैं बाहर गाँव का हूँ , ब्रह्मदत्त चौधरी ने खेतों की चौकीदारी के लिए मुझे रखा है।
वह साईकिल चलाती अपने गाँव की सीमा पर पहुंची तो वह भी मुड़ गया। पारुल ने अचानक साईकिल रोक कर पीछे मुड़ कर देखा तो वह जा रहा था। वातावरण सुगंधित धूप से महक रहा था। वह चकित थी कि यह खुशबू कहाँ से आ रही है। फिर सोचा कि पास ही मन्दिर है। संध्या वंदन का समय था तो हो सकता है ये महक वहीँ से आ रही थी।
आज माँ दरवाजे पर नहीं थी। वह संध्या वंदन करके अपने लड्डू गोपाल को भोग लगा रही थी। उसने भी सर झुका कर प्रणाम किया फिर माँ को सारी दिनचर्या बतायी और उस अजनबी के बारे में भी बताया।
" माँ ! वह आदमी ब्रह्मदत्त जमींदार के खेतों की चौकीदारी के लिए रखा है ! "
" अच्छा ..."
" और माँ ... मैंने उसका नाम पूछा तो मुझे हँसी आते -आते रह गई ! "
" क्यों ? "
" चतुर्भुज ... हाहाहा , यह भी क्या नाम है ! जिसके चार भुजा हो , लेकिन उसके तो दो ही हैं ..... "
माँ ने भी हँसी में साथ दिया और बोली , " यह तो विष्णु भगवान का नाम है बिटिया ! जिसके चार भुजा है , सर पर मुकुट है हाथों में सुदर्शन चक्र है। यह तो बहुत सार्थक नाम है। और फिर ऐसे किसी पर हँसा नहीं करते ! "
माँ ने समझाते हुए फिर चेताया कि यूँ अजनबी से घुलना मिलना ठीक नहीं है।
" लेकिन माँ , वह मुझे अजनबी तो नहीं लगता। "
माँ ने झट से उसकी आँखों में झाँका कि कहीं ...! एक पल के लिए एक सोच उभरी और मन में चिंता से भर उठी। उस रात माँ चिंता के मारे कई देर जागती रही। सुबह जल्दी उठ भी गई। सोती हुयी बेटी के सर पर हाथ फिरा कर जगाया। बेटी का मुस्कुराता चेहरा उसे सदैव ऊर्जा देता था।
पारुल स्कूल चली गई। दरवाजा बंद करने को हुयी तो सामने से पारुल के ताऊ जी -ताईजी आते दिखे। जेठ को देख कर ओढ़नी से पर्दा कर लिया।
जेठानी ने आते ही तमक कर कहा , " सुलोचना .....! ये क्या सुन रहे हैं , छोरी शाम को देर से आती है ? अकेली आती है ? "
" हाँ दीदी .... उसकी अलग से क्लास लगती है तो दो घंटे ज्यादा रुकना पड़ता है। बाकी लड़कियाँ दो घण्टे किसलिए रुकेगी ! "
" ऐसी भी क्या पढाई है ! कोई ऊंच-नीच हो गई तो हमसे आ कर मत कहना ! " जेठ जी तल्खी से बोले।
" दीदी ... फिर क्या करूँ मैं ? "
" पढ़ना जरुरी है क्या ! घर का काम सिखाओ , दो-तीन साल में ब्याह कर देंगे ...."
" उसका बहुत मन है पढ़-लिख कर कुछ बनने का ...."
" अरे, ऊंदरै का जन्मा बिल ही खोदेगा ...., उसके खानदान में कोई मर्द तो पढ़ा नहीं ... ये पढ़ेगी हुंह्ह ! "
" मेरी मानती कहाँ है वह ...., दीदी आपसे मेरी एक विनती है .... आप शाम को राजबीर को भेज दिया करो , बहन को ले आया करेगा.... "
"अब राजबीर को समय कहाँ है ! वह भी शाम को खेतों से आ कर आराम करता है , सारा दिन का थका -हारा होता है ... अब बहन को लेने के लिए रुक जायेगा तो आराम कब करेगा ! दस दिन निकल गए तो अब भी निकल जायेंगे ! " यह ताऊजी की आवाज़ थी।
ताऊ जी और ताई जी अपनी जिम्मेदारी निभा कर चले गए। चिन्तित और आहत मन माँ ने बेटी के लिए अपने लड्डू गोपाल के आगे प्रार्थना की।
           उस दिन शाम को पारुल ने जंगल पार किया तो चतुर्भुज भाई जी को यहाँ -वहाँ  देखने लगी। आज तो वह नज़र ही नहीं आ रहे थे। एक बार तो ठिठकी , लेकिन यहाँ इंतज़ार का मतलब था और देर करना , अँधेरा तो घिरने ही लगा था। वह कृष्ण भगवान को मन ही मन पुकारती चलने लगी। अपनी साईकिल की गति बढ़ा दी। गाँव की सीमा पर पहुँचते ही सुगंधित धूप की महक जैसे उस से लिपट गई। सारा वातावरण महक उठा।  वह चकित -सी सोचती हुई चलती रही कि पास ही मंदिर से ये खुशबु आ रही होगी ...
        अगले दिन भी चतुर्भुज नहीं मिला। पारुल पहले दिन से कुछ कम भयभीत हुयी।अलबत्ता एक सुगन्धित महक उसके साथ चलती रही थी।
        उसके अगले दिन उसने सोचा  कि वह आज चतुर्भुज के सहारे का इंतज़ार नहीं करेगी। वह सोच रही थी। वह कब तक किसी का सहारा देखेगी। वह अकेली है तो अकेली ही रहेगी। माँ का सहारा भी उसी ने तो बनना है।
         " अरे बाई ! " पारुल ने मुड़  कर देखा तो चतुर्भुज भाई जी पुकार रहे थे। देख कर खिल गई।
    " राम-राम भाई जी .... ! आप दो-तीन दिन से कहाँ थे ? "
     " क्यों ,तू डर गई थी ? "
      " हाँ जी भाई जी ... " न कहते हुए भी सच मुँह से निकल ही गया।
       " मतलब कि तुझे सहारे की आदत पड़ गई ! "
     " यह तो सच है .. " पारूल ने मन में कहा |
      " अच्छा बाई ..., तेरे बापू को क्या हुआ था ? कितने बरस हो गए ... "
      " पता नहीं ! मैं तो बहुत छोटी थी ... "
    पारुल क्या बताती कि उसके बापू ने आत्महत्या कर ली थी। अकेली खेती से काम चलता नहीं तो उसने सोचा था एक डेयरी बनाने की। दूध-घी बेच कर जीवन की गति सुधारने की सोची थी परन्तु पशुओं को कोई ऐसा रोग लगा कि वे एक-एक करके मरते गए। बैंक का कर्ज़ा बहुत हो गया था। आत्महत्या के अलावा कोई चारा नज़र नहीं आया।
       बैंक से जमीन पर कर्ज़ा लिया था। ताऊ जी ने कर्ज़ा चुकाने की एवज में जमीन पर कब्ज़ा कर लिया। माँ-बेटी के पास कोई और चारा भी नहीं था।
          पारुल को खामोश देख कर चतुर्भुज बोला, " तेरे बापू ने आत्महत्या की थी  ? "
      उसके साईकिल पर ब्रेक लग गए।
     " आपको कैसे पता ? "
    " मैं यहीं गाँव में रहता हूँ , मुझे सब मालूम है ! "
  " आप तो बाहर गाँव के हो न ! "
   " अब तो यहीं हूँ न ! " कह कर हँस पड़ा वह।
     अब गाँव की सीमा आ गई थी। दोनों अपनी -अपनी राह मुड़ गए।
      घर पहुँच कर वही दिनचर्या थी। रात को हल्की ठण्ड होने लग गई थी। माँ ने लड्डू गोपाल को भी छोटा सा नरम कम्बल ओढ़ा दिया। आले नुमा मंदिर के आगे पर्दा लगा कर सर नवा दिया।
     " माँ ! ये तो मूर्ति है ,इनको ठण्ड लगती है क्या ? "
    " अरी बिटिया ... हाँ लगती ही है ...," माँ कहते-कहते रुक गई।
     " क्या हुआ माँ ! रुक क्यों गई ...,"
    " कुछ नहीं बिटिया , तुम नहीं समझोगी ... नयी पीढ़ी हो और ऊपर से तुम्हारे पास विज्ञान का विषय है... सौ तर्क-वितर्क करोगी। जो शाश्वत सत्य है वह नहीं बदलता ! अब सो जाओ ...! "
       अगले दिन सुबह से शाम तक व्यस्त रहने के बाद  पारुल जब स्कूल से निकली और जंगल के पास पहुँची ही थी कि पीछे से जानी -पहचानी आवाज़ ने ठिठका दिया। साईकिल के पैडल पर पैर रोक दिया। मुड़ कर देखा तो चतुर्भुज भाई जी आ रहे थे। साईकिल से उतर गई।
"  भाई जी आप ! प्रणाम ....आप यहाँ  ?"
    " जीती रह  बाई , आज मुझे बाजार में कोई काम था। "
  " बाई .. कल मैंने सोचा कि तू तो बहुत डरपोक है  ! तेरी माँ ने तुझे डरना ही सिखाया है क्या ? "
   पारुल चुप रही। क्या बोलती ! कह तो सही ही रहे हैं।
   " नहीं भाई जी, मेरी माँ मुझे अकेला नहीं समझती , वह सोचती है कि मेरे साथ उनके लड्डू-गोपाल है ! "
   " हा हा ... बाई ! तेरी माँ तो बहुत चतुर है !
     " तू भी ऐसा ही मानती है क्या ... तेरी  माँ का विश्वास ठीक है ?"
   "पता नहीं ! माँ कहती है कि ईश्वर एक शक्ति है जो हमारे मनों में हिम्मत की तरह रहता है और वही सही राह दिखलाता है | तो कभी कहानियों में भगवान के साक्षात प्रकट होने की बात करती है कि जब भी धर्म की हानि होती है , तब ईश्वर धरती पर आते हैं ... तो भाई जी मैं थोड़ा अलग सोचती हूँ ..."
   " जैसे ? "
    " माँ कहती है , धर्म की हानि होने पर ईश्वर आते हैं तो फिर धर्म की हानि होती ही क्यों है ... अगर उसका वजूद है तो सब ठीक क्यों नहीं रहता ! दूसरी बात यह कि उन्होनें द्रोपदी का चीर क्यों बढाया ! वहाँ तो बहुत सारे हथियार धारी थे ... उसे क्यों नहीं प्रेरित किया .. ! अगर वह साहस दिखाती तो आज किसी नारी को किसी कृष्ण की सहायता की आस नहीं रहती ..."
" बाई तेरी बात तो ठीक है ! यह तो पुराणों की बातें हैं .. "
" और हम पुरानी बातों को ले कर ही जीते आये हैं .... "
     " फिर तू क्या सोचती है ? "
   वह चुप सोचती रही कुछ बोल न सकी , एक बार चतुर्भुज की और देखा और चुप चलती रही। बोलने को कुछ था भी नहीं।
        " वैसे भाई जी , आप क्या सोचते हो ? "
     " मैं तो कुछ भी ना सोचूँ ! मुझे क्या है ! "
     " यही तो बात है भाई जी !  कि मुझे क्या या मेरा क्या जाता है ! हम सिर्फ  अपने बारे में ही तो सोचते हैं ... हम अपनी लड़की को सुरक्षा देंगे और दूसरे की लड़की को मरने देंगे ...!"
     " छोरी तू अभी छोटी है , तुझे क्या समझाऊँ ..."
    " मैं समझती तो सब हूँ ... इतनी भी छोटी नहीं ,आप कोशिश तो करो ..."
    " फेर कभी समझाऊंगा , फेर भी एक बात कहूंगा कि लड़कियों में आत्मबल होना चाहिए !"
      " आत्मबल ! " पैर थम गए  पारुल के।
      "जा अब तेरा गाँव आ गया..."
       घर आ कर भी वह अपने उलझी  -सी रही। माँ ने पूछा भी। फिर भी जवाब नहीं दिया। अनमनी -सी रही। अनमनी होने की बात भी नहीं थी फिर भी वह सोच रही थी कि यह आत्मबल लड़कियों में कैसे होना चाहिए। जबकि किसी भी लड़की को बचपन से सिखाया जाता है कि वह  देह है , सिर्फ पारदर्शी देह ही है , उस से परे  वह  कुछ भी नहीं है ... वह लड़की है ... नाजुक है , परी है ,किसी और दुनिया से आई हुयी ! फिर वह इस दुनिया में कैसे समाहित रहे।
          " माँ ..."
        " हूँ ..."
     " लड़कियों में आत्मबल क्यों होना चाहिए  ? "
   "  ................."
    " सुन न माँ ! ये हूँ से क्या पता चलेगा ! "
    " तुझे ये किसने कहा कि आत्मबल नहीं होता हमारे में .... अगर नहीं होता तो आज मैं जिन्दा रह कर तुझे पाल नहीं रही होती। भाग्य और दुनिया के थपेड़े सहन नहीं कर पाती... यह तो ..यह तो ...." कहते हुए माँ का गला भर आया।
      " यह तो , क्या माँ ..."
       " यह तो ईश्वर ने नारी को शरीर ही ऐसा दिया है कि वह न चाहे तो भी असुरक्षित हो जाती है। "
      " अब शरीर तो शरीर है , इसका क्या किया जा सकता है माँ ? "
     " खुद का बचाव ही सबसे बड़ी बात है बिटिया , ऐसा काम ही क्यों करे या ऐसी जगह अकेली जाये ही क्यों , कि संकट में फंस जाये ! "
     " तो माँ  कभी जाना ही पड़ जाये तो ? अब मुझे ही लो , कितने दिन से अकेली आ रही हूँ ....यह तो चतर्भुज भाई जी मिल गए , अगर न मिलते तो अकेली ही जाती न ? "
" मुझे तो कृष्ण भगवान पर भरोसा है , हो न हो ये चतुर्भुज को उन्होंने ही भेजा होगा ..."
" माँ ..." ठुनक पड़ी पारुल।
" अब ईश्वर अवतार कहाँ लेता है माँ ? " पारुल के शब्दों में कौतुहल कम व्यंग्य अधिक था। माँ चुप रही। कुछ सोचती रही।
" बिटिया ये जो तुम आत्मबल कहती हो न , वही ईश्वर बन कर आत्मा में ही रहता है। और हमनें उसे ही भुला रखा है ...."
" तुमने एक ही बात की रट लगा रखी है माँ , ईश्वर की ! "
" मुझे शब्द नहीं मिल रहे कि तुझे कैसे समझाऊँ ...."
" समझाने की जरूरत ही नहीं माँ , सब समझ है मुझे , हमारे समाज में हमें बचपन में दो इकाइयों में पाला जाता है। लड़की और लड़का..., तू लड़की है , ऐसे रहेगी , तू लड़का है ऐसे रहेगा। दोनों की असमान परवरिश ही सबसे बड़ी मुसीबत की जड़ है। तू लड़की है , दुपट्टा ओढ़ ! लड़का चाहे अधनंगा ही क्यों ना फिरे ! और भी बहुत है जो भेद करती है लड़के और लड़कियों में... 
   कभी देखा है माँ , राह चलते हुए कैसे महसूस होता  है , घिन आती है ,गंदी नजरों से !
   सड़क पर चलती लड़की , हाड़ -माँस की इंसान नहीं लगती बल्कि रसभरा रसगुल्ला लगती है... मौका मिलते ही गपक जाओ नहीं तो छू कर , गन्दी नज़रों से ताड़ कर चाशनी तो चख ही लो ..!
" ऐसे में आत्मबल क्या करेगा ....? गन्दी नज़रों वाले इंसान की नज़रों में झांको या उसको पीटो ! "
" हम कर ही क्या सकते हैं ? "
" तो माँ हम क्यों कुछ नहीं कर सकते ?  कब तक ईश्वर को पुकारेंगे या लड़कियों को घरों में बंद रखेंगे  ! "
पारुल को आवेशित देख कर माँ चुप रही | विचार तो उसके मन मेें भी उमड़ रहे थे | 
सोच रही थी कि क्या बताये बेटी को, स्त्री की यही दशा है सदियों से.., वह सिर्फ़ शरीर है, गोरी है, काली है, क्या उम्र है उसकी, यह भी मायने नहीं रखती है | घर से बाहर ही नहीं वह तो घर में भी सुरक्षित नहीं है|
" लेकिन माँ...! "
पारुल ने पुकारा तो सुलोचना सोच- विचार से बाहर आई|
" सभी पुरुष ऐसे नहीं होते... अब ताऊ जी हैं, राजबीर भाई जी हैं और भी है परिवार के जो कितना सम्मान करते हैं हमारा ... और हमारे परिवार ही क्यों गाँव में भी तो सभी अपने परिवार की स्त्रियों का सम्मान करते ही है !"
" अरे बिटिया सिर्फ अपने परिवार की ही स्त्रियों का सम्मान करते हैं, बल्कि मैं  तो कहूँगी कि एक तरह से जानवरों की तरह हड़का कर रखा जाता है क्योंकि वो जानते हैं अपनी आदिम प्रवृत्ति को..!
जैसा तुमने कहा कि स्त्री , स्त्री न हुई रसगुल्ला हो गई ! जब उन्हें पता कि सभी स्त्रियाँ रसगुल्ले समान है तो वो अपने वाले रसगुल्लों को डब्बे में बंद ही रखना चाहेंगे न...! "
इस बात पर दोनों माँ बेटी खिलखिला कर हँस पड़ी |
" बात जरा सी है और समझ किसी को भी नहीं आती, जब हम अपनी बहन बेटी की सुरक्षा चाहते हैं तो किसी और की बहन बेटी की क्यों नहीं ? "
बहुत सारी बातें थी, सवाल थे दोनों के मनों में... जवाब सिर्फ एक ही था कि खुद की सुरक्षा खुद करो, स्वयं को मजबूत बनाओ, यहाँ शारीरिक बल की बात नहीं थी, यहाँ बात थी आत्मबल की, जो हर स्त्री में होना ही चाहिए !
    अगली सुबह भी रोज की तरह ही थी |  मौसम में थोड़ी ठंड
  बढ़ने लगी थी | पारुल के मन में कुछ चल रहा था |  माँ को बताये या न बताये, उधेड़बुन - सी थी | कई दिन से उसे लग रहा था कि  उसका पीछा किया जा रहा है | हो सकता है उसका वहम हो... लेकिन बार- बार मोटर साइकिल से उसके रास्ते में चक्कर काटना, उसको मुड़ मुड़ कर देखना तो वहम नहीं हो सकता है |
माँ को बताएगी तो वह उसे जाने नहीं देगी | दो -चार दिन की ही तो बात है, फिर तो और सहेलियाँ भी साथ होंगी ही.. सोच लिया कि माँ को नहीं बताएगी ... डरने वाली क्या बात है, आजकल चतुर्भुज भाई जी नहीं आते तो क्या हुआ, कुछ और लोग तो खेतों में होते ही हैं |
" क्या बात है बिटिया, थोड़ा परेशान दिख रही हो ? माँ ने भांप लिया |
" नहीं तो ! " अचकचा गई पारुल|
" फिर चुप क्यों हो, कोई बात है तो बता बेटा, घर में, अपनों से कुछ छुपाया नहीं करते... अगर छुपाया ही जाए तो फिर कैसा घर, कैसे अपने..? "
पारुल हँस पड़ी, " अरे माँ, मैं रात की बातों पर विचार कर रही थी...! "
माँ के गले लग अपनी सहेलियों के साथ चल पड़ी |
और माँ ! हमेशा की तरह अपने लड्डु गोपाल के सामने अपनी बेटी की सलामती की दुआ करने लगी |
शाम को स्कूल से निकली ,कुछ दूर चलने के बाद, उसको वही दो लड़के मोटर साइकिल पर आते हुए नज़र आये | एक बार तो वह सहम गई | जी कड़ा कर के चेहरे पर सख्ती लिए साईकल चलाती रही | एक लड़का जोर से चिल्लाया तो वह गिरते- गिरते बची... 
           वह दिन ही जाने कैसा था ! आधे राह पहुंची थी कि वो लड़के फिर से आ रहे थे | उसकी साईकल के आगे ला कर मोटर साइकिल रोक दी | 
      पारुल डर गई और साईकल से उतर गई | कुछ बोल नहीं पाई, जबान जैसे तालु के चिपक गई | वह साईकल को एक तरफ मोड़ कर जाने लगी तो एक लड़के ने आगे बढ़ कर रोक लिया | अब तो पारुल के हाथों में पकड़ी साईकल भी छूट कर गिर गई | तभी दूसरे लड़के ने उसके दुपट्टे की ओर हाथ बढ़ाया और जोर से कहकहा लगाया... बहुत घटिया और अश्लील शब्दों का प्रयोग  भी कर रहे थे | यह समय पारुल के लिए मृत्यु तुल्य था |
        पारुल ने कदम पीछे हटा लिये... तभी उसके मस्तिष्क में एक बात  कौन्धी, " आत्मबल "
और वह झट से नीचे झुकी , दोनों हाथों में मिट्टी भर कर उन बदमाशों के मुँह पर फेंक दी |
      अचानक हुए वार से और आँखों में मिट्टी जाने से वे उसे गालियाँ निकालते हुए गिर गए ... पारुल को कुछ और हौसला मिला, उसने बदमाशों के बाल पकड़ कर आपस में सर भिड़ा दिया और पूरी ताकत से वहाँ से भाग निकली ! 
      वह भाग रही थी, उसके दिमाग में चतुर्भुज भाई जी की बातें गूँज रही थी , " बाई, तुम लोग द्रोपदी और कृष्ण की ही बात क्यों करती हो ? दुर्गा की करो, काली की करो और हाँ , रानी झांसी की बात क्यूँ नहीं करती...!  वे क्या अधिक ताकत वर थी... ! ताकत, हौसला तन से नहीं, मन से आता है ! "
       तभी उसे  चतुर्भुज भाई जी की आवाज सुनाई दी , " ए बाई ! कहाँ भाग रही है और क्या बात हो गई...? "
      वह रुक गई | भींची हुई आँखे खोली तो सामने भाई जी को देख कर उनकी दोनों बाजू पकड़ कर जोर से रो पड़ी |
        भाई जी ने सर पर हाथ रख कर हौसला दिया तो वह थोड़ा संभली | सारी बात सुन कर उनकी आँखे लाल हो आई और मुट्ठियाँ भींचते हुए उसी दिशा में दौड़ पड़े ,जिस तरफ से पारुल आई थी | जा कर देखा तो बदमाश भाग चुके थे | उन्होंने साईकल उठा कर झाड़ी और पारुल के पास ले आये |
      " चल बाई ! तुझे गाँव तक छोड़ आऊँ.. "
   दोनों खामोश रहे, पारुल के हृदय की कंपकंपी अभी मिटी नहीं थी | वह सुबक भी रही थी | गाँव की सीमा पर पहुँच कर भाई जी बोले, " शाबास बाई ! जो आत्मबल की बात मैं करता था ; वह आज तुझ में देख लिया..., अब तुझे कोई सहारे की जरूरत ना है... शाबास.. वाह ! " कह कर सर पर हाथ रख दिया |
" अच्छा बाई सा राम - राम... "
    पारुल ने एक बार मुड़ कर देखा तो वे लम्बे डग भरते हुए जा रहे थे | आज उसे धूप - बत्ती की खुशबू महसूस नहीं हुई, जिसकी उसकी आदत थी | उसके मन में यह बात आई तो, लेकिन वह जल्दी से माँ के पास पहुंचना चाहती थी |
      माँ दरवाजे पर ही थी... वह भाग कर माँ के गले लग कर रो पड़ी | माँ भी कोई अनहोनी की आशंका में भयभीत हो गई | बेटी को कोई रोते न देख ले, जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया |
     सारी बात बता कर पारुल जोर से रो पड़ी, " माँ... कोई भी नहीं था ..जो मेरी सहायता करता.. बहुत अकेली पड़ गई थी... आज मेरे बापू जिन्दा होते या मेरा कोई भाई ही होता.."
    " कोई और कौन होता बेटा... तू थी ना, तू कोई कमजोर थोड़ी है... मेरी हिम्मत वाली बेटी, अपनी रक्षा खुद ही करनी होती है, मुझे बहुत नाज़ है तुझ पर....! "
     माँ और कुछ कहती कि दरवाजे पर भड़भड़ाहट हुई, जैसे जोर- जोर से दरवाजा पीटा जा रहा हो... 
      दरवाजे पर जेठ और जेठानी खड़े थे | बहुत क्रोधित थे |
      "आज तो छोरी ने नाक कटवा दी..! "
     सुलोचना ने पर्दा नहीं किया तो जेठ जी पीठ घुमा कर खड़े हो गए और पैर पटकते हुए बोले |  
      "कैसे भाई जी ? " सुलोचना मन के गुबार को दबा कर संयत शब्दों में बोली |
       " हम भी गाँव में ही रहते हैं.. इतने दिनों तक जो हो रहा था , सब पता है..!" जेठानी ने तमक कर जवाब दिया |
    "अच्छा दीदी ! क्या हो रहा था ? "
   " छोरी  शाम को अकेली आ रही थी,  न जाने कौन था जो छोड़ कर जाता था ! "
     " तो दीदी..! आपको कहा था न, राजबीर स्कूल से ले आया करेगा !  आप भी अब शिकायतें ले कर आ गए, यूँ तो ना हुआ कि उन बदमाशों की रिपोर्ट थाने में लिखवाते  ! "
      सुलोचना के सवाल के बदले सवाल वे झेलना नहीं चाहते थे  और पुलिस के चक्कर में भी पड़ना नहीं चाहते थे तो पैर पटकते हुए चले गये |
       माँ ने पारुल को अगले दो तीन - दिन स्कूल नहीं भेजा |  गाँव में बात तो फैलनी ही थी |  कुल मिला कर माँ - बेटी की ही गलती थी कि पारुल के बापू नहीं है तो माँ- बेटी निरंकुश हो गई हैं |  जबकि समस्या क्या थी और हल क्या होना चाहिये था |  यह किसी के दिल - दिमाग में नहीं था | था तो बस यही कि लड़कियों को हद में ही रहना चाहिए |
      " माँ, मुझे स्कूल तो जाना ही पड़ेगा, चुप रह कर, डर कर, कब तक रहूंगी..? " पारुल ने माँ से सवाल किया |
       " बिटिया दो- तीन दिन में दिवाली की छुट्टियां हो जायेगी, तब तक बात भी  ठंडी- मट्ठी हो जायेगी |"
    " माँ विज्ञान विषय है मेरे पास...! एक दिन की छुट्टी भी मेरी पढाई में दिक्कत डाल देती है तो यहाँ बहुत छुट्टियां मेरी पढाई खराब कर देगी..! " पारुल परेशान हो उठी |
      " अब मैं क्या करूं बेटा..? " माँ भी परेशान थी |
        पारुल चुप माँ का मुँह ताकती रही। 

        "मैं सोचती हूँ बिटिया , क्यूँ न हम चतुर्भुज से बात करें  !" माँ ने उसे सोचते हुए देखा तो बोली। 

        "माँ , क्या ऐसा हो सकता है ?" 

        "कोशिश क भगवान रने में क्या बुराई है , अगर तुम्हें कुछ दिन स्कूल छोड़ने और लेने का काम कर सकते हैं तो पढाई में हर्ज़ा नहीं होगा   ..... और अगर नहीं माने तो उनसे मिलना तो हो ही जायेगा, बहुत अहसान है उनका । थोड़ा काम निपटा लें ,फिर चलते हैं  .... " 

         खेतों में जा कर पता चला कि चतुर्भुज भाई जी तो काम छोड़ कर जा चुके है। दोनों निराश हो एक पेड़ के नीचे बैठ गई। माँ की आँखे भर आई। हाथ जोड़ कर बोली , " इस स्वार्थ भरी दुनिया में चतुर्भुज हमारे लिए भगवान का रूप ले कर आए हैं। "

       " कमाल की बात है माँ  ! भगवान  भी धरती पर आए हैं कभी ! " पारुल हँस पड़ी। 

       " हाँ क्यों नहीं आ सकते हैं ! 

        " फिर तो भगवान को कोई भी बुला ले .... पारुल अब भी हँस रहीं थी।   

      "यह हंसने  की बात नहीं है बिटिया , हारे हुए इंसान का सहारा भगवान ही होता है , वह खुद नहीं आता लेकिन किसी  तो माध्यम बनाता ही है  !" 

       " पर माँ , मैं सोचती हूँ कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति या निजी मनोवृत्ति ही होती है जो उसे अच्छा या बुरा बनाती है, यहाँ हम स्त्री या पुरुष को दोष नहीं दे सकते हैं .... नहीं तो भाईजी पुरुष हो कर मुझे  प्रेरणा देते और ताई जी जैसी महिलाएं  औरतों को घर में रहने को मज़बूर नहीं करती !और सारी बात तो आत्मबल की है ,जो हर इंसान में ; विशेष तौर से स्त्रियों में , होना ही चाहिए  !" 
         " और ये आत्मबल को भगवान ही ...... " माँ की बात बीच में काटते हुए पारुल उठ गई कि अब घर चलते हैं। थोड़ी दूर चले थे कि सामने से गाँव के सरपंच आते दिखे। राम-राम ,नमस्ते होने के बाद सरपंच जी ने पारुल की माँ से कुछ दिन पहले होने वाली घटना के बारे में बात करते हुए , पारुल की प्रशंसा की और उसे सम्मानित करने की बात भी कही। लेकिन सुलोचना ने मना कर दिया कि बेटी को सम्मानित करने की बजाय बेटियों की सुरक्षा का इंतज़ाम किया जाये ; जिस से वे निडर हो कर  स्कूल जा सके। गाँव में बेकार और नाकारा लड़कों पर अंकुश लगा कर उनको काम पर लगाया जाये। सरपंच जी ने आश्वासन दिया कि वे कोशिश करते हैं कि वे क्या कर सकते हैं। 
      माँ की बात भी सही थी , जब तक समाज की लड़कियों के प्रति सोच नहीं बदलती है , तब तक तो उनकी सुरक्षा की चिंता रहेगी ही और यह सोच रातों- रात तो बदल नहीं सकती है , हाँ बदलने की उम्मीद जरूर है और विश्वास भी |

     उपासना सियाग
    अबोहर

       





     
 
    
      


शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

अगर तुम साथ हो

प्रधानमंत्री जी के द्वारा घोषित देश व्यापी लॉकडाउन का टीवी पर सुन कर मलिक साहब और शकुन्तला देवी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे |
   " मलिक साहब ...! अब क्या होगा ? "
    "अब...?"
    दोनों चुप रहे |
    परेशानी की बात तो थी ही ... तिहत्तर-चौहत्तर के लगभग मलिक साहब हैं तो शकुन्तला देवी भी उनसे दो-तीन साल छोटी होंगी !
     उनके चार बच्चे हैं... दो बेटियाँ-दो बेटे ... साथ कोई नहीं रहता है | बेटे विदेश में है तो बेटियाँ अपने-अपने घरों में मस्त और व्यस्त है | 
   गाँव में पले बढ़े मलिक साहब रेलवे में नौकरी करते थे | विवाह होते ही पत्नी को साथ ले आये | फिर गाँव कम ही गये | जहाँ नौकरी ले गई, वहीं का दाना-पानी चुग लिया |
     अब कई सालों से नोयडा के सैक्टर 71 की  एक बिल्डिंग में तीसरी मंजिल पर आठ नम्बर फ्लैट में रह रहे हैं |
    बेटे साल में एक बार आते हैं | बेटियाँ दो बार आती है | यह भी कोई नियम नहीं था कि वे दो बार ही आयें, कई बार हारी-बीमारी हो तो बीच में आना भी संभव हो जाता है |
          एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे कि बड़े बेटे हितेश का फोन आ गया | बहुत सारी चिन्ता के साथ निर्देश भी दिये |
     " तू चिन्ता मत कर बेटा , सोहिली है न , सब संभाल लेगी .. और हमारा क्या है हम तो घर से निकलते ही कम है... मैं सैर कर आता हूँ, तेरी माँ मंदिर तक घूम आती है .... बस और क्या ? "
    " लेकिन बाबूजी , अब आप सोहिली को भी मत आने देना ..."
     बड़े से बात जारी थी कि छोटे बेटे कविश का फोन शकुन्तला जी के फोन पर आ गया | उसने भी बहुत सारी हिदायतें दे डाली |
       " अभी उषा और संध्या के भी फोन आने बाकी हैं ! " मलिक साहब खीझे से बोले तो पत्नी मुस्करा पड़ी |
        " मुस्करा रही हो ?"
     " नहीं मेन्टली प्रिपेयर हो रही हूँ !"
  " किस लिये ? "
     " लॉकडाउन के लिये ..."
    " अरे  वाह ! जैसे इसमें तुमने बड़े दिन गुजारे हों ! "
 " मैंने तो कभी नाम ही नहीं सुना इसका ! आज का काम तो हो चुका है ...अब सुबह ही सोचेंगे कि आगे क्या करना है ... शांति से सो जाओ ..."
        तभी सोहेली का फोन आ गया |
  " अम्मा ... आप परेशान मत होना ...आपके लिये तो मैं आ ही जाऊँगी ..." 
      सोहिली की बातें राहत भरी थी | एक वही थी जिसके सहारे पर उनके बच्चे निश्चिंत थे | वह उनके यहाँ कई सालों से काम कर रही है | 
       पाँच बजे बिना अलार्म उठ जाना मलिक साहब की आदत में शामिल है | सो , आज भी उठ गये | शकुन्तला जी को जल्दी उठना कम पसंद है | सोई हुयी पत्नी पर एक नजर डाल कर बाथरूम में चले गये | 
     पंद्रह से बीस मिनिट में वे सैर पर जाने के लिये तैयार थे | दोनों पर उम्र का असर ज्यादा दिखाई नहीं पड़ा है ,इसे वह अपनी सकारात्क सोच और जिन्दगी से शिकायत न रखने को श्रेय देते हैं |
     लिफ्ट से उतर कर देखा तो वातावरण बहुत शांत था | थोड़ा रूके ... गर्दन ऊपर कर के बिल्डिंग को निहारा ... चुप सा माहौल था |
      कंधे ऊपर-नीचे घुमा कर मुख्य दरवाजे की ओर मुड़े | दरवाजा अभी बंद ही था | छड़ी से दरवाजा बजाया तो दरवाजे के पास बने कमरे से अलसाता चौकीदार बाहर आया |
  " अंकल जी ... अब यह गेट नहीं खुलेगा जी ..."
   " क्यों भई ? "
    " आपने कल टीवी नहीं देखा ... सरकार का आदेश नहीं सुना ? "
     " हाँ देखा तो था ... लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ  ! "
    " नहीं है बीमार ... लेकिन हो तो सकते हैं न ... ! कितनी भंयकर महामारी फैली हुई है ...यह बूढों और बच्चों को जल्द पकड़ में लेती है ... इसलिये आप अपने घर में ही रहिये ..."
   " कमाल है भई ..." मन ही मन बुदबुदा कर वे घर की तरफ चल दिये |
     सैर कर के जब तक घर पहुँचते थे तब तक शकुन्तला जी चाय बना चुकी होती थी. कपों में डालने की ही देरी होती थी |
      लेकिन आज तो दरवाजे से ही लौट आये थे | दरवाजे पर हलचल हुई तो शकुन्तला देवी चौंकी और डर गई | उनको डरा देख कर वे हँस पड़े, " डरने की आदत जायेगी नही तुम्हारी ...!"
     " डरना भी कोई आदत होती है भला ? आप जल्दी कैसे आ गये ?"
    " मैंने सोचा कि आज जा कर देखता हूँ कि तुम मेरे पीछे से क्या करती हो , कितने बजे उठती हो ?"
   " ओहो ... जासूसी ! स्टेशन मास्टर जी ,यह कब से ? "
         "अरे मैं तो मजाक कर रहा था  , आज चौकीदार ने दरवाजे पर ही रोक लिया | उसने कहा कि आप, आज से सैर करने नहीं जा सकते क्योंकि लॉक डाउन है ,करोना वायरस के कारण बीमारी फैली है |"
       "   ओ हो ऐसा !"
      तब तक शकुंतला देवी चाय बना लाई थी | चाय पीते हुए आसपास के वातावरण को निहारने लगे | आज वातावरण बहुत शांत था | चिड़ियों की चहचहाहट मन को बहुत लुभा रही थी |
"  सब कुछ ठहर सा गया लगता है ना शकुंतला !"
  " शकुन से शकुंतला कब से हो गई मैं ?"
   "  अभी अभी से... हा हा "
    " हँसने से कुछ नहीं होगा ... अब इक्कीस दिन हम करेंगे क्या ?"
    " करेंगे क्या ... क्या मतलब है तुम्हारा ...पहले क्या करते थे ...? घर में ही तो रहते थे..!"
     " पहले की और बात थी , पाबंदियाँ नहीं थी कि घर से नहीं निकलना है !"
        बालकनी में चुप बैठे दोनों ही जैसे कुछ सोच रहे हों...., फोन की घंटी बजी तो सोच विचार से बाहर आए |
   " बैठे रहो , मैं फोन देखती हूँ ़़..."
     फोन सोहिली का था | उसने बताया कि उसे भी घर से निकलने की इजाजत नहीं है |
      वे धम् से आकर बैठ गई | मलिक साहब ने सवालिया नजरों से देखा, वैसे वे वार्तालाप तो सुन चुके थे | 
   " अब मैं सारा काम कैसे करूँगी ...आदत भी नहीं रही ... खाना तो फिर भी बन जायेगा , सफाई-बरतन आदि कैसे होंगे ?"
   " मुश्किल तो हो ही गई ...कोई बात नहीं ...मैं हूँ न ... !" पति को प्यार से देखते हुये वे भी मुस्करा पड़ी और कप ले कर रसोई की तरफ चली | 
         सिंक में धोने के लिये रात के बर्तन भी पड़े थे | कप रख कर , फ्रिज खोला , दूध दो तीन बर्तनों में रखा था ,मलाई उतार कर सबको एक भगोने में इकट्ठा किया | 
    " ये सोहिली भी न.."
     " क्या बुदबुदा रही हो शकुन ! "
    " कुछ नहीं ..."
     " रात की दाल पड़ी है न , वही दोपहर में खा लेगें ... दही की लस्सी पी लेगें |"
      " अभी सर्दी गयी नहीं है ... लस्सी नहीं दूँगी ...चिन्ता नहीं करो मैं हूँ ना...! " शकुन्तला जी हँसी |
         उन्होने देखा , फ्रिज का हाल, बेहाल हो रखा था |  दिनों से रसोई की ओर ध्यान दिया ही नहीं था | एक-दो दिन पुरानी दाल-सब्जी भी पड़ी थी | अलसाया धनिया , मूली आदि कुछ कटी हुई सब्जियाँ भी थी जो खुली ही रखी थी | सबको एक लिफाफे में इकट्ठा किया और डस्टबिन में डाल दिया |
      " हे भगवान ... मैंने भी कैसे सारी रसोई सोहिली को सौंप दी है !" मन ही मन बुदबुदाती वे फ्रिज को व्यवस्थित करने लगी |
        एक एयर टाईट डिब्बे में मटर के दाने रखे थे , गर्म पानी में भिगो दिये कि आज मटर -टमाटर की सब्जी और मिस्सी रोटी बनाऊँगी |साथ में बूँदी का रायता !
      रसोई /फ्रिज संभालते हुए समय तो लगा लेकिन अपने हाथ से काम कर के जो संतुष्टि एक गृहणी को मिलती है , वही उनको महसूस हो रही थी |
         तभी नजर घड़ी पर पड़ी , नौ बजने वाले थे | " अरे राम ! "
       " क्या हुआ शकुन... ? "
     " रसोई के चक्कर में तो आज पूजा -पाठ रह गई ..."
       " जाने दो कुछ दिन पूजा-पाठ को, आओ टीवी देखो ... , हमारे शहर में भी कोरोना का संक्रमण हुआ है |"
      " मतलब कि हम भी सुरक्षित नहीं है  !"
     " हाँ, अगर घर से बाहर निकलेंगे तो !"
" अगर घर से नहीं निकलेंगे तो हमें रोज का जरूरी सामान कैसे मिलेगा ..?"
    " उसका भी कोई - न -कोई हल तो निकलेगा ही ..."
      पति को टीवी देखते छोड़ वह नहाने चली गई | नहा कर आई तो पता चला कि दोनों बेटियों के फोन आ चुके थे |
      " यार शकुन , मुझे लगता है कि हम तो बच्चे हैं... यह मत करना , वह मत करना ...और तो और ऊषा बोली कि हमारी उम्र में लापरवाही अच्छी नहीं है ...!"
      " हाहा , आपको नसीहत पसंद नहीं आई या उम्र की बात पर चिढ़ गए ...! "
       पत्नी को हँसता देख ,थोड़ा झेंप गये वे क्योंकि बात तो उम्र की ही थी | एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि उनको बुढ़ापा स्वीकार ही नहीं था ... होता भी क्यों ,वे खुद को सेल्फ मेड व्यक्ति मानते हैं !
       नहाना -धोना भी हो गया ... पूजा-पाठ के नाम पर दीया जला कर हाथ जोड़ लिये कि प्रभु क्षमा करना...कुछ दिन ऐसे ही चलेगा ... हिम्मत देना ! 
      खाने में क्या बनेगा यह भी योजना बन गई लेकिन सफाई का क्या किया जाये वह भी तो जरूरी है |
       " सफाई आज रहने दो शकुन ...कल देखते हैं कि क्या करेंगे ... जोश में सारी ऊर्जा आज ही खर्च कर दोगी तो कल बहुत दिक्कत होगी | "
        मलिक साहब की बात भी सही थी |
थकान तो होने लगी थी | सुबह छह बजे से काम कर रही थी | बेड पर लेटी तो नींद आ गई |
      घंटा-सवा घंटा तो नींद ले ही ली थी | सोचने लगी सफाई हुई नहीं है , बासी घर में ही खाना बनाना पड़ेगा ..., ऐसे भी कभी होगा सोचा न था |
     " ज्यादा सोचो मत ... सफाई नहीं हुई तो कोई बात नहीं... भूख लग आई है , आज चाय बिस्किट ही तो खाये थे ...!"
     "ओह हाँ ! अभी बनाती हूँ ..! " फुर्ती से उठने की कोशिश की तो मलिक साहब ने चुटकी ली, " फुर्ती उमर के हिसाब से ही ठीक रहती है ... हा हा ..."
      " आपसे तो कम ही है ! "
  रसोई में पत्नी के पीछे पहुँच गये | " बहादुर हाजिर है मेम साहब ! कहिये क्या हुकुम है ! "
   " अच्छा जी ! एक दिन काम पड़ गया तो बहादुर बन गये ...और मैं सारी उमर रसोई में बहादुरी दिखाती रही , वो ? "
     " हाहाहा... तुमसे बातों में कौन जीत सकता है ...लाओ मैं आटा निकालता हूँ ... तुम सब्जी बनाने की तैयारी करो ..."
     बात में से बात निकालना दोनों की आदत थी | थोड़ी देर में दोनों डाईनिंग टेबल पर खाना खा रहे थे | दोनों ही संतुष्ट थे | जीवन में ऐसे मौके बहुत बार आये थे, जब मिल जुल कर काम किया था और अब तक गृहस्थी की गाड़ी सुचारू रूप से चला रहे थे |
          पत्नी को गहरी नींद में सोते देख कर मलिक साहब के मन में प्रेम उमड़ आया | शकुन्तला जी ने आँखे खोली तो पति को प्रेम से निहारते देखा |
     " क्या बात है..."
     " देख रहा हूँ, थक गई हो... अभी तो एक ही दिन हुआ है ! " आखिरी वाक्य में अचरज के साथ चुहल भी थी |
       वे सिर्फ मुस्कुराई |
      उनकी दिनचर्या में कोई फर्क नहीं आने वाला था | फर्क तो बस इतना आएगा कि सोहिली नहीं आयेगी, बाहर की सैर / मंदिर जाना बंद हे जायेगा | बाकी काम तो सब घर बैठे हो जाता था | 
     नाश्ता करने की आदत नहीं थी | दोपहर का खाना ग्यारह बजे खा लेते थे | रात को सात बजे तक खाते थे |
       "शकुन , आज दलिया या खिचड़ी बना लो |   " 
      " ठीक है ... "
   " आज मुझे गाँव, जमीन और सबसे ज्यादा बापू की बहुत याद आई ..."
     उन्होने पत्नी को उदासी से देखा |
   " आज क्या हुआ ... ? एक दिन में ही यह हाल हो गया क्या ! " शकुन्तला जी ने चुहल की |
     " मजाक की बात नहीं है , आज गाँव में होते तो यूँ बालकनी में टँगे हुये नही होते ... तुम खुले आँगन में बैठी होती ... मैं अपने साथियों,भाईयों के साथ चौकी पर बैठा बतिया रहा होता ! क्यूँ.. है न ?"
     " हाँ ... लेकिन हमने ये जीवन खुद चुना है ... हमारे बच्चों को शहरी जीवन ही पसंद है और हम कभी गाँव रहे भी तो नहीं न ...हमारे बच्चे वहाँ सिर्फ पिकनिक मनाने तक ही खुश रह सकते हैं ...! "
     " तो मैं कौनसा गाँव जाने का कह रहा हूँ...  तुम बातें ही बहुत बनाती हो..! गाँव क्या मैं तो बच्चों के पास परदेश भी जाना नहीं चाहता ..."
बच्चों की तरह ठुनक गये मलिक साहब |
     यह तो बात बदलने की कवायद थी ,नहीं तो शकुन्तला जी जानती ही थी कि वे सच में उदास ही हैं | 
    शाम गहराने लगी थी | वे पूजा कर चुकी थी | खिचड़ी गैस पर चढ़ा कर वापस बालकनी में बैठ गई | 
     " हो गई पूजा ? "
     " जी ..!"
      " शकुन्तला जी ! आप क्या सोचती हैं कि यह सारा घर आपकी पूजा -पाठ की बदौलत ही खुशहाल है ...या सारा संसार ईश्वर ही चला रहा है ! "
      शकुन्तला जी चौंकी कि यह ' शकुन्तला ' और वह भी ' जी ' और 'आप ' के साथ ! जरूर ही उनके मन में कुछ चल रहा है और शिकायत भी... सोचते हुए होठों पर गहरी मुस्कान आ गई |
     " यार तुम ऐसे गहरे मुस्कुराया न करो..
 इसके पीछे मुझे गहरा राज लगने लगता है ..."
      " नहीं जी मैं तो बहुत बातें बनाती हूँ न ...चलिये कुकर सीटीयाँ बजा रहा है , खाना खाते है ... "
     " सीटियाँ तो मेरी बजेगी , इक्कीस दिन तक ..."
         पति की बात पर शकुन्तला जी खिलखिला कर हँस पड़ी | दोनों ने मिल कर डाइनिंग टेबल पर खिचड़ी के साथ खाने के लिये पापड़,चीनी और दूध रख लिया और घी भी रखा | दोनों ही घी के शौकीन  है और यह तर्क भी कि सीमित मात्रा में घी खाने से शरीर में ऊर्जा और चिकनाई बनी रहती है |
        अगली सुबह मलिक साहब की नींद तो अपने समय पर ही खुल गई | सोच रहे थे सैर करना नहीं है ... बिस्तर से उठुँ या नहीं... कल तो अखबार भी नहीं आये थे ...आज पता नहीं ....
     " आ जायेंगे अखबार भी ... मैंने कल टीवी पर सुना था कि जरूरी चीजों की सप्लाई नहीं रूकेगी ..."
       " शकुन तुम जाग रही हो ! तुम मेरा मन कैसे पढ़ लेती हो ... "
      " जैसे आप मेरा मन पढ़ लेते हो ..."
      शकुन्तला जी का सुबह नित्यकर्म के बाद का नियम है अपने छोटे से मंदिर की सफाई करना और वहाँ से दीपक, लोटा ,घंटी आदि उठा कर रसोई में रख देना होता है जिसे वह बाद में धो कर पूजा करती है | तब तक मलिक साहब सैर कर के आ जाते हैं |
      लेकिन आज तो पति घर पर ही हैं इसलिये उन्होने केवल हाथ जोड़े और धीमे से मुस्करा कर बोली ," प्रभु , पति सेवा पहले ! "
        " अरे शकुन ! अब यहाँ हाथ जोड़ने से कोई फायदा नहीं है ... बड़े-बड़े धर्म स्थानों ने भी अपने द्वार बंद कर लिये हैं | "
      शकुन्तला जी फिर मुस्कुरा दी ," संध्या के पापा जी , भगवान मंदिर में थोड़ी न होता है ,वह तो सब जगह होता है ... जरा सी बात है और समझानी पड़ रही है ... धर्म - स्थल पर लोग जमा न हो इसलिये द्वार बंद किये हैं और यही ईश्वर की भी इच्छा है | उसने कब कहा कि मेरे..." बात बीच में रह गई क्योंकि दरवाजे की घंटी बजी थी |
         मलिक साहब ने दरवाजा खोला तो सामने बिल्डिंग का सचिव था |
   " नमस्ते सर , कुछ दिन के लिये काम वाली तो आएगी नहीं , सो हम आप के लिये खाना ला दिया करेंगे ... दूध आता रहेगा, और कुछ भी चाहिये , उसके लिये कॉल कर देना |"
      " ठीक है , बहुत शुक्रिया .." 
      दरवाजा बंद कर के एक बार वे सोच में वहीं खड़े रहे | 
   " ऊषा की मम्मा , मैं क्या सोच रहा हूँ...?"
  " हा हा ...आप सोच रहे हैं कि हम बाहर से खाना न मंगवाएं , क्योंकि पहली बात तो यह कि मैं बना सकती हूँ... और दूसरी बात यह है कि हमें बाहर का खाना हजम नहीं होगा ... ! क्यों ... ?"
      " एकदम सही जवाब.."
    उन्होने फोन कर के बोल दिया कि उनको अगर जरूरत होगी तो खाना मंगवा लेंगे | चाय पी कर दोनों ने मिल कर घर साफ किया | 
       " यार शकुन ऐसा लगता नहीं था कि इस उम्र में भी तुम काम कर लोगी ! ...मम् मेरा मतलब था कि हम दोनों... ऐसे घूर के मत देखा करो ... हाहा "
     " अब हम ऐसे हँस कर ही यह लॉक डाउन बिताएगें ... हमारे बच्चे देश-विदेश में है | संक्रमण का भय सभी जगह है | वे भी बाल -बच्चों वाले हैं , वे अपने बच्चों की फिक्र करें या हमारी ! "
       " सच कहा शकुन..."
    " हमारे पास बहुत कुछ है करने को ... और नहीं तो प्रार्थना कर सकते हैं विश्व शांति की ! "
     " बातों में तुमसे कोई जीत नहीं सकता तो मेरी क्या बिसात है ... चलो अब टीवी देखते हैं !"
         "टीवी देखो तो दहशत आने लगती है , जैसे कुछ नहीं बचेगा.. मुझे नहीं लगता कि यह लॉकडाउन इक्कीस दिन ही चलेगा ...जैसे देश का और देश का ही क्यों हमारे शहर का ही हाल देख लो ... आगे भी बढ़ाया जा सकता है ..."
      हाँ लगता तो यही है ... है तो यह हमारे लिये ही न.. जान है तो जहान है ..."
       टीवी में समाचार देखो तो डर लगता है और दो-चार दिन में धारावाहिक भी बंद हो गए | धार्मिक सीरियल मलिक साहब को पसंद नहीं | अब किताबों का ही सहारा था या टीवी पर कोई मूवी देख ली |
        पोते-पोतियाँ , दोहते -दोहितीयाँ... बेटे -बहू , बेटियाँ- दामाद सभी समय -समय पर कॉल/ वीडियो कॉल करते रहते थे |
        " टेक्नोलोजी ने कितना करीब कर दिया है न सबको ..." मलिक साहब उत्साहित थे |
        " हाँ भी और ना भी ... यह ठीक है कि हम अपनों को देख सकते हैं लेकिन कितनी देर तक ..इसकी भी एक सीमा ही है ...सारा दिन तो नहीं देख सकते न छू सकते ... क्या ये बाजू तरसते नहीं कि पोते -पेतियों को गोद में उठाएं... सीने से लगाएं... उनकी मासूम बातें सुने, कभी हँसे तो कभी कहानियाँ सुनायें..." शकुन्तला जी ने बात भर्राये गले से शुरू की थी ,आँसूओं से खत्म की |
       पत्नी की बात तो सही थी | चुप रहे ,बस सर हिला दिया |
       " हम अपने माता-पिता के साथ भी नहीं रहे ... और बच्चों के साथ भी नहीं रहना चाहते..आखिर कब तक ? जब कि बच्चों ने कितनी बार कहा भी है ..."
       " शकुन... यह श्राप है जो हमें हमारे माता-पिता ने दिया है ...हमने उनकी सेवा नहीं की ... तभी हम अकेले हैं..."
      " वे हमें कभी श्राप नहीं देंगे... यह आपकी सोच है ... आपने दूर रह कर भी सारी जिम्मेदारी पूरी की थी न ? अब हमारे बच्चे हमें बुला रहें है तो हम क्यों नहीं जाते ... ? "
         " ठीक है भई ... ये महामारी का ताण्डव समाप्त हो जाये फिर देखते हैं ... चलो उठो ... आज रात दीप जलाना है ...प्रधानमंत्री जी का आव्हान याद है न..."
            शकुन्तला जी दीया जलाने की तैयारी में जुट गई और मलिक साहब ने बड़े बेटे से फोन पर बात करने लग गये | 
       
उपासना सियाग 
(अबोहर)
    ईमेल: upasnasiag@gmail.com

  नाम -- उपासना सियाग
जन्म -- 26 सितम्बर
शिक्षा -- बी एस सी ( गृह विज्ञान ) महारानी कॉलेज , जयपुर।
           
              ज्योतिष रत्न ( आई ऍफ़ ए एस ,दिल्ली )

प्रकाशित रचनाएं --- 9 साँझा काव्य संग्रह  , एक साँझा लघु कथा संग्रह। ज्योतिष पर  लेख। कहानी और कवितायेँ  ( सखी जागरण , सरिता , अंजुम, करुणावती साहित्य धारा , अटूट बंधन आदि )विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं ( दैनिक भास्कर आदि )में प्रकाशन।

पुरस्कार -सम्मान :-- 2011 का ब्लॉग रत्न अवार्ड , शोभना संस्था द्वारा।  ' जय-विजय ' रचनाकार सम्मान,     2015 ( कहानी विधा )
   


 

      
       
     
       
       
    
        
      
       
        
    
    
   
          
     
  

  
   
      
     
        
        
   

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

छोटी लकीर-बड़ी लकीर



  छोटी लकीर-बड़ी लकीर

  दिसम्बर  के छोटे-छोटे दिन। भागते-दौड़ते भी दिन पकड़ से जैसे छूटा जाता है। सुबह पांच बजे से लेकर दोपहर ढ़ाई बजे तक एक टांग पर दौड़ते रहना वेदिका की आदत में शामिल है। अब कुछ समय मिला है तो छत की तरफ चल दी। धूप भी हल्की हो चली है, मगर यही थी , उसके हिस्से की धूप...
            एक कोने में चटाई बिछा कर पैर सीधे कर के बैठ गई। बाल कन्धों पर फैला दिए। सुबह के धोए हुए बाल अब भी गीले ही थे। फिर हाथ बढ़ा कर साथ लाया डिब्बा खोल लिया। उसमें वैसलीन , लोशन और कंघा था , कुछ  मेकअप का सामान और एक छोटा सा आईना भी । यहीं वह कुछ देर सुस्ता कर अपना चेहरा-मोहरा ठीक कर लिया करती है। हाथ पर लोशन लिया ही था कि वह भी आ गई।
           " अच्छा तो मिल गई फुरसत !" वह मुस्कुराते हुए फर्श पर बैठते हुए बोली।
       " हाँ ....,मगर तुम वहां क्यों बैठ गई , यहाँ बैठो ना चटाई पर !
 सच में फुरसत तो बहुत दिन बाद मिली है। घर की रंगाई-पुताई सम्पूर्ण हो गई है। अभी  शादी की तैयारियां भी बहुत पड़ी है।  "
" हम्म ...., एक बात तो है , तुम सास बनने चली हो, फिर भी तुम्हारे बाल कितने सुन्दर है।  हाँ थोड़ी सी चाँदी झलकने लगी है ! "
   " पचास के पार पहुँच गई हूँ , चाँदी तो झलकेगी ही.....," मुस्कुरा पड़ी वेदिका। मुस्कुराते हुए उखड़े हुए फर्श पर, वहीँ पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े से  एक छोटी सी लकीर खींच दी।
       मुस्कुरा तो पड़ी वेदिका, लेकिन  तारीफ के बोल अब उसके मन को नहीं छूते हैं। जिसके मुहँ से सुनना चाहती थी वह तो कभी बोला ही नहीं।
     उसके बाल तो हमेशा से ही अच्छे थे , काले-घने... सहेलियों की ईर्ष्या मिश्रित प्रशंसा से वह भली भांति परिचित थी। सास जब पहली बार देखने आई तो उसके रूप के साथ-साथ बालों की भी प्रशंसा कर के गई थी। लेकिन राघव ने कभी भी तारीफ नहीं की। हां, एक बार ( विवाह के कुछ ही माह बाद ) वह अपने कमरे के बाहर बेसब्री से कुछ-कुछ रोमांटिक मूड लिए , इंतज़ार कर रही थी तो राघव ने अचानक पीछे से आ कर डरा दिया था और बेजारी से कहा कि क्या डायन की तरह बाल बिखरा कर खड़ी हो। उसे बहुत बुरा लगा था। तारीफ/प्यार के बोल ना सही , लेकिन राघव डायन कहेंगे , यह तो नहीं सोचा था।
         उसकी आँखे भर आई थी। वैसे यह राघव का मज़ाक ही था। लेकिन इस मज़ाक की फ़ांस को वेदिका दिल से कभी निकाल ही नहीं पाई। उसके बाद किसी भी तारीफ ने उसके मन को जैसे छूना ही बंद कर हो।
           " क्या सोचने लगी ? ये आंखे क्यों भर आई ! "
  " कुछ नहीं ।" मन में हल्का सा बुदबुदाते हुए , पहले से खींची लकीर के पास ,एक छोटी लकीर खींच दी।
 सोचने लगी कि काश ये जिंदगी भी सर्दियों के दिन सी होती तो .... कितनी जल्दी व्यतीत हो जाती ...., लेकिन ये तो जेठ की दुपहरी सी है काटे नहीं कटती ....
          आँखे मूंदे , गर्दन उठाये हुए , चेहरा ऊपर किये जाती हुयी धूप को जैसे आत्मसात करती हुई , सोच में डूबी थी कि  नीचे रसोई में  खट -पट सी सुनाई दी। साथ ही सास की बड़बड़ाहट। बड़बड़ाहट ने जैसे उसे जमीन पर ला दिया। झट से बाल समेटे , अपना डिब्बा भी समेट लिया।  पास बैठी वह मुस्कुराई , "  हो गई शुरू बुढ़िया की ताना-कशी ! "
          " ना री ! बुजुर्ग है बेचारी , ऐसे मत कहो... " वेदिका ने हंसी रोकते हुए,आँखों ही आँखों में उसे डांटा।
सीढ़ियों की तरफ भागी।
          जा कर देखा , माता जी चाय बना चुकी थी। कप में डाल कर रसोई से बाहर आते हुए वेदिका के हाथ में पड़े डब्बे को देख कर मुहं बनाते हुए ' सजने-संवरने में ही फुरसत नहीं मिलती , बहू आने वाली है फिर भी ...' बड़बड़ाते हुए , मुहं बनाते हुए अपने कमरे में चली गई। वेदिका की आंखे नम हो गई। उनकी बड़बड़ाहट कुछ स्पष्ट सुनाई  दे गई थी। खिला मुख मलिन हो गया। अपने कमरे की अलमारी में डिब्बे को रखते हुए सोचने लगी , " माता जी को मेरे सजने-संवरने पर इतनी तकलीफ क्यों है ? और ऐसा भी क्या सज रही थी मैं !"
      सोचना तो बहुत चाहती थी कि बाहर  गाड़ी रुकने की आवाज़ सुन कर आँखों की नमी को पौंछते हुए बाहर आ गई। बेटा था।  सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। प्यारी सी मुस्कान देख कर मन और आँखों से नमी छंट गई। ममता उमड़ आई कि इसे क्यों अपने मन की उलझनों में डालूं , चार दिन तो आया है। मेरा क्या है , यही नसीब है। सोच कर हंस पड़ी।
      " क्या हुआ माँ ? " यह हंसी क्यों आ रही है।
     माताजी जी फिर बड़बड़ा उठी, " अरे इसका क्या , ये तो बिना कारण ही हंसती है !हंस ले ! जितना हंसना है ! बहू आएगी तब पता चलेगा। "
    दादी की बड़बड़ाहट पोते ने सुन ली  , हंस कर बोल उठा , "  दादी ! बहू आएगी तो हंसी क्यों बंद हो जाएगी  ? माँ के आ जाने पर आपके साथ भी ऐसा हुआ था क्या !"
     दादी कुछ कहती तभी , " क्या हुआ था भई ...., कहते हुए राघव भी आ गए।
   " मुझे लगता है पापा , माँ को डॉक्टर को दिखाना चाहिए ! मैंने भी कई बार नोट किया है ,खुद ही हँसती रहती है , कभी मन ही मन मुस्कुराती है ! "
  " मतलब ! " वेदिका ने हैरान होते हुए पूछा।
" मतलब कि  दिमाग के डॉक्टर को !" राघव की आवाज़ थी। वे हँस भी रहे थे , और आँखों में लापरवाही भी थी।
 " हाँ माँ ! ये कोई पागलपन की बात नहीं है, ये बीमारी होती है , आम लोग समझते ही नहीं है ! " कहता हुआ बेटा उसे रसोई के दरवाज़े तक ले गया।
         वह हैरान रह गई कि सारी उम्र यहाँ खपा दी और आज वह मानसिक रोगी कही जा रही थी। उसे रोना आ गया, लेकिन उसे रोने का समय भी तो कहाँ था।
     फिर वही शाम का काम शुरू हो गया। वेदिका को सोचने का अवसर ही नहीं मिला ना ही कहने को। रात को फुर्सत मिली तो शादी पर चर्चा चल पड़ी थी। बेटे की छुट्टियां तो कुछ दिन में ख़त्म हो जाएगी। फिर तो शादी से कुछ दिन पहले ही आ पायेगा , इसलिए जो भी बात / कार्यक्रम तय करना था , उसकी ज्यादा से ज्यादा बात कर लेना चाहते थे। उसके बाद तो फ़ोन पर ही बात हो सकनी थी।
          बात करती , राय देती, वेदिका को कोई बात जब समझ नहीं आती या दोबारा पूछ लेती तो बेटा खीझ उठता कि माँ को कुछ समझ ही नहीं आता , तभी तो कह रहा था , माँ को डॉक्टर की जरूरत है।
     अब तो गला और आंखे दोनों ही भर आये। अनवरत आँसू चल पड़े।  राघव चिढ़ गए।
    " काम की बातों  में ये तुम्हारे आंसू विघ्न डालते ही हैं ! कोई बात याद मत आने दिया करो ! "
" मैंने क्या कहा !  मारो-पीटो और रोओ भी मत ! " वेदिका बहुत आहत हो उठी। मन में घटायें शाम से ही भरी थी अब बरस गई तो क्या आश्चर्य था।
      " आपसे तो बात करनी ही बेकार है माँ , और, अब भी समय है  आप डॉक्टर को दिखा ही लो ! " बेटा नाराज़ हो कर कमरे से चला गया।
         वेदिका जोर से रो पड़ी, "ये क्या बात हुई भला ! आप भी उसका साथ देने लग गए ! "
" जाने भी दो वेदिका ! क्या हुआ जो कुछ बोल दिया।  कुछ समय बाद इसकी शादी हो जाएगी तो बेचारा ये भी कहाँ मन की कह पायेगा , मेरी तरह चुप ही तो रहा करेगा। "
    " अच्छा जी , आप भी चुप रहते हैं और वह भी चुप ही रहेगा ! कड़वी बेल के फल भी तो कड़वे लगते हैं !"
" अरे जाने दो भई ! रात बहुत हो गई है , सुबह और भी काम है। " राघव सोने चल दिए।
      वेदिका पीठ घुमाए रोती रही। सोच रही थी कि काश ,  बेटी पास होती तो  मन की तो सुनती, यूँ पागल तो ना कहती ।  काश, एक बार मुझे राघव गले लगा कर चुप ही करवा देते तो मन यूँ अशांत ना रहता। राघव को क्या परवाह थी। वे तो बेफिक्र खर्राटे मार रहे थे। कुछ देर में उसकी भी आँख लग गई।
        अगले दिन फिर वही काम में व्यस्तता रही। कहने को सहायक है मदद के लिए , फिर भी उसके काम तो उसे ही करने होते हैं। वेदिका को काम में व्यस्त देख कर वह भी लौट गई। लेकिन जैसे ही धूप सेवन करने को वेदिका छत पर गई। पीछे -पीछे वह भी आ गई। वेदिका ने चोटी खोल कर बाल फैला लिए। चटाई पर ही लेट कर आँख मूँद ली कि दो बून्द आँखों के किनारों से बह निकले।
             अरे , क्या हुआ ...ये आंसू क्यों ? पास बैठे हुए उसने देखा तो जैसे आंसू अपनी उँगलियों पर ले लिए। वेदिका ने करवट ले कोहनियों पर सर टिकाते हुए , उदासी भरे स्वर में बोली , " हम जिंदगी में सब को खुश नहीं रख सकते ..... , अब मैं हार गई हूँ। कितने बरस हो गए इस घर में  आये हुए।  सिर्फ दो कदम भर जमीन ही मेरी है। पीछे जा नहीं सकती और आगे बढूं तो कितने कांटे है। कोशिश भी की  कभी तो कदम रखने को इजाजत नहीं मिली ..." कह कर सीधे लेट गई। आंसू फिर बह चले।
       " माँ ! आप यहाँ लेटी हो ! मैं सारे घर में ढूंढ आया ! "
      " क्या हुआ ? आप रोये हो क्या ! हैं ! "
" नहीं मैं क्यों रोउंगी ! मैं तो मानसिक रोगी हूँ न ! कुछ भी कर सकती हूँ ...., गला भर्रा गया वेदिका का।
" लो माँ , ये भी क्या बात हुयी , मैंने क्या गलत कहा , कई बार इंसान को खुद मालूम नहीं पड़ता ! "
" अच्छा ! अब मैं ऐसा क्या करती हूँ जो मानसिक रोगी नज़र आती हूँ। " नाराज़ हो गई वेदिका।
" अरे माँ...... जाने दो ना , मुझे भूख लगी है , चलो कुछ बना कर दो। "
" अच्छा क्या खायेगा ..., " भर्राये गले  से भी ममता फूट रही थी।
   बेटे को उसका मनचाहा बना कर दिया। फिर शाम को वही काम -धंधा। उदासी और ख़ुशी में डूबती वेदिका का एक दिन और बीत गया।
       दो दिन बाद बेटा भी चला गया।  बेटा जा रहा था, सो मन तो भारी ही था उस पर माता जी का व्यवहार। वह सोचती रहती कि उससे ना जाने क्या गलती हुई है। हद तो तब थी कि उसे ,माँ नौकरों से भी कम तरजीह देती थी। उस दिन भी यही हुआ। वह रसोई में बेटे के लिए प्याज़ के परांठे बनाने के लिए प्याज़ काट रही थी और बहादुर आटा सान रहा था। मां पूजा की डलिया ले कर रसोई से बाहर ही बहादुर को आवाज़ लगाती हुयी चली गई कि वह मंदिर जा रही है। एक तो प्याज़ की जलन और ऊपर से गले तक छलके हुए आंसू ढ़लक पड़े। जोर से रोना चाहती थी पर ऐसा नहीं कर पाई क्यूंकि रोने की ये कोई बड़ी वजह नहीं थी। फिर भी आंसू रुक नहीं सके। प्याज़ के बहाने से ही सही कुछ छलका हुआ गला तो नीचे बैठा।
    " माँ ! आप रो रहे हो क्या ? "
  " नहीं बेटा , ये तो प्याज़ छील रही हूँ तो कड़वे बहुत है ! " आँखे पोंछती हुयी अपने कमरे के वाश रूम की तरफ गई तो पतिदेव ने कंधे पकड़ कर रोक लिया कि ये प्याज़ के आंसू तो नहीं है। ये तो ....
    " ये तो क्या है फिर ! आप मेरे आंसू कब से समझने लगे .... " कंधे छुड़ा कर जल्दी से वॉशरूम में मुहं धोकर थोड़ा संयत होने की कोशिश की। आँखे फिर भी लाल थी। ऐसे तो वेदिका ने प्याज़ के बहाने ना जाने कितनी ही बार मन को हल्का किया है।
        रसोई में गई तो वह सामने खड़ी थी। होले  से मुस्कुरा कर बोली , " बेटा जा रहा है इसलिए मन भारी है ना ? " 
  " हाँ , सच में ......" कह कर वेदिका ने चाकू से स्लैब पर एक लकीर खींच दी , और फिर उस लकीर के पास , उस लकीर के पास एक छोटी लकीर खींच दी। ऐसा वह तब तक करती गई , जब तक आखिर में एक लकीर की जगह बिंदु बच गया।
          दोपहर तक बेटा भी चला गया। घर एक बार खामोश सा हो गया। उसका मन नहीं किया कि छत पर जाये। अपने कमरे में जा कर रजाई ओढ़ कर सोने का सोचा। नरम-गरम रजाई में घुसते ही भरा हुआ मन फिर बरस पड़ा। बेटे की वजह से  राघव उस दिन ऑफिस नहीं गए थे। उसके जाने के बाद किसी काम से कहीं गए थे। लौटने पर जब कमरे में आये तो उनको लगा कि वेदिका रो रही है। झट से रजाई हटा कर , सर पर हाथ रखा। उदास तो वो भी हो गए थे।
      " क्या बात है वेदिका , यूँ जी छोटा क्यों कर रही हो ! "
   " कुछ नहीं हुआ ! यूँ ही रोने का मन कर गया। " आंसू पोंछते हुए उसने रजाई मुहं पर खींच ली।
" अरे वाह ! ये भी खूब रही , रोने का भी मन करता है कभी ? तुम भी कमाल की हो ! ध्रुव सच ही कहता है। तुमको डॉक्टर से मिलना ही चाहिए ! "
     तमक कर उठी वेदिका तो राघव चाय का आदेश दे कर बाहर निकल गए। भरी आंखे और भारी सर लिए वेदिका चली पड़ी आगे की दिनचर्या पूरी करने में।
         वह सोचती जा रही थी कि अगर उसकी जगह, उनकी  बेटी होती तो राघव  उसके रोने की वजह जान कर उसे खुश करने के हर संभव प्रयास करते। ऐसा क्यों होता है अपनी बेटी इतनी प्रिय और पत्नी जो कि उसी बेटी की जन्मदायनी है , उसके साथ ऐसी बेरुखी। एक बार फिर आँखे छलक पड़ी।
         तभी बेटी का फोन आ गया। मन से मन को राह होती ही है। वह कुछ दिन के लिए आ रही थी। मन को सुकून सा मिला। क्या-क्या शॉपिंग करनी है , कहाँ से करनी है। क्या ज्वेलरी बनानी है। सोचते हुए शाम हो गई और रात भी कट गई।
          अगला दिन कुछ सुकून भरा था। मन शांत था। राघव  ऑफिस के लिए चले गए। मन किया कि कुछ संगीत सुना जाये। मोबाईल को वायर -लेस स्पीकर से जोड़ा , यू -ट्यूब खोला और सोचने लगी की गजल सुनु या गीत।  तभी मेहँदी हसन की गजल पर नज़र पड़ी। उसे ही चला दिया।
       " रंजिशे ही सही , दिल ही दुखने के लिए आ .... "
        मेहँदी हसन  की मखमली आवाज़ जैसे घर की नीरवता भंग कर रही थी। ' नीरवता! ' हां ! यही शब्द सूझता है उसे अपने घर के लिए।  पति घर में हो कर भी अपने में मग्न , माता जी या तो पूजा-पाठ या उसको कोसने के अलावा मुहं फुला कर बैठे रहना ही स्वभाव था। ऐसे में संगीत ही उसका सहारा है।
        ग़ज़ल के साथ-साथ माता जी की बड़बड़ाहट शुरू हो गई , "उम्र हो गई है , लेकिन ये गीत-संगीत की लत नहीं जाती ! बेटी को का क्या संस्कार देगी ! जब खुद ही का मन बस में नहीं ! भजनों में जाने क्यों इसका मन  लगता।  "
        खीझ कर उसने ग़ज़ल बंद कर दी। मन उदास हो गया। 'इनको मेरे सजने संवरने पर , मेरे संगीत सुनने पर इतना ऐतराज़ क्यों है। ' हाथ में पत्रिका ले ,उदास मन आँखों में पानी लिए छत पर चल पड़ी। चटाई बिछा कर लेट गई। सोचने लगी कि इतने बड़े घर में उसके लिए एक कोना नहीं है , जहाँ अपना सुख-दुःख कर सके। तभी वह भी आ गई तो वेदिका को अच्छा सा लगा।
        " कमाल की बात है ना , घर में दो औरतें हैं , फिर भी खामोश , चुप-चुप ! एक छत पर तो दूसरी लॉन में ! "
वह हंस रही थी।
       " यह मुझे भी मालूम है। लेकिन मेरे पास कोई हल नहीं है। मैंने बहुत कोशिश की कि माँ के पास बैठूं बात करूँ, लेकिन उनको तो सिर्फ उनके मतलब की बात या उनका स्तुतिगान ही पसंद है। मैं एक साधारण इंसान ही  हूँ , उनके असाधारण मानसिक स्तर को नहीं छू सकती। " वेदिका ने आहत और स्पष्ट शब्दों में अपनी व्यथा कह दी।
      लेकिन क्या राघव भी ......
          तभी सीढ़ियों से आहट हुई। वह झट से उठ बैठी। अपनी बेटी के क़दमों की आहट  को कैसे ना पहचानती भला ...
           बेटी को गले लगा कर वेदिका की जैसे आत्मा ही तृप्त हो गई। रुनकु के आते ही जैसे घर में रौनक आ गई। थोड़ी देर में तीनों लॉन में बैठी थी। वह माँ और दादी के बीच की कड़ी थी। दादी भी उसके बहाने से वेदिका को खूब सुना लेती थी। और वेदिका के पास सिर्फ मुहँ बनाने के अलावा कोई चारा नहीं था। मन में घुट के रह जाती बस।
     आज भी शुरू हो गई माता जी , उनके पास कौन बैठता है। बूढ़े इंसान की कोई जिंदगी है क्या ! और भी बहुत कुछ न कुछ ...
  " दादी माँ , आज ही सारी भड़ास निकाल देंगी तो कल क्या कहेंगी ! " रुनकु हंस पड़ी। वेदिका चुप रह कर कुढ़ती रही।
          ध्रुव को इसी बात से चिढ़ थी कि वह समय पर नहीं बोलती है और बाद में मन ही मन कुढ़ती रहेगी। और यही बात उसे मानसिक रोगी बनाये जा रही थी। 'मानसिक रोगी', शब्द दिमाग से जैसे टकरा गया हो। एक दम से खड़ी हो गई।
       " क्या हुआ मम्मा ?  उठ कैसे गए , अभी तो कल की प्लानिंग बाकी है ...."
     " कॉफी ले आती हूँ ! " वेदिका ने जाते हुए कहा।
   " रुनकु बेटा , मैं कॉफी -शाफी नहीं पीयूंगी ! बहादुर आएगा तो चाय बना देगा नहीं तो खुद बना लुंगी ! " दादी माँ ने ठसक से कहा।
       वेदिका को गुस्सा आया कि अगर कॉफी नहीं पीनी है तो चाय वह भी तो बना सकती थी। लेकिन कैसे भी हो वेदिका का दिल तो दुखना ही चाहिए था।
        " मम्मा , आप क्यों दादी की बातों को दिल से लगाती हो। उनको अपने हाथ की चाय पसंद है तो अच्छी बात है न ! आप या तो उनको उसी समय जवाब दे दिया करो नहीं तो एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकल दिया करो। "
      " माँ-बाप ने संस्कार यही दिए थे, जो समय के साथ परिपक्व होते गए। इतने बरस नहीं जवाब नहीं दिया तो अब भी जुबान नहीं खुलती...... तू नहीं समझेगी ! बड़ों का मान सम्मान भी तो कुछ होता है ! "
       " और अगर बड़े समझे ही ना तो ,  आखिर हम कितना झुकेगें ? टूटने की हद तक ? यह गलत है भई , मेरी तो इतनी सहन -शक्ति नहीं है मम्मा ! "
       " अच्छा -अच्छा रहने दे .... काम की बात करते हैं अब ! " वेदिका ने बात बदल दी।
        फिर कुछ दिन तक शादी की शॉपिंग में दिन बीते। कभी अम्मा जी भी साथ थी तो कभी राघव के साथ। बहुत सारी शॉपिंग हो गई। कुछ बच भी गई। सबकी पसंद के कपड़े लिए गए। वेदिका की बारी आई तो वह कुछ सोच में पड़ गई।
      " क्या सोच रहे हो मम्मा ? "
      " सोच रही हूँ कि कौनसा रंग लूँ , सभी अच्छे ही हैं ! " स्मित मुसकान लिए बेजारी से वेदिका ने कहा।
      " जो रंग सबसे ज्यादा पसंद हो वह लो ! " राघव कह रहे थे।
" रंग ! " फिर गुम होने को आई वेदिका ....
         उसे यह तो याद ही नहीं रहा कि उसको क्या रंग पसंद है या था। विवाह से पहले तो काला रंग ही पसंद था। कुछ स्वभाव भी विद्रोही था।  नए ज़माने की सोच लिए हुआ था। और फिर एक दिन विवाह हो गया।
       सोच पर पहरे तो नहीं लगे , हाँ अभिव्यक्ति कहीं दब गई। सास और पति की पसंद और ना पसंद के बीच उसकी पसंद कही खो ही गई थी।
     " हां तो फिर ! " राघव ने टहोका।
   " फिर क्या ? बता दीजिये कौनसी साड़ी लूँ .... , "
    " मैं इसमें क्या बताऊँ , जो अच्छी लगे वो लो .... "
    " हाँ जी सही कहा,मैं तो बाद में नुक्स निकलूंगा , क्यों ? " खिलखिला कर हंस पड़ी वेदिका।
       वेदिका को राघव का साथ बहुत अच्छा लगता था। इसमें बड़ी क्या बात थी ! ये तो हर पत्नी  को लगता है ! लेकिन वेदिका को राघव का साथ एक सुरक्षा का घेरा सा लगता था। चाहे वह उसकी उपस्तिथि को तवज्जो दे या ना दे। जाने क्या महक थी राघव में। एक जादू सा है उसकी ख़ामोशी में भी ...., ये महक, ये जादू उसे सम्मोहित किये रहता है और वह सम्मोहित सी उसके मद में डूबी सी रहती है।
       " हाँ जी वेदिका जी ! कहाँ खो गई ! " राघव उसे हैरान से पुकार रहे थे। थोड़े खीझ गए। यह लेडीज़ डिपार्टमेंट उनके बस में नहीं। वह बस मुस्कुरा दी। बोली , " आज नहीं लेना कुछ भी ! कल फिर से आएंगे ! "
   "  कल ! मम्मा  ! कल तो मैं चली जाउंगी ! "
     " कमाल है भई , मुझे कल समय नहीं मिलेगा ! जो भी लेना है आज ही ले लो ! "
       " इसमें चिल्ला कर बोलने की जरुरत तो नहीं थी , ये सेल्समेन क्या सोचेगा ! मेरी कोई इज़्ज़त है कि  नहीं ! "
तुनक गई वेदिका।
            राघव नाराज़ हो कर दुकान से बाहर आ गए। वेदिका और रुनकु  भी पीछे-पीछे आ गई। थोड़ी देर बाद घर की ओर चल रहे थे।  राघव खीझ रहे थे कि जो काम आज-अभी हो सकता था वह कल पर क्यों छोड़ा गया, काम तो और भी बहुत हैं । वेदिका की आंखे नम थी कि राघव को यूँ तो दुकान वाले के सामने खीझना तो नहीं था।
           शॉपिंग आज तो हो सकती थी कल पर छोड़ने  में कोई तुक भी नहीं बनती थी , पर इसके पीछे एक राज़ की बात भी थी ! वह राघव के साथ अगले दिन भी बाजार आना चाहती थी ; सिर्फ उसके साथ अकेले जाने के लिए। उसे उसका साथ और लॉन्ग ड्राइविंग बहुत पसंद थी। राघव को भी यह मालूम  है फिर वह क्यों नहीं जानता-समझता। और भी बहुत सारी  बातें है जो वेदिका मुहं से बिन बोले राघव को समझाना चाहती है पर वह नहीं समझता या समझना नहीं चाहता।
          वह  बाजार से आकर अनमनी सी ही रही। किसको परवाह थी !
           वेदिका को भी तो ऐसे अनमना नहीं रहना चाहिए था। उसको भी थोड़ा समझदार तो होना चाहिए ना ! घर में इतने काम थे और वह अपने बुझे मन को लिए बैठी थी।
          उस रात उसने अपनी डायरी में लिखा ," एक स्त्री क्या चाहती है  ? यह , वह स्वयं जानती है ! फिर भी वह चाहती कि कोई उसका खयाल रखे, उसको सुने और वह सब भी सुने जो उसका अव्यक्त है ।वह  कैसे दौड़ पड़ती है सबके लिए ,कोई तो उसका भी ऐसे ही फ़िक्र करे।  वह कभी-कभी परियों जैसा , राजकुमारी जैसा महसूस करवाना चाहती है जैसे उसके मायके में महसूस करवाया जाता है। कम-से-कम वह अपने पति से तो ये उम्मीद रखती ही है।  तो फिर क्यों ....? "
        लिखते -लिखते कलम मुँह में दबा कर , मुड़ कर देखा तो राघव निन्द्रा में मग्न थे। मुस्कुरा पड़ी। कितना  व्यवहारिक इंसान है। किसी की भावनाओं की परवाह ही नहीं।
        उसने आगे लिखा , " तो फिर क्यों , उसे पराई ही समझा जाता है। कहने को घर की रानी होती है , पर क्या सच में ? सच क्या है , सबको पता है... , यहाँ स्त्री पर जुल्म की बात नहीं है  पर समझने की यह बात भी कि एक स्त्री कब तक स्त्री रहती है ! जब तक वह सास ना बन जाये ,   तब तक ही ? तो उसके बाद क्या वह स्त्री नहीं रहती ?  यह जिंदगी शतरंज की बिसात ही तो है।  सारा खेल शह -मात का है। सारी लड़ाई सत्ता की ही तो है ...."
         " वेदिका ! तुम्हारा लिखना-लिखाना हो गया हो तो आकर सो जाओ ! " राघव की आवाज़ में आदेश था।
       वेदिका आदेश मानती आयी ही है तो आज कैसे मना करती। रात भी तो काफी हो चली थी।  एक अच्छी सी अंगड़ाई ले कर खड़ी हो गई।  आदमकद आईने में देख कर मुस्कुराई। मुस्कुराई कि रात को मुहं बिसूर कर सोने से सपने भी अच्छे नहीं आते।
            आने वाले दिन बहुत व्यस्त थे। शॉपिंग लगभग सम्पूर्ण हो चुकी थी। साँस लेने को भी फुर्सत नहीं थी। फरवरी के प्रथम सप्ताह में विवाह का मुहूर्त था। सभी रिश्तेदारों का आगमन हुआ। गीत-संगीत की धूमधाम रही। तेज़ संगीत और चमकती लाइटों की रौशनी में सब कुछ चमकदार था। कोई गिला-शिकायतें नहीं थी। बेटा दूल्हा बना बहुत प्यारा लग रहा था। नज़रे ही नहीं हट रही थी। दादी तो बार बलैयां ले रही थी। बुआएँ , मौसियां , मामियाँ और चाची -ताईयां सबका आशीर्वाद मिल रहा था। बहुत अच्छे से विवाह -कार्य संपन्न हुआ।
             अब नई बहू के स्वागत में घर में गहमा -गहमी थी।
         " वेदिका ! अब तेरा राज-पाट तो गया भई ! " ध्रुव की ताई ने चुटकी ली।
   " राज-पाट ? वो कब मिला मुझे ! जिसका जाने का डर हो " वेदिका भी हंस पड़ी।
बात हंसी की ही थी और जवाब भी हंसी में ही दिया।  लेकिन कई चेहरों पर रंग आयेऔर चले गए। माहौल देखते हुए कुछ कहा तो नहीं गया अलबत्ता होठों पर तिर्यक रेखा अंकित हो गई।
       वेदिका का मन बुझ सा गया। वह गुम होने को आयी। एक लड़की जो बहू बन कर एक पराये घर में जाती है ,परायी बने रहने के लिए नहीं बल्कि तन -मन से सबको अपनाने ही आती है। फिर भी वह तब तक परायी ही मानी जाती है ,जब तक अगली परायी लड़की उसकी जगह लेने नहीं आ जाती ! तो अब एक पराई लड़की का आगमन होना है और उसका राजपाट छिन जाने वाला था ?
             हमारे समाज में  एक लड़की को सास के नाम पर इतना डराया जाता है कि वह सोचने लगती है कि सास एक बहुत खतरनाक प्राणी है। वह एक असुरक्षा की भावना और  जिद से भर जाती है कि वह अपना वर्चस्व स्थापित करके ही रहेगी। सास को भी तो डराया जाता है कि अब उसकी नहीं चलने वाली। आखिर एक स्त्री ने इतने सालों तक तपस्या से अपने घर को बनाया होता है , सजाया होता है तो उसे कोई और लड़की, वह भी पराये घर से आई हुयी , कैसे हरा सकती है ? जाने-अनजाने वह भी एक असुरक्षा से भर जाती है।और यही कारण है सास-बहू की तकरार का भी ।
      कभी- कभी लगता है , एक स्वस्थ रिश्ते को पनपने देने की बजाए  जैसे अखाड़े में उतरने के लिए दो पहलवानों को तैयार किया जाता है वैसे ही सास-बहू को तैयार किया जाता है। नसीहतें दी जाती हैं , सिखाया-पढ़ाया जाता है।   सोचती हुयी हंस पड़ी।
           " देख कैसी खुश हो रही है , सब पता चल जायेगा जब बहू आएगी।!" दादी ने धीरे से पास बैठी अपनी बेटी को कोहनी मारी।
           " अब नया जमाना है माँ , नयी बातें है...., अब ना तो सास सख्त है और न ही बहू दब कर रहने वाली... " बेटी ने जैसे समझाया हो माँ को या खुद को ही।
           इंतज़ार की घड़ियाँ कम होती जा रही थी। फोन पर जानकारी दी जा रही थी कि नयी बहू कांकड़ पर आ गई है। घर की महिलाओं में उत्साह सा था एक नए सदस्य के स्वागत का। ध्रुव की दादी भी बहुत हर्षोल्लासित थी। जैसे पैरों में घुंघरू बांध लिए हो।
            दुल्हन दहलीज़ पर खड़ी थी। जैसे ही अन्दर आने को कदम बढ़ाया तो साथ खड़ी ध्रुव की बुआ ने आहिस्ता से कहा , " शिवि बिटिया ! पहले दायाँ पैर आगे बढ़ाओ। घर की लक्ष्मी हो , तुम्हारे आने से घर में धन-धान्य की वृद्धि हो। "
         नयी दुल्हन शिवि ने पलकें उठा कर बुआ को देखा और उनकी आज्ञा का पालन किया।
         ध्रुव-शिवि की जोड़ी सराहनीय लग रही है।  वेदिका की तो नज़रें ही नहीं हट रही थी। बहुत प्यार से आरती उतार कर दोनों को गले लगा लिया। वेदिका को शिवि की सांसे वैसी ही महसूस हुयी जैसे नवजात बच्चे की होती है। थोड़ी कच्ची-कच्ची सी , थोड़ी तेज़-तेज़ सी।
           आँखों में सपने और अजनबीपन लिए ..... जैसे एक पौधा इंतज़ार कर रहा हो , अपने रोपे जाने का। एक आशंका भी थी पता नहीं धूप , पानी और थोड़ा सा आसमान मिलेगा या नहीं। बेशक नए ज़माने की लड़कियां बहुत बहादुर और सामंजस्य बिठा लेने वाली होती है लेकिन यह अपनाने वालों पर भी निर्भर करता है कि वे नयी बहू से अपेक्षाओं से अधिक , कितना अधिक प्रेम और स्नेह  देते हैं।
           लाल आलता से रंगे कदमों को आहिस्ता-आहिस्ता बढाती हुई शिवि , वेदिका को साक्षात् लक्ष्मी का रूप ही लग रही थी। घर का वातावरण बहुत खुशनुमा हो गया था। हंसी -ख़ुशी सारी रस्में निभाई  जा रही थी।
     " लो भई शिवि भाभी जीत गई  ! भैया तो हार गए ! " रुनकु  ने ताली बजाई तो सभी औरतें खिलखिला कर हंस पड़ी।
      " बेटियां जीतती ही अच्छी लगती है ! " वेदिका ने भी हंस कर साथ दिया तो शिवि ने वेदिका को गौर से देखा। उसके मन में एक  हिलोर सी उठी , यकायक माँ की याद आ गई।  कितनी भीड़ थी ! सभी अजनबी थे। कहने को ध्रुव से थोड़ी सी पहचान थी वह भी फोन के माध्यम से ही। ऐसे में प्यार और अपनेपन के बोल बहुत सुहाते हैं।
         थोड़ी देर में दादी भी आ गई। बहुत दुलरा रही थी। स्नेह से सर पर हाथ फिराते थक नहीं रही थी।
    " सुनो बहू , अब ये तुम्हारा अपना घर है , फिर भी बहू तो बहू ही होती है  !इसकी मान-मर्यादा भी तुम्हारे हाथ में ही है। अब कहीं भी मुँह उठा कर चल दो या जोर का हंसी ठट्ठा तुमको शोभा नहीं देगा ! " दादी के स्वर में प्यार भरा आदेश था।
     " क्या दादी ! आज ही तो आई है और यह सिखलाई -पढाई शुरू हो गई ! " रुनकु ठुनक सी गई।  अलबत्ता महिलाओं में एक चुप्पी सी पसर गई थी।
          " हाँ कुछ बातें तो हैं जो सिखलाई -पढाई जा सकती है।  शिवि बेटा , मैं चाहती हूँ कि तुम इस घर की अच्छाई को ही बाहर बताओ और कोई भी बात जो तुम्हें बुरी लगे , कैसी भी शिकायत हो वह मुझे बताओ।  मन को अंदर ही अंदर घोट लो , यह मुझे पसंद नहीं आएगा। " वेदिका ने बहुत अपनेपन से कहा।
           शिवि के मन में एक हिलोर फिर से उठी और माँ याद आ गई।
       शिवि नए ज़माने की ही लड़की थी तो सामंजस्य बैठाने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी ।
              दो सप्ताह पुरानी दुल्हन सुबह -सुबह ही रसोई में वेदिका के पास खड़ी थी। चाय लेने आई थी। वेदिका भी आज जल्दी ही उठ गई थी। बेटा -बहू  ने घूमने जाना था और रुनकु ने भी वापस हॉस्टल , इसलिए वह नाश्ते का इंतज़ाम कर रही थी। मौसम  ठंडा था। हल्की  बारिश भी हो चुकी थी।
          " शिवि बेटा ! तुम्हें यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं ! कैसे महसूस होता है ? " वेदिका के शब्द बहुत कोमल थे।
        " मम्मा ..., " कह कर चुप सी हो गई।
      " हाँ बोलो बेटा ! " थोड़ा आशंकित सी हुई वेदिका।
      " मुझे यहाँ ठण्ड का अहसास सा होता है ! ठंडा -ठंडा सा ..., " कहते हुए झिझक सी गई  शिवि।
       " अरे बेटा .... ," हंस पड़ी वेदिका।
        " अभी तुमने यहाँ की , इस घर की गर्माहट को दिल से नहीं अपनाया।  समय लगता है बेटा .... फिर सब ठीक हो जायेगा।  लो  चाय ले जाओ और तैयार हो जाओ , " सर पर स्नेह से हाथ फेर कर चाय की ट्रे थमा दी। मन भर आया वेदिका का , आँखे नम कर के कुछ सोच ने लगी और चाकू से स्लेब पर एक लकीर खींच दी।
         " बीबी जी ! एक बताओ जी ! " वेदिका ने अपनी सोच और हाथ का काम रोक कर बहादुर की और देखा जो कि बहुत गंभीर मुद्रा में कुछ कहना चाह रहा था।
         " हां बोलो ? "
      " बीबी जी ! आप मुझे बताओ कि ये जो बादल होते हैं उनमे पानी धरती का होता या आसमान से आता है ? "
वेदिका हंस पड़ी कि ये कैसा सवाल है। लेकिन उसकी गंभीर मुख मुद्रा देख कर अनजान बनते हुए बोली , " अरे भई , जब बादल आसमान के होंगे तो पानी भी आसमान से ही तो लेगा ना , कोई धरती से से पाईप थोड़ी न जोड़ रखी है ! "
         बहादुर खिलखिला कर हंस पड़ा , " नहीं बीबी जी , धरती पर जो नदी ,तालाब और समंदर होते है उसका पानी धूप में , भाफ बन कर उड़ जाता है और उनसे बादल बनते हैं ! "
           " ओहो , अच्छा ! मुझे तो ये पता ही नहीं था ! तू तो बड़ा सायना है ! " हंस पड़ी वेदिका। उसके साथ-साथ बाहर  से भी  जोर से हँसने आवाज़ आई तो वह चौंक पड़ी।
         " क्या मम्मा आप भी ना , कैसी  बात कर रही हो , इस बहादुर के आगे भोले पन की बात कर रही हो। इसको डांट भी सकती थी। आप का भी ना दिमाग ...., "
       " दिमाग खराब है , मंद-बुद्धि हूँ ! अरे भई , कई बार किसी का मन रखने के लिए अनजान बनना भी अच्छा ही होता है। अगर मैं डांटती या अपना ज्ञान बघारती तो बेचारे मासूम का दिल ना टूट जाता  !  " वेदिका ने ध्रुव की बात काट दी।  वह बहू के सामने आहत महसूस कर रही थी।
         " लेकिन ध्रुव इसमें ना तो  मंद -बुद्धि और दिमाग खराबी की बात तो कहीं नज़र नहीं आई , यह तो मम्मा की सरलता और सहजता है जो एक नौकर का दिल भी दुखाना नहीं चाहती। सरल होना भी तो कर किसी के बस में कहाँ है ! हाँ ना मम्मा ! " शिवि ने बहुत प्यार से वेदिका की और देखते हुए कहा।
           " ले  सुन ले रुनकु ! अब इस घर में तेरी माँ की हिमायती आ गई है तेरी जगह लेने ! " दादी कटाक्ष करने में कहाँ चुकने वाली थी।
          " मेरी जगह कौन लेगा भला ! और शिवि भाभी की अपनी जगह है ! ये तेरी जगह -मेरी जगह मुझे समझ नहीं आती दादी .... चार दिन की जिंदगी है क्यों ना मिल कर गुजारें। "
          दादी-पोती का संवाद वेदिका को कहीं  गुम कर गया और उसने डाइनिंग टेबल पर ऊँगली से एक साथ बड़ी से छोटी लकीरें खींच दी जब तक एक बिंदु की जगह ना रह गई। वेदिका को शिवि बहुत गौर से देखती रही।
       दोपहर तक सभी चले गए। रह गए तो बस वेदिका और अम्मा जी। अम्मा जी सोने चल दिए और वेदिका छत पर। अब सर्दी तो नहीं रही थी फिर भी थोड़ी सी धूप -छाँव देख कर चटाई बिछा दी। उसके पीछे -पीछे वह भी आ गई।
       " बहुत दिन हुए तुमको मेरी याद भी नहीं आई  ! "  उसने उलाहना सा दिया।
      " नहीं तो ! तू तो मेरे दिल में बसी है फिर तुम्हें कैसे भूल जाती !  बस समय ही नहीं मिला।  वेदिका हंस कर बोली।
         " बहू तो तुम्हें अच्छी मिली है ! जैसी तुम चाहती थी वैसी ही .... ,"
        " मेरी बहू को मनभाती सास मिली या नहीं , यह कौन बताये मुझे ? " वेदिका ने झट से जवाब दिया।
      फिर पास ही पड़े उखड़े पत्थर  से वहीँ एक लकीर खींच दी। सोचने लगी ये मनचाहा क्या होता है। जो हमें अच्छा लगे वही मिले। सामने वाले की भी तो यही कामना होती है कि उसे भी मनचाहा मिले। फिर क्यों नहीं हम सामने वाले के हितों की रक्षा करते। अगर ऐसा हो जाय तो फिर सारी समस्या  , प्रतिद्वंदिता ही समाप्त हो जाएगी। पर क्या यह संभव है ! यहाँ तो हर कदम पर खुद को साबित करने की होड़ है। कोई किसी से कम नहीं रहना चाहता।
        " क्या सोचने लगी वेदिका ? " उसने टहोका।
      " कुछ भी नहीं , और बहुत कुछ भी ... , आज माता जी ने मुझे समझाया कि बहू को सर चढ़ाने की जरुरत नहीं। कंट्रोल में रखना सीखो। एक बार हाथ से निकल जाएगी तो बेटा भी हाथ से गया ही समझो ! मुझे हंसी आ गई। पर मन ही मन में हंसी। कि अभी तो मैं भी आपके ही कंट्रोल में हूँ तो किसको बस में करूँ और किस को नहीं। जहाँ तक बेटे की बात है। नदी तो सागर की ओर ही बहेगी। बंधन में किसको बांधना, जो मेरा है वह  तो मेरा ही रहेगा न !"
           " हम्म्म ....," उसे भी कोई जवाब नहीं सूझा।
        घर में एक नए सदस्य आ जाने से वेदिका को  जीवन में परिवर्तन सा महसूस सा हुआ। अपने अंदर आत्मविश्वास सा महसूस करने लगी थी। बेटे के व्यवहार में भी बदलाव आया था अब तुनकता नहीं बल्कि बड़ा और जिम्मेदार सा लगने लगा।
            " वह तो होना ही था वेदिका ! मेरा बेटा है , मुझ पर ही जायेगा न , बीवी का गुलाम !" राघव ने चुहल की।
          वेदिका भी तमक गई कि राघव और गुलाम  ! कुछ कहना चाह रही थी कि  माता जी ने आवाज़ लगा दी। माता जी की ठसक तो वही थी पर खुद को कहीं -न-कहीं असुरक्षित सी महसूस भी कर रही थी। क्यूंकि उनकी नज़र में राजगद्दी उनके हाथ से छिन गई थी। अब डर था कि नया राजा , पदच्युत राजा के साथ कैसा व्यवहार करने वाला है। वेदिका समझ तो रही थी पर वह ऐसा कुछ नहीं सोच रही थी। ' जियो और जीने दो ' उसका तो यही जीवन जीने का लक्ष्य था।
           शिवि ने बहुत गौर से वेदिका की गतिविधि देखी। उसने देखा कि मम्मा दिन में कई-कई बार गुमसुम हो जाती है। और कभी तो ऊँगली से लकीरें खींचने लगती है। उसने ध्रुव से पूछा तो वह हंस कर बोला कि ये मम्मा की उम्र का असर है। इस उमर में औरतें ऐसे मानसिक रोगी हो ही जाती है। वह खुद ही हंसती है और कई बार तो बात भी अपने आप से करती है।
      " अच्छा ! तो फिर दादी तो ऐसे नहीं हुयी और मेरी माँ भी ऐसे गुमसुम नहीं  होती ! मम्मा कुछ भावुक स्वभाव की है। सरल और सहज है। छल-प्रपंच उनको नहीं आते। बस यही नुक्स है उनमें ! " शिवि ने कुछ सोचते हुए कहा।
          " अच्छा ! तुम ने तो आते ही मम्मा को जान-समझ लिया !  बहुत बुद्धिमान हो। लगता है एक दिन तुम भी मम्मा की जगह लेने वाली हो। " ध्रुव बिन सोचे बोल गया।
          " देखो ध्रुव ! मैं , तुम्हें अपने  स्वाभिमान से खेलने की इज़ाज़त कभी नहीं दूंगी। बेशक पति -परमेश्वर कहे जाते हो पर ...." कहते हुए चुप हो गई।
         ध्रुव आहत सा उसे ताकता रहा और वह सोच रही थी कि गलत बात का विरोध तत्काल कर देना चाहिए।
   शिवि और ध्रुव के जाने का वक्त भी पास आने लगा था। दादी को नई बहू की बातें कुछ-कुछ  ही पसंद आती थी और बहुत सारी बातें नापसंद ही थी।  वह नए ज़माने को आत्मसात करने को झिझक रही थी। और करती भी क्या , थोड़ी भौचक्की भी थी। क्यूंकि ज़माने ने एकदम से करवट ली है और बहुत सारी बातें एक दम से बदल गई है। वह अब भी पुरानी  बातें ले कर बैठी रहती थी कि पहले तो ऐसा नहीं होता था। अब तो बहुत बदल गया है।
     " माता जी ! अगर हम पहले की बातें ले कर बैठे रहेंगे और आज को कोसेंगे तो तरक्की कैसे करेंगे ? " वेदिका ने माता जी को टोक ही दिया।
      " सच्ची ! दादी माँ ! मम्मा की बात एक दम सही है ! " शिवि ने कहा।
      " क्या बात सही है ! " माता जी को वेदिका की पैरवी पसंद नहीं आई। वह आगे  कुछ कहती इससे पहले ही वेदिका अनमनी सी छत की तरफ चल दी। अपनी बच्चों के सामने तो अपमानित होती आई थी लेकिन अब बहू के सामने अपनी किरकिरी नहीं करवानी चाहती थी।
            छत पर जाते ही वह भी आ गई।
      " क्या हुआ , आज बहुत दिन बाद मिली हो ? उदास हो ? "
    " हाँ ........ शिवि -ध्रुव के जाने के बाद तो तुमसे रोज ही मिलना होगा। " कहते हुए उसने ऊँगली से फर्श पर लकीरें खींचना शुरू किया ,  तब तक नहीं रुकी , जब  एक बिंदु ना रह गया।
       वेदिका को पता नहीं चला कि कब शिवि उसके पीछे चली आई थी। बहुत गौर से देख रही थी कि मम्मा किस से बात कर रही है। वहां तो कोई  नहीं था।  खुद से ही बात कर रही थी। कोई काल्पनिक पात्र है जिस से वह मन की बात कर रही थी।
         " उफ्फ ! भावुकता की हद है ! " मन ही मन शिवि ने कहा और व्याकुलता से वेदिका को पुकारा।
        " मम्मा ! आप किस से बात कर रहे हो ? "
      वेदिका चौंक पड़ी। जैसे चोरी पकड़ी गई। कोई शब्द नहीं सूझे।
           " यह क्या मम्मा ! कोई बात करने वाला नहीं मिला तो खुद से ही बातें करने लग गए। " शिवि ने बहुत प्यार और कोमलता से पूछा तो वेदिका की जैसे रुलाई फूट ने को आई। लेकिन संयत रही । इस में तो वह वैसे भी बहुत सिद्धहस्त थी।  चुप हो शिवि को ताकती रही।
           " बोलो तो मम्मा , आप ऐसा क्यों करने लगे हो। "
           " मेरे पास और कोई हल नहीं था ...."
         " क्या हल नहीं था ? खुद से बातें करने के अलावा क्या ? "
         " हाँ। " संक्षिप्त सा उत्तर दिया वेदिका ने।  थोड़ा चुप रह कर बोली , " तुम नहीं समझोगी वेदिका ! चालीस की उम्र  के बाद स्त्री के जीवन में कितना  परिवर्तन आता है। यह वह समय होता है जब उसकी छाया में रहने वाले बच्चे उससे ही कद में ना केवल लम्बे बल्कि बड़े भी बनने लग जाते हैं। कितना मुश्किल होता है जब आपको नाकारा जाने लगता है। "
           " अच्छा , और ! " शिवि ने बहुत गौर से वेदिका देखा।
     वेदिका थोड़ी हैरान थी कि वह क्यों इस परायी लड़की के सामने अपना मन खोलने की कोशिश कर रही है। यह तो उसकी प्रतिद्व्न्दि है। अपनी कमज़ोरियाँ क्यों जाहिर कर रही है।
           " मम्मा ! मैं बेशक पराई हूँ , आपकी बहू ही हूँ , बेटी नहीं हूँ ! पर आप मुझे अपना  हमदर्द तो मान ही सकती है , मैं तो सोचती हूँ कि  चालीस की उम्र के बाद कोई भी स्त्री अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से चाहे दिशा में सकारात्मक तरीके से मोड़ सकती है। आप में भी कई हुनर हो सकते हैं तो अपना कोई शौक पूरा क्यों नहीं किया। यह भी क्या बात हुयी ! आपने तो खुद को कछुए की तरह खोल में ही समेट  लिया। " शिवि ने अंतिम वाक्य थोड़ा ठुनकते हुए कहा तो वेदिका को हंसी आ गई।
        " अब तू मुझे समझाएगी कि मुझे क्या करना चाहिए था। " मुस्कराते हुए वेदिका ने आगे कहा , " शिवि बेटा मुझे पता था कि मैं क्या कर सकती थी और क्या नहीं ; लेकिन कर नहीं पाई। बस ..... जैसे तुम कहती हो कि खुद को खोल में ही समेट लिया , कछुए की तरह ही ! " कहते हुए गला भर्रा गया।
          " आपने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अच्छा समय फिजूल की भावुकता में गँवा दिया। यह दुनिया  ऐसी ही है , यहाँ हर किसी को अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है , अपने हिस्से का आसमान भी खुद ही खोजना होता है। आपने क्या सोचा ; कि  कोई आएगा और आपको आगे बढ़ने का मौका देगा। यहाँ मैं स्त्री या स्त्री विमर्श की बात नहीं करती , क्यूंकि आप पर कोई जुल्म नहीं हुआ ना ही दबाया गया कि  आपको आगे बढ़ने से रोका गया हो। बस कोरी भावुकता चलते हुए मम्मा आप बस खुद को कमतर समझते गए। " शिवि ने बहुत दृढ़ता से कहा।
             वेदिका चुप थी।  सच भी यही था। उँगलियाँ फिर से फर्श पर रेंगने लगी और लकीरे खींचने लगी।
     " मम्मा ! इन लकीरों का क्या मतलब हुआ  ? जरा मुझे समझाइये तो ये बिंदु का क्या मतलब हुआ ! " शिवि ने कौतुहल से पूछा।
         वेदिका सोचने लगी कि जरूर उसने पुण्य किये होंगे।  तभी तो शिवि जैसी सुलझी हुई  बहू  मिली। उसको प्यार से देखती हुयी सोचती रही।  फिर बोली , " यह बिंदु मैं हूँ , इस घर में मेरी हैसियत इतनी है ! ना कम ना ही ज्यादा। बाकी सभी बड़ी लकीरें , छोटी लकीरें। "
           " अच्छा मम्मा ! मगर आप इसे ऐसा भी तो सोच सकते हैं। " वह थोड़ा हैरान होते हुए शिवि ने कहा।
     " कैसे ........... "
       " जैसे आप खुद को बिंदु कहते हो तो देखिये मैंने इस बिंदु को बीच में रखा और बाकी लकीरों को इसके बाहर चारों और खींच दिया।  अब देखो आप केंद्र में हो और सभी लकीरें आपके चारों ओर से घेरे हुए हैं। आपके बिना किसी का अस्तित्व ही क्या ? " शिवि हंसी तो वेदिका भी हंस पड़ी।
           वेदिका के पास कोई जवाब नहीं था उसने हाथ बढ़ा कर शिवि को अपनी तरफ खींचा तो शिवि ने भी हंस कर गले में बांहे डाल दी। दो स्त्रियों को वह भी एक ही घर की , यूँ हँसते देख वह चुपके से चल पड़ी। उसे भी वेदिका की निर्मल हंसी बहुत भा रही थी।
 
       
उपासना सियाग
नै सूरज नगरी
गली नम्बर 7
नौवां चौक
अबोहर ( पंजाब ) 152116

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