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रविवार, 10 मई 2026

चीवी चांऊं ( टीवी चलाऊं)

बच्चे छुट्टियाँ मना कर अपने अपने ठिकाने गए। दादा - दादी टीवी के आगे बैठे हैं ।

दादी - " चीवी चांऊ (टीवी चलाऊं) ?"

दादा जी - " हाँ..."

दादी - " मिक्की माउछ चांऊ !

दादा जी -" नहीं ऐलीफैत चाओ !"

दादा - दादी का सम्मिलित ठहाका गूंजा , लेकिन आंखों में नमी थी ।

उपासना सियाग 

अबोहर 

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

बेन जी 26 जनवरी कब है..

चौथा दिन 

       हम अक्सर बचपन को बहुत याद करते हैं। गर्मियों की छुटियों में ननिहाल आना। पूरे डेढ़ महीने की धमा - चौकड़ी याद है। गुड्डियां खेलना , बैल -गाड़ी पर खेत जाना और ट्रैक्टर की ट्राली में बैठ कर शहर आना। कितना अच्छा समय था। 

          ननिहाल ही क्यों , जहाँ हम रहते थे , वहाँ क्या कम मजे थे ! पढ़ने का तो हम चारों बहनों  शौक था। गर्मी में जब स्कूल का टाइम सुबह का होता था और दोपहर में छुट्टी होने के बाद घर लौटते तो चूल्हे पर पक रही सब्जी की महक भूख बढ़ा दिया करती थी। 

         सर्दी में शाम को चाय या बोर्नविटा वाला दूध मिलता था। तब कॉफी नहीं पीने को मिलती थी कि 18 साल से पहले नहीं पीते। 

        एक दिन स्कूल से लौटे तो माँ एक सब्जी बेचने वाली आंटी से उलझी थी। उनका वार्तालाप यह था। 

        आंटी ," बेन  जी , 26 जनवरी कब है ? "

         माँ ,  "26 तारीख को। "

          " नहीं बेन जी , मैं 26 जनवरी का पूछ रही हूँ। "

          " हाँ तो ! मैं और क्या बता रही हूँ ? "

            " बेन जी ,आप तो 26 तारीख  बता रही है और मैं 26 जनवरी पूछ रही हूँ ! "

            " क्यों क्या है  26 जनवरी को ? " 

            " मेरे भाई का ब्याह है ! " आंटी जी खुश हो कर बता रहे थे। 

         माँ को हंसी आ गई।  मुझ से कैलेंडर मंगवाया और उनको दिखा कर पूछने लगे ," बताओ ये कौनसे महीने का नाम लिखा है ?"

          " जनवरी !"

         " आज क्या तारीख है ?"

               " तीन ! "

            " मतलब कि तीन जनवरी , ऐसे ही देखो ये 26 तारीख है और जनवरी का महीना है तो 26 जनवरी कि नहीं !"

          आंटी जी एक बार चुप हो कर सोचने लगी और फिर खिलखिला कर हंसने लगी , " अरे मैंने तो सोचा था कि जैसे दूसरे त्यौहार होते हैं वैसे ही ये भी होता होगा !"

         माँ ने समझाया कि है तो यह एक त्यौहार ही ये निश्चित तारीख को ही आता है। 

        बहुत सारे साल बीत गए लेकिन 26 जनवरी को एक बात ये वाकया जरूर याद करती हूँ। 


             








शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

राम मुरदा है !

          कई बार शब्दों के हेर - फेर से भी गड़बड़ हो जाती है। हम चाहे कितनी भी हिन्दी में बात कर लें ; स्थानीय भाषा का समावेश हो ही जाता है। बड़ा बेटा अंशुमान जब सातवीं /आठवीं कक्षा में था तो उसने अपनी कक्षा में हुए  किस्से को सुनाया तो हँस कर लोट - पोट हो गए। 

        उसने बताया कि आज हिन्दी की कक्षा में , अध्यापिका जी ने अचानक ही टेस्ट ले लिया। कॉपी चैक करते हुए उन्होंने एक बच्चे का नाम पुकारा तो वह खड़ा हुआ। 

                 अध्यापिका जी हैरान से होते हुए , " यह क्या लिखा है ? "

               बच्चा , " मैडम , राम मुरदा है।  "

                         " राम मुर्दा है ! "

                     " हाँ जी मैम , राम मुरदा है ! "

                       " मुर्दा है ? "

                     " हाँ जी  मुरदा है ? " बच्चा नासमझी के भाव से अध्यापिका को देख रहा था। 

                   " कमाल है , वाक्यों में प्रयोग करने कहा गया था।  राम को किसान , मंत्री , ड्राइवर  आदि बनाना तो ठीक था लेकिन तुमने तो मुर्दा ही बना दिया !" कहते हुए  अध्यापिका ने बच्चे को नाराजगी से देखा। 

               " तुमको पता भी है , मुर्दा का क्या मतलब होता है ! "

            " हाँजी मैम ,  मुरदा का मतलब , कमजोर होता है....! "

      अब तो कक्षा में बच्चों समेत अध्यापिका जी की भी हंसी छूट गई थी। और मैं भी कभी -कभी बच्चों का बचपन याद करते हुए हँस लेती हूँ। 

बुधवार, 20 जुलाई 2022

डायरी लेखन

  23  /02 /2022   

       रोज डायरी लेखन , मतलब मन की बात ! मन तो कहीं न कहीं पहुंचा ही रहता है। ननिहाल पंजाब में है और ससुराल भी पंजाब ही में।  तो इसी मिट्टी में जन्मी और इसी में मिल जाऊँ, यही सोचती हूँ। 

    डायरी की शुरुआत बचपन से करती हूँ। ननिहाल में ही गर्मियों की छुटियाँ बीती थी तो प्रभाव भी वहीं का पड़ा। 

         " क्या समझाऊँ इस भाटे को !"  

     नाना जी के इस कथन को बहुत  याद करती हूँ , या यह भी कह सकती हूँ कि दिमाग में यह वाक्य अक्सर ही कौंध जाता है। नाना जी उस ज़माने के पांचवीं  जमात तक पढ़े हुए थे। और  विचार धारा पक्की आर्य समाजी।  जब भी छुट्टी में जाना होता तो सत्यार्थ - प्रकाश पढ़ते पाती थी। मुझसे ,मेरी बहनों से भी पढ़ने को कहते थे।   मैं बहुत उत्साह से पढ़ती थी। तब वे बहुत खुश हो कर पीठ थप थपाया करते थे। 

         हाँ , तो बात नाना जी  कथन  रही है।  जिसे वे अक्सर ही बहस में जीतने के लिए या कोई पोंगा -पण्डिति की बात करता तो खीझ कर बोल उठते।  सामने वाला उनकी उम्र या चौधराहट के रौब में आकर चुप हो जाता था। 

         मैं हमेशा से ही शब्दों पर गौर करती रहती हूँ।  'भाटा '  मतलब पत्थर ! तो इसका मतलब हुआ कि सामने वाला पत्थर हुआ , मतलब कि जड़ -बुद्धि '. ....लोगों को कहते तो मान लेती कि नाना  है मेरे , तर्क बुद्धि ज्यादा है उनकी। लेकिन यही बात जब नानी को कहते तो मुझे अच्छा नहीं लगता था। माना कि मैं छोटी थी पर कुछ  समझ तो थी ही। 

         तेरह बरस की उम्र से जिस औरत ने घर संभाला।  केवल घर बल्कि उनके तीन बच्चों की ( पहली पत्नी के ) माँ और फिर खुद के भी तीन बच्चों को जना ,पाला,ममता दी। यह अहसास भी न होने दिया कि कौनसे सगे -सौतेले हैं। 

           तो क्या एक स्त्री जड़ बुद्धि ही होती है ? 

          मेरे विचार से स्त्री जड़ बुद्धि होने का नाटक ही करती है। अपनी समझ -बुद्धि को ताक पर रखने का ढोंग करते हुए मंद मुस्कुराते हुए अपने घर -आंगन को संभालती रहती है। समझता तो पुरुष भी है कि स्त्री पत्थर नहीं है , फिर भी न जाने क्यों वह उसे पत्थर समझ कर वार करता है , कि स्त्री खंड -खंड बिखर जाये। लेकिन स्त्री हर वार को पत्थर पर पड़ती छेनियों की तरह लेकर एक सुन्दर मूरत  में ढलती जाती है। और मरने के बाद ही पूजी जाती है। 

अब दिल तो दिल है भई !

 दूसरा दिन 

        स्त्रियाँ मूरत रूप में ढल तो जाती है पर ह्रदय से पत्थर नहीं बन पाती। पत्थर की मूरतों में भी नन्हा सा दिल धड़कता है। अगर यह अपनी हद में रह कर धड़कता रहे तो ठीक है , नहीं तो बागी , कुलटा और भी न जाने क्या क्या सुनना पड़ेगा। मतलब  खुद को मार दो। इसको अगर  धड़कना है ,तो सिर्फ स्पन्दित होने के लिए  , एक मिनिट में सिर्फ ७२ बार ही स्पंदन की ही मंजूरी है। खुल कर धड़का नहीं कि सारे ग्राफ बिगड़ गए। 

            अब दिल तो दिल है भई ! उसे क्या मालूम सीमा-रेखा। 

      दिल के लिए स्त्रियों को फालतू में दिमाग लगाने की भी इज़ाज़त है क्या ?   

            नहीं तो ! 

      आज स्त्रियाँ बेशक चाँद पर जाने के सपने देख रही हो। और ये सपने दिल  तक ही सीमित रहे तो ठीक है । जैसे ही दिमाग में सपने देखने का कीड़ा कुलबुलाएगा ,  दिल को तो धड़कना पड़ेगा ही। जैसे  ही दिल धड़केगा , थोड़ी बहुत तो ,नहीं ज्यादा नहीं , बस थोड़ी सी तिड़क जाएगी ये मिट्टी की मूरतें। 

        तिड़की हुयी दरारों से ठंडी हवा का झोंका उसे फिर से इंसान होने की भूल दिला जायेगा। अब यह स्त्री पर है कि  वह सिर्फ दरारों से झांके और  खुद को मूरत होने का अहसास दिलाती रहे। अहिल्या की तरह एक राम का इंतज़ार करे। या फिर खुद ही मूरत से बाहर आ जाये। 


शुक्रवार, 6 मई 2022

कुल्हड़ में गुड़ फोड़ना

      25/02/2022  

          कई लोगों की आदत होती है बात छुपाने की। मैं इसे ' कुल्हड़ में गुड़ फोड़ना ' कहती हूँ। मतलब कि कुल्हड़ में गुड़ फोड़ोगे तो नतीजा क्या निकलेगा ? गुड़ के साथ कुल्हड़ भी तो फूटेगा न ! 

      तो भई जरुरी नहीं है हर किसी को बात बताई जाये। लेकिन कोई तो ऐसा होना ही चाहिए जिसे मन की बात कही जा सके। हो सकता है हल न निकले , मन तो हल्का हो ही जायेगा। 

        यह आदत स्त्री - पुरुषों  , दोनों में हो सकती है। 

       कई लोग सोचते हैं , सामने वाला खुद ही उनको समझ जाये और उनके मन के अनुरूप व्यवहार करे , उनकी जरूरतें पूरी कर दे। अरे भई , आपके कोई बल्ब तो नहीं लगा कि इस रंग की बत्ती जली तो ये बात है , और उस रंग की बत्ती जली तो वो बात है। खुल कर बोलिये।  विरोध कीजिये। और अपनी बात  रखिये हक़ से !

            बहुत लोग होते हैं जो बोलते नहीं फिर भी  उनके हाव -भाव बता देते हैं कि उनको क्या समस्या है। मेरे लिए उनके लिए एक ही सलाह है , बिन रोये तो माँ भी दूध नहीं पिलाती !

          

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

सोच

सोच
    दादी नन्ही सी पोती को दुलरा रही थी, " ये तो मेरी सरोजनी नायडू है, रानी लक्ष्मी है, मेरी लता मंगेश्कर  है."
       माँ ख्यालों में गुम हुई सी बोली, " मैं तो मेरी बेटी को विदेश भेजूंगी, यहाँ क्या रखा है? "
        दादी  एक नज़र अपनी बहू पर डालते हुए पोती को फिर से दुलराने लगी, हाँ- हाँ. मेरी गुड़िया तो सारा संसार  घूमेगी फिर रॉकेट में बैठ कर चाँद पर जायेगी...."
    और वहाँ से बोलेगी , " सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा.."
उपासना सियाग (अबोहर)