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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

कीमत (लघुकथा )

माँ की इच्छानुसार तेहरवीं के अगले दिन उनके गहनों का बंटवारा हो रहा था। चाचा जी दोनों भाई -बहन को अपने सामने बैठा कर एक-एक करके दोनों को सामान हिस्से में दिए जा रहे थे। आखिर में झुमके की जोड़ी बच गई।
बहन को ये बहुत पसंद थे। माँ जब भी पहनती थी तो बहुत सुन्दर लगती थी। वह धीरे से झुमकों को ऊँगली से हिला देती थी और माँ हंस देती थी। अब इन झुमकों को बहुत हसरत से देख रही थी। भाई को भी यह मालूम था।
भाई ने कहा कि ये दोनों ही बहन को दे दिए जाएँ। बहन खुश भी ना हो पाई थी कि भाभी तपाक से बोल पड़ी ," हां दीदी को दे दो और जितनी एक झुमके की कीमत बनती है वो इनसे ले लेंगे ! माँ जी की तो यही इच्छा थी कि दोनों भाई -बहन में उनके गहने आधे -आधे बाँट दिए जाएं। अब झुमका ना सही रूपये ही सही ! " बहन की आँखे भर आई रुंधे गले से बोली, " मुझे माँ के इन झुमकों का बंटवारा नहीं चाहिए और कीमत भी नहीं , क्यूंकि ये मेरे लिए अनमोल हैं। मैं मेरा यह झुमका भतीजी को देती हूँ। "

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