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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

मेरी प्यारी पंडिताइन सावित्री ......

     आज सुबह उठी तो मन भारी  था और आशंकित सा भी था। एक सपना जिसमे एक समारोह में , मैं मिठाई खा रही हूँ। सपने के बारे में सोचा ,हंसी आयी पहले तो , वह इसलिए की आज -कल डाक्टर ने सब कुछ खाना -पीना ( सिवाय हरी सब्जी के )बंद करवा रखा है तो मिठाई के सपने आ रहे हैं।फिर ध्यान आया , ऐसे सपने तो अशुभ होते है आज जरुर कोई अनहोनी खबर ही आएगी।
     घर के काम में व्यस्त थी कि  बाहर  माँ के किसी के साथ बोलने की आवाज़ सुनाई दी जो कि नज़दीक आती गयी। मुड़  कर देखा तो माँ के साथ पंडिताइन खड़ी थी , लेकिन वो नहीं थी जो हमेशा होती है यह तो दूसरी वाली थी जो ऐसे ही अक्सर चक्कर लगाने आ जाती है वार -त्यौहार पर। माँ उसे बाहर से बुला कर लाई यह कह कर की आज से वह रसोई ले कर जाएगी। मैं हैरान होकर माँ को देख रही थी कि माँ ने कहा कि  सावित्री नहीं रही , 6 -7  दिन हो गए। मुझे बहुत हैरानी हुई  ऐसे कैसे नहीं रही , बुजुर्ग थी पर जाने वाली तो नहीं थी। फिर मुझे सपने का ख्याल आया कि  यही अनहोनी खबर मिलनी थी क्या आज ...!
     सावित्री मेरे घर  सूखी रसोई लेने आती थी। चार फुट की छोटी सी , दुबली पतली सावित्री , घर-घर जा कर रसोई लेने जाया करती थी । वैसे नियम के हिसाब से तो रसोई लेने का हक़ सिर्फ कर्मकांडी पंडित या पुजारी को ही होता है लेकिन वह बहुत मजबूर थी कमाने वाला भी कोई नहीं था।इसलिए उसे कोई लौटाता नहीं था।
     लगभग 18 साल पहले हम अबोहर में रहने आये तो सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद मुझे एक पंडिताइन की तलाश हुई  जो घर आकर महीने में चार बार आकर ( दो द्वादशी , पूर्णिमा और अमावस्या ) रसोई ले जाये।हालाँकि घर के पास ही मंदिर भी था। लेकिन घर से ले जाने वाली बात ही और थी।पड़ोसन ने एक पंडिताइन बता दी। वह नियम से आती और चुप-चाप अपनी रसोई ले जाती।
     एक दिन दरवाज़े की घंटी बोली तो एक छोटे से कद की औरत सर पर लोहे की बड़ी सी परात ले कर खड़ी थी उसमे कई सारे लिफाफे थे अलग - अलग आकर और रंग के। कहने लगी कि वह ब्राह्मणी है और उसे ही रसोई दिया करे।मैंने उसे अंदर बुला तो लिया लेकिन कहा कि मेरे तो पहले से ही एक ब्राह्मणी  आती है। अब सब को दान देने लगी तो चौधरी -साहब मुझे भी तुम्हारे साथ ही भेज देंगे।
    घर आयी ब्राह्मणी को खाली कैसे भेज देती।उसे भी कुछ न कुछ दे कर विदा किया।उसके बाद तो जैसे दोनों में जैसे होड़ सी मच गयी हो। सावित्री अक्सर बाज़ी मार लेती और मुझे दोनों को ही रसोई डालनी पड़ती। आखिर मैंने हार कर पहले वाली को आने मना कर दिया क्यूँ कि  सावित्री सच में मजबूर थी और उसे सहायता की जरूरत थी। उसके अनुसार उस पर उसके दो बेटों का बोझ है और तीन विवाहित बेटियां है जिनके की 9 बेटियां है सभी का पालन उसकी कमाई से ही होगा। उसकी कमाई सिर्फ यह रसोई ही थी। बड़ा बेटा मजदूरी करता था कभी जाता तो कभी बेकार भी रहना पड़ता।
    वह जब आती तो यह भी बताती की कौनसा व्रत कब है कौनसी तिथि कब है ...! या जब मैं पूछती के फलां व्रत कब है या अमुक तिथि कब है तो वह गड़बड़ा जाती और कहती कि वह पंडित जी से पूछ कर बताएगी। हालांकि मेरे पास मेरा अपना पंचांग होता है और मैं खुद अपने परिवार वालों को बताती रहती हूँ की कौनसा व्रत कब आएगा। संजय जी कभी - कभी खीझ उठते हैं और कह बैठते हैं कि  वह एक जाटनी को ही ब्याह कर लाये थे। यह पंडिताइन कैसे बन गई।मेरे पास उनकी बात सुन कर हंस कर टालने के सिवा कुछ भी कहने को नहीं होता।
     एक बार जब मैंने व्रत का उद्यापन करना था तो मैंने सावित्री से कहा , " दादी , आप और पंडित जी कल खाना खाने आ जाना।"
वह बोली कि वह और उसका बेटा  आयेंगे खाने के लिए। मैं हैरान रह गई मुझे पति-पत्नी को खाना खिलाना था माँ-बेटा कैसे खा सकते थे।तब उसने बताया के पंडित जी तो जाने कब के उसे छोड़ चुके हैं। उससे अलग ही रहते हैं। उसने अकेले ही अपने बच्चों को पाला  और शादियाँ की हैं।

    उसे गौर से देखा तो सुहागिनों वाले सारे श्रृंगार सजा रखे थे उसने। मेरे देखने पर वह बोली , "बिटिया पति का नाम ही बहुत बड़ी आगल ( मुख्य दरवाजे पर लगने वाली डंडे नुमा कुण्डी ) होती है एक औरत के लिए । उसे पार कर कोई भीतर नहीं आ सकता। "मैंने उसे कुछ नहीं कहा पर मेरा मन भीग गया अंदर तक।
     संजय जी को उससे वैसे ही चिढ़ थी और उसके आने का समय भी कुछ ऐसा कि एक तरफ संजय जी खाना खाने बैठते और दूसरी तरफ से उसकी आवाज़ , " बिटिया " , आजाती ...! संजय जी का तो मुहं ही बन जाता और मैं परेशान ...! मुझे सावित्री को समझाना ही पड़ा कि जब चौधरी साहब के खाना खाने  का समय हो तब ना आया करे। उसके बाद वह बाहर से गाड़ी खड़ी देख कर ही मुड़ जाती और बाद में आती।
     वह रसोई ही नहीं लेने आती बल्कि गीत गाने में ,किसी के घर रात को जागरण लगाना होता तो भी आगे रहती थी।उसे कभी देखो सर पर बड़ी वाली परात लिए घूमते देखा जा सकता था।
    उसके बेटे की शादी हो गयी थो मैंने हंस कर कहा , " दादी अब आप एक मोपेड ले लो बहू  को बोलो चला कर लाएगी और आप पीछे बैठ कर घर बताती रहना।"
उसने भी हंस कर जवाब दिया , " ठीक है बिटिया ...! फिर तो चौधरी साहब से ही दिलवा दो ...!"हम दोनों ही हंस पड़ी।
    मैं कोई भी चीज़ देती तो वह सोचती कि  उसकी बहू ना हथिया ले और छुपाने की कोशिश करती। मुझे यह देख कभी खीझ आती के यह कैसी सास है जो बहू के साथ ऐसा व्यवहार करती है। लेकिन अगले ही पल उसकी मजबूरी का सोच मन भर आता।
     मजबूर तो थी ही वह ...! उसकी नातिन की शादी थी तो किसी ने सलाह दी कि उसके पति को भी बुला लो वह भी आ जायेगा। यह बात मुझे बताते हए उसके चेहरे पर कितना दर्द था कितनी आहत थी वह आँखों में पानी नहीं था क्यूंकि वह सूख  चूका था।बोली , " बिटिया , अब वह क्या लेने आएगा ...सारी जिम्मेदारी मैंने उठाई और अब उसे नहीं बुलाऊंगी ...!" मैंने भी उसी का साथ दिया और कहा मत बुलाना उसे। कोई हक़ नहीं था उस आदमी को।
        मैं अक्सर उसकी सहायता कर देती थी ( तारीफ नहीं कर रही , मैं सिर्फ इसलिए करती थी कि यह ईश्वर की ही मर्जी है और उसने मुझे माध्यम बनाया है उसकी सहायता के लिए ) तो मुझे आस -पास से सुनना पड़ता के इसके पास बहुत है यह जो सामान हम देते हैं , बेच देती है आदि -आदि।
     इस बात के लिए मेरे पास एक ही तर्क था कि हम रूपये जो दक्षिणा के नाम पर देते है वह तो बहुत कम होती है , उसके परिवार में दो या तीन लोग ही हैं खाने वाले तो इतने सारे सामान का क्या करे वह ...! अगर बेच कर रूपये कमा लेती हैं तो बुरा क्या है वह भी उसी के काम आयेंगे ...!
ईश्वर से हम करोड़ रुपयों से कम नहीं मांगते और दान के नाम पर अगर किसी मजबूर की सहायता करनी हो तो सौ सवाल उठाएंगे।
    कई बार वह मुझसे ही व्रत-त्यौहार का पूछ लेती तो मैं हंस कर बोलती , " दादी आपकी दक्षिणा पर मेरा हक़ होगा , क्यूंकि आपका आधा काम तो मैं ही करती हूँ।" वह हंस कर हामी भर देती।
     आज जब उसके ना रहने का समाचार सुना तो मैं रो  नहीं पाई लेकिन मन बहुत अफ़सोस के साथ भर आया। एक मन सोचती हूँ कि  अच्छा हुआ ...! दुखों से मुक्ति मिल गई उसे और चलते -फिरते ही दुनिया से विदा हो गयी। पर हमारा मन मोह के बन्धनों से बंधा होता है तो जल्दी से मुक्त नहीं हो पाता है। सोचती हूँ कि इतनी जल्दी क्या थी उसे जाने की अभी तो मेरे बेटों की शादी होनी है कौन गीत गायेगा ...!
लेकिन सावित्री तो जा चुकी है। अब उसकी आत्मा की शांति की ही प्रार्थना कर सकती हूँ कि ईश्वर उसे अगले जन्म में कोई भी दुःख -तकलीफ ना दे।
    

सोमवार, 11 मार्च 2013

मीठी गुड्डी ....



         राजस्थान और गुजरात की सीमा से लगे धर्म पुर गाँव में एक दिन सुबह - सुबह ही एक सनसनी खेज खबर से हडकम्प सा मच गया।मचे भी क्यूँ नहीं ...! आखिर गाँव के बड़े चौधरी दमन जीत सिंह का कत्ल जो हो गया। इलज़ाम गाँव के ही रामसुख की बेटी कमली पर लगा। यह तो और भी हैरान कर देने वाली बात थी कि  "एक दुबली पतली, एक मुट्ठी हड्डियाँ है जिसमें  और जिसे कभी बोलते ही ना सुना था, उसने कत्ल कर दिया ...!" यह दूसरी चोंकाने वाली खबर थी।
       कहते हैं कि बड़े आदमी का जन्म भी महान होता तो मरण भी महान ही होता है।पुलिस ने सारा अमला झोंक दिया कमली की तलाश में।आखिर तीन दिन की मशक्कत के बाद कमली परिवार सहित पकड़ी गयी।
      कमली अब कटघरे में खड़ी थी। बेहद सुन्दर रूप पर थोडा कुम्हलाया हुआ बड़ी-बड़ी आँखों में एक सूनापन था।जिन होठों पर सदैव मुस्कान खिला  करती थी वे अब भींचे हुए थे।
      पूछने पर उसके भींचे हुए होठ खुले और बोली , " जज साहब मैंने ही  जमींदार का कत्ल किया है। उसने ना जाने कितनी लडकियों -औरतों को बे -आबरू किया। उसने मेरे साथ भी यही करना चाहा तो मैंने अपनी  ओढनी से गला दबा कर उसे मार डाला। "
  आवाज़ में आक्रोश भर कर बोली , " जज साहब ...! मैं कोई  मीठी गुड्डी ना हूँ , जो जमींदार मुझे जायका  बदलने ले लिए खा जाता ...! मैं इन्सान हूँ एक जीती -जागती, हाड़ - मांस की बनी हुई। अपनी इज्ज़त की रक्षा  खुद कर सकती हूँ।" कहते-कहते गर्दन घुमाई तो सामने काशी खड़ा था। काशी पर नजर पड़ने के बाद वह अपनी रुलाई रोक ना पाई और जोर से रो पड़ी।
        काशी जिसे प्यार से कमली ' कासीड़ा ' पुकारती थी। दोनों बचपन के साथी , साथ -साथ खेलते, रेगिस्तानी मिटटी के ऊँचे नीचे धोरों पर भागते, कभी रुठते तो कभी मनाते , इसी में कब बचपन बीता और कब अल्हड कैशोर्य  में प्रवेश कर गए। आपस का स्नेह कब प्रीत में बदला यह वे दोनों ही नहीं जान पाए।हाँ बदला नहीं था तो कमली का काशी को मनाने का तरीका।
      एक दिन जब कमली ने किसी बात का मजाक बनाया तो काशी रूठ गया। अगले दिन भी नहीं बोला तो कमली अपनी ओढ़नी में कुछ मीठी गुड्डियों वाले खिलोने भर लाई। अपनी ओढ़नी में से एक आगे करती हुयी बोली, " ले मुहं मीठा करले ..कड़वा गुस्सा थूक दे ..!कासीड़ा ...!"
  काशी, कमली से नाराज़ थोड़ी हो सकता था।एक महल को हाथ में लेता हुआ उसकी उँगलियों को जैसे पियानो बजा रहा हो, बजाते हुए बोल पड़ा , " कमली तू भी तो एक मीठी गुड्डी जैसी तो है मीठी -मीठी , बाते भी तेरी मीठी ...!"
      काशी ने पियानो बजाया  तो कमली के मन  में भी जलतरंग सा बज उठा।
" ना रे कासीड़ा ...! मैं मीठी गुड्डी ना हूँ , मैं तो खारी मिर्च और तेज़ धार वाली तलवार सी हूँ ..."जलतरंग सी हंसी हँसते हुए तलवार की तरह टेढ़ी तन कर खड़ी हो गयी।
         उन दोनों की हंसी देर तक सफ़ेद धोरों पर हलके - हलके बहती रेत पर कई देर गूंजती रही। गाँव में किसी को कोई भी ऐतराज़ नहीं था उनके प्यार से। कोई-कोई तो उनको ' ढोला - मारू ' की जोड़ी भी कहा करते थे।
ऐसे ही एक दिन दोनों हँसते हुए जा रहे थे कि सामने से जमींदार की जीप आ रही थी। जमींदार ने कमली की सुन्दरता देख जीप रोक ली और आवाज़ दी , " ए  छोरी ....कौन है तूँ ...!"
" मेरा नाम कमली है।" कमली ने बहुत सयंत स्वर में जवाब दिया।
" अच्छा -अच्छा तो  ढोला - मारू की जोड़ी वाली कमली ...! और तू  काशी है फिर  ...हैं ...! " काशी की और मुखातिब हो कर जमींदार बोला। लेकिन उसकी वहशी नज़र कमली को ऊपर से नीचे ताक रही थी।कमली सहम कर आगे की और बढ़ गयी तो जमींदार ने भी कुत्सित मुस्कान से अपनी जीप आगे बढ़ा ली।
  घर आ कर जब कमली ने जमींदार से मुलाकात की बात अपनी माँ को बताया तो वह सिहर उठी और जल्दी से उसे धकेलती सी हुई  कोठडी में ले जा खड़ा कर दिया।
      बोली , " खबरदार जो यहाँ से बाहर  निकली तो जब तक आक्खा तीज ना आवे और तेरा ब्याह ना कर दूँ , तूँ  इसी कोठड़ी के भीतर रहेगी।एक बार जमींदार की नज़र पड़ गयी मतलब नज़र ही लग गयी ...!"
     लेकिन होनी तो कुछ और ही थी। कुछ तो ठण्ड का मौसम और कुछ भीतर का डर , कमली की माँ को तेज़ बुखार हो आया।वह जमींदार के घर पानी भरने का काम करती थी। दो दिन वह जा ना पाई तो तीसरे दिन चौधराइन का बुलावा आ गया कि  वह ना आ सके तो कमली को ही भेज  दे। अब वह भी क्या करती बहुत समझा बुझा कर बेटी को भेज दिया। कमली को पानी भी कहाँ लाना आता था।कुछ पानी ढ़ोया तो कुछ अपने ऊपर भी गिरा  लिया। भीगे वस्त्रों को समेटती कमली चली तो सामने जमींदार खड़ा था उसे घूरता हुआ। उसके तो जैसे प्राण ही सूख गए।जमींदार की वहशी नज़रों से डरती , गिरती -पड़ती अपने घर की तरफ भागी वह। माँ को कुछ भी ना बता सकी।
       अगले दिन वह नहीं गयी तो फिर से बुलावा आ गया। फिर भी वह ना गयी और ना ही माँ को बताया। दिन ढले फिर बुलावा आ गया। अब तो मरती क्या न करती उसको जाना ही पड़ा।


    जाते ही चौधराइन भड़क गयी। ना जाने क्या - क्या सुनाया और कमली चुपचाप सुनती रही।अपना काम निपटाते-निपटाते शाम हो आई। उसे अपनी माँ की फ़िक्र हो रही थी साथ में सोच रही थी कि  काशी से भी मुलाकात ना हो पाई। सर्दियों को वैसे भी शाम और फिर रात जल्दी ही गहरा जाती है। वह शाल लपेट कर घर की और चल पड़ी। जमींदार के घर के दरवाज़े तक पहुँच भी ना पाई थी कि  एक बलिष्ठ हाथ ने उसके मुहं पर हाथ रख उसे कंधे पर डाल लिया। कमली कुछ सोचती समझती, जमींदार के मेहमान खाने में जमींदार  सामने खड़ी कर दी गयी। दरवाज़ा बाहर से बंद भी कर दिया। कमली भयभीत, सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी। डर के मारे कुछ बोला  नहीं जा रहा था उससे, बस हाथ जोड़ कर बेबसी से जमींदार की और देख रही थी।
      छीना -झपटी, जोर - जबरदस्ती से कमली की ओढ़नी जमींदार के हाथ आ गई । यह देख अचानक कमली में न जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी। उसने जोर से अपना घुटना जमींदार मर्मस्थल पर मारा। जमींदार बिलबिला कर पीछे हटा तो उसने फिर से उसे जोर धक्का देकर अपनी ओढ़नी छीन ली। चिल्ला पड़ी , " रे जमींदार ...! तूने मेरी लाज पर हाथ डाला .... अब तुझे ना छोडूंगी , मार डालूंगी तुझे तो मैं ...!"
     बूढ़ा ,कामान्ध और नशे में धुत जमींदार  धक्का झेल नहीं पाया और गिर पड़ा । कमली पर तो जैसे चंडिका देवी ही सवार हो गयी थी। उसने अपनी ओढ़नी को जमींदार के गले में लपेट कर उसके गले पर कसने लगी। साथ ही में वह गुर्राए जा रही थी, " तुमने मुझे क्या समझा ....मीठी गुड्डी ...! ना रे  ! मैं ना हूँ मीठी गुड्डी ... तेरा जायका बदलने  का सामान नहीं हूँ ..." कमली के हाथ कसे ही जा रहे थे जमींदार की गर्दन पर।
थोड़ी ही देर में जमींदार की आँखे और जीभ बाहर आ गई।
     मर गया ....! अंत हो गया एक वहशी जानवर का।
    ऐसे को तो यमदूत भी ना लेने आया होगा। भगवान  भी ऐसे इन्सान  को बना कर शरमाया तो होगा।धिक्कार है ऐसे माणस  जन्म पर।
       अब कमली के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। दरवाज़ा भी बाहर से बंद था। वह भाग कर खिड़की के पास गयी तो राहत की साँस ली। वहां पर कोई अवरोध नहीं था और गली की तरफ  खुलने वाली खिड़की ज्यादा ऊँची भी नहीं थी। भाग ली कमली जितना जोर से भाग सकती थी।
      कमली की माँ आशंकित सी बाहर ही खड़ी थी। बेटी को यूँ भागते देख वह समझ गयी और जैसे उसके घुटनों से प्राण ही निकल गए हो, वहीँ बैठ गयी। कमली ने सारी बात बताई तो उसके पिता सुखराम ने बहुत गर्व से बेटी के सर पर हाथ रखा और बोला, " मुझे गर्व है तुझ पर मेरी बेटी ....! एक वहशी जानवर का नाश हो गया।"
कुछ देर में वह परिवार सहित गाँव छोड़ कर चले गए।
       अब वह कटघरे में खड़ी थी। लेकिन अपने किये पर शर्मिंदा नहीं थी। जो लोग जमींदार के सताए हुए थे वे सभी राहत की सांस ले रहे थे। कुछ दिन मुकदमा चला. सुनवाई हुई और अंत में जज-साहब ने यही निष्कर्ष निकाला के कमली को एक इन्सान को मारने का कोई अधिकार नहीं था लेकिन जमींदार को एक इन्सान नहीं कहा जा सकता था उसने की लड़कियों और औरतों की आबरू से खेला था। अगर कमली ने अपनी इज्ज़त बचाते  हुए अपनी आत्मरक्षा में जमींदार का क़त्ल भी कर दिया है तो  भी उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।
कमली बा-इज्ज़त बरी कर दी गयी।
      कमली को मिलने काशी उसके घर पहुँचा।  कमली ने मिलने से ही इनकार कर दिया। उसने अपनी माँ से ही कह दिया की वह काशी से नहीं मिलेगी।  वह अब पहले वाली कमली ना रही।  एक कातिल भी है।  उसके हाथों पर खून लग गया है अब मेहँदी ना सज सकेगी।
     काशी ने चाहा कि एक बार बात करले उससे। लेकिन कमली ना मानी।उसकी जिन्दगी में तो जैसे पतझड़ ही आ गया हो। लेकिन सच्चा प्रेम तो पतझड़ में भी फूल खिला देता है। वह रोज़ कमली के घर आता और बात करने की कोशिश करता पर कमली कोठड़ी से बाहर ही नहीं आती।
        मौसम बदल रहा था।सर्दी काम होने लगी थी। बहार का मौसम आने को था।  काशी का प्यार वही रहा। कमली का मन बदल रहा था अब। उसके मन के थार  में अब प्यार का सोता फिर से फूट पड़ा था।लेकिन अब भी काशी से मिलना नहीं चाह रही थी।
      " कमली एक बार तो आकर मिल ले बात कर ले मुझसे, देख ले एक दिन वह भी आएगा मैं ना रहूँगा और तूँ मुझे खोजेगी !" बेबस पुकार कर रह गया काशी।
       एक दिन काशी उसके सच में घर नहीं आया तो कमली बैचैन हो उठी।सारा दिन परेशान रही। रात हुई तो अचानक लगा उसे काशी पुकार रहा हो। वह उठी और अपनी ओढ़नी के पल्लू में कुछ मीठी गुड्डियों वाले खिलोने बांधे और मन्त्र-मुग्ध सी चल पड़ी। उसे केवल काशी की पुकार ही सुनायी दे रही थी। वहीँ जा कर रुकी जहाँ वे दोनों मिला करते थे। सामने देखा तो काशी खड़ा था।
  रो पड़ी कमली, " कासीड़ा ...! तूने मेरी जान लेने की ठान रखी है क्या ? तूँ आया क्यूँ नहीं आज ...!"
" मैंने सोचा , मेरे प्रेम  में शक्ति है या  नहीं, आज यह देख ही लूँ। देख ले ...! मेरे प्रेम की शक्ति, तुझे आना ही पड़ा ...!"  काशी ने कमली का हाथ थामते हुए कहा।
" अच्छा ले अब सब भूल जा ...! ले आज तू मेरे हाथ से मीठा मुहं कर। मैं ले कर आया हूँ  तेरे लिए मीठे -मीठे खिलोने ...." और उसकी उँगलियों से पियनो जैसा बजा दिया। एक जलतरंग कमली के मन में भी बज उठा।और दोनों की हंसी कई देर तक रेगिस्तान के धोरों पर जलतरंग सी तैरती रही।

( चित्र गूगल से साभार )






गुरुवार, 7 मार्च 2013

औरत होना ही अपने आप में एक ताकत है

 रश्मि प्रभा जी की पुस्तक " नारी विमर्श का अर्थ " में छपा मेरा यह लेख 

          नारी विमर्श , नारी -चिंतन या नारी की चिंता करते हुए लेखन , हमेशा से ही  होड़   का विषय रहा है। हर किसी को चिंता रहती है नारी के उत्थान की ,उसकी प्रगति की .पर कोई पुरुष या मैं कहूँगी कोई नारी भी , अपने दिल पर हाथ रख कर बताये और सच ही बताये कि  क्या कोई भी किसी को अपने से आगे  बढ़ते देख सकता है। यहाँ हर कोई प्रतियोगी है. फिर सिर्फ नारी की बात क्यूँ की जाये !
          एक औरत अपने जीवन में कितने रूप धारण करती है, बेटी से ले कर दादी तक। उसका हर रूप शक्ति स्वरूप ही है। बस कमी है तो अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की। ना जाने क्यूँ वह कस्तूरी मृग की तरह इधर -उधर भागती -भटकती रहती है। जबकि  खुशबु रूपी ताकत तो स्वयम उसमे ही समाहित है। सदियाँ गवाह है जब भी नारी ने प्रतिरोध किया है तो उसे न्याय अवश्य ही मिला है। 
      सबसे पहले तो मुझे " महिला-दिवस " मनाने  पर ही आपत्ति है. क्यूँ बताया जाये के नारी कमजोर है  और उसके लिए कुछ किया जाये। कुछ विद्वान जन का मत होता है  , एक महिला जो विभिन्न रूप में होती है उसका आभार प्रकट करने के लिए ही यह दिन मनाया जाता है।  ऐसी मानसिकता पर मुझे हंसी आती है . एक दिन आभार और बाकी साल क्या ....? फिर तो यह शहरी   क्षेत्रों तक ही सीमित हो कर ही रहता है।  मैं स्वयं ग्रामीण क्षेत्र से हूँ। एक अपने परिवेश की महिला से कह बैठी , " आज तो महिला दिवस है ...!" वो हंस पड़ी और बोली , " अच्छा बाकी दिन हमारे नहीं होते क्या...? " यह भी सोचने वाली बात है के बाकी दिन नारी, नारी ही तो है ...!
         हमारे आस -पास नज़र दौडाएं तो बहुत सारी महिलाये दिख जाएगी ,मैं यहाँ आधुनिकाओं की बात नहीं कर रही हूँ . मैं बात कर रही हूँ ग्रामीण क्षेत्रीय या मजदूर -वर्ग की महिलाओं की , जो रोज़ ना जाने कितनी चिंताए ले कर सोती है और सुबह उठते ही कल की चिंता भूल कर आने वाले कल की चिंता में जुट जाती है। वह  आज में तो जीती ही नहीं। जिस दिन वह अपने , आज की चिंता करेगी वही दिन उसके लिए होगा।  उसके लिए उसका देश , उसका घर और उसके देश का प्रधानमंत्री उसका पति ही होता है।  और विपक्ष उसके ससुराल वाले ही बस ! अब ऐसे महिला के लिए क्या चिंता की जाये जब उसे ही पता नहीं उसके लिए क्या सही है या गलत।  उसे अपने बुनियादी हकों के बारे में भी पता नहीं है बस फ़र्ज़ के नाम पर घिसी -पिटी   मान्यताएं ही निभाए जा रही है। यहाँ  तो हम बात कर सकते हैं कि ये  महिलाएं अशिक्षित है और उन्हें अपने बुनियादी हको के बारे में कोई भी जानकारी ही नहीं है।  बस जानवरों की तरह हांकी ही जा रही है। 
   लेकिन शहर की आधुनिक और उच्च -शिक्षित महिलाओं की बात की जाये तो उनको अपने हक़ के बार में तो पता चल गया है लेकिन अपने फ़र्ज़ ही भूले जा रही है।  वे  विदेशी संस्कृति की ओर  बढती जा रही है।  बढती महत्वकांक्षाएँ और आगे बढ़ने की होड़ में ये अपना स्त्रीत्व और कभी जान तक गवां बैठती है ऐसे बहुत सारे उदहारण है हमारे सामने।  
     मुझे दोनों ही क्षेत्रो की नारियों से शिकायत है।  दोनों को ही  पुरुष रूपी मसीहा का  इंतजार रहता है कि कोई आएगा और उसका उद्धार करेगा।  पंजाबी में एक कहावत का भावार्थ है " जिसने राजा महाराजाओं को और महान संतो को जन्म दिया है उसे बुरा किस लिए कहें !" और यह सच भी है। 
     कहा जाता है नारी जैसा कठोर नहीं और नारी जैसा कोई नरम नहीं है. तो वह किसलिए अपनी शक्ति भूल गई ! पुरुष को वह जन्म देती है तो क्यूँ  नहीं अपने अनुरूप  उसे ढाल देती. किसलिए वह पुरुष कि सत्ता के आगे झुक जाती है। 
         जब तक एक नारी अपनी स्वभावगत ईर्ष्या से मुक्त नहीं होगी . तब तक वह आगे बढ़ ही नहीं सकती . चाहे परिवार हो या कोई कार्य क्षेत्र महिलाये आगे बढती महिलाओं को रोकने में एक महिला ही बाधा डालती है . पुरुष तो सिर्फ मौके का फायदा ही उठाता है। 
औरतें, औरतों की दुश्मन
होती है .
ये शब्द तो पुरुषों के ही है ,बस
कहलवाया गया है औरतों के
मुहं से .......
...
 और कहला कर उनके दिमाग मे
बैठा दिया गया है ....

लेकिन औरतें ,औरतों की दुश्मन

कब हुई है भला ......

जितना वो एक दूसरी को समझ सकती 

है ,उतना और कौन समझता है .......

उसकी उदासी में ,तकलीफ में ,

उसके दुःख में कौन मरहम लगाती है ....



  मैं यहाँ पुरुषों की बात नहीं करुगी कि उन्होंने औरतों पर कितने जुल्म किये और क्यूँ और कैसे. 

बल्कि मैं तो कहूँगी , औरतों  ने सहन ही क्यूँ किये. यह ठीक है , पुरुष और स्त्री कि शारीरिक क्षमता अलग -

अलग है. आत्म बल और बुद्धि बल में किसी भी पुरुष सेए स्त्री कहीं भी कमतर नहीं  फिर उसने क्यूँ एक 

पुरुष को केन्द्रित कर आपस में अपने स्वरूप को मिटाने  को तुली है। 

     मुझे विद्वान  जनों के एक कथन  पर हंसी आती है और हैरानी भी होती है , जब वे कहते है ," समाज में 

ऐसी व्यवस्था हो जिससे स्त्रियों का स्तर सुधरे." समाज सिर्फ पुरुषों से ही तो नहीं बनता .यहाँ भी तो औरतों 

की  भागीदारी होती है।  फिर  वे क्यूँ पुरुषों पर ही छोड़ देती है कि  उनके बारे में फैसला ले। 

      मेरे विचार से शुरुआत हर नारी को अपने ही घर से करनी होगी।  उसे ही अपने घर बेटी को , उसका 

हक़ और फ़र्ज़ दोनों याद दिलाने के साथ -साथ उसे अपने मान -सम्मान कि रक्षा करना भी सिखाये। 

अपने बेटों को नारी जाति का सम्मान करना सिखाये। 

बात जरा सी है और
 समझ नहीं आती ...
जब एक माँ अपनी 
बेटी को दुपट्टा में इज्ज़त 
 सँभालने का तरीका
 समझाती है ,
तो वह अपने बेटे को
राह चलती किसी की
बेटी की इज्ज़त करना
क्यूँ नहीं सिखलाती ....
       कई बार हम देखते ( टीवी में ) और सुनते है ,रात को कोई लड़की  या महिला   पर  जुल्म होने की  बात को।  तो सबसे पहले यही ख्याल आता है और कह भी बैठते हैं कि वह  इतनी देर रात गए वहां क्या लेने गयी थी।  तब मेरे जहन में यही सवाल उठता है , अगर किसी अत्याचारी पुरुष के परिवार की कोई  सदस्य या कोई उनके जानकारी की महिला या लड़की होती  तो क्या वह उसके साथ भी ऐसा ही दुराचार करता ?क्यूँ कि कहीं ना कही पुरुष में एक पाशविक प्रवृत्ति भी होती है जो उसे एक नारी को दमन करने पर उकसाती है। उसे , एक स्त्री जो कि माँ होती है अपने संस्कारों से दमित कर सकती है।  अब ये भी कहा जा सकता है के कोई भी स्त्री क्या अपने बेटे को दुराचारी बनाती है ...!  कोई भी माँ अपने बेटे को गलत शिक्षा तो नहीं देती। फिर यह सब नारी के प्रति बढ़ता अत्याचार क्यूँ हो रहा है. ! क्यूँ कि वह ना अपना सम्मान करती है ना ही और ना ही किसी अन्य स्त्री का मान करना सिखाती है !
      बात वहीँ घूम फिर कर आ जाती है कि जो कस्तूरी रूपी अपनी शक्ति  वह अपने में छुपा कर  एक  तृषित मृग की  भाँती फिरती है, वह और कहीं नहीं है, उसी के अन्दर ही है।  उसे सिर्फ वह ही ढूंढ़ सकती है।  सरकार हो या कोई संस्थाए कोई भी क्या करेगी जब नारी स्वयं ही जागरूक नहीं होगी। उसे आत्म -केन्द्रित होने से बचना चाहिए। अस आवाज़ उठा कर देखना चाहिए। जरूरत है बस एक जज्बे की !
नारी शायद तुम हारने लगी हो
क्या सच में अपने को अबला
ही समझने लगी हो ........
ईश्वर ने तुम्हें  अबला नहीं
सृजना ही बनाया था ,
तुम यह कैसी कुसंस्कारी ,
खरपतवार
का सृजन करने लगी हो ,
जो तुम्हारी ही लगाई ,
फूलों कि क्यारी का
विनाश कर रही है....
तुम क्यूँ अपना ही
स्वरूप अपने ही हाथों से
मिटाने लगी हो ....
नारी जो कभी ना हारी थी , अब  हारने लगी हो , शायद ...!


( चित्र गूगल से साभार )




सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

बदलती नज़रें

बदलती नज़रें

उर्वशी की बाहर पुकार हो रही थी। वह  शीशे  के आगे खड़ी अपना चेहरा संवारती -निहारती कुछ सोच में थी।   तभी फिर से "उर्वशीईइ .....! " वह चौंक गई।
उर्वशी उसका असली नाम तो नहीं था पर क्या नाम था उसका असल में  वह भी नहीं जानती !
अप्सराओं की तरह बेहद सुंदर रूप ने उसका नाम उर्वशी रखवा दिया और भूख -गरीबी और मजबूरी ने उसे स्टेज -डांसर बना दिया। वह छोटे - बड़े समारोह या विवाह समारोह में डांस कर के परिवार का भरण -पोषण करती है अब।
    गन्दी , कामुक , लपलपाती नज़रों के घिनोने वार झेलना उसके लिए बहुत बड़ी बात नहीं थी। वह इसे भी अपने काम का ही एक हिस्सा समझती थी। बस निर्विकार सी अपना काम किये जाती यानी कि नृत्य पर ही ध्यान देती थी।
    लेकिन आज उसका मन बहुत अशांत हो गया जब उसने एक आदमी ,जो कि दुल्हन के सर पर बहुत स्नेह से हाथ फिर रहा था। आदमी की नज़रों में उस दुल्हन के लिए कितना प्यार , स्नेह  था।
  थोड़ी ही देर में वह स्टेज के नाच रहा था  और उर्वशी को जिन नज़रों से देखा तो वह अंदर से कट कर रह गयी। मन रो पड़ा उसका , " क्या मैं किसी की बेटी नहीं ...! इसकी नज़रों में मैं एक स्त्री -देह मात्र ही हूँ ? नाचने वाली सिर्फ ! किसी इन्सान की नज़रे ऐसे इतनी जल्दी कैसे बदल जाती है ...! शरीफ लोगों की यह कैसे शराफत है ....!"
सोचते -सोचते रो पड़ी लेकिन आंसू पोंछते हुए स्टेज की तरफ बढ़ गयी जहाँ उसकी पुकार हो रही थी।


रविवार, 13 जनवरी 2013

निरुत्तर सवाल .......

निरुत्तर सवाल ...

कोमल अपने चिकने हाथ धोते -धोते रुक सी गयी। वह अभी दाल के लड्डू बना कर गर्म पानी से हाथ धोने वाशबेसिन के आगे खड़ी थी। लेकिन ध्यान सासू  माँ की बातों में अटका हुआ था। बहुत आहत हुई  है वह आज ...!
  लड्डू के मिश्रण में जैसे ही चीनी मिलाने को हुई तो माँ ने हाथ रोक दिया और बोली , "जरा इसके दो हिस्से कर लो। एक हमारा यानि मेरा और तुम्हारे ससुर जी का और एक अंकुश का।  अंकुश के लिए जरा कम चीनी का कर दो और हमारे लिए मीठा पूरा ही रखना बल्कि थोडा ज्यादा ही।  तुम्हारे ससुर जी को मीठा तेज़ ही पसंद है।"

     कोमल के मन में कहीं कुछ चुभ सा गया।

     " और उसका हिस्सा ...!"

"मेहनत भी भी वही कर रही है और उसी  का ही हिस्सा नहीं है ...! आज 20 बरस हो गए इस घर में आये हुए और उसका किसी भी चीज़ में हिस्सा नहीं है। क्या सास एक औरत नहीं होती जो दूसरी औरत के मन को नहीं समझती ?या बहू परायी ही रहती है सारी उम्र !या जब तक वह सास नहीं बन जाती तभी तक वह औरत रहती है ...? सास बनते ही क्या औरत , औरत नहीं रहती ?इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है ...! "
आंसू रोकते हुए हुए , हाथ पौंछते हुए अपने कमरे में बैठ गयी।  मन में बहुत सारे  सवाल थे लेकिन जवाब उसके पास नहीं थे।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

चिंता.......

अपनी - अपनी चिंता...

जल्दी -जल्दी से बढे जा रहे हैं रजनी के कदम। आज तो देर हो गयी। पहुँचते ही डांट  पड़ेगी सर से। जिम में समय पर पहुंचना उसकी ड्यूटी  है लेकिन छोटे  बच्चे और भाई बहनों को सँभालते -सँभालते देर हो ही जाती है।

जिम पहुंचकर सर पर एक नज़र डाल  कर जल्दी से पहुँच जाती है औरतों के समूह में जो उसके इंतजार में दुबली ( ? ) हो रही थी।
अब सभी के पैर थिरक रहे थे तेज़ संगीत की लय पर। हर -एक के एक साथ हाथ और पैर चल रहे थे।और दिमाग में सभी को अपने-अपने  बढे हुए पेट सपाट करने की चिंता थी।

और रजनी ?

उसे भी तो चिंता थी अपने पेट को सपाट करने की , जो कि अंतड़ियों से चिपका हुआ था ...!

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

ममता की मिठास ......

       माँ की जगह कोई भी नहीं ले सकता। हर औरत को  महसूस होता है कि वह अपनी माँ से बेहतर माँ नहीं  सकती। मुझे भी ऐसा लगता है,  जैसा मेरी माँ मुझे प्यार करती है वैसा और उतना प्यार  मैं अपने बच्चों को नहीं करती। एक घटना जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ , वह मेरे कथन को प्रमाणित करती है।

     बात जुलाई की है इसी साल की जब  मेरा छोटा बेटा हॉस्टल चला गया। मैं बहुत उदास थी। लेकिन मुझे उससे मिलने का जल्दी ही संयोग मिल गया। मेरी बड़ी दीदी का छोटा बेटा  भी उसी स्कूल-होस्टल में है।वैसे दोनों भाई साथ ही जाते हैं पर इस बार किसी कारण -वश वह बाद में गया। दीदी के साथ मैंने भी जाना  तय किया।
           जिस दिन जाना था उस दिन मेरा शुक्रवार का व्रत था।इस व्रत में खास बात यह थी कि  इसमें बाहर यानि किसी के घर का कुछ भी यहाँ तक पानी भी नहीं पीना होता। सोचा व्रत करूँ या नहीं क्यूँकि यह शुक्रवार दूसरा ही था व्रत करने वाला। मन में आया अभी एक व्रत ही हुआ है तो दूसरा किसलिए छोड़ना। व्रत, वह भी प्रद्युमन के लिए था। वह बहुत शरारती है , मुझे उसके लिए भगवान् को बहुत मनाना  पड़ता है , शायद थोड़ी शरारते कम करके पढने लग जाये। उसके लिए मैंने ब्रेड और बीकानेरी भुजिया( ये दोनों ही चीज़ें मेरी कमजोरी है ) तक का त्याग किया हुआ है पिछले चार वर्षों से।भगवन को बोला हुआ है जिस दिन यह दसवीं पास करेगा उसी दिन इनको हाथ लगाउंगी।

हाँ तो मैं बेटे से मिलने जाने की बात कर रही थी ...!
सुबह आठ बजे निकले घर से। रास्ते में एक जगह दीदी और उसके बेटे ने खाना खाया तो मैंने चाय ही पी वह भी अपने  ही रुपयों से खरीद कर। सफ़र  में मुझे  वैसे भी बहुत घबराहट सी होती है। उस दिन तो खाली पेट था।
हाँ एक बात तो बताई ही नहीं मैंने ...! उन दिनों सावन का महीना था। और मैं सावन के महीने में चीनी का सेवन नहीं करती यानि कि  किसी भी प्रकार का मीठा भोजन। कहा जाता है के सावन के महीने में अगर किसी प्रिय वस्तु का त्याग किया जाए  तो शिव जी प्रसन्न होते है। अब सारा साल शिव जी के कानो में पता नहीं क्या-क्या गीत गाती रहती हूँ तो एक महीने कुछ  शिव जी के लिए छोड़ भी दिया तो क्या हुआ ...!

      एक तो खाली  पेट और उस पर चाय भी फीकी पी जी तो घबराना ही था।लेकिन बेटे के भविष्य का भी तो सवाल था।
 लगभग एक बजे के करीब वहां पहुंचे। बेटे का चेहरा देख कलेजा मुहं को आ गया ," अरे ...! ये स्कूल वाले भी न , बच्चों की जान ही निकाल देते है, हम कैसे खिला पिला कर ,अच्छा सा, सुन्दर सा बना कर यहाँ भेजते हैं और इन्होने तो एक सप्ताह में ही हवा सी  निकाल दी।" फिर पति -देव की बात याद आ गयी , ' या तो बच्चो को खिला-पिला लो या इनको पढ़ा लो'...बात उनकी भी सही है।

     आगे बढ़ कर बेटे को गले लगाया तो जल्दी से पीछे हट गया और बोला बस मम्मा सब देख रहे हैं। लो जी ये भी क्या बात हुयी ...! माना के वह दसवीं में आ गया खुद को बहुत बड़ा समझने लग गया , मुझे तो अभी भी वही छोटा सा मुन्ना ही लगता है।फिर भी ढेर सारा लाड तो उंडेल  ही दिया ...

              कुछ देर मिल कर बातें कर हम दोनों बहनें  वापस चल पड़ी। बिना कुछ खाए मेरा हाल खराब सा हुआ जा रहा था। रास्ते में रुक कर एक जगह नीम्बू -पानी पिया तो लगा कि कुछ जान सी आ रही है।

      रास्ते में मेरा मायका भी है। अब मायका रास्ते  में हो और कोई औरत मायके जाये बिना कैसे रह सकती है तो हमने भी ड्राइवर को मायके की तरफ गाडी मोड़ने को कह दिया।गाडी से उतरते ही माँ की वही प्रतिक्रिया थी जो मेरी , मेरे बेटे को देख कर हुई  थी। बोल पड़ी , "अरे ...! तुझे क्या हुआ ऐसा चेहरा क्यूँ उतरा हुआ है ...!"
मैंने व्रत का बताया तो नाराज़ होने लगी के सफर में कोई भूखा रहता है क्या।
मैंने कहा , " बेटे के भविष्य का मामला है , अब भूख के पीछे भगवान को नाराज़ कैसे कर सकती हूँ।"
माँ ने चाय या दूध का पूछा तो मैंने मना  कर दिया क्यूंकि इस व्रत में बाहर का नहीं खा सकते । माँ यहाँ भी नाराज़ हुयी के बाहर का या किसी और के घर का मत खाओ पर यह ते तेरा अपना ही घर है यहाँ तो कुछ ले लो।पर मैंने मना कर दिया क्यूंकि व्रत की किताब में ऐसा ही लिखा था।

    माँ ने एक सुझाव दिया के मैं दूध पी लूँ और दूध के बदले में उनको एक रुपया दे दूँ। उनके मुताबिक मैं खरीद कर तो कुछ खा पी सकती हूँ। एक गिलास दूध मेरे लिए  ले लाई। एक तो भूखे पेट उस पर इतनी गर्मी बहुत राहत सी महसूस हो रही थी। बंद हुयी आँखे खुलने लगी थी।मैंने पर्स टटोला  तो उसमे दो रूपये का सिक्का था तो मैंने कहा की एक रुपया वापस दीजिये।
माँ हंस पड़ी और बोली  , " मेरे पास भी नहीं एक का सिक्का , वैसे आज तो हमारी कमाई का दिन है इस लिए तुम एक गिलास दूध और पी लो , एक रुपया और कमा लूंगी  मैं ...!" और दूध का गिलास थमा दिया।
सच में बहुत राहत सी महसूस हुई ,  दूध से ज्यादा माँ की बातों  और प्यार से।

              कई देर से हमारा वार्तालाप सुन रहे पापा भी मुझे डांटते हए से ग्लुको - मीटर ले आये( माँ को मधुमेह है तो घर में ही रखते हैं यह )। वे कह रहे थे, " कुछ दिन पहले तुम्हारा शुगर  -लेवल नार्मल से कम था फिर  भी तुम मीठा छोड़ कर बैठी हो ...! लाओ चेक करवाओ ...अगर शुगर - लेवल कम हुआ तो तुम्हें अभी मीठा खाना पड़ेगा। "

       मैंने चुप चाप हाथ आगे कर दिया। मुझे उस पल  ऐसा लग रहा था  वही उनकी छोटी सी बेटी ' टिंकू ' हूँ एक बार तो अपनी उम्र ही भूल सी गयी । बचपन में हम बहनों में जो भी बीमार पड़ती थी तो पापा सरहाने ही बैठे रहते थे। तब लगता था के बार -बार बीमार पड़ें और पापा की स्पेशल बेटी बन जाएँ। आज भी जब बीमार पड़ती हूँ तो पापा की बहुत याद आती है।बेटी होने का बस यही दुःख है मुझे के अपने माँ -पापा से दूर रहना पड़ता है।

    हां तो ...!पापा ने शुगर चेक किया तो बिलकुल ठीक था अपने स्तर के मुताबिक ...! मैं हंस पड़ी , " देखो पापा ...! माँ के हाथों में ही मिठास है ...:)

और यही सच है के माता - पिता के प्यार के आगे सब कुछ गौण है। यह बात हम जब तक खुद माता - पिता ना बन जाएँ नहीं समझ सकते।