Text selection Lock by Hindi Blog Tips

रविवार, 13 जनवरी 2013

निरुत्तर सवाल .......

निरुत्तर सवाल ...

कोमल अपने चिकने हाथ धोते -धोते रुक सी गयी। वह अभी दाल के लड्डू बना कर गर्म पानी से हाथ धोने वाशबेसिन के आगे खड़ी थी। लेकिन ध्यान सासू  माँ की बातों में अटका हुआ था। बहुत आहत हुई  है वह आज ...!
  लड्डू के मिश्रण में जैसे ही चीनी मिलाने को हुई तो माँ ने हाथ रोक दिया और बोली , "जरा इसके दो हिस्से कर लो। एक हमारा यानि मेरा और तुम्हारे ससुर जी का और एक अंकुश का।  अंकुश के लिए जरा कम चीनी का कर दो और हमारे लिए मीठा पूरा ही रखना बल्कि थोडा ज्यादा ही।  तुम्हारे ससुर जी को मीठा तेज़ ही पसंद है।"

     कोमल के मन में कहीं कुछ चुभ सा गया।

     " और उसका हिस्सा ...!"

"मेहनत भी भी वही कर रही है और उसी  का ही हिस्सा नहीं है ...! आज 20 बरस हो गए इस घर में आये हुए और उसका किसी भी चीज़ में हिस्सा नहीं है। क्या सास एक औरत नहीं होती जो दूसरी औरत के मन को नहीं समझती ?या बहू परायी ही रहती है सारी उम्र !या जब तक वह सास नहीं बन जाती तभी तक वह औरत रहती है ...? सास बनते ही क्या औरत , औरत नहीं रहती ?इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है ...! "
आंसू रोकते हुए हुए , हाथ पौंछते हुए अपने कमरे में बैठ गयी।  मन में बहुत सारे  सवाल थे लेकिन जवाब उसके पास नहीं थे।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

चिंता.......

अपनी - अपनी चिंता...

जल्दी -जल्दी से बढे जा रहे हैं रजनी के कदम। आज तो देर हो गयी। पहुँचते ही डांट  पड़ेगी सर से। जिम में समय पर पहुंचना उसकी ड्यूटी  है लेकिन छोटे  बच्चे और भाई बहनों को सँभालते -सँभालते देर हो ही जाती है।

जिम पहुंचकर सर पर एक नज़र डाल  कर जल्दी से पहुँच जाती है औरतों के समूह में जो उसके इंतजार में दुबली ( ? ) हो रही थी।
अब सभी के पैर थिरक रहे थे तेज़ संगीत की लय पर। हर -एक के एक साथ हाथ और पैर चल रहे थे।और दिमाग में सभी को अपने-अपने  बढे हुए पेट सपाट करने की चिंता थी।

और रजनी ?

उसे भी तो चिंता थी अपने पेट को सपाट करने की , जो कि अंतड़ियों से चिपका हुआ था ...!

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

ममता की मिठास ......

       माँ की जगह कोई भी नहीं ले सकता। हर औरत को  महसूस होता है कि वह अपनी माँ से बेहतर माँ नहीं  सकती। मुझे भी ऐसा लगता है,  जैसा मेरी माँ मुझे प्यार करती है वैसा और उतना प्यार  मैं अपने बच्चों को नहीं करती। एक घटना जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ , वह मेरे कथन को प्रमाणित करती है।

     बात जुलाई की है इसी साल की जब  मेरा छोटा बेटा हॉस्टल चला गया। मैं बहुत उदास थी। लेकिन मुझे उससे मिलने का जल्दी ही संयोग मिल गया। मेरी बड़ी दीदी का छोटा बेटा  भी उसी स्कूल-होस्टल में है।वैसे दोनों भाई साथ ही जाते हैं पर इस बार किसी कारण -वश वह बाद में गया। दीदी के साथ मैंने भी जाना  तय किया।
           जिस दिन जाना था उस दिन मेरा शुक्रवार का व्रत था।इस व्रत में खास बात यह थी कि  इसमें बाहर यानि किसी के घर का कुछ भी यहाँ तक पानी भी नहीं पीना होता। सोचा व्रत करूँ या नहीं क्यूँकि यह शुक्रवार दूसरा ही था व्रत करने वाला। मन में आया अभी एक व्रत ही हुआ है तो दूसरा किसलिए छोड़ना। व्रत, वह भी प्रद्युमन के लिए था। वह बहुत शरारती है , मुझे उसके लिए भगवान् को बहुत मनाना  पड़ता है , शायद थोड़ी शरारते कम करके पढने लग जाये। उसके लिए मैंने ब्रेड और बीकानेरी भुजिया( ये दोनों ही चीज़ें मेरी कमजोरी है ) तक का त्याग किया हुआ है पिछले चार वर्षों से।भगवन को बोला हुआ है जिस दिन यह दसवीं पास करेगा उसी दिन इनको हाथ लगाउंगी।

हाँ तो मैं बेटे से मिलने जाने की बात कर रही थी ...!
सुबह आठ बजे निकले घर से। रास्ते में एक जगह दीदी और उसके बेटे ने खाना खाया तो मैंने चाय ही पी वह भी अपने  ही रुपयों से खरीद कर। सफ़र  में मुझे  वैसे भी बहुत घबराहट सी होती है। उस दिन तो खाली पेट था।
हाँ एक बात तो बताई ही नहीं मैंने ...! उन दिनों सावन का महीना था। और मैं सावन के महीने में चीनी का सेवन नहीं करती यानि कि  किसी भी प्रकार का मीठा भोजन। कहा जाता है के सावन के महीने में अगर किसी प्रिय वस्तु का त्याग किया जाए  तो शिव जी प्रसन्न होते है। अब सारा साल शिव जी के कानो में पता नहीं क्या-क्या गीत गाती रहती हूँ तो एक महीने कुछ  शिव जी के लिए छोड़ भी दिया तो क्या हुआ ...!

      एक तो खाली  पेट और उस पर चाय भी फीकी पी जी तो घबराना ही था।लेकिन बेटे के भविष्य का भी तो सवाल था।
 लगभग एक बजे के करीब वहां पहुंचे। बेटे का चेहरा देख कलेजा मुहं को आ गया ," अरे ...! ये स्कूल वाले भी न , बच्चों की जान ही निकाल देते है, हम कैसे खिला पिला कर ,अच्छा सा, सुन्दर सा बना कर यहाँ भेजते हैं और इन्होने तो एक सप्ताह में ही हवा सी  निकाल दी।" फिर पति -देव की बात याद आ गयी , ' या तो बच्चो को खिला-पिला लो या इनको पढ़ा लो'...बात उनकी भी सही है।

     आगे बढ़ कर बेटे को गले लगाया तो जल्दी से पीछे हट गया और बोला बस मम्मा सब देख रहे हैं। लो जी ये भी क्या बात हुयी ...! माना के वह दसवीं में आ गया खुद को बहुत बड़ा समझने लग गया , मुझे तो अभी भी वही छोटा सा मुन्ना ही लगता है।फिर भी ढेर सारा लाड तो उंडेल  ही दिया ...

              कुछ देर मिल कर बातें कर हम दोनों बहनें  वापस चल पड़ी। बिना कुछ खाए मेरा हाल खराब सा हुआ जा रहा था। रास्ते में रुक कर एक जगह नीम्बू -पानी पिया तो लगा कि कुछ जान सी आ रही है।

      रास्ते में मेरा मायका भी है। अब मायका रास्ते  में हो और कोई औरत मायके जाये बिना कैसे रह सकती है तो हमने भी ड्राइवर को मायके की तरफ गाडी मोड़ने को कह दिया।गाडी से उतरते ही माँ की वही प्रतिक्रिया थी जो मेरी , मेरे बेटे को देख कर हुई  थी। बोल पड़ी , "अरे ...! तुझे क्या हुआ ऐसा चेहरा क्यूँ उतरा हुआ है ...!"
मैंने व्रत का बताया तो नाराज़ होने लगी के सफर में कोई भूखा रहता है क्या।
मैंने कहा , " बेटे के भविष्य का मामला है , अब भूख के पीछे भगवान को नाराज़ कैसे कर सकती हूँ।"
माँ ने चाय या दूध का पूछा तो मैंने मना  कर दिया क्यूंकि इस व्रत में बाहर का नहीं खा सकते । माँ यहाँ भी नाराज़ हुयी के बाहर का या किसी और के घर का मत खाओ पर यह ते तेरा अपना ही घर है यहाँ तो कुछ ले लो।पर मैंने मना कर दिया क्यूंकि व्रत की किताब में ऐसा ही लिखा था।

    माँ ने एक सुझाव दिया के मैं दूध पी लूँ और दूध के बदले में उनको एक रुपया दे दूँ। उनके मुताबिक मैं खरीद कर तो कुछ खा पी सकती हूँ। एक गिलास दूध मेरे लिए  ले लाई। एक तो भूखे पेट उस पर इतनी गर्मी बहुत राहत सी महसूस हो रही थी। बंद हुयी आँखे खुलने लगी थी।मैंने पर्स टटोला  तो उसमे दो रूपये का सिक्का था तो मैंने कहा की एक रुपया वापस दीजिये।
माँ हंस पड़ी और बोली  , " मेरे पास भी नहीं एक का सिक्का , वैसे आज तो हमारी कमाई का दिन है इस लिए तुम एक गिलास दूध और पी लो , एक रुपया और कमा लूंगी  मैं ...!" और दूध का गिलास थमा दिया।
सच में बहुत राहत सी महसूस हुई ,  दूध से ज्यादा माँ की बातों  और प्यार से।

              कई देर से हमारा वार्तालाप सुन रहे पापा भी मुझे डांटते हए से ग्लुको - मीटर ले आये( माँ को मधुमेह है तो घर में ही रखते हैं यह )। वे कह रहे थे, " कुछ दिन पहले तुम्हारा शुगर  -लेवल नार्मल से कम था फिर  भी तुम मीठा छोड़ कर बैठी हो ...! लाओ चेक करवाओ ...अगर शुगर - लेवल कम हुआ तो तुम्हें अभी मीठा खाना पड़ेगा। "

       मैंने चुप चाप हाथ आगे कर दिया। मुझे उस पल  ऐसा लग रहा था  वही उनकी छोटी सी बेटी ' टिंकू ' हूँ एक बार तो अपनी उम्र ही भूल सी गयी । बचपन में हम बहनों में जो भी बीमार पड़ती थी तो पापा सरहाने ही बैठे रहते थे। तब लगता था के बार -बार बीमार पड़ें और पापा की स्पेशल बेटी बन जाएँ। आज भी जब बीमार पड़ती हूँ तो पापा की बहुत याद आती है।बेटी होने का बस यही दुःख है मुझे के अपने माँ -पापा से दूर रहना पड़ता है।

    हां तो ...!पापा ने शुगर चेक किया तो बिलकुल ठीक था अपने स्तर के मुताबिक ...! मैं हंस पड़ी , " देखो पापा ...! माँ के हाथों में ही मिठास है ...:)

और यही सच है के माता - पिता के प्यार के आगे सब कुछ गौण है। यह बात हम जब तक खुद माता - पिता ना बन जाएँ नहीं समझ सकते।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

मुझे पागल ही बने रहने दो ( लघु कथा )



रागिनी ने अपने बेटे विक्रम को बताया , वह आगरा जाने वाली है तो वह शरारत से मुस्करा उठा और बोला , " माँ  , वहां पर अस्पताल बहुत अच्छा है ...!'
 रागिनी थोडा चौंकी , क्यूंकि वह तो कोई और ही काम जा रही थी। बीमार तो नहीं थी वह।
बेटे के चेहरे को देख वह भी हंस पड़ी  ," अच्छा मजाक है ...!"
शाम को पति से कहा जोकि शहर से बाहर थे।
वह भी बोल पड़े , " अच्छे  से चेक करवा कर आना।"
इस बार रागिनी को बात चुभ सी गयी। सोचने लगी कि आधी से ज्यादा जिन्दगी  घर - गृहस्थी में गुज़ार दी , कभी खुद के लिए सोचा भी नहीं।और अब भी  जरुरी काम है तब ही जा रही हूँ फिर भी पागल करार दी जा रही हूँ।

बोल पड़ी  , " आदरणीय पति जी , आपको और बच्चों को लगता है कि  मैं पागल हूँ ...! तो जी हाँ ...! मैं थोड़ी पागल तो हूँ ! आप, बच्चों और अपनी  गृहस्थी के लिए  ...! जरा सोचिये अगर मेरा दिमाग ठीक  हो कर सेट हो गया तो आप सब का क्या होगा। "
  उधर से एक जोर से हंसी की आवाज़ गूंजी जिसमे ढेर सारा प्यार था।

विवाह के निमन्त्रण -पत्रों का बदलता स्वरूप और प्रारूप

कोई भी समारोह चाहे पारिवारिक या व्यवसायिक हो , अपने सभी परिचितों , मित्रगणो और रिश्तेदारों को निमंत्रित करने की प्रथा तो है ही। बहुत सारे तरीके हो सकते हैं निमंत्रित करने के , लेकिन इन सब में निमन्त्रण - पत्र अति आवश्यक है यह सभी जानते है।

अन्य समारोहों में  जहाँ ये निमन्त्रण -पत्र साधारण स्वरूप और प्रारूप लिए हो सकते हैं पर जो विवाह समारोह के लिए छपवाए या  भेजे  जाते है उनका रंग - रूप और ही होता है।विवाह - शादी में निमन्त्रण या न्योता देना जितना  अति आवश्यक है  तो  उतना ही आवश्यक निमन्त्रण- पत्र  भी है।

राजाओं के ज़माने में उनके निमन्त्रण - पत्र  जहाँ सोने चांदी  के होते थे वहीं  जन साधारण पीले- चावल भेज कर निमंत्रित कर दिया करते थे। समय बदला वैसे ही विचार - धारा भी बदली।

जब घर में किसी का विवाह तय कर दिया जाता है तो सबसे पहले निमन्त्रण की ही बात जेहन में आती है।उसके बाद निमन्त्रण -पत्र  का।

ये भी बहुत सारी  विविधता लिए होते है। अलग रंगों , डिज़ाइन और आकर के , सबकी अपनी  - अपनी पसंद  ,हैसियत और सहूलियत के अनुसार भी होते हैं। कोई बहुत साधारण सा  छपवाते हैं तो कोई बहुत भड़कीला।
कई पृष्ठों और कई रंगों का समावेश यहाँ दिख जाता है। कई तो भारी -भरकम पुस्तिका जैसे भी होते हैं।

90 के दशक तक ये लगभग एक जैसा ही रूप लिए होते थे। जैसे गणेश जी की तस्वीर , डोली में बैठी दुल्हन  घोड़ी पर बैठा दूल्हा और साथ -साथ चलती बारात की की भी तस्वीर होती थी।

लेकिन जमाना जैसे - जैसे हाई -टेक हो रहा है तो निमन्त्रण - पत्र  कैसे अछूते रहेंगे।यहाँ भी बदलाव हो रहा है।
कई लोग इनमे अपने कुल देवता की फोटो भी लगाने लगे हैं।यह कुछ उचित नहीं लगता क्यूँकि  ऐसे में  देवता का अपमान ही अधिक होता है। जिस घर में उन देव को पूजा जाता है वहां तक तो ठीक है लेकिन हर कोई उनका मान नहीं रख पाता।   यह भी क्या जरुरी है जिसके पास कार्ड जाता है वह हाथ धो कर या शुद्धता से ही कार्ड पढेगा। देव तो आशीर्वाद ही देते हैं फोटो लगाने का क्या औचित्य है।

निमन्त्रण - पत्र के साथ मिठाई या सूखे मेवे देने का प्रचलन भी है।इन डिब्बों की बहुत सारी   सज्जा के साथ ही पैकिंग होती है। मिठाई  या सूखे मेवे तक तो ठीक था कुछ अति आधुकिन लोग  इसके साथ एक डिब्बे में शराब की बोतल और चोकलेट भी देने लगे है। अब विवाह जैसे पवित्र कर्म में शराब जैसी चीज़ का क्या काम ...! डिब्बे में  ऊपर तो गणपति की तस्वीर के साथ विवाह -समारोह के कार्यक्रम का विवरण और  नीचे शराब और चोकलेट ...!

निमन्त्रण - पत्र  पर यह दिखावे भरा खर्च करने के बजाय अपनी बेटी या बेटा , जिसकी भी शादी हो , उसके नाम रूपये ही जमा करावा दिया जाये , जोकि उसके भविष्य में काम तो आ पाए। ये कार्ड्स तो कुछ दिन ही याद रहते है।बाद में तो कबाड़ ही है चाहे जितने रूपये लगाये जाए।

निमन्त्रण - पत्र  साधारण और जो भी कायर्क्रम हो उसे सुस्पष्ट तरीके से लिखा जाय तो ही ठीक रहता है।ज्यादा  भडकीला कार्ड होने पर कई बार लोग उसकी चमक -दमक और साथ मिले उपहार में ही उलझ कर रह जाते है और समारोह में शामिल होने के अंतिम क्षण तक कार्यक्रम सूचि को तलाशते है के कौनसा कार्यक्रम कब और किस समय है।

कार्ड का  रूप बदला तो थोडा सा प्रारूप भी बदला - बदला सा है। यहाँ भी किसका नाम लिखाया जाय या किसका नहीं।इससे भी व्यक्ति के उस परिवार के खास होने या न होने का पता चलता है।
आज कल जो सबसे ज्यादा हास्यप्रद है वह है कि कई लोग कार्ड्स में जो उनके पूर्वज स्वर्गजो कि  में निवास कर रहे  हैं , उनके भी नाम लिखवाने लगे है ..., जैसे "स्वर्गीय ......और स्वर्गीया ....., स्वर्ग से आशीर्वाद भेज रहे हैं।"अब उनका तो आशीर्वाद हमेशा ही रहता है चाहे वे ( स्वर्गीय आत्माये ) जीवित रहते हुए एक गिलास पानी को भी तरसे हों। उनके बच्चों ने कार्ड पर सबसे उपर नाम लिखवा कर अपना फ़र्ज़ पूरा करके उनकी आत्मा को शांति तो पहुंचा ही दी।

निमन्त्रण-पत्र पर कैसे नाम लिखा गया है ...जैसे किसी व्यक्ति का अकेले का नाम है या सपरिवार ...या कार्ड देने वाला कौन है और किस तरह से निमंत्रित करके गया है या महज़ औपचारिकता से भरा आमन्त्रण मात्र  ही है, यह भी बहुत मायने रखता है।

आज के ज़माने में प्रेम - स्नेह की बजे दिखावा ही ज्यादा मायने रखता है।अब तो यह  भी लगने लगा है के एक दिन ऐसा  भी आएगा जब लोग इंटरनेट पर अपने मित्रों और सम्बन्धियों को एक ही निमन्त्रण - पत्र में टैग कर देंगे। ऐसे में आशीर्वाद भी वहीँ मिल जायेगा।

उपासना सियाग



सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

एक दिन रेल के सफर में ...



       मैं एक व्यवसायी या कहिये एक सफल व्यवसायी रहा हूँ। अपने जीवन में बहुत रुपया ,नाम ,इज्ज़त कमाई है। लेकिन  कभी बाहर  की दुनिया का भ्रमण ही नहीं कर पाया। अब बेटों ने व्यवसाय बहुत अच्छी  तरह संभाल लिया है तो दुनिया देखने निकला हूँ या मन की शांति खोजने।
      हिंदुस्तान के कई शहरों में घूम चूका हूँ। अब हरिद्वार की तरफ जा रहा हूँ। रेल का सफ़र मुझे हमेशा से पसंद है। हालांकि बड़े बेटे ने गाडी और ड्राइवर साथ ले जाने को कहा था। सारी  उम्र  गाड़ी और ड्राइवर के साथ ही तो घूमा हूँ मैं। मेरे विचार से जब तक आप दूसरे लोगों के साथ सफ़र ना करो दुनिया का असली रूप नज़र नहीं आता।
      सारी उम्र काम में ही उलझा रहा। छोटी उम्र से ही काम का जूनून था। एक दिन सबसे ऊँचा पहुँच जाऊं यह एक जूनून था मेरे अन्दर।मैंने पाया भी बहुत लेकिन बहुत अधिक खोने के बाद।
    अपनी सीट पर बैठा हूँ और आने -जाने वालों को ताक रहा हूँ। मेरे साथ यहाँ दो तीन पुरुष ही सहयात्री है । सामने से भी तीन जन चले आ रहे हैं । उनमे पीछे जो आ रहा था , वह  कुछ परेशान नज़र आ रहा है ।तभी उसके मोबाइल की घंटी बज गयी।
     वह तनिक धीरे पर थोडा सा रोष भरी आवाज़ में बोला , " हाँ बोलो ...! अब ट्रेन पकडूँ  या तुम्हारा फोन सुनुं  ?ओह ...! अब रोने वाली क्या बात है ? हैं ..! मैं आ तो रहा ही हूँ ...सुबह तक पहुँच जाऊंगा ...अरे भई ...चुप हो जाओ , मैं जोर से नहीं बोल रहा था ..यहाँ तक आने में देर हो गई और ट्रेन छूटने का डर  था और ऊपर से तुम फोन पर फोन किये जा रही थी ,तुम भी तो कुछ समझा करो। चलो अब मैं बंद करता हूँ , घर आकर सारी शिकायते कर लेना ....."
     " किसका फोन था राकेश..."  फोन करने वाले का नाम राकेश है ।

   "अरे पत्नी जी का है , एक सांस में लग जाएगी फोन करने ,अब अगले की भी मजबूरी हो सकती है...  कुछ बोलो तो आंसू ढलकने लग जायेंगे !" राकेश ने बात खत्म कर के दोनों हाथों को अंगडाई लेने की तरह फैलाया।
  " उनकी भी तो मजबूरी हो सकती है आखिर दस दिन हो गए इंतजार करते हुए !  जरा उनकी  जगह खुद  रखो " विमल बोला।
   उनकी बातों से पता लगा राकेश , विमल और श्री कान्त अपने ऑफिस के किसी काम से दस दिनों के टूर पर आये हुए थे।
    श्री कान्त भी  खीझा हुआ था बोला , "कोई भी मजबूरी नहीं उनकी , उनको तो इंतजार हैअपने सामान का  जो उन्होंने  फरमाइश की लिस्ट  बना कर दी थी , अब एक भी कम रह जाएगी तो मुहं ही फूल जायेगा।घर में घुसते ही हमारी और ध्यान कम होगा और सामान के बैग पर ज्यादा होगा !"
    विमल जोर से हंस पड़ा और उनकी बातों से वह भी सहमत लगा।
      अब मेरे सहयात्री जो मेरे साथ पहले ही बैठे थे। वे भी उनकी बातों में शामिल होने को उत्सुक लगे।क्यूंकि उनकी भी हंसी सम्मिलित थी। और संयोग भी है कि  हमारे साथ कोई महिला  नहीं थी तो आज उनके पास महिलाओं के प्रति भड़ास निकलने का पूरा मौका था।
   " महिलाओं को समझना बहुत मुश्किल है , कब क्या फरमाइश कर बैठे, कब किस बात पर खफा हो जाये, और आंसू तो कब ढलक जाये। नहीं कहा जा सकता ..." , मेरे पास बैठे व्यक्ति , जिसका नाम नवीन था , बोला।
    " मैं तो भैया इन महिलाओं ना  आज समझ पाया ना ही तब , जब मास्टर जी ने संस्कृत के एक श्लोक की एक लाइन का  मतलब  पूछा था।
   श्लोक इस प्रकार था , " त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम "
   मैंने जवाब दिया , " सर इसका मतलब है , त्रिया का चरित्र देख कर पुरुष भाग गया ...!"और बस फिर क्या बताऊँ भाई साहब ...! क्लास में क्या ठहाके लगे , मेरे सहपाठी तो टेबल पीट -पीट कर हंसने लगे। सर के चेहरे पर भी हंसी तो आयी पर वो आखिर सर थे।पहले तो सबको चुप रहने को कहा फिर मुझे बस एक थप्पड़ ही नहीं मारा पर सुनाने में कोई कसर भी ना छोड़ी... ! "
      "और अब मेरी पत्नी ...! उसे शक के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। इतनी देर क्यूँ हो गयी , कहा थे अब तक ....और यह भी , जब कहीं रास्ते में जा रहे हो और सामने से कोई औरत आती दिख जाये तो ...! क्या देख रहे ? एक दिन मैंने भी हार कर ,बड़े ही प्यार से कहा , ' प्रिये तुम ऐसा करो , जैसे ताँगे वाले घोड़े  की आँखों पर जो बंधा होता है वैसा ही  कुछ मेरी ही आँखों के बाँध दो , फिर मैं सीधा -सीधा ही चलूँगा। इस बात पर तो गंगा -यमुना ही बह चली श्रीमती जी की आँखों से....,:
    यारो , मुझे एक बात तो तय लगती है , हमारी धरती पर जो तीन तरफ पानी है वो हमारी पत्नियों के आँसुओं  से ही बना है और जो दिनों -दिन जल स्तर बढ़ता जा रहा है वो कारण भी ये आंसू ही है ....!" मेरे  बिलकुल साथ बैठा विवेक बहुत उत्तेजित हो कर बोला तो हम सब एक बार जोर से हंस पड़े। ऐसा लगा ऐसे मुक्त हो कर हम  बेचारे पुरुष बहुत दिनों बाद हँसे हो।
     मुकेश चुप हो कर सभी की सुन रहा था। विवेक बोला , "क्यूँ भाई , आप को कोई शिकायत नहीं है क्या ...! सब ठीक -ठाक है।
  " अब क्या ठीक है और क्या ठाक है ...! पर एक बात जरुर है इन औरतों के आगे सच की कोई कीमत नहीं है।मैंने अपने पहले प्यार के बार में पत्नी को बता दिया। अपनी तरफ से ईमानदारी ही की थी।पर अब जब भी कभी चुप हो जाऊं या कोई गीत गुनगुनाऊ तो सुनना पड़ता है ' क्यूँ किसी की याद आ रही है क्या?' अब जब पत्नी के साथ सब आराम से निभा रहा हूँ तो  उसे ऐतराज़ किस बात है।"मुकेश कुछ चिढ कर बोला।
    " सुबह से शाम बस कोल्हू के बैल की तरह लगे रहो।शाम को घर पहुँचो तो कई बार  मेम साहिबा सो  रही होती है ..जगाओ तो ऐसे देखेगी जैसे किसी अजनबी को देख रही है और फिर से पसर जाएगी ..' अरे अभी तो कमर सीधी की है ....', लो कर लो बात,  अब इन्होने सारा दिन क्या किया ...! जो अब आराम फरमा  रही है। मैं भी सारा दिन का मारा -मारा भटक कर आया हूँ।" राकेश थोड़ा  जोश में आ गया था।
     विवेक बोला, " कभी टीवी चला कर बैठ जाओ और कोई सुन्दर सी हिरोइन पर फिल्माया हुआ गीत आ रहा हो तो , फिर तो भी श्रीमती जी की आँखे मुझे पर ही होगी। मन करता है कई बार बोल दूँ ...भई  थोडा टीवी की तरफ ही देखो ना, मुझे क्या घूरे जा रही हो !   अरे ...यह शादी तो करनी ही नहीं चाहिए।शिकायत और बस शिकायत ही है इसमें।"
    " और नहीं तो क्या ...! उनकी यह शिकायत की हम उनको प्यार ही नहीं करते ...! तो सोचने वाली बात है, फिर किससे प्यार करते हैं ...! सारा दिन उनके लिए ही भागते हैं। नहीं तो हमें क्या चाहिए था। कभी पास बैठती है ,कुछ  रोमांस करने का मन भी होता है तो इनकी शिकायतें सुन कर ही मन मर जाता है,तो कभी फरमाइशें सुन कर भी।" विमल भी थोडा सा तल्ख़ हो चुका था।
    मैं सब की बातें सुन कर सोच रहा हूँ । अपनी जिन्दगी से तुलना कर रहा हूँ । समय कितना बदल गया है ।मैंने तो कभी शिकायत नहीं की अपनी पत्नी की और ना ही मेरी पत्नी ने ही कभी मुझसे की।लेकिन  मैंने तो ....
   मेरी सोच पर विराम लग गयी। जब श्रीकांत ने मुझसे पूछा ,  " आपका क्या विचार है हमारे वार्तालाप पर ...? आपके और हमारे समय में आपको अंतर लगा क्या ...! या हम सब गलत हैं।
   " मुझे नहीं लगता हम सब गलत हैं , दोनों ही अपनी जगह सही है।बात तो एक दूसरे  का मूल्य समझने का और भावनाएँ  समझने का है !" मुकेश ने मुझसे पहले ही कहा।
   मैंने कहा , " अगर देखा जाये तो आप लोग यानी पुरुष वर्ग गलत नहीं है ...ना ही महिलाएं ।यह तो हर एक की अपनी जिन्दगी है कोई कैसे जीता है। मैं क्या कहूँगा आप लोगों को ,जब मुझे  ही समझ बहुत देर बाद आयी।
      बचपन अभावों में बीता। सोचा एक दिन इतना रुपया कमाऊंगा कि मेरे बच्चों को मेरी तरह मन ना मारना पड़े।और सच में मैंने वही मकाम पाया , जो चाहा  था। लेकिन जिन्दगी तो कहीं  छूट गयी। जीना क्या होता है ,घर का सुख क्या होता है वह मैंने खो दिया।
      पत्नी ने कभी शिकायत ही नहीं की।बस चेहरे पर मुस्कान ही बिखेरे रहती।
   आज जब आपकी बातें सुन रहा हूँ तो मुझे यह अहसास हो रहा है काश वो भी ऐसे शिकायत करती या मेरे देर से आने पर झगड़ा करती। पर वह तो बस त्याग की मूर्ति बनी सब सहन करती रही। वह बेहद खूबसूरत थी  ,कमर से भी नीचे लहराते बाल थे उसके। कभी देर से घर पहुँचता तो वह मेरा इंतजार करते-करते सो जाती .घने बालों में उसका चाँद सा पर कुछ मायूस सा चेहरा नज़र आता पर ...... पर मैंने कभी देखा ही नहीं उसकी तरफ और जिस दिन मुझे अहसास हुआ वो दुनिया से जा चुकी थी।
   सुबह अपने बिखरे बालों के साथ -साथ अपने आप को भी समेटती हुई फिर से लग जाती घर बच्चे सँभालने में।  विवाह की पच्चीसवीं  साल गिरह पर  एक समारोह किया मैंने। वहां पर किसी ने पूछा सुनीता से ( मेरी पत्नी ) कि उनके इतने सालों के विवाहित जीवन का सबसे यादगार लम्हा क्या था। वह क्या बताती कभी मेरे साथ कोई ख़ुशी का पल बिताया होता तो बताती। लेकिन उसने यहाँ भी ख़ूबसूरती  से जवाब दे कर बात को संभाल लिया  और मेरे मर्द होने का दर्प बना रहने दिया।
     धीरे - धीरे मुझे अहसास होने लगा , मैं गलत हूँ और मैंने बहुत कुछ खोया है । बेटों को कारोबार सँभालने को दे कर मैंने सोचा कि  अब सुनीता को सारी  खुशियाँ दूंगा। उसके साथ ही रहूँगा ,सारा हिंदुस्तान घुमाऊंगा। नई - नई शादी हुई थी तब एक बार उसने जिक्र भी किया था।उसे घूमने  का बहुत शौक है।
    अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो पास के टेबल पर हमेशा की तरह चाय नहीं थी ना ही उस दिन का अखबार था। मैंने गर्दन घुमाई तो देखा सुनीता अभी तक सो रही थी। बहुत चिंतित हुआ और उसे छुआ तो उसका बदन ठंडा सा लगा मुझे।
      वह जा चुकी थी और मैं रोक भी नहीं पाया। अंतिम संस्कार के समय , मेरा मन हो रहा था उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर उसे पुकारूँ कि बस एक बार मेरे लिए वापिस आ जाओ। अब कोई शिकायत नहीं होने दूंगा । लेकिन मैं ऐसा क्यूँ करता भला मर्द था आखिर। उसको जाते देखता रहा अपने चेहरे पर गंभीरता लिए।
   अब मैं हर रोज़ पश्चताप में जलता हूँ ...
   मैं तो यहीं कहूँगा के जिन्दगी को भरपूर जियो। जो शिकवा -शिकायत है उसे खुल कर कहो मन में ना रखो ....!" कहते -कहते मैंने अपने दोनों हाथ से अपना चेहरा ढक लिया।
    मेरी बात सुन कर सभी चुप रहे।
   पर विवेक चुप ना रह सका बोला, " देखिये मोहन लाल जी , आपकी बात सही है  पर सभी औरतें सुनीता जी की तरह सहन शील भी नहीं होती। मेरी पत्नी को हर बात पर शक होता है घर में घुसते ही ख़ुफ़िया जासूस की तरह सूंघने लगती है कहीं मुझमे कोई किसी और औरत की खुशबू तो नहीं आ रही ...! अब इसका क्या इलाज किया जाये।"
" बीमारी हो या समस्या हर चीज़ का इलाज है , वह भी सिर्फ आपके पास ही।यह आपने सोचना-समझना है और अपने साथी को समझाना है।
अब मुझे इजाजत दीजिये ,मेरा गन्तव्य आ गया।" मैंने अपना बैग उठाते हुए अपने सहयात्रियों से विदा ली।

उपासना सियाग
upasnasiag@gmail.con

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

किट्टी पार्टी .....

       आज रमा के यहाँ किट्टी पार्टी  थी। हर महीने होने वाली किट्टी पार्टी का अपना ही एक अलग उत्साह रखता था। लगभग तीस महिलाओं का समूह था यह। सभी सखियाँ -सहेलियां  आ रही थी। महकती -गमकती मुस्कुराती, पर्स संभालती, बालों को सेट करती एक -एक करती पहुँच रही थी।  आँखों पर पतली सी काज़ल और लबों पर भी एक रंगीन लकीर खींच कर  जता रही थी मानो  कुछ देर के लिए चिंताओं और ग़मों  को एक लक्ष्मण रेखा के भीतर धकेल दिया हो। हर कोई बस जी लेना चाहती थी कुछ पल। तरो ताज़ा होने के लिए कुछ महिलाओं के लिए यह पार्टी कम नहीं थी। हालाँकि कई महिलाओं की तो कई और भी किट्टी  पार्टी थी।
     गर्म-गर्म खाने और पीने का दौर चल रहा था। एक खुशगवार सा माहौल था।
   अचानक लीना ने एक खबर सुनानी शुरू की , " कल मैंने विदेश की एक खबर पढ़ी, उसमे लिखा था  एक जोड़े ने शादी के उन्नीस घंटे बाद ही तलाक ले लिया ...!" बड़ी हैरान हो कर थोड़ी आँखे विस्फारित सी हो कर वह कह रही थी।
   सभी महिलाएं खिलखिलाकर हंस पड़ी।
निहारिका थोडा सा मुहं बना कर  दिल पर हाथ रख बोल पड़ी , " लो कर लो बात ...! उन्नीस घंटे बाद ही तलाक ...!और  हमारे यहाँ तो शादी के बाद प्यार होने में ही उन्नीस साल लग जाते हैं ...!"
     एक बार फिर से खिलखिलाहट ..!
       थोड़ी ही देर में एक ख़ामोशी सी छा गयी।
 फिर रोमा हंस कर बोली जैसे कहीं खो सी गयी हो , " हाँ ...!ये तो तुमने सच ही कहा निहारिका , प्यार तो होते -होते  हो  ही जाता है बस, ये अलग बात है हम अपने साथी के साथ रहते हैं,  एक दूसरे  की जरुरत  पूरी करते , बच्चे जनते - पालते और इस बीच न जाने प्यार कब हो जाता है। लेकिन  इतने सालों बाद भी एक खालीपन  तो महसूस होता  ही है। जैसे कोई तो होता जो हमें भी सुनता।  किसी के आगे हम भी जिद करते  और अपनी बात मनवाते ...! आखिर प्यार में यही तो होता है ना ...?"
   पल्लवी ने भी हामी भरी , " अरे यह भी कोई जिन्दगी होती है जैसी हम जीते हैं, शादी ना हुई कोई उम्र कैद की सजा ही हो गई। ना मन पसंद रंग पहन सकते। ना अपनी पसंद का कोई ड्रेस ही पहन सकते। यह मत करो या यह क्यूँ किया या तुमको यही करना चाहिए। मैं तो अपनी पसंद का रंग ही भूल गयी हूँ .....याद ही नहीं के मुझे क्या पसंद था और मुझ पर क्या जंचता  था ...! "
   माहोल थोडा गंभीर हो चला था .हाथों में पकडे कॉफी  के मगों से अब भाप निकलनी बंद हो गयी थी। आखों  और होठों पर लगी लकीरें भी थोड़ी सी फीकी दिखने लगी थी।
     परनीत थोडा सा संजीदा हो चुकी थी। " हाँ यार ...! ऐसा ही होता है , कभी जिद करो या सोचो के आज बात ही नहीं करना और अनशन पर ही रहना है चाहे कुछ भी हो ...! भाड़ में गया यह घर और उनकी घर गृहस्थी ...हुंह ! लेकिन थोड़ी देर में कोई बच्चा कुछ बात करता या खाने को मांग बैठा तो  यह ममता उमड़ने  लगती है ,आखिर बच्चों की तो कोई गलती नहीं होती ना !"
    " और नहीं तो क्या बच्चों को क्यूँ घसीटें हमारे आपसी मतभेद में,  उनके लिए ही उठना  पड़ता  है एक बार से बिखरती गृहस्थी को समेटने। तभी पीछे से साहब भी आ जाएँगे मंद -दबी मुस्कान लिए और धीमे से चाय की फरमाइश लिए हुए।  अब चाहे कितना भी मुहं घुमाओ हंसी आ ही जाती है। पर मन में एक टीस  सी छोड़ जाती है  हूक सी उठाती हुई ..., क्या जिन्दगी यूँ ही कट जायेगी, अपने आप को हर रोज़ घोलते हुए ! ", उषा भावुक सी होते हुए बोली।
     आकांक्षा जिसे  अभी गृहस्थी का अनुभव कम था।   बोली , "अरे तो आप सब सहन ही क्यूँ करती हो ....विरोध करो , और बच्चों के लिए ,किस के लिए अपनी खुशियों को त्याग देती हो !कौन है जो तुम सब के त्याग को महान  कहेगा ? समय आने पर यह बच्चे भी अपनी दुनिया में मग्न हो जायेंगे। हम सब बैठी रहेंगी अपने-अपने त्याग और बलिदान की टोकरी लिए। शायद एक दिन हम सब अपने आप को ही भूल जाएं ।"
 " लेकिन ये जो हमारे बच्चे हैं,  अपने आप तो दुनिया में आये हैं नहीं और ना ही इन्होने हमें कहा था के उनको इस दुनिया में आना है। हम ही तो लायें है इन्हें, तो इनकी देख भाल और परवरिश करने का फ़र्ज़ तो हमारा ही है ...! और हम बच्चों की बात नहीं कर रहे, यहाँ बात हो रही है स्व की ...! हमारी निजता की। हमारा आखिर वज़ूद क्या है घर में समाज में ..., क्या सिर्फ अनुगामिनी  ही है हम , थोडा सा भी विरोध का स्वर उठाने पर कौन हमारा साथ देता है ? यहाँ तक की घर की महिलाये भी साथ नहीं देती। मेरी नज़र में हर औरत अकेली है और सिर्फ अकेली ही उसे अपने लिए लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है कोई भी साथ नहीं देता उसका।" निहारिका ने अपनी बात पर जोर दे कर कहा।
" नहीं ऐसा नहीं है ....,साथ तो देती ही है ..." , आशा ने कहा तो लेकिन कुछ कमजोर स्वर में।
  "क्यूंकि सभी को मालूम है जब कभी भी जोर दे कर महिला अपनी बात भी मनवाना चाहती है तो उसे विद्रोहिणी की संज्ञा दी जाती है।
" एक बात तो निहारिका ने सही कहा , " हर औरत अकेली है " ....दूसरी बात मैं भी कहूँगी कि  "हर औरत का एक ही वर्ग है "....और वह मजदूर वर्ग ...! जिस तरह  एक मजदूर औरत या घरों में काम करने वाली माई  सुबह से शाम मजदूरी करती है वैसे ही मैं भी सुबह घर का काम देख ,फिर अपनी नौकरी पर जाती हूँ। कई बार कुछ फरमाइश होती है शाम को आते हुए कुछ सामान भी लेती आना। देर हो जाती है शाम को आते-आते  तो फिर सभी के फूले हुए मुहं देखो और बडबडाहट भी सुनो , महारानी सुबह ही निकल जाती है पर्स झुलाते हुए ,अब घर आयी है ...!" एक आस भरी नज़र पति महाराज की तरफ देखो तो वहां भी एक अपरिचय सा नज़र आता है। तो मन कट कर रह जाता है। मगर फिर बच्चे दिख जाते हैं तो उनकी भोली और बे कसूर मुस्कान को देख सब भूल ,जुट जाना पड़ता है ...." , सोनिया ने भी कुछ व्यथित हो कर कहा।
     एक बार फिर से ख़ामोशी छा गयी।
      अर्चना ने ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा, " हमने बात तो प्यार से शुरू की थी , कई बार बहुत अजीब सा लगता है हमारे पति लोग जिन्होंने प्यार शब्द कभी जुबान पर ही नहीं लाया हो और एक अहसान की तरह ही साथ रह -रहे हों और बात -बात में यह भी जताया हो कि  उन्होंने एक अहसान ही किया था हमारे पिता पर जो उनकी पुत्री को वह ब्याह कर लाये नहीं तो ना जाने हमारा क्या होता।वही इन्सान अब कभी बाहर जाने पर कहता कि  उसको हमारी याद आ रही या वे बहुत प्यार करते हैं तो क्या ये शब्द हमारे मन को छूते  हैं भला ...! मेरे तो नहीं छूते बिलकुल भी,एक खालीपन सा ही लगता है। "
  " अब प्यार है, तो है ...! यह भी कोई कहने की बात है भला ...? मेरे  साहब का भी यही ख्याल है। लेकिन प्यार इज़हार भी मांगता है। पति-पत्नी का  रिश्ता एक पौधे की तरह ही तो होता है। उसे भी प्यार से सींचना पड़ता है और कभी प्यार भरे बोलों की खाद भी डालनी पड़ती है नहीं तो इसमें भी अवसादों की दीमक लगते देर नहीं लगती ...!" , कोमल भी कुछ दार्शनिक अंदाज़ में बोली तो माहोल में एक हंसी सी दौड़ गयी।
   अब एक बार फिर से गर्म चाय का दौर चल पड़ा था। गर्म - गर्म भाप उठते मगों की चाय ने माहोल फिर से बदल दिया।
     अनु बहुत देर से सबकी बात सुने जा रही थी चाय का घूंट भरते हुए बोली , " तुम लोगों के दौर से मैं भी गुजर चुकी हूँ। मुझे भी बहुत सारी शिकायतें रह चुकी है। अपने पति से , माहोल से। यह भी सच है के किसी का कोई भी साथी नहीं होता सब अकेले  ही होते है। लेकिन हम अकेले होते जरुर है पर रह नहीं सकते ....कोई साथी जरुर चाहिए।
     सबसे पहले निहारिका की बात पर यह कहूँगी कि प्यार को सिर्फ घंटे या साल में नहीं महसूस किया जा सकता बस प्यार तो प्यार ही होता है।वह हो नहीं जाता बल्कि होता ही है। यह बात और है कि  हम ध्यान ही नहीं देते छोटी-छोटी बातों को। मेरे पति भी बहुत चुप्पे थे कोई बात ही नहीं बताते थे। कभी बीमार पड़े तो जैसे काट खाने को दौड़ते थे।अकेले ही रहना पसंद करते थे। मैं उनको खाने या दवाई का पूछती तो जैसे उनको दर्द हो रहा हो बताने में,  चिल्ला पड़ते  थे। मैं भी कभी आंसूं पी लेती या चुपके से उनको  पोंछ लिया करती थी।
   एक दिन जब वह बहुत तेज़ बुखार से तप रहे थे।मुझसे रहा नहीं गया मैं सिरहाने बैठ गयी और धीरे से उनके माथे पर हाथ रख दिया। ईमानदारी से बताऊँ तो मेरा मन नहीं था  उनके पास बैठने का ,एक डर सा था अपमानित होने का। फिर भी मैं  बैठी क्यूंकि जो भारतीय संस्कार है वह रक्त से भी ज्यादा दौड़ता है हम औरतों में।"
    सभी महिलाओं में एक दिलचस्पी सी जाग रही थी और उनकी बात की हामी भी भरी जा रही थी।
अनु ने बोलना  जारी रखा , "बुखार बहुत तेज़ था। मैंने हाथ हटाना चाहा तो उन्होंने मेरे हाथ को हटाने नहीं दिया , उसे वहीँ रखे रहने दिया। उनको मेरा हाथ रखना बहुत सुहा रहा था।मैं कई देर तक उनका माथा सहलाती रही ,सच बताऊँ तो मेरे मन में उनके लिए सिर्फ ममता ही उमड़ रही थी।" कहते - कहते अनु का थोडा सा गला भर आया तभी तो उसकी आवाज़ भर्रा गयी थी।
     कुछ दिन बाद वह ठीक हुए। पर जो इन्सान बोलना ही नहीं जानता  वह क्या जाने के सामने वाला जो उनका जीवन साथी भी है उसे भी तो प्यार और उसके अहसास की जरूरत हो सकती है।
     यहाँ मैंने निष्कर्ष निकाला कि पुरुषों को बचपन से ही  अभिव्यक्ति नहीं आती क्यूंकि उन्होंने सीखा ही नहीं होता। माँ जब बिन कहे सारी जरूरतें उसकी पूरी करती रहती है। उसे कहना ही नहीं आता या उसे बात -बात पर अरे ...! तुम लड़के हो ऐसा कहते या रोते हुए अच्छे  लगते हो क्या ...? हो सकता वह अपनी भावनाएं दबाना वहीँ से सीख जाता हो और उसे व्यक्त करना ही नहीं आता हो !
   लेकिन बहुत महसूस होता है जब कोई मन की बात सुनने वाला न हो और कभी ऐसा भी होता है कि  बात उन्ही को बतानी होती है और वह व्यस्त होते हैं तो मन कितना मायूस होता है मैं समझ सकती हूँ।
    लेकिन ...! जहाँ  गृहस्थी की बात आती है तो बहुत कुछ बनाना ही होता है, मिटाना नहीं। एक औरत अगर कहती है कि गृहस्थी उसके त्याग और बलिदान पर चलती है तो यह पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता।पुरुष का योगदान भी उतना ही होता है जितना एक स्त्री  का ...!
   इस गृहस्थी की ईंटे कहीं मिलती नहीं है, ना इसका कोई मटिरियल बाज़ार में मिलता। यह तो हमें ही बना कर एक-एक कर जोड़नी  पड़ती है ...!"  अनु ने मुस्कुराते हुए कहा।
" वाह  क्या बात कही आपने अनु ...! बहुत सारी आह समेटने के बाद ही वाह मिलती है शायद ..., रमा ने हँसते हुए कहा।
  तभी बाहर  कार का हॉर्न सुनायी दिया। निहारिका झट से खड़ी होते बोली , " मेरा तो ड्राइवर आ गया ...!"
 "अरे तुम ने ड्राइवर कब रखा ?" कई सारे  प्रश्न आये।
    " अरे यार वही तो है पुराना वाला ! जिसे मेरे पापा ने दिया था उन्नीस साल पहले ...!" निहारिका ने भी बहुत शाही अंदाज़ में उत्तर दिया और पीछे अपने बहुत सारी खिलखिलाहटे छोड़ आगे बढ़ गयी।
फिर रमा की और सखियाँ भी चल पड़ी अपने -अपने ठिकाने। रमा भी बहुत खुश थी के आज की उसकी पार्टी सार्थक रही।

उपासना सियाग ( अबोहर )