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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों काप्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" ( एक समीक्षा )

    लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों की मैं बहुत प्रशंशक हूँ। सबसे पहले मैंने उनकी लिखी कहानी वनिता पत्रिका में पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। कहानी का नाम था " परछाइयों के उजाले " !
     जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
   कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
 बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ',  'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत  अच्छी है।
   " जीवट " में फुलवा को जब तक यह अहसास नहीं हो जाता कि सभी सहारे झूठे है , तब तक वह खुद को कमजोर ही समझती है। कोई भी इंसान किसी के सहारे कब तक जी सकता है।
     " सगा सौतेला " जायदाद के लिए झगड़ते बेटों को देख कर भाई को अपने सौतेले भाई का त्याग द्रवित कर जाता है लेकिन जब तक समय निकल जाता है। यहाँ यह भी सबक है कि कोई किसी का हिस्सा हड़प कर सुखी नहीं रह सकता। पढ़ते - पढ़ते आँखे नम हो गई।
      " निश्चय " कहानी भी अपने आप में अनूठी है। यहाँ एक मालकिन का स्वार्थ उभर कर आता है कि किस प्रकार वह अपने घर में काम करने वाली का उजड़ता घर बसने के बजाय उजड़ देती है। एक माँ को बेटे से अलग कर देती है। जब मंगला को सच्चाई मालूम होती है तो उसका निश्चय उसे अपने घर की तरफ ले चलता है।
      " आवरण " कहानी भी भी बहुत सशक्त है। यहाँ समाज के आवरण में छुपे घिनौने  चेहरे दर्शाये है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक औरत का कोई भी नहीं होता है। उसे अपने उत्थान और सम्मान के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है और आवाज़ भी । तब ही उसके साथ दूसरे खड़े होते हैं। यहाँ भी सुकुमा के साथ यही हुआ। अगर वह आवाज़ नहीं उठाती तो वह अपने जेठ के कुत्सित इरादों कि शिकार हो जाती। औरत का आत्म बल बढ़ाती यह कहानी बहुत उम्दा है।
      " परछाइयों के उजाले " एक अलग सी और अनूठी कहानी है। कहानी में भावनाओं के उतार चढाव में पाठक कहीं खो जाता है। यहाँ भी पढ़ते -पढ़ते आँखे नम हो जाती है। इस कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ मन को छू जाती है , " नारी का जीवन हर उम्र में सामाजिक बंधनो से बंधा होता है जो कि उसकी किसी भी मासूम ख्वाहिश को पाने में आड़े आता है। "
     कविता जी की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी है। मेरी तरह से उनको हार्दिक बधाई और ढेर सारी  शुभकामनाएं कि उनके और भी बहुत सारे कहानी संग्रह आएं।
   मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ बल्कि एक प्रसंशक हूँ कविता जी कि कहानियों की।

    परछाइयों के उजाले …… इस लिंक पर क्लिक कर के खरीदी जा सकती है यह पुस्तक।
   

रविवार, 29 दिसंबर 2013

मोनालिसा की सी मुस्कान ( लघु कथा )

" रमणी , तू क्या खाती है ! कितनी स्लिम ट्रिम है ! तेरा डाईट चार्ट लाना , मैं भी वही खाऊँगी कल से !" आमला चकित सी और थोड़ी ईर्ष्यालु सी हुई जा रही थी रमणी से कहते हुए।
रमणी जो कि जिम कि परिचारिका थी। भूख और हालात कि मारी हुई। जैसे- तैसे परिवार और छोटे बच्चे का पेट पाल रही थी।
भारी भरकम आमला का भार कई महीने से जिम आते हुए भी कम नहीं हो रहा था। ऐसे में शायद अनजाने में ही रमणी की डाइट- चार्ट पूछ बैठी।
अब रमणी क्या बताती कि वह सिर्फ गम खाती है। अच्छा खाना कब खाया था ,याद ही नहीं। लेकिन प्रकट में वह मुस्कुरा रही थी अपने होठों पर मोनालिसा की सी मुस्कान लिए।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

एक पल

        सुधा जब से किट्टी पार्टी से लौटी है तभी से चुप है। जैसे कुछ सोच रही है। हाँ , सोच तो रही है वह। आज जो बातें किट्टी में हुई। वे बातें उसे थोडा आंदोलित कर रही है। कभी -कभी वह खुद अपने आप पर ही झुंझला जाती है कि वह दूसरी औरतों की  तरह बेबाक क्यूँ नहीं है। क्यूँ नहीं वह उनकी बचकानी बातों का समर्थन कर खिलखिला कर हंसती। आज तो बहुत गम्भीर विषय था तो भी बातों का स्तर कितना हल्का था।
         बात दामिनी को ले कर चली थी। दामिनी के साथ जो हादसा हुआ और किस तरह सभी के मनों को झिंझोड़  गया था। जितना शोर मचा था, वह सिर्फ मिडिया में ही था। बहुत कम लोग थे जिन्होंने दामिनी से सहानुभूति दिखाई हो। क्या उसके बाद ऐसे हादसे नहीं  हुए !
      सारिका के यह कहने पर कि बॉय फ्रेंड के साथ कु -समय जायेगी तो यही होगा ! सुधा से रहा नहीं गया और बोल पड़ी कि यह भी क्या बात हुई अगर वह उस समय अपने किसी  परिजन के साथ होती तो या अगर घर में कोई बीमार हो जाता और उसे अचानक अकेली ही घर से निकलना पड़ता तो ! क्या जो कुछ उसके साथ हुआ वह जायज था। हम सभ्य समाज में रहते हैं। किसी जंगल में तो नहीं कि भेड़िया आएगा और खा जायेगा ! क्या उन लोगों के अपने परिवार की कोई लड़की होती तो क्या वे सब यह करते ? इस पर भी कई मतभेद उभरे। लेकिन सभी का एक मत कि देर रात ऐसे घर से निकलना नासमझी ही है। जब तक  हालत सुधरते नहीं। खुद की  सावधानी भी जरुरी होती है।
        खुद सावधान रहना चाहिए। इस बात को तो सुधा भी मानती है। वह बचपन में ही माँ से सुनती हुई आयी थी कि अपनी सावधानी से हमेशा बचाव रहता है। माँ रात को सोने से पहले घर के सारे कुंडे -चिटकनिया और परदे के पीछे हमेशा झाँक कर देखती और सावधानी का वाक्य दोहरा देती थी। जब वह होस्टल गयी तो भी माँ ने यही वाक्य दोहराया और यह भी सलाह दे डाली कि किसी से भी ज्यादा दोस्ती ना करो ना ही बैर रखो। माँ की यह सलाह उसके गाँठ बांध ली और अभी भी तक अमल करती है इस बात पर। तभी तो वह सभी से  एक सामान व्यवहार कर पाती है।
        सुधा सोच रही थी कि हादसे तो कभी भी हो सकते हैं। रात का होना कोई जरुरी तो नहीं। यह तो बुरा वक्त होता है जो किसी का आना नहीं चाहिए। वक्त अगर दामिनी का खराब था तो वक्त उन दरिंदो का भी अच्छा नहीं था। तभी तो उनसे यह वारदात हुई। बुरे वक्त और अच्छे वक्त के बीच एक पल ही होता है जो इंसान पर हावी हो जाता है।
  ऐसा ही एक पल सुधा की जिंदगी में आया भी था। अगर वह स्वविवेक से काम न लेती तो...! इससे आगे वह सोच नहीं पाती और सिहर जाती है। हालंकि इस घटना को 26 वर्ष से भी अधिक हो चुका था।
     26 साल पहले जब वह होस्टल में थी तब उसके ताऊ जी भी वहीँ शहर में ही रहते थे।  दो-चार दिन के अवकाश में अक्सर  उनके घर चली जाया करती थी। एक बार तीन   छुट्टियाँ एक साथ पड़ रही थी तो उसने ताउजी के घर जाने की सोची। वार्डन से  छुट्टी की  आज्ञा ले कर हॉस्टल से बाहर आ गई। रिक्शा की तलाश करने लगी। उसको भीड़ से परेशानी और घुटन होती है तो वह सिटी बस से परहेज़ ही करती थी। एक रिक्शा मिला और 7 रुपयों में तय करके बैठ गई।  कुछ दूर जाने पर  उसे लगा कि  रिक्शा वाला गलत रास्ते पर जा रहा है । उसे रास्ता मालूम था। उसने रिक्शे वाले को टोका भी कि वह गलत जा रहा है।  वह बोला कि ये शॉर्ट -कट है।
         सुधा ने सोचा हो सकता है कि इसे ज्यादा मालूम है। लेकिन उसे फिर भी शक हुआ जा रहा था कि वह गलत जा रहा है। कई देर चलने के बाद वह एक पैट्रोल -पम्प के पास जा कर रुका और बोला कि शायद वह रास्ता भूल गया और पूछ कर आ रहा है। सुधा चुप कर बैठी रही। तभी कुछ आवाज़ें सुनायी दी तो उसने गरदन घुमाई। सामने यानि पैट्रोल -पम्प के पीछे की तरफ एक कमरे के आगे से दो आदमी उसको अपनी तरफ बुला रहे है। वह रिक्शे से उतरने को हुई। अचानक  फिर दिमाग में एक विचार कोंध गया कि वह क्यूँ उतर रही है !कलेजा उछल कर गले में आ गया। लेकिन कस कर रिक्शा पकड़ लिया और गरदन घुमा  कर बैठ गई।
      थोड़ी ही देर में रिक्शा वाला आकर बोला कि वह खुद जा कर रास्ता पूछ ले। सुधा का हालाँकि कलेज़ा कांप रहा था फिर भी जबड़े भींच कर लगभग डांटते हुए बोली कि रास्ता उसे पता है। वह उसे ले जायेगी। रिक्शे वाला उसके तेवर देख कर सहम गया और रिक्शे पर बैठ कर बोला तो बताओ किधर ले चलूँ।
       सुधा के ताऊजी पुलिस के बड़े अधिकारी थे। उसने उनका नाम लेते हुए कहाँ कि उसे पुलिस स्टेशन ले चले। वही से वह उनके घर जायेगी। जहाँ उसने जाना था वहाँ के थाने का नाम लिया। थोड़ी देर में ही वह पुलिस स्टेशन के सामने था। उसके ताऊजी पुलिस अधिकारी तो थे लेकिन वे वहाँ कार्यरत नहीं थे।
       अब सुधा ने कहा कि  रिक्शा आगे बढ़ाये और वह घर ही जायेगी। ऊपर से मज़बूत दिखने का ढोंग करती सुधा मन ही मन बहुत डर गयी थी। घर का रास्ता ही भूल गयी। सुबह 10 बजे की हॉस्टल से  निकली सुधा को डर के साथ भूख भी सताने लगी थी। दोपहर के दो बजने को आये थे।
   अब तो रिक्शे वाला भी चिढ़ गया था। बोला कि जब उसे घर का पता नहीं था तो वह आयी ही क्यूँ ? तभी उसे थोड़ी दूर पर ताऊजी के घर के आगे गार्ड्स दिखाई दिए। राहत की  साँस सी आई और रिक्शा वही ले जाने को कह दिया। घर के आगे पहुँच कर  उसने रिक्शा वाले को 7 रूपये देने चाहे तो वह रुहाँसा हो कर बोला मालूम भी है कितने घंटे हो गए हैं।
   सुधा बोली ,"तेरी गलती ! मैं क्या करूँ तू गलत ले कर ही क्यूँ गया ! सामने गार्ड्स दिख रहे हैं क्या ? उनको बताऊँ तेरी हरकत , मैं तो ये सात  रूपये भी नहीं देने वाली थी। चल जा यहाँ से। "
वह चुप करके रूपये ले कर चलता बना।
    सुधा का मन था कि काश आज माँ सामने होती और गले लग कर सारा डर दूर कर लेती। बाद में ताईजी को बताया तो उन्होंने कहा भी कि उसे जाने क्यूँ दिया। उसकी शिकायत करनी थी।  तब तो  उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था और वह यह सोच ही नहीं पाई थी । तब ताईजी ने कहा कि जो बात हुई नहीं उस पर विचार मत करो और सोचो कि तुमने आज सात रुपयों में आधा शहर घूम लिया। दोनों हंस पड़ी इस बात पर।
     सोचते -सोचते वह मुस्कुरा पड़ी। यह एक पल ही होता है जो इंसान को अच्छे या बुरे वक्त में धकेल देता है। फिर भी खुद की  सावधानी जरुरी तो है ही।


उपासना सियाग

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

मैं ऑक्टोपस क्यूँ न भई ...!

' मैं ऑक्टोपस  क्यूँ न भई '.... शीर्षक पढ़ कर चौंकिएगा नहीं। एक गृहिणी जो सुबह से लेकर शाम तक , नहीं शाम तक नहीं ! आधी रात तक खटती हो , वह यह जरुर मानेगी कि उसके ऑक्टोपस कि तरह बहुत सारी भुजाएं क्यूँ ना हुई।
   हम माँ लोग, अपने बच्चों को लाड़ -प्यार में इतना बिगाड़ देती हैं कि वो कुछ भी काम नहीं करेंगे। सब कुछ उनको उनके पास ही पहुँच जाए। केवल बच्चों को ही क्यूँ हम तो हमारी सासु माँ के बिगड़े हुए बच्चे को भी आज्ञाकारी पत्नी बन कर सर चढ़ा लेती हैं।
    नहाने जाओ तो ' माँ तौलिया देना। मेरे जूते  तो पॉलिश कर दो। बस आज -आज कर दो कल से पहले ही कर दिया करेंगे। मेरी प्यारी मम्मा कपडे़ भी निकाल दो अलमारी से। आप कितनी अच्छी हो। ' रोज़ के डायलॉग है बच्चों के ! और मैं कभी उनके  प्यार में , ममता और कभी मक्खनबाजी से उनको और बिगाड़ती रहती हूँ। उनका तो कल कभी नहीं आया।
   यही हाल पति देव का भी ! उनके कपडे  सफ़ेद कड़क स्टार्च वाले होने चाहिए। मज़ाल है कि कोई धब्बा भी रह जाये। कोई रह भी जाये तो फिर गले से इतनी मधुर आवाज़  कि दिल बैठ जायेगा कि  जरुर कोई नुक्स है। मैं जरुर जोर से चिल्ला  पड़ती हूँ कि  नहीं मैं नहीं आउंगी ! कोई नुक्स है तो एक तरफ रख दीजिये। फिर से धो दूंगी।
   पति जी तो सुबह एक घूंट चाय के साथ शुरू हो जाते हैं कि ये नुक्स है या फिर से बना कर लाओ। अब सुबह -सुबह इनके नखरे उठाऊं या बच्चों को देखूं। तब मन करता है कि भगवान को पुकारूँ कि उसने मुझे औरत तो बना दिया फिर  ऑक्टोपस की तरह कई सारी बाजू क्यूँ ना दी।
  खाना खाने बैठेंगे तो भी नखरे।  जो बना है उससे संतुष्टि नहीं। चलो कभी होता है कोई फरमाईश कर दी कि ऐसे नहीं वैसे बना था। नहीं जी ! यहाँ तो कुछ भी खाना हो वह खाना सामने आने के बाद ही नखरे और नुक्स शुरू होते हैं। अपनी मर्ज़ी से थाली में डाला तो ये तो मैंने खाना ही नहीं था। थाली आगे रखते ही बोलेंगे। जाओ आज तो दही कि लस्सी बनाओ। या लस्सी बना दो तो आज तो रायता खाना था। पहले पूछो तो बोलेंगे कि पहले सामने लाओ फिर देखूंगा और बताऊंगा कि तुमने क्या -क्या बनाया है। चटनी रखो तो आज मैंने हरी मिर्च खानी थी वह भी तवे पर तड़की हुई। मिर्च लाओ तो उनको आचार खाना होता है। एक मिनिट भी सांस तो क्या ले कोई। खाना खाते हुए  जाने कितने चक्कर लगवाते हैं।
   एक दिन मैंने भी सोचा कि आज एक भी चक्कर नहीं लगाऊंगी। थाली में खाना रखा और एक ट्रे में सब कुछ रखा जिनका कि मुझे अंदेशा था कि वो क्या -क्या खा सकते हैं। मैंने खाना रखते हुए( साथ में ट्रे भी ) बोली कि आज मैं एक भी चक्कर नहीं काटूंगी। आपके लिए सारा सामान इस ट्रे में है। मेरे भी पैर दर्द कर रहे हैं। जम कर बैठ गयी कि आज नहीं उठूंगी।
   उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई और जोर से हंसी आ गयी कि एक चक्कर तो कटना पड़ेगा। मैंने बुरा सा मुहं बनाया तो हँसते हुए बोले कि चम्मच तो रखना ही भूल गयी। अब उठना तो पड़ा लेकिन रोकते हुए भी हंसी आ गई।
     जीवन में यह सब तो चलता रहता है। बच्चों और पति और बाकी घर वालों के लिए काम करना सच में मन को सुकून देता है।  बस अपनी वेल्यू नहीं भूलना चाहिए।
जो भी है खूब है।  और दोष भी किसका ! मैंने ही शिव जी से ऐसा नखरे वाला वर मानेगा था। ओक्टोपोस होती या ना होती पर काम करते हुए उसके जैसी भुजाएँ जरुर चाहिए होती है, कभी -कभी |

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

जीवन के रंग

       यह हमारा जीवन चलते -चलते ना जाने  कब क्या मोड़ ले लेता है कोई नहीं जानता।  मैं एक सामान्य गृहिणी , जो कि बेलन -कलछी चलाने तक ही सिमित थी। जिसे रचना 'र ' और कलम का ' क ' भी नहीं लिखना आता था , उसकी रचना भी छपेगी सोच नहीं था कभी। विज्ञान की छात्रा का कलम से क्या वास्ता। कलम उठाई भी तो बच्चों को पढ़ाने या राशन के सामान की  लिस्ट बनाने के लिए या घर में काम करने वालों , दूध -अखबार या सब्जी का हिसाब करने के लिए ही।  हां ! कभी कभार बच्चों को स्कूल के लिए कुछ लिख कर दिया वह बात अलग है। एक दिन एकाकीपन से तंग हो कर फेसबुक पर प्रोफाइल बनाया वह भी देर रात को ,बच्चों को फोन पर पूछ कर।
   8 जून 2011 को पहली कविता लिखी। वह भी तब , जब  मुझे कॉपी-पेस्ट करना भी नहीं आता था। कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना भी नहीं आता था। मोबाइल से लिखी थी। फिर धीरे -धीरे कदम बढ़ाना सीखा। चुनौतियों को स्वीकार कर उनको पार करना मुझे बहुत भाता है।
  मुझे प्रेरित करने वाले श्री रविन्द्र शुक्ला जी अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने मुझ सहित कई प्रतिभाओं को प्रेरित किया है।उनको निजी तौर पर नहीं जानती। एक अनजान व्यक्ति आपको प्रेरित करता है  तो  उसे


ईश्वर का भेजा हुआ दूत ही समझना चाहिए। मैं आस्तिक हूँ और ईश्वर कि सत्ता में पूर्ण विश्वास करती हूँ तो मुझे मेरे ईश्वर ने घुट -घुट कर मिटने से पहले ही उबार लिया।
  ऐसा नहीं है कि मुझे जिंदगी से कोई शिकायत रही है।  जो दिल से चाहा वह मिला मुझे। हाँ ! जो नहीं मिला वह   दिल से नहीं  माँगा मैंने शायद। जब इंसान कि बुनियादी जरूरतें हाथ बढ़ाने से पहले ही पूरी होने लगे तो इंसान एक अवसाद में आ जाता है। मेरे लेखन ने मुझे फिर से जीवन दान सा दिया है जैसे !
    सबसे पहले जब " स्त्री हो कर सवाल करती है " काव्य संग्रह के लिए रचनाएं भेजनी थी तो मुझे मेल भी नहीं करना आता था। तब मैंने शोभा मिश्रा जी का सहयोग माँगा। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया तो मैं मेल कर पाई। बाद में शोभा जी ने मुझे ब्लॉग बनाने में भी सहायता की।
  उसके बाद मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मेरी कुछ कहानियाँ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है। मेरे लेखन कि वजह से सबसे अधिक प्रसन्न मेरे पापा और मेरी माँ है। मेरे पापा ने बहुत प्यार से सर पर हाथ फिराया जैसे कह रहे हों बेटियां भी नाम रोशन कर सकती है। मेरे भाई नहीं है ,चार बहने ही हैं हम। पापा मेरी सारी  कहानियां कवितायेँ पढ़तें है और समीक्षा भी करते हैं।

  आज जब गुलमोहर साँझा काव्य संग्रह मेरे हाथ में आया तो मैं बहुत अभिभूत हुई। इससे पहले मेरी कुछ कवितायेँ , " स्त्री हो कर सवाल करती है " और  " पगडंडियां "काव्य संग्रह में भी छपी है।
 आज मैं रविन्द्र शुक्ला जी , माया मृग जी , लक्ष्मी शर्मा जी ,अंजू चौधरी जी और मुकेश कुमार सिन्हा जी , शोभा मिश्रा जी और मेरी प्रिय सखी नीलिमा जी का भी (जिन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया , चैट बॉक्स में आ कर। नीलिमा जी हमेशा मुझे सही राय देती है )सभी को शुक्रिया करती हूँ जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित किया है। और आप सभी का भी जिन्होंने मेरी लिखी हुई रचनाये पढ़ी और  सराहना कर के हौसला दिया।

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

नहीं बंटेगा मम्मी -डैडी का प्यार "

       राधिका जी बैचैनी से टहल रही थी।  ऑफिस से आते ही माधव जी ने देखा आज फिर बैचेनी की लहर है पत्नी के चेहरे पर।   सोचने लगे कारण  क्या हो सकता है भला। सुबह तो सब ठीक -ठाक  ही था। अब फिर क्या बात हो सकती है।  बच्चे भी अपने -ठौर ठिकाने पर सकुशल है। सुबह सब से एक बार बात हो जाती है। वे दोनों पति -पत्नी भी आराम से एक अच्छी और स्वस्थ जिन्दगी बिता रहे हैं।
फिर क्या बात हो सकती है आज ! ये बैचेनी क्यूँ ?

छ्नाअक्क्क  "……!

जोर से शीशा टूटने की आवाज़ आयी। जैसे किसी ने  गिलास को जमीं पर दे मारा हो और वह कांच का गिलास टूट कर बिखर गया।
          माधव जी कुछ पूछने से पहले ही समझ गए राधिका जी की बैचेनी का राज़। आज फिर झगडा हुआ लगता है सुष्मिता और अंकुश का।
   तो राधिका को क्या ? कोई अपने घर में लड़े -झगड़े !
कोई क्या कह सकता है और क्यूँ कहे कोई उनको ?

सुष्मिता और अंकुश अपनी पांच वर्षीय बेटी मालू के साथ उनके उपर वाले पोर्शन में किराये पर रह रहे थे। पहले उनके बेटा -बहू थे वहां। जब से बेटे का तबादला दूसरे  शहर में हुआ तब से किराये पर दे रखा है।
         बहुत प्यारी जोड़ी है दोनों की। दोनों ही नौकरी करते हैं। बेटी को पहले क्रेच में छोड़ा करती थी सुष्मिता । अब स्कूल लगा देने के बाद थोड़ी देर मालू यानि स्कूल का नाम मालविका को राधिका जी संभाल लिया करती है।
          राधिका जी को उनकी हर बात पसंद है। कोई शिकायत नहीं वैसे तो उनसे। लेकिन यह झगड़ने वाली बात सख्त ना पसंद है। महीने में एक बार तो जम  कर झगड़ा होता ही है। और तब  तक झगड़ते रहेंगे  जब तक की मालू डर  के मारे  रो ना पड़े। थोड़ी ही देर में ऐसे हँसते हुए बाहर  निकल पड़ते जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
     शादी को सात  साल हो गए हैं उनको। सुष्मिता के विचार थोड़े उग्र और नारी वादी हैं। वो सोचती है उसे कोई दबा नहीं सकता। वह अपने पैरों पर खड़ी  है तो वह किसी से दब नहीं सकती ना ही किसी का सहारा उसे चाहिए। अंकुश के विचार समझोता वादी  थे। इसलिए निभ रही थी अच्छे  से। दोनों एक दूसरे  का सहयोग करते हुए गृहस्थी चला रहे थे।
    दो महीने पहले सुष्मिता का प्रमोशन हो गया तो उसके ऑफिस में थोडा काम बढ़ गया। जिम्मेदारी बढ़ी है तो काम और उससे होने वाले तनाव में बढ़ोतरी तो होगी है। इस कारण थोड़ी सी चिडचिडी से भी हो गयी। हर छोटी सी बात पर तुनक जाना उसकी आदत बनती जा रही थी। अब उनके झगड़े बढ़ते  ही जा रहे थे हर रोज।
     आज तो बर्तन तक तोड़े जा रहे हैं। बात उनकी क्या है यह समझ नहीं आ रही लेकिन दोनों एक स्वर में बोल रहे हैं कि अब उन दोनों का एक साथ रहना मुमकिन नहीं है। अब वे तलाक ले लेंगे जल्दी ही।
   उफ़ ये तलाक शब्द कितनी जल्दी इस लोगों की जुबान पर आ जाता है। राधिका जी फिर से बैचेन हो गयी।  कुछ सोचते हुए एकदम से उठी। उपर की तरफ जाने वाली सीढ़ियों की तरफ लपकी। माधव जी ने रोक कर कहना चाहा कि यह उनका अपना मामला है हमें क्या करना ?
" यह मामला अब मेरा भी हो गया है ना केवल उनका ! उनके बड़े उनके साथ नहीं रहते तो इन लोगों ने बेशर्मी ही धारण कर ली। ना हमारी परवाह ना मासूम सी मालू की परवाह। अब मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दे सकती। " राधिका जी सीढियां चढ़ती हुई  बोली।
      राधिका जी ने दृश जो देखा तो एकबार हंसने को हुई। दोनों के एक -एक गिलास हाथ में ले रखा था। बारी  -बारी से तोड़ने को तैयार थे। बात कुछ भी नहीं थी बस छोटा -मोटा अहम् ही आड़े आ रहा था। उनको देख कर दोनों ही एक दम सकपका गए और झेंप भी गए। 
    राधिका जी ने शांत किन्तु तनिक रोष से कहना शुरू किया कि उनकी ये हरकत बहुत खराब लगी है उनको। झगड़ने की आदत ही बना ली उन लोगों ने। मालू की तरफ इशारा करते हुए कहा की तुम दोनों इसका भी ख्याल करो कितना सहम गयी है। इसके दिल -दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। यह भी सोचना चाहिए। जरा सी बात पर तलाक ले लेने की बात करना कहाँ की समझदारी है।   
      सुष्मिता बोली , " आंटी आप नहीं जानती कि मुझे दबाया जा रहा है। मैं एक औरत हूँ तो हर काम मुझे ही करना जरुरी है। जबकि हम दोनों ही कमाते है। क्या अंकुश को मेरा हाथ नहीं बंटाना चाहिए। "
  " एक गिलास पानी मांग लिया तो इनको दबाया जा रहा है। आज हम ऑफिस से साथ ही आये। और मैंने एक गिलास पानी मांग लिया। बस इनकी नारी शक्ति जाग गयी। " अंकुश ने थोडा सा खिसिया कर झल्लाते हुए बोला। 
    " यह तो छोटी सी बात है। लेकिन मुझे हर बात पर दबाया जा रहा है। हर रोज़ कोई न कोई फरमान जारी  हो जाता है। मैं औरत हूँ तो मैं ही सहन करूँ। यह भी कोई जरुरी है क्या ?" कहते हुए सुष्मिता का गला भर आया। 
      "सिर्फ अच्छा रंग रूप ,कद- काठी देख और अच्छी कमाई भी देख मेरे पापा ने इसके पल्ले बाँध दिया जिसको औरत की कोई इज्ज़त ही नहीं।" अब सुष्मिता की आँखों से आंसू ढलक आये थे 
     "अच्छा  !और तुम  !सिर्फ बाहर अच्छा काम करो और घर ना संभालो यह कहाँ की समझदारी है। मैंने कभी तुम्हे अकेले कोई काम नहीं करने दिया हर जिम्मेदारी तुम्हारे साथ ही निभाई है। आज एक गिलास पानी ही तो माँगा था। इसमें तुम्हारे अस्तित्व को कहाँ दबाया जा रहा है !" अंकुश को सुष्मिता के आंसूं देख कर खीझ हो आयी।  
      राधिका जी को अब बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा सात साल होने को आये साथ रहते हुए उन लोगों को और अब वे लोग तलाक  की बात कर रहे है। 
 वो नाराज़गी से बोली , " ये झगड़ा आज खत्म करो और बातचीत से तय कर लो कि तलाक लेना है या साथ रहना है। 
फिर दोनों के हाथ पकड कर  उनके कमरे में ले गयी। बाहर आ कर कमरा बंद करते हुए बोली कि आज दोनों  अच्छी  तरह सोच विचार ले कि आगे क्या करना है। तब कर यह दरवाज़ा बंद ही रहेगा। तुम दोनों का खाना पीना सब बंद। मालू को साथ ले कर नीचे आ गयी। 
     माधव जी ने समझाया भी कि यह ठीक नहीं है। उनका आपसी मामला है। लेकिन राधिका जी बोली कि नहीं उनको हमारे साथ रहते हुए तीन साल हो गए। वे हमारे अपने बच्चों जैसे ही है। मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दूंगी। 
         उधर अंकुश और सुष्मिता क्या फैसला करते। यह झगड़ा तो उनकी रोज़ की दाल  -रोटी बन गयी थी। दोनों ने एक दूसरे  की तरफ देखना भी गवारा नहीं किया। अंकुश बेड  पर चुप बैठ गया। सुष्मिता जमीन पर ही बैठ गयी।  
     " जमीन पर क्यूँ बैठी हो , कुर्सी पर ही बैठ जाओ। " अंकुश ने कहा। उसके शब्दों में कोई भाव नहीं थे बस ऐसे ही कह दिया। 
    " नहीं ! मैं औरत हूँ  ! पैर की जूती  ही रहूंगी। इसलिए मेरी जगह जमीन ही है। तुम क्यूँ चाहोगे की मैं तुम्हारे बराबर बैठूं। " सुष्मिता तुनक उठी। 
  " अब औरत पैर की जूती  है , वाली बात कहाँ से आ गयी। मैं तुमसे भर पाया जो तुम चाहो मेरा वही फैसला है। " अंकुश मुहं -पीठ घुमा कर लेट गया। 
    सुष्मिता भी ऊँघने लगी बैठी -बैठी। सर घुटनों पर टिका लिया। 
   थोड़ी देर में एक गाने की आवाज़ से उन दोनों की नींद टूट सी गयी। दोनों खिड़की के पास आ गए और सुनने लगी। 
     यह संयोग ही था कि  बाल दिवस पर मालू को एक गीत तैयार करवाना था। जिसे राधिका जी तैयार करवा रही थी। उसे ही मालू गा रही थी अपने माँ -पापा के झगड़े से बेखबर। 

 वह गा रही थी , " एक बटा  दो , दो बटे चार , 
                             छोटी -छोटी बातों में बंट गया  संसार।  
                                नहीं बंटेगा , नहीं बंटा है , 
                                 मम्मी -डैडी  का प्यार ....."

   बहुत प्यारी सी भोली सी आवाज़ में गा रही थी और बेखबर सी खेल भी रही थी मालू। 
सुष्मिता सुन कर रो पड़ी। अब उसके पास कोई भी शब्द नहीं थे कि वह क्या कहती। अंकुश ने धीरे से उसके कन्धों पर हाथ रह कर बोला , " सुशी , तुम चाहे कितना भी झगड़ा करो लेकिन गुस्से में ,नाराज़गी में मेरी तारीफ़ ही करती हो।  "
 वह रोना भूल कर अंकुश की तरफ देखने लगी।  
" हां ! वो सुन्दर रंग-रूप , अच्छी कद -काठी। मैं कितना तो अच्छा लगता हूँ तुमको।  तुम फिर भी मुझसे तलाक लेना चाहोगी। "   अंकुश के बोलने के अंदाज़ से सुष्मिता को हंसी आ गयी। वह खिलखिला कर हाँ पड़ी। 
 तभी राधिका जी उनकी खोज खबर लेने आयी तो दोनों को हँसते देख वह कुछ आश्वस्त हो गयी। दरवाज़ा खोल दिया। चेतावनी भी दे डाली कि अब वे तब तक बात नहीं करेगी जब तक वे झगड़ना बंद नहीं करते।  वे दोनों सिर्फ मुस्कुराए। और झगडा ना करने का वादा नहीं किया।  



रविवार, 11 अगस्त 2013

धूप छाँव

कई दिनों  अस्वस्थ चल रही थी  कनिका। चल क्या रही थी महसूस ज्यादा कर रही थी मन से । और फिर रात वाली बात ने भी उदास कर दिया। आज सुबह बिस्तर पर से  उठने को मन ही नहीं कर रहा था उसका। रात की घटना पर सोच रही थी। बात कोई बड़ी भी नहीं थी।  ऐसे ही हंसी  मजाक की बात को दिल से लगा बैठी थी वह। यह विचार उसके पति के थे। लेकिन क्या वह सचमुच मजाक था या उसकी अवहेलना ही थी।
   पिछली रात को वह बच्चों के साथ बैठी बात कर रही थी। उसने बातों ही बातों में कहा , " एक औरत माँ और बाप दोनों की जगह ले सकती है लेकिन पिता , माँ की जगह नहीं ले सकता। "
इस बात पर दोनों बच्चे एक साथ बोल पड़े। " नहीं , आप गलत हो इस बात पर  …. ! आपको क्या मालूम कितने काम होते हैं बाहर के , कमाई करनी होती है ,बैंक जाना होता है और भी कितने काम होते हैं , खाने का क्या नौकर रख लो  … .! "
" और नहीं तो क्या ! कपड़े धोने के के लिए वाशिंग मशीन है ना  …! " बच्चों के पापा ने भी सुर में सुर मिलाया।तीनों ने हाथ पर हाथ हुए जोर से ठहाका लगाया।
" अच्छा तो मैं सिर्फ खाना और कपडे धोने के लिए ही हूँ ? मेरी यही कीमत है  ? अरे सारा जीवन गला दिया तुम लोगों के लिए और आज  हो  …… ! " आगे के स्वर रुंध गए।
 नाराज़ हो कर अपने कमरे में  गयी।  बच्चों ने पुकारा लेकिन अनसुनी कर , चुप हो बिस्तर पर जा लेटी।   आँखों से आंसू बह निकले।
 पति ने भी समझाया कि एक औरत से ही घर बनता है। तुम हो तो हम है।  यह तो ऐसे ही हंसी -मजाक की बात थी।  लेकिन बात तो दिल पर तीर की तरह लगी थी।
" माँ , यूनिफार्म तो निकाल दो।  नाश्ते में क्या दोगी। आज उठना नहीं है क्या ? स्कूल को देर हो जाएगी हमें।
एक बार तो गुस्से में कुछ बोलने वाली थी। लेकिन सुबह ही सुबह वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी।
बच्चों को स्कूल भेज कर उसने पति से कहा की वह आज डॉक्टर  को दिखा ही आये।  जल्दी से काम निपटा कर सोचा कि जब तक बच्चे स्कूल से आयेंगे तब तक वह लौट आएगी।
लेकिन वहां भीड़ होने के कारण उसे थोड़ी देर लगने वाली थी। ध्यान फिर से रात की बात पर चला गया और खुद की अहमियत पर भी। तभी बेटे का फोन आ गया कि उसे क्या हुआ है और इतनी देर क्यूँ लग रही है डॉक्टर के पास। उसने भीड़ होने की बात कही और फोन काट दिया। लेकिन बेटे की आवाज़ में उसके लिए चिंता मन ही मन सुकून दे गयी और रात को लगे दिल पर घाव पर थोडा मलहम भी लगा गयी।
 घर पहुँच कर देखा तो बच्चे टीवी देख रहे थे।  आज जूते , युनिफोर्म और बेग भी अपनी जगह पर थे। बच्चों को लगा था की आज माँ की तबियत शायद ज्यादा खराब है तो वह उसका काम बढ़ाना नहीं चाहते थे। वह जल्दी से हाथ -मुहं धोकर रसोई में गयी की जल्दी से खाना बना दूँ। सब्जी बना कर गयी थी बस फुलके ही सेकने थे।
रसोई में जा कर देखा तो आज फुलके बाज़ार से आ गए थे बस उसी का इंतजार हो रहा था।
" माँ , डॉ ने क्या कहा ? आपके क्या हुआ है ? " छोटे बेटे ने पास आ कर गले लगते हुए कहा।  कनिका का मन भीग गया।  उसने कहा की डॉक्टर ने कहा की केल्सियम की कमी है ज्यादा कोई डरने वाली बात नहीं है।
" लो  इसमें डरने वाली बात नहीं तो क्या बात है , आपको मालूम है की इसकी कमी से हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती है और आप कहते हो कि.…. , छोटे बेटे ने बात अधूरी छोड़ दी।
" आपको दूध पीना चाहिए जिससे आपकी केल्सियम की कमी पूर्ति हो सके  ," बड़े बेटे ने भी सुर में सुर मिलाया।
इतनी चिंता इतना प्यार देख वह रात वाली बात भूल गयी और सोचने लगी कि यह धूप छाँव तो जिन्दगी का हिस्सा है। थोड़ी देर में सारा परिवार खाना खा रहा था और किसी बात पर हंसी -मजाक भी चल रहा था।