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सोमवार, 9 दिसंबर 2013

मैं ऑक्टोपस क्यूँ न भई ...!

' मैं ऑक्टोपस  क्यूँ न भई '.... शीर्षक पढ़ कर चौंकिएगा नहीं। एक गृहिणी जो सुबह से लेकर शाम तक , नहीं शाम तक नहीं ! आधी रात तक खटती हो , वह यह जरुर मानेगी कि उसके ऑक्टोपस कि तरह बहुत सारी भुजाएं क्यूँ ना हुई।
   हम माँ लोग, अपने बच्चों को लाड़ -प्यार में इतना बिगाड़ देती हैं कि वो कुछ भी काम नहीं करेंगे। सब कुछ उनको उनके पास ही पहुँच जाए। केवल बच्चों को ही क्यूँ हम तो हमारी सासु माँ के बिगड़े हुए बच्चे को भी आज्ञाकारी पत्नी बन कर सर चढ़ा लेती हैं।
    नहाने जाओ तो ' माँ तौलिया देना। मेरे जूते  तो पॉलिश कर दो। बस आज -आज कर दो कल से पहले ही कर दिया करेंगे। मेरी प्यारी मम्मा कपडे़ भी निकाल दो अलमारी से। आप कितनी अच्छी हो। ' रोज़ के डायलॉग है बच्चों के ! और मैं कभी उनके  प्यार में , ममता और कभी मक्खनबाजी से उनको और बिगाड़ती रहती हूँ। उनका तो कल कभी नहीं आया।
   यही हाल पति देव का भी ! उनके कपडे  सफ़ेद कड़क स्टार्च वाले होने चाहिए। मज़ाल है कि कोई धब्बा भी रह जाये। कोई रह भी जाये तो फिर गले से इतनी मधुर आवाज़  कि दिल बैठ जायेगा कि  जरुर कोई नुक्स है। मैं जरुर जोर से चिल्ला  पड़ती हूँ कि  नहीं मैं नहीं आउंगी ! कोई नुक्स है तो एक तरफ रख दीजिये। फिर से धो दूंगी।
   पति जी तो सुबह एक घूंट चाय के साथ शुरू हो जाते हैं कि ये नुक्स है या फिर से बना कर लाओ। अब सुबह -सुबह इनके नखरे उठाऊं या बच्चों को देखूं। तब मन करता है कि भगवान को पुकारूँ कि उसने मुझे औरत तो बना दिया फिर  ऑक्टोपस की तरह कई सारी बाजू क्यूँ ना दी।
  खाना खाने बैठेंगे तो भी नखरे।  जो बना है उससे संतुष्टि नहीं। चलो कभी होता है कोई फरमाईश कर दी कि ऐसे नहीं वैसे बना था। नहीं जी ! यहाँ तो कुछ भी खाना हो वह खाना सामने आने के बाद ही नखरे और नुक्स शुरू होते हैं। अपनी मर्ज़ी से थाली में डाला तो ये तो मैंने खाना ही नहीं था। थाली आगे रखते ही बोलेंगे। जाओ आज तो दही कि लस्सी बनाओ। या लस्सी बना दो तो आज तो रायता खाना था। पहले पूछो तो बोलेंगे कि पहले सामने लाओ फिर देखूंगा और बताऊंगा कि तुमने क्या -क्या बनाया है। चटनी रखो तो आज मैंने हरी मिर्च खानी थी वह भी तवे पर तड़की हुई। मिर्च लाओ तो उनको आचार खाना होता है। एक मिनिट भी सांस तो क्या ले कोई। खाना खाते हुए  जाने कितने चक्कर लगवाते हैं।
   एक दिन मैंने भी सोचा कि आज एक भी चक्कर नहीं लगाऊंगी। थाली में खाना रखा और एक ट्रे में सब कुछ रखा जिनका कि मुझे अंदेशा था कि वो क्या -क्या खा सकते हैं। मैंने खाना रखते हुए( साथ में ट्रे भी ) बोली कि आज मैं एक भी चक्कर नहीं काटूंगी। आपके लिए सारा सामान इस ट्रे में है। मेरे भी पैर दर्द कर रहे हैं। जम कर बैठ गयी कि आज नहीं उठूंगी।
   उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई और जोर से हंसी आ गयी कि एक चक्कर तो कटना पड़ेगा। मैंने बुरा सा मुहं बनाया तो हँसते हुए बोले कि चम्मच तो रखना ही भूल गयी। अब उठना तो पड़ा लेकिन रोकते हुए भी हंसी आ गई।
     जीवन में यह सब तो चलता रहता है। बच्चों और पति और बाकी घर वालों के लिए काम करना सच में मन को सुकून देता है।  बस अपनी वेल्यू नहीं भूलना चाहिए।
जो भी है खूब है।  और दोष भी किसका ! मैंने ही शिव जी से ऐसा नखरे वाला वर मानेगा था। ओक्टोपोस होती या ना होती पर काम करते हुए उसके जैसी भुजाएँ जरुर चाहिए होती है, कभी -कभी |

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

जीवन के रंग

       यह हमारा जीवन चलते -चलते ना जाने  कब क्या मोड़ ले लेता है कोई नहीं जानता।  मैं एक सामान्य गृहिणी , जो कि बेलन -कलछी चलाने तक ही सिमित थी। जिसे रचना 'र ' और कलम का ' क ' भी नहीं लिखना आता था , उसकी रचना भी छपेगी सोच नहीं था कभी। विज्ञान की छात्रा का कलम से क्या वास्ता। कलम उठाई भी तो बच्चों को पढ़ाने या राशन के सामान की  लिस्ट बनाने के लिए या घर में काम करने वालों , दूध -अखबार या सब्जी का हिसाब करने के लिए ही।  हां ! कभी कभार बच्चों को स्कूल के लिए कुछ लिख कर दिया वह बात अलग है। एक दिन एकाकीपन से तंग हो कर फेसबुक पर प्रोफाइल बनाया वह भी देर रात को ,बच्चों को फोन पर पूछ कर।
   8 जून 2011 को पहली कविता लिखी। वह भी तब , जब  मुझे कॉपी-पेस्ट करना भी नहीं आता था। कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना भी नहीं आता था। मोबाइल से लिखी थी। फिर धीरे -धीरे कदम बढ़ाना सीखा। चुनौतियों को स्वीकार कर उनको पार करना मुझे बहुत भाता है।
  मुझे प्रेरित करने वाले श्री रविन्द्र शुक्ला जी अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने मुझ सहित कई प्रतिभाओं को प्रेरित किया है।उनको निजी तौर पर नहीं जानती। एक अनजान व्यक्ति आपको प्रेरित करता है  तो  उसे


ईश्वर का भेजा हुआ दूत ही समझना चाहिए। मैं आस्तिक हूँ और ईश्वर कि सत्ता में पूर्ण विश्वास करती हूँ तो मुझे मेरे ईश्वर ने घुट -घुट कर मिटने से पहले ही उबार लिया।
  ऐसा नहीं है कि मुझे जिंदगी से कोई शिकायत रही है।  जो दिल से चाहा वह मिला मुझे। हाँ ! जो नहीं मिला वह   दिल से नहीं  माँगा मैंने शायद। जब इंसान कि बुनियादी जरूरतें हाथ बढ़ाने से पहले ही पूरी होने लगे तो इंसान एक अवसाद में आ जाता है। मेरे लेखन ने मुझे फिर से जीवन दान सा दिया है जैसे !
    सबसे पहले जब " स्त्री हो कर सवाल करती है " काव्य संग्रह के लिए रचनाएं भेजनी थी तो मुझे मेल भी नहीं करना आता था। तब मैंने शोभा मिश्रा जी का सहयोग माँगा। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया तो मैं मेल कर पाई। बाद में शोभा जी ने मुझे ब्लॉग बनाने में भी सहायता की।
  उसके बाद मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मेरी कुछ कहानियाँ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है। मेरे लेखन कि वजह से सबसे अधिक प्रसन्न मेरे पापा और मेरी माँ है। मेरे पापा ने बहुत प्यार से सर पर हाथ फिराया जैसे कह रहे हों बेटियां भी नाम रोशन कर सकती है। मेरे भाई नहीं है ,चार बहने ही हैं हम। पापा मेरी सारी  कहानियां कवितायेँ पढ़तें है और समीक्षा भी करते हैं।

  आज जब गुलमोहर साँझा काव्य संग्रह मेरे हाथ में आया तो मैं बहुत अभिभूत हुई। इससे पहले मेरी कुछ कवितायेँ , " स्त्री हो कर सवाल करती है " और  " पगडंडियां "काव्य संग्रह में भी छपी है।
 आज मैं रविन्द्र शुक्ला जी , माया मृग जी , लक्ष्मी शर्मा जी ,अंजू चौधरी जी और मुकेश कुमार सिन्हा जी , शोभा मिश्रा जी और मेरी प्रिय सखी नीलिमा जी का भी (जिन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया , चैट बॉक्स में आ कर। नीलिमा जी हमेशा मुझे सही राय देती है )सभी को शुक्रिया करती हूँ जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित किया है। और आप सभी का भी जिन्होंने मेरी लिखी हुई रचनाये पढ़ी और  सराहना कर के हौसला दिया।

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

नहीं बंटेगा मम्मी -डैडी का प्यार "

       राधिका जी बैचैनी से टहल रही थी।  ऑफिस से आते ही माधव जी ने देखा आज फिर बैचेनी की लहर है पत्नी के चेहरे पर।   सोचने लगे कारण  क्या हो सकता है भला। सुबह तो सब ठीक -ठाक  ही था। अब फिर क्या बात हो सकती है।  बच्चे भी अपने -ठौर ठिकाने पर सकुशल है। सुबह सब से एक बार बात हो जाती है। वे दोनों पति -पत्नी भी आराम से एक अच्छी और स्वस्थ जिन्दगी बिता रहे हैं।
फिर क्या बात हो सकती है आज ! ये बैचेनी क्यूँ ?

छ्नाअक्क्क  "……!

जोर से शीशा टूटने की आवाज़ आयी। जैसे किसी ने  गिलास को जमीं पर दे मारा हो और वह कांच का गिलास टूट कर बिखर गया।
          माधव जी कुछ पूछने से पहले ही समझ गए राधिका जी की बैचेनी का राज़। आज फिर झगडा हुआ लगता है सुष्मिता और अंकुश का।
   तो राधिका को क्या ? कोई अपने घर में लड़े -झगड़े !
कोई क्या कह सकता है और क्यूँ कहे कोई उनको ?

सुष्मिता और अंकुश अपनी पांच वर्षीय बेटी मालू के साथ उनके उपर वाले पोर्शन में किराये पर रह रहे थे। पहले उनके बेटा -बहू थे वहां। जब से बेटे का तबादला दूसरे  शहर में हुआ तब से किराये पर दे रखा है।
         बहुत प्यारी जोड़ी है दोनों की। दोनों ही नौकरी करते हैं। बेटी को पहले क्रेच में छोड़ा करती थी सुष्मिता । अब स्कूल लगा देने के बाद थोड़ी देर मालू यानि स्कूल का नाम मालविका को राधिका जी संभाल लिया करती है।
          राधिका जी को उनकी हर बात पसंद है। कोई शिकायत नहीं वैसे तो उनसे। लेकिन यह झगड़ने वाली बात सख्त ना पसंद है। महीने में एक बार तो जम  कर झगड़ा होता ही है। और तब  तक झगड़ते रहेंगे  जब तक की मालू डर  के मारे  रो ना पड़े। थोड़ी ही देर में ऐसे हँसते हुए बाहर  निकल पड़ते जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
     शादी को सात  साल हो गए हैं उनको। सुष्मिता के विचार थोड़े उग्र और नारी वादी हैं। वो सोचती है उसे कोई दबा नहीं सकता। वह अपने पैरों पर खड़ी  है तो वह किसी से दब नहीं सकती ना ही किसी का सहारा उसे चाहिए। अंकुश के विचार समझोता वादी  थे। इसलिए निभ रही थी अच्छे  से। दोनों एक दूसरे  का सहयोग करते हुए गृहस्थी चला रहे थे।
    दो महीने पहले सुष्मिता का प्रमोशन हो गया तो उसके ऑफिस में थोडा काम बढ़ गया। जिम्मेदारी बढ़ी है तो काम और उससे होने वाले तनाव में बढ़ोतरी तो होगी है। इस कारण थोड़ी सी चिडचिडी से भी हो गयी। हर छोटी सी बात पर तुनक जाना उसकी आदत बनती जा रही थी। अब उनके झगड़े बढ़ते  ही जा रहे थे हर रोज।
     आज तो बर्तन तक तोड़े जा रहे हैं। बात उनकी क्या है यह समझ नहीं आ रही लेकिन दोनों एक स्वर में बोल रहे हैं कि अब उन दोनों का एक साथ रहना मुमकिन नहीं है। अब वे तलाक ले लेंगे जल्दी ही।
   उफ़ ये तलाक शब्द कितनी जल्दी इस लोगों की जुबान पर आ जाता है। राधिका जी फिर से बैचेन हो गयी।  कुछ सोचते हुए एकदम से उठी। उपर की तरफ जाने वाली सीढ़ियों की तरफ लपकी। माधव जी ने रोक कर कहना चाहा कि यह उनका अपना मामला है हमें क्या करना ?
" यह मामला अब मेरा भी हो गया है ना केवल उनका ! उनके बड़े उनके साथ नहीं रहते तो इन लोगों ने बेशर्मी ही धारण कर ली। ना हमारी परवाह ना मासूम सी मालू की परवाह। अब मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दे सकती। " राधिका जी सीढियां चढ़ती हुई  बोली।
      राधिका जी ने दृश जो देखा तो एकबार हंसने को हुई। दोनों के एक -एक गिलास हाथ में ले रखा था। बारी  -बारी से तोड़ने को तैयार थे। बात कुछ भी नहीं थी बस छोटा -मोटा अहम् ही आड़े आ रहा था। उनको देख कर दोनों ही एक दम सकपका गए और झेंप भी गए। 
    राधिका जी ने शांत किन्तु तनिक रोष से कहना शुरू किया कि उनकी ये हरकत बहुत खराब लगी है उनको। झगड़ने की आदत ही बना ली उन लोगों ने। मालू की तरफ इशारा करते हुए कहा की तुम दोनों इसका भी ख्याल करो कितना सहम गयी है। इसके दिल -दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। यह भी सोचना चाहिए। जरा सी बात पर तलाक ले लेने की बात करना कहाँ की समझदारी है।   
      सुष्मिता बोली , " आंटी आप नहीं जानती कि मुझे दबाया जा रहा है। मैं एक औरत हूँ तो हर काम मुझे ही करना जरुरी है। जबकि हम दोनों ही कमाते है। क्या अंकुश को मेरा हाथ नहीं बंटाना चाहिए। "
  " एक गिलास पानी मांग लिया तो इनको दबाया जा रहा है। आज हम ऑफिस से साथ ही आये। और मैंने एक गिलास पानी मांग लिया। बस इनकी नारी शक्ति जाग गयी। " अंकुश ने थोडा सा खिसिया कर झल्लाते हुए बोला। 
    " यह तो छोटी सी बात है। लेकिन मुझे हर बात पर दबाया जा रहा है। हर रोज़ कोई न कोई फरमान जारी  हो जाता है। मैं औरत हूँ तो मैं ही सहन करूँ। यह भी कोई जरुरी है क्या ?" कहते हुए सुष्मिता का गला भर आया। 
      "सिर्फ अच्छा रंग रूप ,कद- काठी देख और अच्छी कमाई भी देख मेरे पापा ने इसके पल्ले बाँध दिया जिसको औरत की कोई इज्ज़त ही नहीं।" अब सुष्मिता की आँखों से आंसू ढलक आये थे 
     "अच्छा  !और तुम  !सिर्फ बाहर अच्छा काम करो और घर ना संभालो यह कहाँ की समझदारी है। मैंने कभी तुम्हे अकेले कोई काम नहीं करने दिया हर जिम्मेदारी तुम्हारे साथ ही निभाई है। आज एक गिलास पानी ही तो माँगा था। इसमें तुम्हारे अस्तित्व को कहाँ दबाया जा रहा है !" अंकुश को सुष्मिता के आंसूं देख कर खीझ हो आयी।  
      राधिका जी को अब बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा सात साल होने को आये साथ रहते हुए उन लोगों को और अब वे लोग तलाक  की बात कर रहे है। 
 वो नाराज़गी से बोली , " ये झगड़ा आज खत्म करो और बातचीत से तय कर लो कि तलाक लेना है या साथ रहना है। 
फिर दोनों के हाथ पकड कर  उनके कमरे में ले गयी। बाहर आ कर कमरा बंद करते हुए बोली कि आज दोनों  अच्छी  तरह सोच विचार ले कि आगे क्या करना है। तब कर यह दरवाज़ा बंद ही रहेगा। तुम दोनों का खाना पीना सब बंद। मालू को साथ ले कर नीचे आ गयी। 
     माधव जी ने समझाया भी कि यह ठीक नहीं है। उनका आपसी मामला है। लेकिन राधिका जी बोली कि नहीं उनको हमारे साथ रहते हुए तीन साल हो गए। वे हमारे अपने बच्चों जैसे ही है। मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दूंगी। 
         उधर अंकुश और सुष्मिता क्या फैसला करते। यह झगड़ा तो उनकी रोज़ की दाल  -रोटी बन गयी थी। दोनों ने एक दूसरे  की तरफ देखना भी गवारा नहीं किया। अंकुश बेड  पर चुप बैठ गया। सुष्मिता जमीन पर ही बैठ गयी।  
     " जमीन पर क्यूँ बैठी हो , कुर्सी पर ही बैठ जाओ। " अंकुश ने कहा। उसके शब्दों में कोई भाव नहीं थे बस ऐसे ही कह दिया। 
    " नहीं ! मैं औरत हूँ  ! पैर की जूती  ही रहूंगी। इसलिए मेरी जगह जमीन ही है। तुम क्यूँ चाहोगे की मैं तुम्हारे बराबर बैठूं। " सुष्मिता तुनक उठी। 
  " अब औरत पैर की जूती  है , वाली बात कहाँ से आ गयी। मैं तुमसे भर पाया जो तुम चाहो मेरा वही फैसला है। " अंकुश मुहं -पीठ घुमा कर लेट गया। 
    सुष्मिता भी ऊँघने लगी बैठी -बैठी। सर घुटनों पर टिका लिया। 
   थोड़ी देर में एक गाने की आवाज़ से उन दोनों की नींद टूट सी गयी। दोनों खिड़की के पास आ गए और सुनने लगी। 
     यह संयोग ही था कि  बाल दिवस पर मालू को एक गीत तैयार करवाना था। जिसे राधिका जी तैयार करवा रही थी। उसे ही मालू गा रही थी अपने माँ -पापा के झगड़े से बेखबर। 

 वह गा रही थी , " एक बटा  दो , दो बटे चार , 
                             छोटी -छोटी बातों में बंट गया  संसार।  
                                नहीं बंटेगा , नहीं बंटा है , 
                                 मम्मी -डैडी  का प्यार ....."

   बहुत प्यारी सी भोली सी आवाज़ में गा रही थी और बेखबर सी खेल भी रही थी मालू। 
सुष्मिता सुन कर रो पड़ी। अब उसके पास कोई भी शब्द नहीं थे कि वह क्या कहती। अंकुश ने धीरे से उसके कन्धों पर हाथ रह कर बोला , " सुशी , तुम चाहे कितना भी झगड़ा करो लेकिन गुस्से में ,नाराज़गी में मेरी तारीफ़ ही करती हो।  "
 वह रोना भूल कर अंकुश की तरफ देखने लगी।  
" हां ! वो सुन्दर रंग-रूप , अच्छी कद -काठी। मैं कितना तो अच्छा लगता हूँ तुमको।  तुम फिर भी मुझसे तलाक लेना चाहोगी। "   अंकुश के बोलने के अंदाज़ से सुष्मिता को हंसी आ गयी। वह खिलखिला कर हाँ पड़ी। 
 तभी राधिका जी उनकी खोज खबर लेने आयी तो दोनों को हँसते देख वह कुछ आश्वस्त हो गयी। दरवाज़ा खोल दिया। चेतावनी भी दे डाली कि अब वे तब तक बात नहीं करेगी जब तक वे झगड़ना बंद नहीं करते।  वे दोनों सिर्फ मुस्कुराए। और झगडा ना करने का वादा नहीं किया।  



रविवार, 11 अगस्त 2013

धूप छाँव

कई दिनों  अस्वस्थ चल रही थी  कनिका। चल क्या रही थी महसूस ज्यादा कर रही थी मन से । और फिर रात वाली बात ने भी उदास कर दिया। आज सुबह बिस्तर पर से  उठने को मन ही नहीं कर रहा था उसका। रात की घटना पर सोच रही थी। बात कोई बड़ी भी नहीं थी।  ऐसे ही हंसी  मजाक की बात को दिल से लगा बैठी थी वह। यह विचार उसके पति के थे। लेकिन क्या वह सचमुच मजाक था या उसकी अवहेलना ही थी।
   पिछली रात को वह बच्चों के साथ बैठी बात कर रही थी। उसने बातों ही बातों में कहा , " एक औरत माँ और बाप दोनों की जगह ले सकती है लेकिन पिता , माँ की जगह नहीं ले सकता। "
इस बात पर दोनों बच्चे एक साथ बोल पड़े। " नहीं , आप गलत हो इस बात पर  …. ! आपको क्या मालूम कितने काम होते हैं बाहर के , कमाई करनी होती है ,बैंक जाना होता है और भी कितने काम होते हैं , खाने का क्या नौकर रख लो  … .! "
" और नहीं तो क्या ! कपड़े धोने के के लिए वाशिंग मशीन है ना  …! " बच्चों के पापा ने भी सुर में सुर मिलाया।तीनों ने हाथ पर हाथ हुए जोर से ठहाका लगाया।
" अच्छा तो मैं सिर्फ खाना और कपडे धोने के लिए ही हूँ ? मेरी यही कीमत है  ? अरे सारा जीवन गला दिया तुम लोगों के लिए और आज  हो  …… ! " आगे के स्वर रुंध गए।
 नाराज़ हो कर अपने कमरे में  गयी।  बच्चों ने पुकारा लेकिन अनसुनी कर , चुप हो बिस्तर पर जा लेटी।   आँखों से आंसू बह निकले।
 पति ने भी समझाया कि एक औरत से ही घर बनता है। तुम हो तो हम है।  यह तो ऐसे ही हंसी -मजाक की बात थी।  लेकिन बात तो दिल पर तीर की तरह लगी थी।
" माँ , यूनिफार्म तो निकाल दो।  नाश्ते में क्या दोगी। आज उठना नहीं है क्या ? स्कूल को देर हो जाएगी हमें।
एक बार तो गुस्से में कुछ बोलने वाली थी। लेकिन सुबह ही सुबह वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी।
बच्चों को स्कूल भेज कर उसने पति से कहा की वह आज डॉक्टर  को दिखा ही आये।  जल्दी से काम निपटा कर सोचा कि जब तक बच्चे स्कूल से आयेंगे तब तक वह लौट आएगी।
लेकिन वहां भीड़ होने के कारण उसे थोड़ी देर लगने वाली थी। ध्यान फिर से रात की बात पर चला गया और खुद की अहमियत पर भी। तभी बेटे का फोन आ गया कि उसे क्या हुआ है और इतनी देर क्यूँ लग रही है डॉक्टर के पास। उसने भीड़ होने की बात कही और फोन काट दिया। लेकिन बेटे की आवाज़ में उसके लिए चिंता मन ही मन सुकून दे गयी और रात को लगे दिल पर घाव पर थोडा मलहम भी लगा गयी।
 घर पहुँच कर देखा तो बच्चे टीवी देख रहे थे।  आज जूते , युनिफोर्म और बेग भी अपनी जगह पर थे। बच्चों को लगा था की आज माँ की तबियत शायद ज्यादा खराब है तो वह उसका काम बढ़ाना नहीं चाहते थे। वह जल्दी से हाथ -मुहं धोकर रसोई में गयी की जल्दी से खाना बना दूँ। सब्जी बना कर गयी थी बस फुलके ही सेकने थे।
रसोई में जा कर देखा तो आज फुलके बाज़ार से आ गए थे बस उसी का इंतजार हो रहा था।
" माँ , डॉ ने क्या कहा ? आपके क्या हुआ है ? " छोटे बेटे ने पास आ कर गले लगते हुए कहा।  कनिका का मन भीग गया।  उसने कहा की डॉक्टर ने कहा की केल्सियम की कमी है ज्यादा कोई डरने वाली बात नहीं है।
" लो  इसमें डरने वाली बात नहीं तो क्या बात है , आपको मालूम है की इसकी कमी से हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती है और आप कहते हो कि.…. , छोटे बेटे ने बात अधूरी छोड़ दी।
" आपको दूध पीना चाहिए जिससे आपकी केल्सियम की कमी पूर्ति हो सके  ," बड़े बेटे ने भी सुर में सुर मिलाया।
इतनी चिंता इतना प्यार देख वह रात वाली बात भूल गयी और सोचने लगी कि यह धूप छाँव तो जिन्दगी का हिस्सा है। थोड़ी देर में सारा परिवार खाना खा रहा था और किसी बात पर हंसी -मजाक भी चल रहा था।



मंगलवार, 9 जुलाई 2013

महिला दिवस

महिला दिवस

सुबह का समय। दो सहेलियाँ आपस में मिली।
पहली बच्चे को स्कूल बस में बैठाने आयी थी। दूसरी एक स्कूल की शिक्षिका थी। दोनों ही सहेलियां थी।


शिक्षिका सहेली ने अपनी सहेली के  गले लगते हुए बोली , " हैप्पी वुमन्स डे ...,"

पहली ने हंस कर कहा " सेम टू  यू ...!
अरी  धीरे बोल ...! काम वाली ने सुन लिया तो छुट्टी कर के बैठ जाएगी ...!"
दोनों हँस पड़ी ....



शनिवार, 15 जून 2013

पालन का भाव पिता ही में आता है .........

हम सभी हमेशा माँ का ही गुणगान करते है। कविताओं में भी अक्सर माँ की महिमा का गुणगान ही होता है ,और होना ही चाहिए। हम सभी जानते है कि माँ के क़दमों में स्वर्ग है लेकिन यह भी सच है कि पालन का भाव पिता ही में आता है ,माँ अगर प्यार करती है तो पिता पालन करता है।पिता का साथ ही अपने आप में सुरक्षा का भाव आ जाता है।
      मेरे जीवन कि ऐसे कुछ घटनाएँ है जो मुझे याद रही है। एक तो कुछ वर्ष पहले जब हम छोटे बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आने के कुछ दिन बाद जब उसे फोन किया तो मैं तो कई देर तक उसे लाड मैं ही बात करती रही ,पर जब उसके पापा ने बात की तो सबसे पहले पूछा कि" बेटे तुम्हारे कमरे का ए सी ठीक हो गया क्या ?".....(जिस दिन छोड़ने गए थे उस दिन ए सी ठीक हो रहा था उसके कमरे का ),तो यह भाव है पालन का ....! जहाँ माँ  सिर्फ लाड़ -प्यार में ही व्यस्त थी तो पिता उसकी बुनियादी जरूरतों को अधिक महत्व दे रहा था।

 
    अब दूसरी घटना मेरे बचपन की ,हमारे स्कूल के आगे एक नदी थी जो बरसात में भर जाती थी तो स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन बहुत बरसात हुई  और नदी में पानी आ गया। स्कूल में छुट्टी की घोषणा के साथ कहा गया की बस्ते यहीं छोड़ दो और घर चले जाओ।सारे बच्चे बहुत खुश थे कि एक तो छुट्टी उपर से बस्ते भी नहीं ले कर जाने।लेकिन मुझे तो पानी से डर बहुत ही लगता था , अभी भी लगता है ...!
   नदी में ज्यादा पानी नहीं था पर मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कदम बढाने की। साथ वाली सखियों ने कहा भी कि आओ हम है न हाथ पकड़ो और चलो। मगर  मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी ,जोर से आँखे बंद कर ली। सोच रही थी कि क्या करूँ। तभी मुझे दूर से मेरे पापा आते दिखे। उनको मेरे डर के बारे में पता था। वो लगभग भागते हुए से आ रहे थे। पास आने पर में उनकी टांगों से लिपट कर जोर से रो पड़ी ,पर जो सुरक्षा का अहसास मुझे महसूस हुआ .उसका में वर्णन नहीं कर सकती।
पिता के  पालन की भावना माँ की ममता से भी बड़ी लगती है मुझे।

  और तीसरी घटना कुछ समय पूर्व की है। जब माँ ( सासू माँ ) अपने मायके गयी। अब पिता जी का सारा काम वह स्वयंम ही देखती है तो मुझे उनका काम करने की आदत भी नहीं है। वैसे भी पिता जी को बहू से बात करना पसंद नहीं है।हालाँकि  कोई काम हो तो कह भी देते हैं .नहीं तो बात नहीं करते।
   हाँ तो माँ के जाने बाद  , मैं उनको नाश्ता ,दिन का और रात का खाना तो समय पर दे देती पर रात को दूध देना भूल जाती क्यूंकि टीवी  में मग्न जो हो जाती थी। फिर पौने ग्यारह बजे याद आता ," अरे पिताजी का दूध तो रह ही गया ...!" फिर संजय जी को  ढूध का गिलास  दे कर आना पड़ता .. दो दिन तो ऐसा ही रहा।
तीसरे दिन पिताजी रात का खाना खा कर जाने लगे तो मुझे बोले के रात को 10  बजे मैं खुद ही आ जाऊंगा। संजय को ऐसे ही तकलीफ होगी।
मुझे  बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और बड़ी मुश्किल से बोली नहीं पिताजी आज मैं समय से ही दूध दे जाउंगी और उस दिन मैंने सबसे पहले यही काम किया।
    मन ही मन बहुत अभिभूत हुई एक पिता का अपने पुत्र के प्रति प्यार को देख कर जो 75  वर्ष की उम्र में भी अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ नहीं दे सकता है।जबकि यह कोई मुश्किल काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ भी बनता है एक पुत्र का ...
 पिता ऐसे ही होते हैं जो माँ की तरह अपना प्यार दिखा नहीं सकते पर महसूस तो करवा सकते है।


बुधवार, 5 जून 2013

शक की आग ....


"बाय माँ "......अपने छोटे-छोटे हाथ हिलाता हुआ उदय  ऑटो में बैठ कर स्कूल चला गया तो  मैंने राहत की साँस ली .....उफ़  !  सुबह-सुबह की भागदौड को  एक बार राहत सी मिलती है जब बच्चों को स्कूल भेज दिया जाता है।

    उदय  एक बार बाथरूम में घुस गया तो बस फिर बाहर आने का नाम ही नहीं लेता , जब तक तीन-चार बार ना चिल्लाओ। उसे कोई परवाह नहीं है कि  स्कूल को देर हो जाएगी या ऑटो वाला बाहर खीझते हुए इंतज़ार करेगा। जोर से डांट लगाओ तो बोलेगा "जब मैं स्कूल जाता हूँ तभी स्कूल लगता है !!"मुझे हंसी और खीझ दोनों एक साथ आती और बाहर जा कर खिसियानी हंसी से ऑटो वाले को देखती हुई उदय को रवाना कर एक लम्बा साँस लेती हूँ। 

   फिर थोड़े से बिखरे घर पर उचटती सी नज़र डाल कर रसोई में जा कर एक कड़क सी चाय ले आती हूँ और आराम से अखबार पढती हूँ। मुझे राजनीती की खबरों में ज्यादा रूचि नहीं है। लेकिन अखबार में जिस पृष्ठ पर "शोक -सन्देश"छपे होतें है ,सबसे पहले वही पृष्ठ खोलती हूँ। हर शोक सन्देश को गौर से पढ़ती-देखती  हूँ फिर सोचती हूँ कि  इस के कितने बच्चे है या इसकी कितनी उम्र होगी ...कोई बेटे-पोतों वाला होता तो सोचती हूँ , "चलो अमर तो कोई भी नहीं है पर कुछ साल और जी लेता तो क्या होता।" पर कोई असमय मौत या कोई बालक होता तो मुझे लगता मैं भी उनके दुःख में शामिल हूँ और कई बार तो आँखे भी भर आती और सोचती , दुनिया में कितने दुःख है। फिर उनके परिवार-जन के लिए हिम्मत और हौसला भी माँगती जाती और अपने  आंसू पौंछती रहती  हूँ। यह  सब मैं  अपने पति शेखर से छुपा कर ही करती थी क्यूँ की उन्हें मेरी ये आदत बहुत खराब लगती थी।

    आज अखबार जैसे ही हाथ में लिया तो मुख्य -पृष्ट पर एक तस्वीर पर नज़र अटक गयी जिसके नीचे लिखा था "अरुण चौपड़ा को आई. ए.एस.की परीक्षा में पूरे भारत  में तीसरा स्थान मिला है" और तस्वीर में उसकी माँ उसे मिठाई खिलाती बहुत खुश दिख रही थी ....अरुण चौपड़ा की माँ पर मेरी नज़र अटक गयी 'अरे ये तो नीरू आंटी लग रही है 'फिर माँ को फोन लगाया और पूछा  क्या वो नीरू आंटी ही है क्या ...!माँ भी खुश थी बोली "मैं तुझे ही फोन करने वाली थी।  आज नीरू की मेहनत सफल हो ही गयी।  दोनों बेटे लायक निकले हैं। छोटा भी कुछ दिनों में इंजिनियर बन जायेगा।  अच्छा है , अब उसके भी सुख के दिन आ गए।"

   नीरू आंटी ; गोरा रंग ,भरा-भरा मुख और दुबली सी काया वाली एक भली और सीधी-सादी सी स्त्री थी। उनका ख्याल आते ही कानो में एक आवाज़ सी गूंजती है जो वह अक्सर हमें पढ़ाते वक्त , जब कोई पढ़ते वक्त कक्षा में छात्र शोर करता, अपनी तर्जनी को होठों पर रख कर जोर से बोला करती थी "श्श्श्श च्च्च्च" ...! और सारी कक्षा में शांति सी छा जाती।

यह  बात तब की बात है जब मैं सातवी में थी और नीरू आंटी 'शिक्षक-प्रशिक्षण केंद्र में पढती थी। उस केंद्र के शिक्षार्थी हमारे स्कूल में प्रेक्टिकल के तौर पर हमें पढ़ाने आया करते थे उन्ही में नीरू आंटी भी थी। वह मेरी आंटी इसलिए थी के उनके पति रमेश चौपडा और मेरे पापा एक ही महकमे में थे।वे दोनों अक्सर आया करते थे हमारे यहाँ। उनके दो बेटे थे अरुण और वरुण...! दोनों बहुत प्यारे और शरारती थे और मुझे  बच्चों से लगाव बहुत था तो उनके साथ खूब खेला करती थी।

आंटी, माँ को दीदी बुलाया करती थी। दोनों कई बार गुपचुप बात करती रहती थी। मैंने कई बार आंटी को आंसू पौंछते हुए बातें करते भी देखा तो माँ से पूछा भी तो माँ ने डांट दिया के बड़ों की बातें नहीं सुना करते।
लेकिन  तब मैं ,अपने को इंतना भी छोटा नहीं समझती थी के इंसानों के मन के भाव ना पढ़ ना पाती। मुझे रमेश अंकल की आँखों में वहशत और आंटी की आखों में एक अजीब सी दहशत नज़र आती थी। समझी बाद में , बात क्या थी आखिर !

 कई बार उनको स्कूल के बाहर भी खड़ा देखा था और जब आंटी आती तो उनको साथ में ले कर चल देते। पापा को अक्सर अपने विभाग के काम  सिलसिले से कई दिनों के लिए  बाहर जाना पड़ता। एक बार उनके साथ रमेश अंकल भी गए ...

लगभग दस दिन बाद पापा का आना हुआ। हम सब बहुत खुश थे क्यूँ कि मेरे पापा जब भी कही जाते तो हम सब के लिए कुछ ना कुछ जरुर लाते इस बार तो उदयपुर गए थे मेरे लिए वहां से चन्दन कि खुशबू वाला पेन ले कर आये तो मैं बहुत खुश थी।

 अगले दिन  स्कूल से आने के थोड़ी देर बाद नीरू आंटी लगभग रोती सी आयी और दीदी कहती हुई माँ के गले लग कर रो पड़ी। माँ ने मुझे आँखों से  ही बाहर जाने का इशारा किया। छोटे से घरों  में दीवारों के भी कान होते है और मुझे तो जानने कि उत्सुकता थी ये क्या हुआ है आज आंटी को। उनके मुहं पर काफी चोट के निशान थे।मैं भी ध्यान से सुनने लगी ...


मेरे  कानो में आंटी कि आवाज़ पड़ रही थी "दीदी आज तो हद ही हो गयी जुल्म की ;इतने दिन तक जो शक की आग लिए घूम रहे थे रमेश ,अब वो उसमे जलने भी लग गए हैं। ना जाने किस ने इनके कान भर दिए कि  जब वो उदयपुर टूर पर गए थे तो मैंने किसी से शादी कर ली , कभी किसी के साथ ,कभी किसी के साथ नाम जोड़ना तो पहले से ही आदत थी कल तो आते ही पीटना शुरू कर दिया और कहने लगे ,वो कौन है जिससे मैंने शादी की है...मैंने बहुत पूछा पर नहीं बताया कि किसने कान भरे हैं उनके ...!"

वो कई देर तक रोती रही ,माँ के यह कहने परकि क्या वो या मेरे पापा अंकल को समझाएं...!लेकिन  डर के मारे आंटी ,माँ का हाथ पकड़ते हुए बोली "नहीं दीदी फिर तो मेरा और भी बुरा हाल हो जायेगा ,शायद यही मेरी किस्मत है किसी ने सच कहा है जिसकी  बचपन में माँ मर जाती है उसका भाग्य भी रूठ ही जाता है।"और फिर से रो दी ...तब मैं, चाहे छोटी थी लेकिन  मुझे भी गलत बात का विरोध करना तो आता था .मुझे बहुत हैरानी हुई थी ,आंटी तो इतनी बड़ी है क्यूँ मार खा गयी जबकि  वह गलत भी नहीं थी ...!

उसके बाद आंटी ऐसे ही सहन करती रही फिर उनकी सरकारी स्कूल में नौकरी भी लग गयी अंकल ने भी वहीँ तबादला करवा लिया जहाँ आंटी की पोस्टिंग थी और पापा का भी तबादला दूसरी जगह हो गया और हमने भी वह  शहर छोड़ दिया .......

कई साल बीत गए ; मैं ग्यारहवी कक्षा में  आ चुकी थी। एक दिन मैं इम्तिहान की तैयारी कर रही थी सहसा दरवाजे पर दस्तक हुई तब दोपहर के लगभग दो बजे थे। दरवाज़ा खोलने पर देखा तो एक जानी पहचानी सी औरत खड़ी थी। ध्यान से देखा तो बोल पड़ी "आप नीरू आंटी ...! है ना ...!"

फिर माँ को आवाज़ दी तो वो दोनों बड़ी खुश हुई .कुछ देर बाद जब स्नेह-मिलन हो गया तो माँ ने हाल चाल पूछा  तो आंटी ने मायूसी से बताया ,"रमेश जी वैसे ही हैं, उनका शक अब लाइलाज बीमारी में  बदल गया है ;कभी खुद को ,कभी मुझे और कभी बच्चों को तो बहुत  पीटते है। एक बार तो अरुण के बाल खींच कर ही हाथ में निकाल दिए और एक बार आँख पर मारा तो बहुत बड़ा निशान हो गया , बस आँख का बचाव हो गया।
कितने ही डॉक्टर्स को दिखाया पर कोई हल नहीं। पागल-खाने में भी डाल कर देखा। उनके परिवार वाले और अब तो आस -पड़ोस के लोग भी मुझे दोषी मानते है। मैंने कितना समझाया रमेश को ,अगर मैं किसी से शादी कर ही लेती तो उसकी मार खाने को उसके साथ किसलिए रहती।लेकिन  उसके दिमाग मैं जो  शक का कीड़ा घुस गया था वो उसे और  परिवार की सुख-शान्ति और खुशियों को खाए जा रहा था। "

 माँ उनकी बातें सुन कर रो पड़ी पर आंटी की आँखे सूनी ही थी। अब कितना रोती वह भी !आंसुओं की  भी कोई सीमा या सहनशक्ति  होती होगी ,ख़त्म हो गए होंगे वे  भी अब तक। उनकी आँखों में तो बस उनके बच्चों के भविष्य की चिंता ही थी बस।

बच्चों के बारे में  पूछा तो बताया कि वे दोनों  ठीक है और पढ़ाई में भी ठीक है।  थोड़ी देर बाद आंटी चली गयी तो माँ ने उनके  बारे में बताया कि  नीरू आंटी के माँ बचपन में ही गुज़र गयी थी। उनको पड़ोस की मुहं-बोली बड़ी माँ ने पाल कर बड़ा किया था । मायके मे उनका कोई भी नहीं है और ससुराल वाले भी तभी साथ देते हैं जब  पति मान-सम्मान देता है।

"तो माँ , वो जुल्म क्यूँ सहती रही ,क्यूँ नहीं छोड़ कर चली गयी जब कि वो खुद अपने पैरों पर खड़ी थी !उनकी कोई गलती भी नहीं थी  और उनके परिवार  वालों ने अंकल को क्यूँ नहीं समझाया ...!"मैंने कुछ हैरान और दुखी हो कर माँ से पूछा।

 "अब वह  क्या करती बेचारी , अगर छोड़ कर चली जाती तो क्या दुनिया उसे जीने देती ...! उसे तो और भी कुसूरवार समझा जाता। मैंने उसे एक बार ऐसा करने को कहा भी था तो उसने मना कर दिया एक तो दुनिया की  बदनामी और इंसानियत भी उसको यह करने मना कर रही थी के अगर वो भी इसे छोड़ कर चली जाएगी तो ये तो ऐसे ही मर जायेगा चाहे मन में प्यार नहीं इसके लिए फिर भी वो उसके बच्चों का पिता तो था। उसने अपनी इसे ही किस्मत मान ली थी।" माँ ने बहुत दुखी स्वर में बताया।

मुझे सुन कर बहुत दुःख हुआ सोचने लगी कब तक औरत सक्षम होते हुए भी अपने उपर लांछन सहती रहेगी, क्यूँ नहीं हिम्मत जुटा पाती .क्यूँ गलत बात का विरोध नहीं करती.क्या विवाह किसी -किसी के लिए इतनी बड़ी सजा भी होता है ...!

 उनके मायके में कोई नहीं था तो उनके ससुराल के परिवार में तो महिलाएं थी क्या उनको भी आंटी का दर्द समझ नहीं आया ...? क्यूँ नहीं अंकल को समझाया कि आंटी गलत नहीं थी और कोई भी परिचित ,रिश्तेदार या मित्र किसी ने भी नहीं समझाया के आंटी बे-कसूर थी ...!

उसके बाद मै आंटी से नहीं मिली .बी .ए करने के बाद मेरी  शादी हो गयी और अपनी  गृहस्थी में रम गयी।फिर उड़ते -उड़ते खबर सुनी रमेश अंकल ने अपने को आग लगा कर आत्महत्या कर ली। शक की आग मे जलते रहने वाले शख्स को आग ने भी जल्दी ही पकड लिया होगा ...!

     नीरू आंटी ने पहले भी बच्चों को माँ-बाप दोनों प्यार दिया था और अंकल के जाने के बाद भी ,उनको आगे बढ़ने का हौसला दिया। यह  औरत का ही हौसला होता है जो सब कुछ सहन करके भी पर्वत की  तरह हर मुश्किल से जूझती रहती है। और आज उनकी मेहनत का  फल उनके  सामने था उनके बड़े बेटे की  कामयाबी ! उनके चेहरे से ख़ुशी झलक रही थी पर एक दर्द कि हलकी सी रेखा भी थी उनकी आँखों में।

  वह जरुर अंकल का ख्याल कर रही होगी कि  अगर आज सब-कुछ ठीक होता तो क्या ये ख़ुशी उनकी अपनी नहीं होती ....!

सोचते-सोचते ना जाने कब  मेरे भी आंसू बह चले और मैं खोयी हुई सी बैठी रही  जब तक कि शेखर ने मेरे हाथों से अखबार ना ले लिया और बोले "आज किसकी  आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना हो रही है ...!
"
"आज ये ख़ुशी के आंसू  है किसी की मेहनत या तपस्या सफल हुई है ," मैंने आंसू पोंछते हुए शेखर को तस्वीर दिखाते हुए सारी बात बताई तो उन्होंने भी अरुण की सफलता के पीछे आंटी का ही हाथ बताया और कहा "बेशक आज उनकी मेहनत सफल हुई है पर जो उनके, अपने ख़ुशी के दिन थे या जिन पर उनका हक़ था वो कौन लौटाएगा ...!
अपने दुःख की  कहीं न कहीं स्वयं नीरू आंटी भी जिम्मेदार है और दूसरे लोग जो उनको जानते थे वो भी जिम्मेदार है उन्होंने क्यूँ नहीं समझाया उनके पति को ....! बस एक जीवन यूँ ही बिता दिया उन्होंने। "
मैं भी शेखर की बातों से पूर्ण रूप से सहमत थी।  ख़ुशी और कुछ भरा मन ले कर मै उठ गयी।

---उपासना सियाग



.............................................................................................( चित्र गूगल से साभार )