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शनिवार, 19 दिसंबर 2020

है दिल को तेरी आरजू

    है दिल को तेरी आरजू...

   पिछले सात दिनों से लगातार हो रही बारिश से  नदी का स्तर भी बढ़ चला था। नदी किनारे बसे गाँव बस्तीपुर में अफरा-तफरी का माहौल था। प्रशासन का  ऐलान हो चुका था कि सभी जन अपने जरुरी सामान समेट  लें। कभी भी घर छोड़ना पड़ सकता है।
       यह कोई पहली बार नहीं था ; बहुत बार ऐसा हो चुका है। कितनी ही बार घर छोड़ना पड़ा है। लेकिन इस बार तो यूँ महसूस हो रहा है कि अबकी बार कुछ न बचेगा। सब कुछ जल मग्न हो जायेगा। साक्षात् प्रलय के दर्शन हो रहे थे।
        चंदना किंकर्तव्यमूढ़ सी बैठी थी। क्या समेटे ? क्या रखे ! दो साल पुरानी गृहस्थी थी। कितने अरमान से सामान बनाया था। पति की थोड़ी सी खेती थी। पिछली बाढ़ से जमीन उपजाऊ हो गई थी तो फसल भी अच्छी ही हुई थी।  घर की मरम्मत के साथ कुछ नया सामान भी बनाया था।
         " ए चंदनी ! क्या सोच रही रही है ! " पति चिल्ला कर बोला तो वह चिहुंक पड़ी। उसे अपना ऐसे नाम लेना पसंद नहीं था। कई बार पति को टोक भी चुकी थी। लेकिन वह ऐसे ही बोलता था। झिड़क कर , चिल्ला कर !
      " आ..हाँ ...! " अभी बहस का समय तो नहीं था। इसलिए उसने सामने रखी संदूकची में कुछ कपड़े रखे। रूपये थे कि नहीं वह तो उसे पता नहीं था।  वह सब तो पति और ससुर के आधीन था।
           एक संदूकची उसकी सास ने भी तैयार कर ली थी।
  " चन्दना बिटिया .... जो कुछ भी तेरे नाक-कान का जेवर है वो तू पहन ले ... संदूकची का पता नहीं कहाँ जाये , हमें मिले या न मिले !" सास का  प्यार भरा लहजा हमेशा उसके हृदय पर रुई के नरम फाहे रख देता था।
  " और अम्मा ! कोई हमारा गला काट कर ले गया तो ! " वह खिलखिला कर हँस पड़ी। विपरीत परिस्तिथियों में उसका यूँ हँसना भैरव को नहीं सुहाया।
   फिर चिल्ला पड़ा ," चंदनी तू  खी -खी मत कर ... बाहर जा कर देख जरा कैसे जल-थल एक हो रहा है। "
    " नहीं जाएँगे हम बाहर ! हमें पानी से डर लगता है ! "
   " डरने से क्या होगा .. जाना तो पड़ेगा ही न ! " यह चिंतित आवाज़ उसके ससुर की थी।जो कि बार -बार आँसू पोंछ रहा था।
   सभी घरों में लगभग यही हाल था। किसी ने तो मकान कुछ अर्से पहले ही पक्का करवाया था। किसी को बेटी की शादी की चिंता थी। हर एक की अपनी चिंता थी। सभी का खेती-कारोबार नष्ट हो रहा था।
     और घर के बाहर  जल का ताण्डव था ; जो कि अब नदी की सीमा पार कर चुका था। दिन चढ़ते-चढ़ते  पानी घरों में घुसने लगा था। त्राहि-त्राहि मची थी। बरसती बारिश में भी घरों की छतों पर पहुँच गए थे। दूर तक कोई सहायता करने वाला नज़र नहीं आ रहा था।  अपनी मेहनत की कमाई को डूबते देख हताश-निराश हो रहे थे। दिमाग में एक साथ असंख्य विचार आ रहे थे कि अब क्या होगा ? करेंगे क्या ?
         तभी सामने से सेना के जवान कश्तियाँ ले कर आते दिखे तो कुछ राहत सी लगी।
    सबसे पहले बच्चों और बूढ़ों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया।  उसके बाद महिलाओं की बारी थी। चन्दना तो छत पर दुबक कर बैठी थी। उसके सास-ससुर को ले जाया जा चुका था। उसने भैरव का हाथ पकड़ लिया , " हम तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाएँगे ... तुम यहीं रह गए तो ! कुछ हो गया तो फिर  ? "
    " तो तुम भी मर जाना ... अभी तो जाओ यहाँ से ! " भैरव चिल्लाया।
" अरे कुछ नहीं होगा , सब की जान बचाएंगे हम ! " एक जवान बोला।
लेकिन चन्दना तो पति का हाथ पकड़ कर और दुबक गई।
" क्या तमाशा है यहाँ  ! " दूसरा जवान चिल्ला कर पूछ रहा था।
" एक महिला है जो अपने पति का हाथ नहीं छोड़ रही है ..."
" जरा रुको , मुझे देखने दो ... ए माई , क्या है ये ? तेरे कारण यहाँ सबकी जान पर बन रही है ; और भी लोगों को ले जाना है हमें ! " सख्ती से बोलते हुए उस जवान में चन्दना को अपनी बाजुओं में उठा कर नाव में डाल दिया।
      उसकी तो, इतना सारा पानी देख कर जान ही निकल गई। वह झट से पास बैठी राजो की गोद में सर दुबका कर बैठ गई।  कानों में सिर्फ स्त्रियों का प्रलाप ही सुनायी दे रहा था।  नदी का शोर मचाता पानी जैसे सब कुछ लील लेना चाहता हो।
       परबतिया हाथ जोड़े सिसकते हुए नदी मैया से प्रार्थना कर रही थी , " मैया ! तू तो जीवन देती है आज जीवन लेने पर कैसे उतर गई। तेरे सहारे ही हम फूलते-फलते हैं और  तू ...." जोर से रो पड़ी। कितनी  चिंता थी सभी के मनों में । सब कुछ बिखरा था। पति कहीं ! बच्चे कहीं ! अगर उनको कुछ हो गया तो हम क्या करेंगी। मनों में हौल उठ रहा था।
        आसमान से पानी अभी भी बरस  रहा था।
       चन्दना ने खुद को सिकोड़ते हुए धीरे से गर्दन उठाई। देखा बहुत सारा पानी ही पानी ! चिल्ला कर वह फिर से राजो की गोद में  दुबक गई। और कोई मौका होता तो सब उसका बहुत मज़ाक बनाती । अभी तो सबकी जान सांसत में थी।
         आखिर में नाव को किनारा मिला। सूखी जगह मिली। थोड़ी ही दूर शिविर बने हुए थे। चन्दना को राहत मिली। अब वह अपनी सास को ढूंढ रही थी। सारा गाँव था सामने कि उसकी सास भागी हुयी आई और उसको लिपटा लिया। दोनों रो पड़ी। सभी का यही हाल था।
         रात तक लोगों को राहत शिविरों में लाया जा चुका था। कपड़े अब तक गीले थे। सामान आया तो था पर रात का समय था। ढूंढा नहीं जा सका। अस्थायी तौर से लाइट की व्यवस्था थी।  कई सारे  शिविरों में पुरुषों और स्त्रियों  की अलग-अलग की व्यवस्था की गई थी। एक बात सभी को राहत दे रही थी कि किसी की जान नहीं गई थी।सभी सुरक्षित थे। अब बारिश भी रुक गई थी।  भीगे कपड़े सूखने तो लगे थे। लेकिन ठंडी हवा सिहरा दे रही थी।
          सेना के जवान मुस्तैदी से लगे थे।  पहले बचा कर लाये ;अब खाने और दवाइयों की व्यवस्था भी कर रहे थे। उनका शिविर अलग था।
          शिविरों में दरी बिछा दी गई थी। ओढ़ने को चादर दी गई थी। खाने को दाल-भात मिला । चहुँ ओर एक रुआँसी सी ख़ामोशी थी। कभी कोई बच्चा चिल्ला पड़ता था तो कोई बुजुर्ग खांस पड़ता था।
     चन्दना ने देखा की उसकी सास काँप रही है। वह झट से उठ बैठी और देखा उसको तो बुखार है। उसने अपनी चादर भी ओढ़ा दी। शिविर के बाहर देखा तो सेना के जवान बाहर बैठे थे। उसने इधर - उधर देखा , पति और ससुर नज़र नहीं आये।
          उसे देख एक बोला , " क्या बात है ? क्या समस्या है ? "
     कितना कोमल और विनम्र स्वर था !आवाज़ उसे जानी- पहचानी सी लगी। शायद यही वह सैनिक था जिसने उसे नाव  में बैठाया था।
          " वो हम ...  अपने पति को देख रही थीं  ... "
       " क्या नाम है ? "
     " भैरव। "
      " अब इतनी लोगों में कैसे पता करूँ कि वह कहाँ मिलेगा ! मुझे बता दो , क्या सन्देश देना है .... "
    चन्दना चकित -सी थी कि कोई पुरुष इतनी कोमलता और धीरजाई से भी बोल सकता है ! चुप सी उसके मुँह  को ताकती रही।
       फिर संभल कर बोली , " अम्मा को ठण्ड लग रही है ; शायद बुखार हो गया है ...."
  " हाँ तो ऐसे बोलो ना .. मैं डॉक्टर को भेजता हूँ ...."
   थोड़ी देर में डॉक्टर ने आ कर ना केवल उसकी सास को बल्कि जिस किसी को भी कोई तकलीफ थी , दवा दे कर गया।
       चन्दना को नींद नहीं आ रही थी। और वह ही नहीं , सो तो कोई भी नहीं रहा था।  बाढ़ ने सब कुछ लूट लिया था।
        वह सास के  पैर दबाने लगी क्यूंकि वह बहुत बैचेन थी।  बहुत साल पहले बाढ़ ने उसके बापू और छोटे बेटे को लील लिया था। तब से हर बरसात के बाद बाढ़  उसके घाव हरे कर जाती थी।  छिले हुए घाव बहुत टीस  दिए जा रहे थे।
     " अरी बिटिया ! अब कुछ नहीं बचेगा , हाय मैं ही मर क्यों नहीं जाती ! "
" देखो अम्मा ,ऐसे करोगी तो दवा  नहीं लगेगी तो सच में ही मर जाओगी ! फिर हमारा कौन है ? " चन्दना ने दुखी होते सास को पुचकारा।
       कितनी लम्बी रात थी।  सुबह होने का नाम नहीं। एक तरफ मच्छरों/ झींगुरों की भिनभिनाहट और दूसरी तरफ नदी का चिंघाड़ता पानी !
         उसे याद आया जब यह नदी शांत हो कर बहती है तो कितनी सुहानी लगती है। कई बार वह और भैरव नदी किनारे  जाते हैं।
 एक दिन भैरव ने उससे प्यार जताते हुए कहा था , " तुझ पर मुझे इतना प्यार आ रहा है कि तुझे नदी में डुबो कर ही मार दूँ ! फिर जोर से हँस पड़ा था। वह चुप उसके मुँह को ताकती रही कि ये कैसा प्यार है !
       राजो और परबतिया उठ कर बाहर चली तो वह भी उनके पीछे चल पड़ी। अम्मा भी सो चुकी थी। वे तीनों बाहर खड़ी हो कर मौसम का जायजा लेने लगी।
       " कितना समय हुआ होगा ..." यह राजो थी।
     " तीन बजने वाले हैं ! क्यों ? अब क्या हुआ है ! " एक सैनिक चिल्ला कर बोला।
   " कुछ नहीं भाई जी ! हम तो ऐसे ही पूछ रहे हैं ! "
 " ठीक है फिर , जाओ सो जाओ ! "
        नींद आ तो नहीं रही थी पर फिर भी बदन ढीला पड़ते ही आँख तो लग ही गई। सुख भरी उम्मीद की सुबह की आस में।
      सुबह तो और भी निराश करने वाली थी। शोर -शराबा , चिल्लाहट -कराहट भरे शब्दों से सराबोर। बरसात थम गई थी पर पानी अभी  उतार पर नहीं था।
          अम्मा का बुखार अब ठीक था। सभी औरतें घेरा डाल कर बैठी थी। तभी शोर सा हुआ तो  सभी का ध्यान शोर की तरफ गया। पता लगा कि सुबह-सुबह पंडित जी जो कि  गांव के मंदिर के पुजारी भी थे ; सुबह का ध्यान -पूजन करने लगे तो कुछ युवाओं का खून खौल उठा।  पंडित जी को घेर लिया।
      " ये क्या है पंडित जी ! किस भगवान को याद कर रहे हो ? "
     " ये मेरा रोज का नियम है ! "
  " होगा नियम ! पर आप उस भगवान को बुलाओ तो सही जो हमें हर साल ऐसे दुःख देता है ....."
  " भगवान किसी को दुःख नहीं देता बेटा ....ये हमारे कर्म हैं जो भोग रहे हैं !
  " तेरे कर्मों की ऐसी की तैसी ! जो दुधमुहाँ बच्चा है , उसके भी कर्म खराब है क्या ? " भैरव तो जैसे मारने को हुआ।
       शोर सुन कर बचावकर्मी भी आ गए।  कैसे ही समझा कर सबको शांत किया।
    चन्दना  ने देखा  कि वही सैनिक सबसे आगे था और उसने कितने आराम से सबको समझा-बुझा कर शांत किया था। उसने उसे गौर से देखा। थोड़े से गहरे सांवले रंग , सुन्दर गठीले बदन का  और बहुत लम्बे कद का था। वह उसे जाते हुए देखती रही। उसके एक -एक कदम पर चन्दना के मन में कुछ हलचल सी हो रही थी।
         किसी के पास  कोई काम तो था नहीं। जब तक धूप नहीं चढ़ गई  पानी के पास ही बैठे रहे। कुछ महिलाएँ खाना बनाने के काम में लग गई। उनमे चन्दना भी थी।
            उसे  दूर से वह सैनिक भी दिख रहा था। जो कि गाँव के गणमान्य लोगों  के साथ हालत का जायजा ले रहा था। उसकी सास भी करीब ही बैठी थी। सैनिकों को आशीष दिए जा रही थी, " ये भी तो अपनी माँ के लाल हैं , किसी के पति ,भाई और पिता हैं ... जान  हथेली पर सब रखे जगह मौजूद होते हैं... जुग-जुग जिए ऐसे माँ के लाल !" उसे देखना चन्दना को बहुत भला  लग रहा था।
         सारा दिन बेकार शिविर में बैठे -बैठे सबको उकताहट सी हो रही थी। चन्दना ने अपनी सहेलियों  को बाहर चल ने  का इशारा करती हुई चल पड़ी। बाहर आ कर सुकून मिला लेकिन सिर्फ तन को ही ; मन को सुकून कहाँ था। एक पेड़ की घनी छाया में बैठ गई। दूर तक फैला पानी और पसरी हुई उदासी , माहौल को भारी बनाये जा रही थी।
          " हमनें  इस धरती पर जन्म ही क्यों लिया ? यहाँ रहना कितना मुश्किल है !  अब यह पानी जाने कब उतरेगा और कब हम घर जायेंगे ......"
          " हाँ और नहीं तो क्या ! घर भी मिलेगा या नहीं ...., अब तो दो महीने के लिए जिन्दगी मुश्किल हो गई है ...., घर की मरम्मत करेंगे या सामान जुटाएंगे ..."
      " सच्ची ! कैसा जीवन है हमारा ! जीवन पटरी पर आएगा तब तक फिर से वही सब-कुछ ..."
        साखियों की वार्तालाप का विषय घूम फिर कर घर की चिंता में ही आ रहा था। तभी खट -खट की आवाज़ से सभी चौंक पड़ी। आवाज़ पेड़ के तने से आ रही थी। उछल कर खड़ी हो कर कौतुहल से देखने लगी। पेड़ के तने में एक कोटर था। वहाँ कठफोड़वे के छोटे-छोटे बच्चे थे।
     उनको देख कर सभी  अपनी  सारी उदासी भूल कर किलक पड़ी।
   " देख तो लक्ष्मी ! कितने प्यारे-प्यारे बच्चे हैं ....."
" सच्ची रे .... , चीं -चीं -चीं ...."
  " हाहाहाहा ये कोई चिड़िया है क्या जो चीं -चीं करेगा , ये तो हुदहुद के बच्चे हैं ....."
     " ए चंदनी ! क्या हँसी - ठट्ठा लगाया है ! कुछ शर्म लिहाज है कि नहीं , सारा गाँव है यहाँ ! " भैरव की कर्कश आवाज़ से सभी चमक पड़ी। चन्दना का मुँह उतर गया और अपमान से रंग काला पड़ गया। तम्बई रंग में जैसे कालिमा घुल गई हो।
        सभी एक कतार में शिविर में चली गई।  राजो धीरे से बोली," चंदी ..ये भैरव ऐसा क्यों है ? "
     " पता नहीं ..."
     " उसकी माँ तो बहुत अच्छी है , कुछ कहती नहीं क्या ! "
     " कभी कहती तो है ....कभी कहती है कि परेशान है  बेचारा , सुन लिया कर ..."
     " यह भी क्या बात हुई ...परेशानी है तो चीखने से कम हो जाएगी क्या ?
     " तो क्या वह रात को भी ऐसा ही ....! " परबतिया ने धीरे से फुसफुसाया तो उसकी बात बीच में ही काट कर चन्दना ने लजा कर उसकी पीठ पर धीरे से धौल जमा दी।
        पानी अगर नहीं उतरा तो आने वाले दिनों में हालात गंभीर होने वाले थे। न केवल इंसानों के खाने-पीने बल्कि मवेशियों के भी खाने पर संकट आने वाला था। बीमारी फैलने का भी तो खतरा था।
          चिंता -मुक्त थे तो बच्चे ! कोई फ़िक्र नहीं ..
    वे  बकरी का बच्चा उठा लाए थे। उसी के पीछे भाग रहे थे। चन्दना के मन का बच्चा भी जाग गया। वह भी भागी और उसे उठा कर दूर झाड़ियों की ओर दौड़ पड़ी। बकरी का बच्चा भी घबरा कर - कसमसा कर उसकी गोद से उछल कर भाग गया।
      इस से पहले वह उसके पीछे भागती ; एक जानी - पहचानी आवाज़ सुन कर ठिठक गई।  यह आवाज़ उसी सैनिक की थी। वह खींची -सी चली गई। वह पेड़ के नीचे दूसरी तरफ मुँह किये फ़ोन पर बात कर रहा था। चन्दना की तरफ उसकी पीठ थी।
       " अरे चिंता मत करो ... मैं ठीक हूँ ! यहाँ कोई खतरा नहीं है और खतरे से जूझना ही तो हमारा काम है ! "
   "  ............................................. "
      " ऐसा तुम क्यों सोचती हो ... नदी का पानी हमें छू तक नहीं गया और देखो हमने एक भी जान नहीं जाने दी..."
 "........................................"
" हाहाहा .. तुम भी ना ! मेरी जान तो तुम सब में बसती है और तुम मुझे अपना राक्षस वाला तोता बता रही हो !"
"........................................ "
" देखो सुमि , हम सब अपने-अपने मोर्चे के सिपाही ही तो हैं। तुमने घर की जिम्मेदारी का मोर्चा संभाला है तभी तो मैं निश्चिंत हूँ।  सैनिक ही सीमा पर लड़ाई नहीं लड़ता है बल्कि उसके घर वाले भी एक लड़ाई लड़ रहे होते हैं ..."
".................................................."
" बातें तो तुम्हारे साथ रह कर ही सीखी है  ! हाहाहा ....."
"......................................."
" अच्छा सुमि अब फ़ोन बंद करता हूँ। तुम सबकी बहुत याद आती है। जल्दी ही मिलेंगे। बाय...."
         चन्दना कदम और दिल थामे  उसकी बातें सुनती जा रही थी। उसका यूँ प्यार और धीरजाई से बातें करना बहुत भा रहा था। उसके खड़े रहने का अंदाज भी बहुत मोहक था। सब कुछ उसके मन की गहराई में कहीं बसता जा रहा था। दिल में प्रेम का दबा हुआ एक सौता फूट पड़ा था ; जिसके सहारे वह सैनिक उसके दिल के तिकोने वाले हिस्से में जा बैठा।
          सहसा ही वह भैरव और सैनिक में तुलना करने लगी।  भैरव का ध्यान आते ही वह जैसे जाग गई  , कदम धीरे से पीछे किये कि पायल छनक गई। पायल की छनक सुनते ही सैनिक पलटा।
       " क्या हुआ ? यहाँ क्या कर रही हो ? ऐसे किसी की बातें सुना करते हैं क्या ? " बहुत प्यारी और सहज मुस्कान से चन्दना को देखते हुए चला गया।
     " हाय दैया ! "
  यह क्या हुआ ! वह तो वही जमीन पर धम से बैठ गई। दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
    " हमको ये क्या हुआ जा रहा है , उसकी आँखे ... उसकी मुस्कान ! जाने कैसी थी .... हाँ यही तो है वो आँखे हैं जिनकी तलाश थी उसको बरसों से या सदियों से ..! "
      वह चित लेट गई धरती पर ही।  मन पंछी उड़ने को आतुर था।
       आसमान में काली घटाएँ घिर आई थी। आज उसको किसी की कोई चिंता नहीं थी। मन कर रहा था कि धरती पर लोट जाये। जहाँ वह सैनिक खड़ा था , वहाँ की धूल अपने माथे पर लगा ले। अपने बदन पर लपेट ले। जोगन हो जाने का मन हो आया। बदन से चंदन की महक उठने लगी।
         भावातिरेक में खिलखिला कर हँस पड़ी।
      " चन्दना बिटिया ! " सास की आवाज़ से चौंकी।  आँखे खुली तो देखा दूर तक उदासी के अलावा कुछ भी नहीं था।
    " अरी क्या हुआ .... ऐसे पगली की तरह क्यों हँस रही है .... तबियत तो ठीक हैं न ...."
   " ना अम्मा ... कुछ भी ठीक नहीं है ..." मुंदी आँखों से उसने कहा।
   " वह तो दिख ही रहा है कि ठीक नहीं है ,तेरे लच्छन बता रहे हैं ! हुँह ..."
    अम्मा की बात सुन कर उसकी पूरी आँखे खुल गई।  सास से पूछने लगी ,  " अच्छा अम्मा ! नदी कब तक उतरेगी  .. "
       " यही तो बताने आई थी ...पानी उतरने  लगा है !  कल तक शायद हम भी लौट चलें !" अम्मा की आवाज़ में ख़ुशी झलक दिखाई दी।
        " इतनी जल्दी ! "
    " क्यों तुझे घर नहीं जाना क्या ? "
    " जाना क्यों नहीं है अम्मा ! "
      चन्दना  कहने को तो कह गई पर उसका दिल बैठ सा गया।  अभी तो जिंदगी मिली थी और फिर से वही जहालत भरी जिंदगी में जाने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन सच्चाई तो यही थी।
      फिर सोचा कि अभी दो दिन की जिन्दगी और है। जी लूंगी.... सारे जीवन को पोषण करने को खाद-पानी जो मिल जायेगा। मुस्कुराती हुई अम्मा के पीछे दौड़ पड़ी।
               अगली सुबह नदी सच में ही उतर चुकी थी। सभी खुश थे। चन्दना भी खुश थी। लेकिन सच में वह खुश नहीं थी।स्थिति को सामान्य होने में  दो दिन लग गए थे। । घरों से पानी ही निकला था। नुकसान भी तो बहुत हुआ था। प्रशासनिक अधिकारी जाँच-पड़ताल में लगे थे। कितना नुक्सान हुआ है और कितना हर्जाना मिलेगा !
          इस बीच चन्दना को सैनिक का इधर -उधर मुस्तैदी से काम में लगे रहना बहुत लुभा रहा था। लेकिन उसकी चंचलता गुम - सी हो गई थी। सखियों ने ,सास ने कई बार पूछा भी ... छू कर भी देखा की कहीं बुखार तो नहीं है। वह तप तो रही थी लेकिन बुखार से नहीं , आने वाले समय में मिलने वाली विरह की अग्नि में !
         कभी वह भैरव से उसकी तुलना करने लगती तो लगता कि वह क्यों सूरज और दीपक में तुलना कर रही है ?  उसे मालूम तो था ही कि उसके अँधेरे जीवन में  दीपक ही प्रकाश करेगा। सूरज का क्या , वह तो शाम को ढल जायेगा किसी और देश में प्रकाश करने के लिए !
           गाँव वालों को छोड़ने के लिए सेना के ट्रक आ गए थे। अब चलने का समय था। एक ख़ुशी भरा शोर था। तभी सरपंच जी ने आ कर कहा कि राखी का त्यौहार नजदीक ही है तो क्यों ना सभी सैनिक भाइयों की कलाइयों पर राखी बांध कर , पहले ही मना लिया जाये।
        पूजा में काम आने वाली मोली लिए औरतें, जिनमें चन्दना भी थी , राखी की तरह सैनिकों की कलाइयों बांधने लगी।  सैनिकों के चेहरे पर बहुत कोमल भाव थे और आँखों में नमी। वे भी तो अपनी बहनों को याद कर  रहे होंगे। चन्दना ने बाकी सैनिकों को तो राखी बाँधी लेकिन उस एक सैनिक के सामने आते ही काँप उठी...  मुँह का रंग पीला पड़ गया। उसने नज़रें उठा कर सैनिक की तरफ देखा तो उसने सहज भाव से मुस्कुरा कर अपनी कलाई आगे बढ़ा दी।
             चन्दना से धागा बाँधा ही नहीं गया और मुँह घुमा कर रो पड़ी।  थोड़ा पीछे हट कर दौड़ पड़ी , कोटर वाले पेड़ के नीचे जा कर रोने लगी। सबको हैरानी हो रही थी कि इसे क्या हुआ ! वह रोई क्यों  !
       " उसे अपना भाई याद आ गया होगा ! छह महीने से मिली जो नहीं ..." चन्दना की सास ने कहा।
       एक दिन वह था जब वह घर नहीं छोड़ना चाहती थी और आज का दिन था  वह यहाँ से जाना नहीं चाहती थी। वह फिर से वही घड़ी -पल आत्मसात का लेना चाहती थी। उसे मालूम था फिर यहाँ नहीं आना होगा। दोनों हाथ फैला कर सूरज को अपने हाथों में समेटने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
        " यहाँ क्या कर रही हो ? तुम्हारे लिए  गाड़ी फिर से आएगी क्या ? " सैनिक की आवाज़ सुन कर चौंक गई।
        आज उसने नज़रें न झुकाई , न ही चुराई और न ही दौड़ लगाई। अनपढ़ चन्दना सैनिक की आँखों में झाँक कर प्रेम की सारी पढाई कर लेना चाहती थी। सैनिक भी थोड़ा चकित था। अपनी ओर  चन्दना को अपलक देखते हुए पाया तो झेंप गया। उसको चलने को बोल कर मुड़ गया।
      ट्रक के छत के सुराख से आती हुई जाते , शाम ढलते हुए सूरज की धूप को पकड़ने की नाकाम कोशिश ने उसे रुला दिया।  ट्रक चल पड़ा था। वह ढलते हुए सूरज को देर तक ताकती रही जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गया।
उपासना सियाग
(अबोहर)

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