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Friday, November 21, 2014

मैं सत्संग में गयी ही क्यूँ ?

      आज कल की आपाधापी में इंसान इतना हार चुका के उसे कहीं भी कोई आशा की किरण दिखती है वह उसी राह चल पड़ता है। इसीलिए आज कल तथाकथित श्री श्री बाबाओं की भीड़ जमा हो रही है और लोग उनको सुनने जाते है ताकि मन में शांति मिल सके।
     मन को शांति मिले या ना मिले बाबाओं के बेंक-बेलेंस तो बढ़ ही रहे हैं। मुझे इन बाबाओं में कभी कोई श्रद्धा नहीं रही और भीड़ से तो मुझे सख्त परहेज़ है। मुझे जब भी त्योहारों पर मंदिर जाना होता है तो भीड़ कम होने पर ही जाती हूँ ,क्यूँ कि भीड़ में मैं कही गुम हो जाती हूँ और लोगों के चेहरे पढने लग जाती हूँ। मुझे उनके असली रंग-रूप दिखने लग जाते हैं ,जैसे यह  औरत ये सोच रही है ..! या यह आदमी कितना  परेशान लग रहा है ये तो 
इसकी चाल  ही बता रही है , और भी ना जाने कई बातें सोचने लगती हूँ ....!
    भगवान् की पूजा-अर्चना तो एक तरह से भूल ही जाती हूँ ,  बेचारा भगवान भी परेशान तो जरुर होता होगा। जब भी मेरे बारे में सोचता होगा क़ि  उसने यह  क्या नमूना बनाया है !
      तभी  मैं कुछ याद करके जल्दी से घर को दौड़ पड़ती हूँ "अरे, भगवान को तो मैं घर का चौकीदार बना कर आयी हूँ !यहाँ तो कुछ नहीं है !!अब जल्दी से उसको मुक्त कर दूँ नहीं तो मंदिर में लोग भी परेशान होंगे !! "
    अब क्या है कि हम जहाँ रहते हैं वहां चोरी का बहुत खतरा होता है तो मैं जब भी घर से बाहर जाती हूँ तो शिव जी बोल देती हूँ कि "प्रभु जरा घर का ध्यान रखना ,मैं बाज़ार जा रही हूँ ,दरवाज़े पर ही बैठ जाना". ऐसे ही जब भी कही जाना हो तो भगवान को बैठा कर ही जाती हूँ और वो भी वहां से टस से मस नहीं होते ...!
     मेरी सासू माँ को सत्संग और कथा वाचन ,श्रवण करना बेहद पसंद है। एक बार वे मुझे बोली , "अगली बार जब सत्संग होगी ,तुम को भी ले कर चलूंगी। "
    अब नयी नयी शादी थी , सर हिला दिया आज्ञाकारी बहू बन  कर पर मन तो अशांत हो गया कि अब क्या करूँ !.फिर पति देव का ख्याल आया। उनको तो यह सब बिलकुल भी पसंद नहीं है। उनसे ही कहा जब माँ कथा सुनाने ले जाये तो आप मना कर देना ,और फिर ऐसा ही हुआ नहीं गयी और कभी भी नहीं गयी। माँ ने भी नहीं कहा उसके बाद।
   अभी कुछ महीनो पहले मेरी एक बिलकुल पक्की वाली सहेली आयी और बोली एक बाबा जी आये हैं और तुम भी चलो। उसको मालूम है कि मैं इन सबको नहीं मानती पर वह  मेरी सुन ही कब रही थी बोली "अरे बाबा जी बहुत छोटी उम्र के हैं तुम्हारे बड़े बेटे जितने ही है पर विचार देखो उनके ,मोह माया से दूर रहने को बोलते हैं ,बहुत अच्छे संस्कारों की  बात करते हैं तुम चलो तो सही एक बार !" उसने मेरी हां-ना कुछ भी नहीं सुनी और बोली कल दिन में दो बजे तैयार रहना।
  अब मैं सोचने लगी के बाबा जी में ऐसे क्या खास संस्कार होंगे जो मेरे बेटे में नहीं है बेटा बड़ो का मान -सम्मान  करना जानता है।   गलत संगति में भी  नहीं है। पढाई में भी अच्छा है। मेरी सारी बातें मानता है  और लड़कियों को भी नहीं छेड़ता ...! शायद नहीं ही छेड़ता होगा क्यूँ कि अभी तक तो कोई शिकायत आयी नहीं।
 चलो भई ,अब पक्की सहेली है तो जाना तो होगा ही सोच कर ठंडी सांस  भरी।
    दूसरे दिन ठीक दो बजे हम निकल लिए। एक बड़े से ग्राउंड में पंडाल बना रखा था। गर्मी और उमस के मौसम में पंडाल में बहुत गर्मी का अहसास हो रहा था। वैसे कही-कहीं पंखे भी थे। सामने स्टेज पर बाबाजी के लिए वातानुकूलित केबिन सा बना रखा था। 
       थोड़ी देर में समय के पाबंद ( सहेली ने बताया था ) बाबा जी बड़ी सी चमचमाती काले रंग की  कार से उतरे। सहेली के साथ-साथ  सभी उपस्थित लोगों के हाथ जुड़ गए ,लेकिन मेरे हाथ नहीं जुड़ पाए, ना जाने क्यूँ ...!उसने बहुत खुश होकर जितनी मुस्कान फैला सकती थी ,फैला कर बोली देखो बाबा जी सत्तर लाख की  गाडी में आये है।  मेरा दिल किया कि मैं जोर से ठहाका लगा कर हंस पडूं !अरे ,बाबा जी खुद तो इतनी महंगी कार में आये हैं और हमें कहते है कि मोह-माया से दूर रहो ,अब बाबा जी को क्या पता अगर मोह-माया ना हो तो  घर-गृहस्थी चलती है भला ...!भगवान् ने भी तो यह मोह -माया  सोच कर ही तो बनाया होगा... !
    अब बाबा जी स्टेज की तरफ बढ़ रहे थे। एक बार उनकी बात की जाये  तो बाबा जी की आकृति तो बहुत सोम्य और सुन्दर थी। लोग उनकी जय जय कार कर रहे थे और वो मंथर गति से अपने दोनों हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में किये आगे बढ़ रहे थे।
       मंच पर एक व्यक्ति ने बाबा जी का गुणगान करते हुए उनकी महिमा का बखान किया।  जिन लोगो ने दान की मोटी-मोटी रकम भेंट में दी थी ,उनके नामो को बताया गया। बाबा जी के साथ-साथ वे लोग भी बहुत संतुष्ट हुए।
    दोनों की अपनी -अपनी जगह संतुष्टि थी एक को माल मिलने की और दूसरो को अपने दान -दाता होने की। महिलाएं और पुरुष बाबाजी के चरण स्पर्श कर रहे थे और कुछ रुपये  या भेंट भी चढ़ा रहे थे। बढती भीड़ को देख कर मैं अपने आप से जुदा होने लगी थी। मैं  पहले से ही एक कोने  में बैठी थी जहाँ से लोगों और बाबा जी ,दोनों की प्रतिक्रियाए देख सकूँ।
     लोगों की श्रद्धा देख में अभिभूत भी थी और किंकर्तव्यमूड भी। वे कितनी श्रद्धा से एक ढोंगी बाबा के आगे नतमस्तक थे और कितने मूर्ख भी। पढ़े लिखे होने के बावजूद भी अपना समय और पैसा दोनों व्यर्थ गवां रहे हैं। यहाँ कितना चंदा दान में दे रहे हैं पर अगर कोई भूखा मर रहा हो तो या कोई मज़बूर हो तो उसकी मदद कोई नहीं करेगा।
       तभी  एक सुन्दर सी कन्या भी बाबा जी के सामने नतमस्तक हो रही थी और उसे देख बाबा जी के मुख मंडल पर कोमल भावनाएं छा गयी और फिर मेरा मन जोर से हंस पड़ा ..."हाय रे मानव मन ...जब विश्वामित्र ही नहीं बच पाए थे रूप-सौन्दर्य के आगे तो यह  तो पता नहीं साधू है भी या नहीं। "
   बाबा जी के प्रवचन में कोई भी ऐसी बात नहीं थी जो हमें प्राईमरी स्कूल की क्लासों में नहीं पढ़ी हो या मैं तो ये भी कहूँगी एक सी ग्रेड हिंदी मूवी में भी हम ये सब बातें सीख ही सकते है ,जैसे माता-पिता की सेवा ,सभी धर्म-जाति एक सामान है या देश प्रेम ...भाई -भाई का प्यार ....तो ये फिर बाबा जी के पास आने का तात्पर्य क्या है .जब सभी को मालुम है बुराई का अंत बुराई है तो वहां जा कर क्या सीख कर आते हैं हम यह  मुझे आज तक समझ नहीं आया ....!
बाबा जी का प्रवचन चलता रहा और मैं वहां से गुम ही रही। याद आ रहा था मुझे जब ये बाबा जी किसी और शहर में थे तो मेरी यही सखी वहां भी गयी थी इनके प्रवचन सुनने और आते ही मेरे पास एक कटोरी सब्जी मांगने आयी और बोली "आज तो बिलकुल हिम्मत नहीं है कुछ  बनाने की , तूने क्या बनाया है वो ही देदे बेटी को जोर से भूख लगी है !" मैंने उसे सब्जी देते हुए कहा खाना यही खा लो मेरे पास। वह  थोड़ी सी शर्मिंदा होते बोली कि वह रोटी तो ही  बना लेगी।
      तभी तालियों की गूंज ने मुझे वापस अपने आप में ला दिया और शीघ्रता  से वहां  निकलने की करने लगी और घर आ कर सांस लिया।
     उस दिन माँ भी खुश थी की चलो आज उनकी बहू सीधे राह चल पड़ी फ़िल्मी गीत संगीत से दूर हट कर सत्संग में जाने लगी है। लेकिन वे  ज्यादा देर खुश ना रह सकी क्यूँ कि मैंने बाबा जी की तारीफ में सारे उनके बखिया उधेड़ दिए। वे  नाराज़ हो कर बोली "तुम जैसों को सत्संग में जाने की  जरूरत ही क्या है जब कोई अच्छे बोल या राम का नाम तम्हारे कानो को छू कर ही नहीं गुज़रा। "
 अब  क्या बताती मैं, कानो को छुआ पर मन को ना छू सका बाबा जी के मुख से लिया राम का  नाम ....!