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Saturday, June 15, 2013

आशंकाओं की बदली ....

विक्रम ,सुधीर जी को कोटा से बस में बैठा कर , अपने बड़े भाई सुमेर को फोन किया कि  उसने बाबूजी को बस में बैठा दिया  और बस रवाना हो गयी है। बस शाम 4 बजे तक इंदौर पहुँच जाएगी ।
      बाबूजी को हमेशा वह कार से ही छोड़ने जाता है। इस बार उसकी पत्नी शानू की छोटी बहन आने वाली थी तो कार की जरूरत उसे थी। बाबूजी का जाना भी जरुरी था क्यूँ की सुमेर के बच्चों ने जिद की कि  इस बार दादा जी होली उनके साथ ही मनाये।
    लेने को तो सुमेर भी आ सकता था लेकिन उसके ऑफिस में बहुत काम था सो वह छुट्टी नहीं ले सका। सुधीर जी ने कहा कि  वे बस पर चले जायेंगे उनको कोई असुविधा नहीं होगी , ४ -५ घंटे का ही तो सफ़र है और आज कल बस का सफर भी आराम दायक हो गया है। आखिरकार उनको बस में भेजना ही तय हुआ।
    तीन साल हुए विक्रम-सुमेर की माँ का स्वर्गवास हुए तब से दोनों भाइयों ने पिता की देखभाल में कोई कसर नहीं रखी है। ना केवल जरूरतें पूरी करना ही बल्कि उनकी हर बात सुनना और राय  भी लेना भी नहीं भूलते। उनका जहाँ मन करता उसी बेटे के पास कुछ दिन रहने को चले जाते। पिछले तीन महीनों से वे विक्रम के पास थे।
        सुमेर ने बच्चों को जैसे ही कहा कि उनके दादा जी चल पड़े हैं तो जैसे एक ख़ुशी की लहर सी दौड़ पड़ी हो , उनके मन और घर दोनों में। नन्ही सोमाया झट से लॉन में पहुँच गयी और सोचने लगी कि दादा जी के लिए एक गुलदस्ता ही बना लूँ। दादा-पोती दोनों को ही फूल बहुत पसंद है। अब अवि भी सोच में पड़ गया कि वह दादा जी के स्वागत के लिए क्या करे कि दादा जी खुश हो जाये। बहू  रीना भी खुश थी पिता जी के आने की खबर सुन कर।
       जहाँ सुमेर के घर में दादा जी से आने वाली खुशियों का इंतजार हो रहा था , वहीँ विक्रम के घर में उदासी थी . रविवार का दिन ही तो मिलता था छोटी टुनिया और अभिषेक को दादा जी साथ सारा दिन बिताने को। दादा जी भी तो ज्ञान के भंडार थे और हंसी-मजाक करके सभी का मन बहला दिया करते थे।अब वे सिर्फ इंतजार ही कर सकते थे सिर्फ उन दिनों का जब दादा जी उनके पास फिर से रहने आयेंगे। टुनिया तो माँ से शिकायत भी कर बैठती कि वे सभी इक्कठे क्यूँ नहीं रह सकते हैं। लेकिन दोनों भाइयों की नौकरी ही ऐसे थी कि एक जगह रहना संभव ही नहीं था।
          खैर शाम के 4 बज गए। सुमेर दोनों बच्चों समेत बस-स्टेंड पहुँच गया। दूर से बस को आती देख खुश हो गए  सोमाया और अवि।लेकिन यह क्या ...! यह तो वह बस ही नहीं थी जिसमे सुधीर जी ने आना था।थोडा और इंतजार किया गया। सुमेर ने पिता को फ़ोन लगाया तो स्विच -ऑफ था। चिंता में पड़  गया सुमेर ...!
  विक्रम को फोन किया तो वह भी चिंता में पड़ गया कि यह क्या हुआ ? बाबूजी पहुंचे क्यूँ नहीं ...!
    सुमेर ने पूछा कि क्या उसने बस का नम्बर नोट किया था। विक्रम के मना करने पर वह जैसे उस पर बरस ही पड़ा उसकी लापरवाही पर।
         सभी फिक्रमंद हो गए की अब क्या किया जाये। बस को राह  में जंगल से भी गुजरना पड़ता है। ना जाने वहां क्या हुआ होगा ? डाकुओं की कार्य गुज़ारी की सम्भावना को नाकारा नहीं जा सकता था। सोच कर ही दोनों भाइयों का कलेजा मुहं को आ रहा था। सुमेर को पछतावा हो रहा था कि  आज तो रविवार था वह समय निकाल कर बाबूजी को खुद लाने जा सकता था। उससे यह भूल कैसे हो गयी। ना वह घर जा सकता था और ना ही वह बच्चों को इतनी देर साथ रख सकता था। बच्चे भी बार -बार पूछ रहे थे की दादा जी कब आयेंगे।
     उधर विक्रम परेशान ...! बस -स्टेंड गया , पूछताछ से कोई तसल्ली -बक्श जवाब नहीं मिला। और कहीं बस नहीं चला तो पत्नी पर ही खीझ उठा। शानू शायद तमक कर जवाब देती लेकिन अब तो वह भी चिंतित हो उठी थी और चुप रह गयी। कहीं न कहीं वह भी अपने को अपराधी मान रही थी की शायद यह उसकी वजह से हो रहा हो। फिर बोली , " अगर हम पिता जी को टैक्सी से ही भेज देते तो ठीक रहता। "
 विक्रम ने भी यह बात मानी। लेकिन अब क्या हो सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए।
उसे बचपन की घटना याद आयी जब वे दोनों भाई पिकनिक पर गए और राह में बस खराब हो जाने के कारण वे एक घंटे घर देर से पहेंचे थे और  बाबूजी को दरवाजे पर ही खड़ा पाया और माँ घर में चिंतातुर बैठी थी। कारण पता लगने पर पिता जी ने अगले दिन स्कूल जा कर प्रिंसिपल से शिकायत भी की थी।लेकिन वह अब किस्से क्या शिकायत करे।
बार -बार पिता जी को फ़ोन लगा रहा था और हर बार वही जवाब "स्विच -ऑफ ...!"
     सुमेर बच्चों को छोड़ कर फिर से बस स्टेंड आ गया। पूछताछ से भी कोई संतुष्टिदायक जवाब नहीं मिला।हार कर वहीँ बैठ गया एक बेंच पर।
        और बस क्या हुआ जिसमे सुधीर जी आ रहे थे ...!
   बस सच में ही खराब हो गयी थी। वह भी जंगल से गुजरते हुए। वहां किसी भी फोन के लिए नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। सुधीर जी को पता था कि  बच्चों को चिंता थी लेकिन वे भी क्या करते। बस ड्राइवर भी क्या करे। कोई पास से वाहन वहां से गुज़रे  तो उस पर शहर जाए और मेकेनिक को लेकर आये। तभी वहां से एक ट्रक  गुज़रा। ड्राईवर उसके साथ शहर तक गया और लगभग एक घंटे बाद ही आ पाया मैकेनिक को लेकर। बस ठीक होते -होते आधा -पौना घंटा तो लग ही गया। सुधीर जी के साथ -साथ दूसरे यात्री भी परेशान थे।सभी बात कर रहे थे कि  जब ऐसा रास्ता है तो एक मैकेनिक और दो सुरक्षा कर्मी भी बस के साथ होने चाहिए ।
       चार बजे इंदौर पहुँचने वाली बस चार बजे तो जंगल से रवाना हुई।


  दोनों भाई परेशान , एक -दूसरे को फोन लगा रहे थे कि कोई खबर आयी या नहीं। दोनों ही एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे की वे चिंता ना करें सब अच्छा ही होगा। दोनों  खुद को ही दोषी मान रहे थे के उनसे ही गलती हुई  है। सुमेर को मलाल था कि वह बाबूजी को खुद क्यूँ लेने नहीं गया तो वही विक्रम भी सोच रहा था कि  उसको ही बाबूजी को छोड़ कर आना चाहिए था।लेकिन अब तो इंतज़ार  ही किया जा सकता है।
       बस कुछ देर आगे पहुंची और नेटवर्क काम करने लगा तो लगभग सभी यात्रियों के फ़ोन बज उठे।सुधीर जी ने भी सुमेर को फ़ोन लगाया।
        सुमेर एक दम चौंक पड़ा जब देखा कि फ़ोन पर बाबूजी का नाम चमक रहा है और फोन बज रहा है। आँखे और गला दोनों भर आए ,जल्दी से फ़ोन रिसीव तो किया पर बोला ना जा सका उससे । उधर से सुधीर जी कह रहे  थे कि  बस खराब हो गयी थी ,अब सब ठीक है ,आठ बजे तक बस पहुँच जाएगी।
      सुमेर को ऐसे लग रहा था जैसे कोई बोझ उतर गया हो मन से। आँसू  पोंछ कर विक्रम को सूचना दी कि  बाबूजी ठीक हैं और आठ बजे तक पहुँच जायेंगे उसके पास। अभी छह ही बजे थे। सुमेर घर की तरफ चल पड़ा। वह सोच रहा था कि ये इंतजार के पल कितने भारी थे उसके लिए लेकिन अब आशंकाओं की बदली छंट गयी। वह मुस्कुरा पड़ा।



9 comments:

  1. फिक्रमंद बच्चों की व्यथा पढ़ कर भी सुकून मिला ..... भाग्यशाली हैं इस कहानी के बाबूजी ।

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  2. बहुत ही सुन्दर कहानी …मार्मिक …

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  3. बहुत सुंदर ...दिल को छू लिया ,काश सभी बच्चे ऐसे हो ,या माँ बाप की किस्मत ऐसी हो ....

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  4. इस कहानी के पात्रों से सच्चे और अच्छे दर्दमंद बच्चे यथार्थ में भी हर माता पिता को मिल जाएँ तो यह संसार स्वर्ग सा सुंदर हो जाये ! बहुत ही अच्छी सुकूनभरी कहानी !

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  5. मार्मिक कहानी

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  6. बड़ों की चिंता आपके संस्कारों को दर्शाती है

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  7. कहानी दिल को छू गयी...काश सभी बेटे ऐसे होते..

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